Friday, May 10, 2019

कुंडलियाँ छंद "विधान"

कुंडलियाँ दोहा और रोला के संयोग से बना छंद है। इस छंद के ६ चरण होते हैं तथा प्रत्येक चरण में २४ मात्राएँ होती है। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि कुंडलियाँ के पहले दो चरण दोहा के तथा शेष चार चरण रोला से बने होते हैं।

दोहा के प्रथम एवं तृतीय पद में १३-१३ मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे पद में ११-११ मात्राएँ होती हैं। कुंडलियाँ में दोहे के चौथे पद की रोला के प्रथम पद के रूप में पुनरावृति होती है। रोला के प्रत्येक चरण में २४ मात्राएँ होती है। चूँकि दोहे का चौथा पद रोला का प्रथम पद बनता है अतः रोला के चारों चरणों की सम रूपता बनाये रखने के लिए रोला के चारों चरणों की यति ११वीं मात्रा पर रखनी आवश्यक है, साथ ही इस पदका अंत  भी गुरु लघु से होना आवश्यक है।

रोला की मात्रा बाँट ८-६-२-६-२ की है। इसमें प्रथम यति की 11 मात्राएँ ८-३(गुरु लघु) तथा अंतिम यति की 13 मात्राएँ ३-२-६-२ के मात्रा बाँट में रहती है। त्रिकल के तीनों रूप(1-1-1, 2-1, 1-2) तथा द्विकल के दोनों रूप(1-1, 2) मान्य है।

कुंडलियाँ छंद का प्रारंभ जिस शब्द या शब्द-समूह से होता है, छंद का अंत भी उसी शब्द या शब्द-समूह से होता है। सोने में सुहागा तब है जब कुंडलियाँ के प्रारंभ का और अंत का शब्द एक होते हुए भी दोनों जगह अलग अलग अर्थ रखता हो। साँप की कुंडली की तरह रूप होने के कारण ही इसका नाम कुंडलियाँ पड़ा है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

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