Saturday, January 16, 2021

आरोही अवरोही पिरामिड (वक्त का मोल)

(1-7 और 7-1)

(वक्त का मोल)

जो
मोल
वक़्त का
ना  समझे
पछताते वो।
हो काम का वक़्त
सोये रह जाते वो।

हाथों  को  मलने से
लाभ अब क्या हो?
जो बीत  गये
पल नहीं
लौट के
आते
वो।।
*****

(क्षणभंगुर जीवन)

ये
चार
दिनों का
जीवन है
नाम कमा ले।
सत्कर्मों की पूँजी
ले के पैठ जमा ले।

हीरे सा ये जीवन
न माटी में मिला।
परोपकार
कर यहाँ
धूनी तु
रमा
ले।।
********

(वर्तमान)

जो
बीत
चुका है
उस  पर
नयन बन्द
लेना तुम कर;
यूनान मिश्र रोमाँ
मिटे आज खो कर;
नेत्र रखो खुल्ला
वर्तमान  पे;
सार सदा
इस में
जग
में।
*****

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
14-08-18

क्षणिका (कैनवस)

(1)

पेड़ की पत्तियों का
सौंदर्य,
तितलियों का रंग,
उड़ते विहगों की
नोकीली चोंच की कूँची;
मेरे प्रेम के
कैनवस पर
प्रियतम का चित्र
उकेर रही है,
न जाने
कब पूरा होगा।
**

क्षणिका (जिंदगी)
(2)

जिंदगी
चैत्र की बासन्ती-वास,
फिर ज्येष्ठ की
तपती दुपहरी,
उस पर फिर
सावन की फुहार,
तब कार्तिक की
शरद सुहानी
और अंत में
पौष सी ठंडी पड़
शाश्वत शांत
**

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
1-06-19

Sunday, January 10, 2021

मनहरण घनाक्षरी "मौन त्याग दीजिये"

जुल्म का हो बोलबाला, मुख पे न जड़ें ताला,
बैठे बैठे चुपचाप, ग़म को न पीजिये।

होये जब अत्याचार, करें कभी ना स्वीकार,
पुरजोर प्रतिकार, जान लगा कीजिये।

देश का हो अपमान, टूटे जब स्वाभिमान,
कभी न तटस्थ रहें, मन ठान लीजिये।

हद होती सहने की, बात कहें कहने की,
सदियों पुराना अब, मौन त्याग दीजिये।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
22-06-17

दोहे (मोदी जी पर)

दोहा छंद

भरा पाप-घट तब हुआ, मोदी का अवतार।
बड़े नोट के बन्द से, मेटा भ्रष्टाचार।।

जमाखोर व्याकुल भये, कालाधन बेकार।
सेठों की नींदें उड़ी, दीन करे जयकार।।

नई सुबह की लालिमा, नई जगाये आश।
प्राची का सूरज पुनः, जग में करे प्रकाश।।

दोहा मुक्तक

चोर चोर का था मचा, सकल देश में शोर।
शोर तले जनता लखे, नव आशा की भोर।
भोर सुहानी स्वप्नवत, जिसकी सब को आस।
आस करेगा पूर्ण अब, जो कहलाया चोर।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
19-11-2016

32 मात्रिक छंद "मन्दभाग"

फटाहाल दिखला ये अपना, करुण कहानी किसे बताते।
टपका कर आँखों से  मोती, अन्तः वाणी किसे सुनाते।
सूखे अधरों की पपड़ी से, अंतर्ज्वाला किसे दिखाते।
अपलक नेत्रों की भाषा के, मौन निमन्त्रण किसे बुलाते।।1।।

रुक रुक कर ये प्यासी आँखें, देख रही हैं किसकी राहें।
बींधे मन के दुख से निकली, किसे सुनाते दारुण आहें।
खाली लोचन का यह प्याला, घुमा रहे क्यों सब के आगे।
माथे की टेढ़ी सल दिखला, क्यों फिरते हो भागे भागे।।2।।

देख अस्थि पिंजर ये कलुषित, आँखें सबकी थमतीं इस पर।
पर आगे वे बढ़ जाती हैं, लख कर काया इसकी जर्जर।
करुण भाव में पूर्ण निमज्जित, एक ओर ये लोचन आतुर।
घोर उपेक्षा के भावों से, लिप्त उधर हैं जग के चातुर।।3।।

देख रहे हैं वे इसको पर, पूछ रही हैं उनकी आँखें।
किस धरती के कीचड़ की ये, इधर खिली हैं पंकिल पाँखें।
वक्र निगाहें घूर घूर के, मन्दभाग से पूछ रही ये।
हे मलीन ! क्यों अपने जैसी, कुत्सित करते दिव्य मही ये।।4।।

मन्दभाग! क्यों निकल पड़े हो, जग की इन कपटी राहों में।
उस को ही स्वीकार नहीं जब, डूब रहे क्यों इन आहों में।
गेह न तेरा इन राहों में, स्वार्थ भरा जिन की रग रग में।
'नमन' करो निज क्षुद्र जगत को, जाग न और स्वार्थ के जग में।।5।।


बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
17-05-2016

Monday, January 4, 2021

ग़ज़ल (जनवरी के मास की छब्बीस)

बह्र:- 2122  2122  2122  212

जनवरी के मास की छब्बीस तारिख आज है,
आज दिन भारत बना गणतन्त्र सबको नाज़ है।

ईशवीं उन्नीस सौ पच्चास की थी शुभ घड़ी,
तब से गूँजी देश में गणतन्त्र की आवाज़ है।

आज के दिन देश का लागू हुआ था संविधान,
है टिका जनतन्त्र इस पे ये हमारी लाज है।

सब रहें आज़ाद हो रोजी कमाएँ खुल यहाँ,
एक हक़ सब का यहाँ जो एकता का राज़ है।

राजपथ पर आज दिन जब फ़ौज़ की देखें झलक,
छातियाँ दुश्मन की दहले उसकी ऐसी गाज़ है।

संविधान_इस देश की अस्मत, सुरक्षा का कवच,
सब सुरक्षित देश में सर पे ये जब तक ताज है।

मान दें सम्मान दें गणतन्त्र को नित कर 'नमन',
ये रहे हरदम सुरक्षित ये सभी का काज है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-01-17

ग़ज़ल (गिर्दाब में सफ़ीना है पतवार भी नहीं)

बह्र:- 221  2121  1221  212 

गिर्दाब में सफ़ीना है पतवार भी नहीं,
चारों तरफ अँधेरा, मददगार भी नहीं।

इंकार गर नहीं है तो इक़रार भी नहीं,
नफ़रत भले न दिल में हो पर प्यार भी नहीं।

फ़ितरत हमारे देश के नेताओं की यही,
जितना दिखाते उतने मददगार भी नहीं।

रिश्तों से कट के दुनिया बसाओ तो सोच लो,
परिवार गर नहीं है तो घरबार भी नहीं।

इतने भी दूर हों न किसी से, ये ग़म रहे,
बाक़ी यहाँ पे सुल्ह के आसार भी नहीं।

बेज़ार अब न हों तो करें और क्या बता,
मुड़ के उन्होंने देखा था इक बार भी नहीं।

सुहबत का जिसकी रहता था कायल सदा 'नमन',
साबित हुआ वो इतना समझदार भी नहीं।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-10-19

ग़ज़ल (जग में जो भी आने वाला)

22  22  22  22

जग में जो भी आने वाला,
वह सब इक दिन जाने वाला।

कौन निभाये साथ दुखों में,
हर कोई समझाने वाला।

साथ चला रहबर बन जो भी,
निकला ख़ार बिछाने वाला।

लाखों घी डालें जलती में,
बिरला आग बुझाने वाला।

आज कहाँ मिलता है कोई,
सच्ची राह दिखाने वाला।

ऊपर से ले नीचे तक हर,
सत्ता में है खाने वाला।

खुद पे रख विश्वास 'नमन' तू,
कोइ न हाथ बँटाने वाला।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
4-2-19

Saturday, December 26, 2020

मुक्तक (कांटे, फूल, मौसम)

हिफ़ाजत करने फूलों की रचे जैसे फ़ज़ा काँटे, 
खुशी के साथ वैसे ही ग़मों को भी ख़ुदा बाँटे,
अगर इंसान जीवन में खुशी के फूल चाहे नित,
ग़मों के कंटकों को भी वो जीवन में ज़रा छाँटे।

(1222×4)
*********

मौसम-ए-गुल ने फ़ज़ा को आज महकाया हुआ
है,
आमों पे भी क्या सुनहरा बौर ये आया हुआ है,
सुर्ख पहने पैरहन हैं टेसुओं की टहनियों ने,
खुशनुमा रंगों का मंजर हरतरफ छाया हुआ है।

(2122×4)
*********

सावन लगा तो हरतरफ मंजर सुहाना हो गया,
सब और हरियाली खिली लख दिल दिवाना हो गया,
उनके बिना इस खुशनुमा मौसम में सारी सून है,
महबूब अब तो आ भी जा काफ़ी सताना हो गया।

(2212×4)
*********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
19-07-17

विविध मुक्तक -5

परंपराएँ निभा रहे हैं,
स्वयं में रम दिन बिता रहे हैं,
परंतु घर के कुछेक दुश्मन,
चमन ये प्यारा जला रहे हैं।

(12122*2)
*******

आपके पास हैं दोस्त ऐसे, कहें,
साथ जग छोड़ दे, संग वे ही रहें।
दोस्त ऐसे हों जो बाँट लें दर्द सब,
आपके संग दिल की जो पीड़ा सहें।

(212*4)
*******

यारो बिस्तर और नश्तर एक जैसे हो गये,
अब तो घर क्या और दफ्तर एक जैसे हो गये,
मायके जब से गयी है रूठ घरवाली मेरी,
तब से नौकर और शौहर एक जैसे हो गये।

(2122*3 212)
******

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-09-20

Friday, December 18, 2020

मौक्तिका (बेटियाँ हमारी)

बहर:- 22  121 22,  22  121 22
(पदांत का लोप, समांत 'आरी')

ममता की जो है मूरत, समता की जो है सूरत,
वरदान है धरा पर, ये बेटियाँ हमारी।।
माँ बाप को रिझाके, ससुराल को सजाये,
दो दो घरों को जोड़े, ये बेटियाँ दुलारी।।

जो त्याग और तप की, प्रतिमूर्ति बन के सोहे,
निस्वार्थ प्रेम रस से, हृदयों को सींच मोहे।
परिवार के, मनों के, रिश्ते बनाये रखने,
वात्सल्य और करुणा, की खोल दे पिटारी।।

ख़ुशियाँ सदा खिलाती, दुख दर्द की दवा बन,
मन को रखे प्रफुल्लित, ठंडक जो दे हवा बन।
घर एकता में बाँधे, रिश्तों के साथ चल कर,
ममतामयी है बेटी, ये छाप है तुम्हारी।।

साबित किया है तुमने, हर क्षेत्र में हो आगे,
सम्मान हो या साहस, बेटों से दूर भागे।
लेती छलांग नभ से, खंगालती हो सागर,
तुम पर्वतों पे चढ़ती, अब ना रही बिचारी।।

सन्तान के, पिया के, सब कष्ट खुश हो लेती,
कन्धा मिला के चलती, पग पग में साथ देती।
जो एकबार थामा, वो हाथ छोड़ती ना,
तुमको नमन है बेटी, हर घर को तुम निखारी।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
20-08-2016

पिरामिड (तू, ईश)

तू
ईश
मैं जीव
तेरा अंश,
अरे निष्ठुर
पर सहूँ दंश,
तेरे गुणों से भ्रंश।11
**

मैं
लख
तुम्हारा
स्मित-हास्य
अति विस्मित;
भाव-आवेग में
हृदय  तरंगित।2।
**

ये
तेरा
शर्माना,
मुस्कुराना
करता मुझे
आश्चर्यचकित
रह रह पुलकित।3।
**

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-06-19

गुर्वा (मन)

मन विशाल है एक सरोवर,
स्मृतियों के कंकर,
हल्की सी बस लहर उठे।
***

बसी हुई है मन में प्रीत,
गीत सजन के गूँजे,
हृदय लिया, अनजाना जीत
***

हृदय पटल पर चित्र उकेरे,
जिसने ज्योत जगायी,
मनमंदिर में मेरे।
***

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
17-05-20

Tuesday, December 15, 2020

गीत (आज हिमालय भारत भू की)

लावणी छंद आधारित

भारत के उज्ज्वल मस्तक पर, मुकुट बना जो है शोभित,
जिसके पुण्य तेज से पूरा, भू मण्डल है आलोकित,
महादेव के पुण्य धाम को, आभा से वह सजा रहा,
आज हिमालय भारत भू की, यश-गाथा को सुना रहा।

तूफानों को अंक लगा कर, तड़ित उपल की वृष्टि सहे,
शीत ताप छाती पर झेले, बन मशाल अनवरत दहे, 
झेल झेल झंझावातों को, लगातार मुस्कुरा रहा,
आज हिमालय भारत भू की, यश-गाथा को सुना रहा।।

केतु सभ्यता का लहराये, गीत जगद्गुरु के गाये,
उन्नत भाल उठा कर अपना, महिम देश की दर्शाये,
प्रखर शिखर का दीपक न्यारा, जग के तम को मिटा रहा,
आज हिमालय भारत भू की, यश-गाथा को सुना रहा।

उत्तर की दीवार अटल है, त्राण शत्रु से यह देता,
स्वयं निरंतर गल करके भी, कोटिश जन की सुध लेता,
यह सर्वस्व लूटा कर अपना, आन देश की बचा रहा,
आज हिमालय भारत भू की, यश-गाथा को सुना रहा।

यह भंडार देव-संस्कृति का, है समाधि स्थल ऋषियों का,
सर्व रत्न की दिव्य खान ये, उद्गम पावन नदियों का,
अक्षय कोष देश का कैसे, रखे सुरक्षित बता रहा।
आज हिमालय भारत भू की, यश-गाथा को सुना रहा।

दीप-शिखा इस गिरि पुंगव की, एक वस्तु की मांग करे,
वीर पतंगों को ललकारे, जो जल इसके लिये मरे,
बलिदानों से वीरों के ही, मस्तक इसका उठा रहा।
आज हिमालय भारत भू की, यश-गाथा को सुना रहा।

इसकी रक्षा में उठना क्या, हम सब का है धर्म नहीं,
शीश उठाये इसका रखना, क्या हम सब का कर्म नहीं
हमरे तन के बहे स्वेद से, दीपक यह जगमगा रहा,
आज हिमालय भारत भू की, यश-गाथा को सुना रहा।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
24-05-2016

Thursday, December 10, 2020

लावणी छन्द "विष कन्या"

कई कौंधते प्रश्न अचानक, चर्चा से विषकन्या की।
जहर उगलती नागिन बनती, कैसे मूरत ममता की।।
गहराई से इस पर सोचें, समाधान हम सब पाते।
कलुषित इतिहासों के पन्ने, स्वयंमेव ही खुल जाते।।

पहले के राजा इस विध से, नाश शत्रु का करवाते।
नारी को हथियार बना कर, शत्रु देश में भिजवाते।।
जहर बुझी वो नाग-सुंदरी, रूप-जाल से घात करे।
अरि प्रदेश के प्रमुख जनों के, तड़पा तड़पा प्राण हरे।।

पहले कुछ मासूम अभागी, कलियाँ छाँटी थी जाती।
खिलने से पहले ही उनकी, जीवन बगिया मुरझाती।।
घोर बिच्छुओं नागों से फिर, उनको डसवाया जाता।
कोमल तन प्रतिरोधक विष का, इससे बनवाया जाता।।

पुरुषों को वश में करने के, दाव सभी पा वह निखरे।
जग समक्ष तब अल्हड़ कन्या, विषकन्या बन कर उभरे।।
छीन लिया जिस नर समाज ने, उससे बचपन मदमाता।
भला रखे कैसे वह उससे, नेह भरा कोई नाता।।

पुरुषों के प्रति घोर घृणा के, भाव लिये तरुणी गुड़िया।
नागिन सी फुफकार मारती, जहर भरी अब थी पुड़िया।।
जिससे भी संसर्ग करे वह, नख से नोचे या काटे।
जहर प्रवाहित कर वह उस में, प्राण कालिका बन चाटे।।

नये समय ने नार-शक्ति में, ढूंढा नव उपयोगों को।
वश में करती मंत्री, संत्री, अरु सरकारी लोगों को।।
दौलत से जो काम न सुधरे, वह सुलझा दे झट नारी।
कोटा, परमिट सब निकलाये, गुप्तचरी करले भारी।।

वर्तमान की ये विषकन्या, शत्रु देश को भी फाँसे।
अबला सबला बन कर देती,  प्रेम जाल के ये झाँसे।।
तन के लोभी हर सेना में, कुछ कुछ तो जाते पाये।
फिर ऐसों से साँठ गाँठ कर, राज देश के निकलाये।।

नारी की सुंदरता का नित, पुरुषों ने व्यापार किया।
क्षुद्र स्वार्थ में खो कर उस पर, केवल अत्याचार किया।।
विष में बुझी कटारी बनती, शदियों से नारी आयी।
हर युग में पासों सी लुढ़की, नर की चौपड़ पर पायी।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
30-08-2016

सरसी छंद "बच्चों का आजादी पर्व"



सरसी छंद / कबीर छंद

आजादी का पर्व सुहाना, पन्द्रह आज अगस्त।
बस्ती के निर्धन कुछ बच्चे, देखो कैसे मस्त।।
टोली इनकी निकल पड़ी है, मन में लिये उमंग।
कुछ करने की धुन इनमें है, लगते पूर्ण मलंग।।

चौराहे पर सब आ धमके, घेरा लिया बनाय।
भारत की जय कार करे तब, वे नभ को गूँजाय।।
बना तिरंगा कागज का ये, लाठी में लटकाय।
फूलों की रंगोली से फिर, उसको खूब सजाय।।

झंडा फहरा कर तब उसमें, तन के करें सलाम।
खेल खेल में किया इन्होंने, देश-भक्ति का काम।।
हो उमंग करने की जब कुछ, आड़े नहीं अभाव।
साधन सारे जुट जाते हैं, मन में जब हो चाव।।

बच्चों का उत्साह निराला, आजादी का रंग।
ऊँच नीच के भाव भुला कर, पर्व मनाएँ संग।।
बच्चों में जब ऐसी धुन हो, होता देश निहाल।
लाज तिरंगे की जब रहती, ऊँचा होता भाल।।


बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-08-17

सार छंद "भारत गौरव"

सार छंद / ललितपद छंद

जय भारत जय पावनि गंगे, जय गिरिराज हिमालय;
सकल विश्व के नभ में गूँजे, तेरी पावन जय जय।
तूने अपनी ज्ञान रश्मि से, जग का तिमिर हटाया;
अपनी धर्म भेरी के स्वर से, जन मानस गूँजाया।।

उत्तर में नगराज हिमालय, तेरा मुकुट सजाए;
दक्षिण में पावन रत्नाकर , तेरे चरण धुलाए।
खेतों की हरियाली तुझको, हरित वस्त्र पहनाए;
तेरे उपवन बागों की छवि, जन जन को हर्षाए।।

गंगा यमुना कावेरी की, शोभा बड़ी निराली;
अपनी जलधारा से डाले, खेतों में हरियाली।
तेरी प्यारी दिव्य भूमि है, अनुपम वैभवशाली;
कहीं महीधर कहीं नदी है, कहीं रेत सोनाली।।

महापुरुष अगणित जन्मे थे, इस पावन वसुधा पर;
धीर वीर शरणागतवत्सल, सब थे पर दुख कातर।
दानशीलता न्यायकुशलता, उन सब की थी थाती;
उनकी कृतियों की गुण गाथा, थकै न ये भू गाती।।

तेरी पुण्य धरा पर जन्मे, राम कृष्ण अवतारी;
पा कर के उन रत्नों को थी, धन्य हुई भू सारी।।
आतताइयों का वध करके, मुक्त मही की जिनने;
ऋषि मुनियों के सब कष्टों को, दूर किया था उनने।।

तेरे ऋषि मुनियों ने जग को, अनुपम योग दिया था;
सतत साधना से उन सब ने, जग-कल्याण किया था।
बुद्ध अशोक समान धर्मपति, जन्म लिये इस भू पर;
धर्म-ध्वजा के थे वे वाहक, मानवता के सहचर।।

वीर शिवा राणा प्रताप से, तलवारों के चालक;
मिटे जन्म भू पर हँस कर वे, मातृ धरा के पालक।
भगत सिंह गांधी सुभाष सम, स्वतन्त्रता के रक्षक;
देश स्वतंत्र किये बन कर वे, अंग्रेजों के भक्षक।।

सदियों का संघर्ष फलित जो, इसे सँभालें मिल हम;
ऊँच-नीच के जात-पाँत के, दूर करें सारे तम।
तेरे यश की गाथा गाए, गंगा से कावेरी;
बारंबार नमन हे जगगुरु, पुण्य धरा को तेरी।।


बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
02-04-2016

Friday, December 4, 2020

एक हास्य ग़ज़ल (मूली में है झन्नाट जो)

बह्र:- 221 1221 1221 122

मूली में है झन्नाट जो, आलू में नहीं है,
इमली सी खटाई भी तो निंबू में नहीं है।

किशमिश में लचक सी जो है काजू में नहीं है,
जो लुत्फ़ है भींडी में वो कद्दू में नहीं है।

बेडोल दिखे, गोल सदा, बाँकी की महिमा,
जो नाज़ है बरफी में वो लड्डू में नहीं है।

जितनी भी करूँ तुलना मैं घरवाली ही ऊँची,
बिल्ली में जो शोखी़ है वो भालू में नहीं है।

झाड़ू को लगाती हुईं पत्नी जी न समझें,
पोंछे सी सफाई मेरी, झाड़ू में नहीं है।

कुर्सी का रहा ठाठ सदा, औरों की मिहनत,
अफसर में भला क्या है जो बाबू में नहीं है।

चलती है जबाँ से ये तो हाथों से वो चलता,
जो बात छुरी में है वो चाकू में नहीं है।

कल न्यूज सुना, एक धराशायी हुआ पुल,
सीमेंट की मज़बूती तो बालू में नहीं है।

इलजा़म लगाते हैं जो शेरों पे सुनें वे,
जो गूंज दहाड़ों में वो ढेंचू में नहीं है।

कुर्सी से चिपक बोझ 'नमन' जो भी वतन पर,
क्यों नेता में नाम+उस का! निखट्टू में नहीं है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-08-20

ग़ज़ल (साथ सजन तो चाँद सुहाना)

बह्र:- 22  22  22  22  22  2

साथ सजन तो चाँद सुहाना लगता है,
दूर पिया तो फिर वो जलता लगता है।

मन में जब ख़ुशहाली रहती है छायी,
हर मौसम ही तब मस्ताना लगता है।

बच्चों की किलकारी घर में जब गूँजे,
गुलशन सा घर का हर कोना लगता है।

प्रीतम प्यारा जब से ही परदेश गया,
बेगाना मुझको हर अपना लगता है।

झूठे तेरे फिर से ही वे वादे सुन,
तेरा चहरा पहचाना सा लगता है।

प्रेम दया के भाव सृष्टि पर यदि रख लो,
यह जग भगवत मय तब सारा लगता है।

पात्र 'नमन' का वो बनता है नर जग में,
हर नर जिसको अपने जैसा लगता है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
24-05-19

ग़ज़ल (यादों के जो अनमोल क्षण)

बह्र :- 2212   2212   2212   2212

यादों के जो अनमोल क्षण मन में बसा हरदम रखें,
राहत मिले जिस याद से उर से लगा हरदम रखें।

जब प्रीत की हम डोर में इक साथ जीवन में बँधे,
हम उन सुनहरे ख्वाबों को दिल में जगा हरदम रखें।

छाती हमारी शान से चौड़ी हुई थी जब कभी,
उस वक्त की रंगीन यादों को बचा हरदम रखें।

जब कुछ अलग हमने किया सबने बिठाया आँख पे,
उन वाहवाही के पलों को हम सजा हरदम रखें।

जो आग दुश्मन ने लगाई देश में आतंक की,
उस आग के शोलों को हम दिल में दबा हरदम रखें।

जो भूख से बिलखें सदा है पास जिनके कुछ नहीं,
उनके लिये कुछ कर सकें ऐसी दया हरदम रखें।

जब भी 'नमन' दिल हो उठे बेजा़र ग़म में डूब के,
बीते पलों की याद का दिल में मजा़ हरदम रखें।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
2-11-2016