Friday, December 7, 2018

इंद्रवज्रा छंद "शिव पंचश्लोकी"

इंद्रवज्रा छंद "शिव पंचश्लोकी"

चाहे पुकारे जिस हाल में जग
     शंकर महादेव हे ज्ञान राशी।
पीड़ा हरे नाथ संसार की सब
     त्रिपुरारि भोले कैलाश वासी।।

जब देव दानव सागर मथे थे
     निकला हलाहल विष घोर भारी।
व्याकुल हुए सब तुम याद आए
     दूजा न कोई सन्ताप हारी।।

धारण गले में विष के किये से
     नीला पड़ा कंठ मृणाल जिसका।
गंगा भगीरथ लाये धरा पे
     धारण जटा में किया वेग उसका।।

फुफकार मारे विषधर गले से
     माथे सजे चाँद सबका दुलारा।
तेरे लिये ही काशी का गौरव
     ऐसा हमारा है नाथ न्यारा।।

भोले हमारे सब कष्ट हर लो
     खुशियाँ हमारे जीवन में भर दो।
माथा नवा के करते 'नमन' हम
     आशा हमारी सब पूर्ण कर दो।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
27-07-2016

(इन्द्रवज्रा वाचिक स्वरूप में है)

स्त्रग्धरा छंद "शिव स्तुति"

सारे ध्याएँ महेशा, रजत-गिरि बसे, पूर्ण आशा करें वो।
भूतों के नाथ न्यारे, भव-भय-दुख को, शीघ्र सारा हरें वो।।
भोले के भाल साजे, शुचि सुर-सरिते, और चन्द्राभ प्यारी।
ऐसे न्यारे त्रिनेत्री, विकल हृदय की, पीड़ हारें हमारी।।

बाघों की चर्म धारे, कर मँह डमरू, कंठ में नाग साजे।
शाक्षात् हैं रुद्र रूपी, मदन-मद मथे, ध्यान में वे बिराजे।।
गौरा वामे बिठाये, वृषभ चढ़ चले, आप ऐसे दुलारे।
हे शम्भो 'बासु' माथे, वरद कर धरें, द्वार आया तिहारे।।
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स्त्रग्धरा छंद (लक्षण)

"मेरी भैना ययाया", त्रय-सत यति दें, वर्ण इक्कीस या में।
बैठा ये सूत्र न्यारा, मधुर रसवती, 'स्त्रग्धरा' छंद राचें
।।

"मेरी भैना ययाया"= मगण, रगण, भगण, नगण, तथा लगातार तीन यगण। (कुल 21 अक्षरी)
222  212  2,11  111  12,2  122  122
त्रय-सत यति दें= सात सात वर्ण पर यति।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

5-1-17

शार्दूल विक्रीडित छंद "हिंदी यशोगान"


हिन्दी भारत देश के गगन में, सोहे सदा चाँद सी।
भाषा संस्कृत हाथ राख सर पे, साजे इसे मात सी।
सारे प्रांत रखे कई विविधता, देती उन्हे एकता।
हिन्दी से पहचान है जगत में, देवें इसे भव्यता।।

ये उच्चारण शब्द का सुगम दे, जैसा लिखो वो पढ़ो।
जो भी संभव जीभ से कथन है, वैसा इसी में गढ़ो।।
ये चौवालिस वर्ण और स्वर की, भाषा बड़ी सोहनी।
हिंदी को हम मान दें हृदय से, ये विश्व की मोहनी।

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लक्षण छंद:-

"मैं साजूँ सतताग" वर्ण दश नौ, बारा व सप्ता यतिम्।
राचूँ छंद रसाल चार चरणी, शार्दूल विक्रीडितम्।।

"मैं साजूँ सतताग" = मगण, सगण, जगण, सगण, तगण, तगण और गुरु।
222  112  121 112// 221  221  2

आदौ राम, या कुन्देन्दु, कस्तूरी तिलकं जैसे मनोहारी श्लोकों की जननी छंद। इस चार चरणों की छंद के प्रत्येक चरण में कुल 19 वर्ण होते हैं और यति 12 और 7 पर है।


बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
11-08-2016

मंदाक्रांता छंद "लक्ष्मी स्तुति"

लक्ष्मी माता, जगत जननी, शुभ्र रूपा शुभांगी।
विष्णो भार्या, कमल नयनी, आप हो कोमलांगी।।
देवी दिव्या, जलधि प्रगटी, द्रव्य ऐश्वर्य दाता।
देवों को भी, कनक धन की, दायिनी आप माता।।

नीलाभा से, युत कमल को, हस्त में धारती हो।
हाथों में ले, कनक घट को, सृष्टि संवारती हो।।
चारों हाथी, दिग पति महा, आपको सींचते हैं।
सारे देवा, विनय करते, मात को सेवते हैं।।

दीपों की ये, जगमग जली, ज्योत से पूजता हूँ।
भावों से ये, स्तवन करता, मात मैं धूजता हूँ।।
रंगोली से, घर दर सजा, बाट जोहूँ तिहारी।
आओ माते, जगत-जननी, नित्य आह्लादकारी।।

आया हूँ मैं, तव शरण में, भक्ति का भाव दे दो।
मेरे सारे, दुख दरिद की, मात प्राचीर भेदो।।
मैं आकांक्षी, चरण-रज का, 'बासु' तेरा पुजारी।
खाली झोली, बस कुछ भरो, चाहता ये भिखारी।।
× × × × × ×

"दीपावली पर शुभकामना"

दीपों की ये, जगमग करे, ज्योत यूँ ही उरों में।
माता लक्ष्मी, हरदम रहें, आप ही के घरों में।
विष्णो भार्या, सहज कर दें, आपकी जिंदगी को।
दीवाली पे, 'नमन' करता, मात की बन्दगी को।

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लक्षण छंद (मंदाक्रांता  )

"माभानाता,तगग" रच के, चार छै सात तोड़ें।
'मंदाक्रांता', चतुष चरणी, छंद यूँ आप जोड़ें।।

"माभानाता, तगग" = मगण, भगण, नगण, तगण, तगण, गुरु गुरु (कुल 17 वर्ण)
222   2,11   111  2,21   221   22  
चार छै सात तोड़ें = चार वर्ण,छ वर्ण और सात वर्ण पर यति।
दो दो या चारों चरण समतुकांत।

(संस्कृत का छंद जिसमें मेघदूतम् लिखा गया है।)
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

30-10-2016

अनुष्टुप् छंद "गुरु पंचश्लोकी"


सद्गुरु-महिमा न्यारी, जग का भेद खोल दे।
वाणी है इतनी प्यारी, कानों में रस घोल दे।।

गुरु से प्राप्त की शिक्षा, संशय दूर भागते।
पाये जो गुरु से दीक्षा, उसके भाग्य जागते।।

गुरु-चरण को धोके, करो रोज उपासना।
ध्यान में उनके खोकेेे, त्यागो समस्त वासना।।

गुरु-द्रोही नहीं होना, गुरु आज्ञा न टालना।
गुरु-विश्वास का खोना, जग-सन्ताप पालना।।

गुरु की गरिमा भारी, आशीर्वाद प्रताड़ना।
हरती विपदा सारी, मीठी मधुर ताड़ना।।

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अनुष्टुप् छंद (विधान)

यह छन्द अर्धसमवृत्त है । इस के प्रत्येक चरण में आठ वर्ण होते हैं । पहले चार वर्ण किसी भी मात्रा के हो सकते हैं । पाँचवाँ लघु और छठा वर्ण सदैव गुरु होता है । सम चरणों में सातवाँ वर्ण ह्रस्व और विषम चरणों में गुरु होता है। आठवाँ वर्ण संस्कृत में तो लघु या गुरु कुछ भी हो सकता है। संस्कृत में छंद के चरण के अंतिम वर्ण का उच्चारण लघु होते हुये भी दीर्घ होता है जबकि हिंदी में यह सुविधा नहीं है। अतः हिंदी में आठवाँ वर्ण सदैव दीर्घ ही होता है।

(1) × × × ×   । ऽ ऽ ऽ, (2) × × × ×   । ऽ । ऽ
(3) × × × ×   । ऽ ऽ ऽ, (4) × × × ×   । ऽ । ऽ

उपरोक्त वर्ण विन्यास के अनुसार चार चरणों का एक छंद होता है। सम चरण (2, 4) समतुकांत होने चाहिए। रोचकता बढाने के लिए चाहें तो विषम (1, 3) भी समतुकांत कर सकते हैं पर आवश्यक नहीं।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
22-07-2016