Sunday, February 21, 2021

राजस्थानी डाँखला (1)

(1)

लिछमी बाईसा री न्यारी नगरी है झाँसी,
गद्दाराँ रै गलै री बणी थी जकी फाँसी।
राणी सा रा ठाठ बाठ,
गाताँ थकै नहीं भाट।
सुण सुण फिरंग्याँ के चाल जाती खाँसी।।
****
(2)

बाकी सब गढणियाँ गढ तो चित्तौडगढ़,
उपज्या था वीर अठै एक से ही एक बढ।
कुंभा री हो ललकार,
साँगा री या तलवार,
देशवासी बणो बिस्या गाथा वाँ री पढ पढ।।
****
(3)

राजनीति माँय बड़ग्या सगला उचक्का चोर,
श्राधां आला कागला सा उतपाती घनघोर।
पड़ जावै जठै पाँव,
मचा देवे काँव काँव।
चाटग्या ये देश सारो निकमा मुफतखोर।
****

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
08-09-20

क्षणिकाएँ

(बीती जवानी)

(1)
जवानी में जो
इरादे पत्थर से
मजबूत होते थे,,,
वे अब अक्सर
पुराने फर्नीचर से
चरमरा टूट जाते हैं।
**

(2)

क्षणिका  (परेशानी)

जो मेरी परेशानियों पर
हरदम हँसते थे
पर अब मैंने जब
परेशानियों में
हँसना सीख लिया है
वे ही मुझे अब
देख देख
रो रहे हैं।
**

(3)

क्षणिका (पहचान)

आभासी जग में 
पहचान बनाते बनाते
अपनी पहचान
खो रहे हैं----
मेलजोल के चक्कर में
और अकेले
हो रहे हैं।
**

बासुदेव अग्रवाल नमन
तिनसुकिया
15-06-19

पथिक (नवगीत)

जो सदा अस्तित्व से 
अबतक लड़ा है।
वृक्ष से मुरझा के 
पत्ता ये झड़ा है।

चीर कर 
फेनिल धवल 
कुहरे की चद्दर,
अव्यवस्थित से 
लपेटे तन पे खद्दर,
चूमने 
कुहरे में डूबे 
उस क्षितिज को,
यह पथिक 
निर्द्वन्द्व हो कर 
चल पड़ा है।

हड्डियों को 
कँपकँपाती 
ये है भोर,
शांत रजनी सी 
प्रकृति में
है न थोड़ा शोर,
वो भला इन सब से 
विचलित क्यों रुकेगा?
दूर जाने के लिए 
ही जो अड़ा है।

ठूंठ से जो वृक्ष हैं 
पतझड़ के मारे,
वे ही साक्षी 
इस महा यात्रा 
के सारे,
हे पथिक चलते रहो 
रुकना नहीं तुम,
तुमको लेने ही 
वहाँ कोई खड़ा है।

जीव का परब्रह्म में 
होना समाहित,
सृष्टी की धारा 
सतत ये है 
प्रवाहित,
लक्ष्य पाने की ललक 
रुकने नहीं दे,
प्रेम ये 
शाश्वत मिलन का 
ही बड़ा है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
8-4-17

Monday, February 15, 2021

मुक्तक (श्रद्धांजलि)

(नेताजी)

आज तेइस जनवरी है याद नेताजी की कर लें,
हिन्द की आज़ाद सैना की हृदय में याद भर लें,
खून तुम मुझको अगर दो तो मैं आज़ादी तुम्हें दूँ,
इस अमर ललकार को सब हिन्दवासी उर में धर लें।

(2122*4)
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तुलसीदास जी की जयंती पर मुक्तक पुष्प

लय:- इंसाफ की डगर पे

तुलसी की है जयंती सावन की शुक्ल सप्तम,
मानस सा ग्रन्थ जिसने जग को दिया है अनुपम,
चरणों में कर के वन्दन करता 'नमन' में तुमको,
भारत के गर्व तुम हो हिन्दी की तुमसे सरगम।।

(221 2122)*2
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(चन्द्र शेखर आज़ादजी की पुण्य तिथि पर। जन्म 1906।)

तुम शुभ्र गगन में भारत के, चमके जैसे चन्दा उज्ज्वल।
ऐंठी मूंछे, चोड़ी छाती, आज़ाद खयालों के थे प्रतिपल।
अंग्रेजों को दहलाया था, दे अपना उत्साही यौवन।
हे शेखर! 'नमन' तुम्हें शत शत, जो खिले हृदय में बन शतदल।।

(मत्त सवैया आधारित)
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(ताटंक छंद में झांसी की रानी को श्रद्धांजलि)

बुन्देलखण्ड की ज्वाला थी, झांसी की तू रानी थी।
करवाने आज़ाद देश ये, तूने मन में ठानी थी।
भारतवासी के हृदयों में, स्थान अमर रानी तेरा।
खूब लड़ी थी अंग्रेजों से, ना तेरी ही सानी थी।।


बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-02-18

मुक्तक (घमण्ड, गुमान)

इतना भी ऊँची उड़ान में, खो कर ना इतराओ,
पाँव तले की ही जमीन का, पता तलक ना पाओ,
मत रौंदो छोटों को अपने, भारी भरकम तन से,
भारी जिनसे हो उनसे ही, हल्के ना हो जाओ।

(सार छंद)
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बिल्ले की शह से चूहा भी, शेर बना इतराता है,
लगे गन्दगी वह बिखेरने, फूल फुदकता जाता है,
खोया ही रहता गुमान में, वह नादान नहीं जाने,
हँसे जमाना उसकी मति पर, और तरस ही खाता है।

(ताटंक छंद)
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हवा बहुत ही भारी भारी, दम सा घुटता लगता है,
अहंकार की गर्म हवा में, तन मन जलता लगता है,
पंछी हम आज़ाद गगन के, अपनी दुनिया में चहकें,
रोज झपटते बाजों से अब, हृदय धड़कता लगता है।

(लावणी छंद)
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-12-16

विविध मुक्तक -6

अर्थ जीवन का है बढना ये नदी समझा रही,
खिल सदा हँसते ही रहना ये कली समझा रही,
हों कभी पथ से न विचलित झेलना कुछ भी पड़े,
भार हर सह धीर रखना ये मही समझा रही।

(2122*3 212)

1-09-20
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हबीब जो थे हमारे रकीब अब वे हुए,
हमारे जितने भी दुश्मन करीब उन के हुए,
हक़ीम बन वे दिखाएँ हमारे जख्मों के,
हमारे वास्ते सारे सलीब जैसे हुए।

(1212  1122  1212  22)
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चाहे नहीं तू खेद जताने के लिये आ,
पर घर से निकल हाथ हिलाने के लिये आ,
मैं खुद की ही ढ़ो लाश रहा जा तेरे घर से,
जीते का ही मातम तो मनाने के लिये आ।

(221 1221 1221 122)
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
8-09-20

Wednesday, February 10, 2021

दोहे (क्रोध)

मन वांछित जब हो नहीं, प्राणी होता क्रुद्ध।
बुद्धि काम करती नहीं, हो विवेक अवरुद्ध।।

नेत्र और मुख लाल हो, अस्फुट उच्च जुबान।
गात लगे जब काम्पने, क्रोध चढ़ा है जान।।

सदा क्रोध को जानिए, सब झंझट का मूल।
बात बढ़ाए चौगुनी, रह रह दे कर तूल।।

वशीभूत मत होइए, कभी क्रोध के आप।
काम बिगाड़े आपका, मन को दे संताप।।

वश में हो कर क्रोध के, रावण मारी लात।
मिला विभीषण शत्रु से, किया सर्व कुल घात।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
19-10-2016

ताटन्क छंद "भ्रष्टाचारी सेठों ने"

(मुक्तक शैली की रचना)

अर्थव्यवस्था चौपट कर दी, भ्रष्टाचारी सेठों ने।
छीन निवाला दीन दुखी का, बड़ी तौंद की सेठों ने।
केवल अपना ही घर भरते, घर खाली कर दूजों का।
राज तंत्र को बस में कर के, सत्ता भोगी सेठों ने।।

कच्चा पक्का खूब करे ये, लूट मचाई सेठों ने।
काली खूब कमाई करके, भरी तिजौरी सेठों ने।
भ्रष्ट आचरण के ये पोषक, शोषक जनता के ये हैं।
दो खाते रख करी बहुत है, कर की चोरी सेठों ने।।

देकर रिश्वत पाल रखे हैं, मंत्री संत्री सेठों ने।
काले धन से काली दुनिया, अलग बसाई सेठों ने।
ढोंग धर्म का भारी करते, काले पाप छिपाने में।
दान दक्षिणा सभी दिखावा, साख खरीदी सेठों ने।

लोगों की कुचली सांसों से, दौलत बाँटी सेठों ने।
सुख सुविधाएँ इस दुनिया की, सारी छाँटी सेठों ने।
दुखियों के दिन फिरने वाले, अंत सभी का होता है।
सारी साख गँवा दी है अब, शोषणकारी सेठों ने।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
16-11-2016

गणेश-वंदन (कुण्डलियाँ)

पूजा प्रथम गणेश की, संकट देती टाल।
रिद्धि सिद्धि के नाथ ये, गज का इनका भाल।
गज का इनका भाल, पेट है लम्बा जिनका।
काया बड़ी विशाल, मूष है वाहन इनका।
विघ्न करे सब दूर, कौन ऐसा है दूजा।
भाद्र शुक्ल की चौथ, करो गणपति की पूजा।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
05-09-2016

Thursday, February 4, 2021

ग़ज़ल (जब से अंदर और बाहर)

बह्र:- 2122 2122 2122 212

जब से अंदर और बाहर एक जैसे हो गये,
तब से दुश्मन और प्रियवर एक जैसे हो गये।

मन की पीड़ा आँख से झर झर के बहने जब लगी,
फिर तो निर्झर और सागर एक जैसे हो गये।

लूट हिंसा और चोरी, उस पे सीनाजोरी है,
आजकल तो जानवर, नर एक जैसे हो गये।

अर्थ के या शक्ति के या पद के फिर अभिमान में,
आज नश्वर और ईश्वर एक जैसे हो गये।

हाल कुछ ऐसा ही है संसद का इस जन-तंत्र में,
फिर से क्या नर और वानर एक जैसे हो गये।

साफ़ छवि रख काम कोई कैसे कर सकता यहाँ,
भ्रष्ट सब जब एक होकर एक जैसे हो गये।

जब से याराना फकीरी से 'नमन' का हो गया,
मान अरु अपमान के स्वर एक जैसे हो गये।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
30-09-20

ग़ज़ल (शुक सा महान)

बह्र:- 221  2121 1221 212

शुक सा महान कोई भी ज्ञानी नहीं मिला,
भगवत-कथा का ऐसा बखानी नहीं मिला।

गाथा अमर है कर्ण की सुन जिसको सब कहें,
उसके समान सृष्टि को दानी नहीं मिला।

संसार छान मारा है ऋषियों के जैसा अब,
बगुलों को छोड़ कोई भी ध्यानी नहीं मिला।

भगवान के मिले हैं अनुग्रह सभी जिसे,
संतुष्ट फिर भी हो जो वो प्रानी नहीं मिला।

मतलब के यार खूब मिले किंतु एक भी,
दुख दर्द बाँट ले जो वो जानी नहीं मिला।

जो दूसरे ही पल में मुकर जाते बात से,
चहरों पे ऐसों के कभी पानी नहीं मिला।

ले दे के ये 'नमन' की नयी पेश है ग़ज़ल,
ऊला नहीं मिला कभी सानी नहीं मिला।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
27-05-19

ग़ज़ल (कब से प्यासे नैना दो)

बहरे मीर:- 22  22  22  2

कब से प्यासे नैना दो,
अब तो सूरत दिखला दो।

आज सियासत बस इतनी,
आग लगा कर भड़का दो।

बदली में ओ घूँघट में,
छत पर चमके चन्दा दो।

आगे आकर नवयुवकों,
देश की किस्मत चमका दो।

दीन दुखी पर ममता का,
अपना आँचल फैला दो।

मंसूबों को दुश्मन के,
ज्वाला बन कर दहका दो।

रमते जोगी अपना क्या,
लेना एक न देना दो।

रच कर काव्य 'नमन' ऐसा,
तुम क्या हो ये बतला दो।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
12-11-2019