Wednesday, February 20, 2019

गाथ छंद "वृक्ष-पीड़ा"

वृक्ष जीवन देते हैं।
नाहिं ये कुछ लेते हैं।।
काट व्यर्थ इन्हें देते।
आह क्यों इनकी लेते।।

पेड़ को मत यूँ काटो।
भू न यूँ इन से पाटो।।
पेड़ जीवन के दाता।
राख लो इन से नाता।।

वृक्ष दुःख सदा बाँटे।
ये न हैं पथ के काँटे।।
मानवों ठहरो थोड़ा।
क्यों इन्हें समझो रोड़ा।।

मूकता इनकी पीड़ा।
काटता तु उठा बीड़ा।।
बुद्धि में जितने आगे।
स्वार्थ में उतने पागे।।
=============
लक्षण छंद:-

सूत्र राच "रसोगागा"।
'गाथ' छंद मिले भागा।।

"रसोगागा" = रगण, सगण, गुरु गुरु  
212  112  22 = 8 वर्ण
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
21-03-2017

गजपति छंद "नव उड़ान"

पर प्रसार करके।
नव उड़ान भर के।
विहग झूम तुम लो।
गगन चूम तुम लो।।

सजगता अमित हो।
हृदय शौर्य नित हो।
सुदृढ़ता अटल हो।
मुख प्रभा प्रबल हो।।

नभ असीम बिखरा।
हर प्रकार निखरा।
तुम जरा न रुकना।
अरु कभी न झुकना।।

नयन लक्ष्य पर हो।
न मन स्वल्प डर हो।
विजित विश्व कर ले।
गगन अंक भर ले।।
=============
लक्षण छंद:-

"नभलगा" गण रखो।
'गजपतिम्'  रस चखो।।

"नभलगा" नगण  भगण लघु गुरु
( 111   211  1 2)
8 वर्ण,4 चरण, दो-दो चरण समतुकांत
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
26-01-19

कुसुमसमुदिता छंद "श्रृंगार वर्णन"

गौर वरण शशि वदना।
वक्र नयन पिक रसना।।
केहरि कटि अति तिरछी।
देत चुभन बन बरछी।।

बंकिम चितवन मन को।
हास्य मधुर इस तन को।।
व्याकुल रह रह करता।
चैन सकल यह हरता।।

यौवन कलश विहँसते।
ठीक हृदय मँह धँसते।।
रूप निरख मन भटका।
कुंतल लट पर अटका।।

तंग वसन तन चिपटे।
ज्यों फणिधर तरु लिपटे।।
हंस लजत लख चलना।
चित्त-हरण यह ललना।।
============
लक्षण छंद:-

"भाननगु" गणन रचिता।
छंदस 'कुसुमसमुदिता'।।

"भाननगु" = भगण नगण नगण गुरु

(211 111 111  2)
10वर्ण,4 चरण,  दो-दो चरण समतुकांत।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
26-01-19

कण्ठी छंद "सवेरा"

हुआ सवेरा।
मिटा अँधेरा।।
सुषुप्त जागो।
खुमार त्यागो।।

सराहना की।
बड़प्पना की।।
न आस राखो।
सुशान्ति चाखो।।

करो भलाई।
यही कमाई।।
सदैव संगी।
कभी न तंगी।।

कुपंथ चालो।
विपत्ति पालो।।
सुपंथ धारो।
कभी न हारो।।
========
लक्षण छंद:-

"जगाग" वर्णी।
सु-छंद 'कण्ठी'।।

"जगाग" = जगण, गुरु - गुरु  
(121,  2 - 2), 5 वर्ण, 4  चरण,
2-2 चरण समतुकांत
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
10-02-19

Wednesday, February 13, 2019

हरिणी छंद "राधा कृष्ण नाम-रस"

नर तुम बनो, नामोच्चारी, यही बस सार है।
मन मँह रहे, राधेकृष्णा, नहीं भव-भार है।।
बहुत महिमा, नामों की है, इसे सब जान लें।
सब हृदय से, संतों का ये, कहा सच मान लें।।

जँह जँह बसे, राधा प्यारी, वहीं घनश्याम है।
यदि मन लगा, दोनों में तो, बने तब काम है।।
छवि मन रखें, राधा जी की, तभी सुध श्याम ले।
सुन मन अतः, जोड़ी का ही, सदा तुम नाम ले।।
=============
लक्षण छंद: (हरिणी छंद)

मधुर 'हरिणी', राचें बैठा, "नसामरसालगे"।
प्रथम यति है, छै वर्णों पे, चतुष् फिर सप्त पे।

"नसामरसालगे" = नगण, सगण, मगण, रगण, सगण, लघु और गुरु।
111  112,  222  2,12  112  12
चार चरण, दो दो समतुकांत।
****************
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
13-02-19

एक मज़ाहिया ग़ज़ल (नये अमीर हैं)

बह्र: 1212  1122  1212   22/112

नये अमीर हैं लटके जुराब पहने हुए,
बड़ी सी तोंद पे टाई जनाब पहने हुए।

अकड़ तो देखिए इनकी नबाब जैसे यही,
चमकता सूट है जूते खराब पहने हुए,

फटी कमीज पे लगता है ऐसा सूट नया,
सुनहरे कोट को जैसे उकाब पहने हुए।

चबाके पान बिखेरे हैं लालिमा मुख की,
गज़ब की लाल है आँखें शराब पहने हुए।

हुजूर वक्त की चाँदी जो सर पे बिखरी है,
ढ़के हुए हैं इसे क्यों खिजाब पहने हुए।

भरा है दाग से दामन नहीं कोई परवाह,
छिपाए शक्ल को बैठे निकाब पहने हुए।

फ़लक से उतरा नमूना रईसजादा 'नमन',
ख़याल छोटे मगर खूब ख्वाब पहने हुए।

उकाब=एक पौराणिक बहुत बड़ा पक्षी

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
11-10-2016

धुन- खिजाँ के फूल पे आती कभी बहार नहीं।

ग़ज़ल- (बड़ा खुदा से न कोई)

बह्र: 1212  1122  1212   22/112

बड़ा खुदा से न कोई ये ऐतबार की बात,
बड़ी खुदा से मुहब्बत ये जानकार की बात।

लगा है जब से ये फागुन चली धमार की बात,
दिलों में छाई है होली ओ रंग-धार की बात।

जिधर भी देखिए छाई छटा बसन्त की आज,
हर_इक नज़ारा फ़िज़ा का करे बहार की बात।

कभी जहाँ की जो जन्नत उजड़ने अब वो लगी,
नहीं वहाँ पे बची है गुले दयार की बात।

मची है धूम चुनावों की देखिए जिस ओर,
किसी की जीत की अटकल किसी की हार की बात।

करूँ जो लाख मैं कोशिश सहूँ सितम उनके,
मुकाम-ए-इश्क़ का मिलना न इख़्तियार की बात।

मैं गीत और ग़ज़ल में हूँ गूँथता रो कर,
सदा गरीब के दुख, दर्द और प्यार की बात।

पिया जो जामे मुहब्बत लबों से चू जो पड़े,
नहीं वो प्यार का किस्सा है इश्तिहार की बात।

दुकान में न ये बिकती इजारे पे न मिले,
रही कभी न मुहब्बत नगद उधार की बात।

सुनो वतन के जवानों न पीछे हटना कभी,
कभी वतन के लिए गर हो जाँ निसार की बात।

लगाया दिल जो किसी से कभी न पीछे हटो,
'नमन' हो चाहे ये कितने भी इंतज़ार की बात।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-02-2017

Saturday, February 9, 2019

ग़ज़ल (बला हो जितनी बड़ी)

बह्र-1212 1122 1212 22/112

बला हो जितनी बड़ी फिर भी टल तो सकती है,
हो आस कितनी भी हल्की वो पल तो सकती है।

बुरी हो जितनी भी किस्मत बदल तो सकती है,
कि लड़खड़ाके भी हालत सँभल तो सकती है।

अगर है तपती हुई राह-ए-जीस्त ग़म न करो,
*मिले न छाँव मगर धूप ढल तो सकती है*।

ये सोच पैर बढ़ाये न उनकी गलियों में,
उन्हें हमारी मुलाक़ात खल तो सकती है।

बढ़ा है इतना अधिक मर्ज-ए-इश्क़ मत पूछो,
मिले जो उनकी दुआ दिल से फल तो सकती है।

सनम निकाब न महफ़िल में तुम उठा देना,
झलक से सब की तबीअत मचल तो सकती है।

अवाम जाग रही है ओ लीडरों सुन लो,
चली न उसकी जो अब तक वो चल तो सकती है।

अमीरों कर्ज़ चुकाए बगैर खैर नहीं,
भरे बाज़ार में पगड़ी उछल तो सकती है।

कोई सुने न सुने जुल्म पर न चुप बैठो,
'नमन' जो टीस है दिल में निकल तो सकती है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
11-04-2018

(आ0 फ़िराक़ साहिब के मिसरे पर तरही ग़ज़ल)

ग़ज़ल (जिधर वो रहते मैं क्योंकर)

बह्र-1212  1122  1212  22/112

जिधर वो रहते मैं क्योंकर उधर से निकला था,
बड़ा मलाल जो उनकी नज़र से निकला था।

मिले थे राह में पर आँख भी उठाई नहीं,
लिये बड़ी ही मैं उम्मीद घर से निकला था।

कदम कदम पे मुझे जिंदगी में खार मिले,
गुलों की चाह में मैं हर डगर से निकला था।

तुम्हारी यादें सदा दें बुलाती क्यों अब भी,
मैं मुश्किलों से ही उनके असर से निकला था।

जिसे भी समझा था रहबर मिला रकीब वही,
मैं जिंदगी की सभी रहगुज़र से निकला था।

रहें जो गुम हो अँधेरों में उनको कुछ न खबर,
सितारा आस का उनकी जिधर से निकला था।

रहे हैं सेक 'नमन' रोटियाँ सभी अपनी,
उन्हें पता ही न दुश्मन किधर से निकला था।

रहबर = पथ प्रदर्शक

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
24-05-17

Friday, February 8, 2019

कनक मंजरी छंद "गोपी विरह"

कनक मंजरी छंद "गोपी विरह"

तन-मन छीन किये अति पागल,
हे मधुसूदन तू सुध ले।
श्रवणन गूँज रही मुरली वह,
जो हम ली सुन कूँज तले।।
अब तक खो उस ही धुन में हम,
ढूंढ रहीं ब्रज की गलियाँ।
सब कुछ जानत हो तब दर्शन,
देय खिला मुरझी कलियाँ।।

द्रुम अरु कूँज लता सँग बातिन,
में यह वे सब पूछ रही।
नटखट श्याम सखा बिन जीवित,
क्यों अब लौं, निगलै न मही।।
विहग रहे उड़ छू कर अम्बर,
गाय रँभाय रही सब हैं।
हरित सभी ब्रज के तुम पादप,
बंजर तो हम ही अब हैं।।

मधुकर एक लखी तब गोपिन,
बोल पड़ी फिर वे उससे।
भ्रमर कहो किस कारण गूँजन,
से बतियावत हो किससे।।
इन परमार्थ भरी कटु बातन,
से नहिं काम हमें अब रे।
रख अपने मँह ज्ञान सभी यह,
भूल गईं सुध ही जब रे।।

भ्रमर तु श्यामल मोहन श्यामल,
तू न कहीं छलिया वह ही।
कलियन रूप चखे नित नूतन,
है गुण श्याम समान वही।।
परखन प्रीत हमार यहाँ यदि,
रूप मनोहर वो धर लें।
यदि न सँदेश हमार पठावहु,
दर्श दिखा दुख वे हर लें।।
=================
लक्षण छंद:-

प्रथम रखें लघु चार तबै षट "भा" गण  संग व 'गा' रख लें।
सु'कनकमंजरि' छंद रचें यति तेरह वर्ण तथा दश पे।।

लघु चार तबै षट "भा" गण  संग व 'गा' = 4लघु+6भगण(211)+1गुरु]=23 वर्ण

{1111+211+211+211+211+211+211+2}

(भागवत का प्रसिद्ध गोपी गीत इसी छंद में है।)
*********
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
27-01-19

इंदिरा छंद "पथिक"

इंदिरा छंद "पथिक"

तमस की गयी ये विभावरी।
हृदय-सारिका आज बावरी।।
वह उड़ान उन्मुक्त है भरे।
खग प्रसुप्त जो गान वो करे।।

अरुणिमा रही छा सभी दिशा।
खिल उठा सवेरा, गयी निशा।।
सतत कर्म में लीन हो पथी।
पथ प्रतीक्ष तेरे महारथी।।

अगर भूत तेरा डरावना।
पर भविष्य आगे लुभावना।।
मत रहो दुखों को विचारते।
बढ़ सदैव राहें सँवारते।।

कर कभी न स्वीकार हीनता।
मत जता किसी को तु दीनता।।
जगत से हटा दे तिमीर को।
'नमन' विश्व दे कर्म वीर को।।
==============
लक्षण छंद:-

"नररलाग" वर्णों सजाय लें।
मधुर 'इंदिरा' छंद  राच लें।।

"नररलाग"  =  नगण रगण रगण + लघु गुरु
111 212  212 12,
चार चरण, दो-दो चरण समतुकांत
********************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
28-01-19

Sunday, February 3, 2019

असबंधा छंद "हिंदी गौरव"

भाषा हिंदी गौरव बड़पन की दाता।
देवी-भाषा संस्कृत मृदु इसकी माता।।
हिंदी प्यारी पावन शतदल वृन्दा सी।
साजे हिंदी विश्व पटल पर चन्दा सी।।

हिंदी भावों की मधुरिम परिभाषा है।
ये जाये आगे बस यह अभिलाषा है।।
त्यागें अंग्रेजी यह समझ बिमारी है।
ओजस्वी भाषा खुद जब कि हमारी है।।

गोसाँई ने रामचरित इस में राची।
मीरा बाँधे घूँघर पग इस में नाची।।
सूरा ने गाये सब पद इस में प्यारे।
ऐसी थाती पा कर हम सब से न्यारे।।

शोभा पाता भारत जग मँह हिंदी से।
जैसे नारी भाल सजत इक बिंदी से।।
हिंदी माँ को मान जगत भर में देवें।
ये प्यारी भाषा हम सब मन से सेवें।।
============
लक्षण छंद:-

"मातानासागाग" रचित 'असबंधा' है।
ये तो प्यारी छंद सरस मधु गंधा है।।

"मातानासागाग" = मगण, तगण, नगण, सगण गुरु गुरु
222  221  111  112  22= 14 वर्ण।
दो दो या चारों चरण समतुकांत।
********************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
12-02-2017

गीत "आओ सब मिल कर संकल्प करें"

आओ सब मिल कर संकल्प करें।
चैत्र शुक्ल नवमी है कुछ तो, नूतन आज करें।
आओ सब मिल कर संकल्प करें॥

मर्यादा में रहना सीखें, सागर से बन कर हम सब।
हम इस में रहना सिखलाएं, तोड़े कोई इसको जब।
मर्यादा के स्वामी की, धारण यह सीख करें।
आओ सब मिल कर संकल्प करें॥

मात पिता गुरु और बड़ों की, सेवा का ही मन हो।
भाई मित्र और सब के, लिए समर्पित ये तन हो।
समदर्शी सा बन कर, सबसे व्यवहार करें।
आओ सब मिल कर संकल्प करें॥

उत्तम आदर्शों को हम, जीवन में सभी उतारें।
कर चरित्र निर्माण स्वयं को, जग में आज सुधारें।
खुद उत्तम बन कर हम, पुरुषोत्तम को 'नमन' करें।
आओ सब मिल कर संकल्प करें॥

आज रामनवमी के दिन हम, मिल कर व्रत यह लेवें।
दीन दुखी आरत जन जन को, सकल सहारा देवें।
राम-राज्य का धरती पर, सपना साकार करें।
आओ सब मिल कर संकल्प करें॥


बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
15-04-16

षट ऋतु हाइकु

षट ऋतु हाइकु

चैत्र वैशाख
छायी 'बसंत'-साख।
बौराई शाख।
**
ज्येष्ठ आषाढ़
जकड़े 'ग्रीष्म'-दाढ़
स्वेद की बाढ़।
**
श्रावण भाद्र
'वर्षा' से धरा आर्द्र
मेघ सौहार्द्र।
**
क्वार कार्तिक
'शरद' अलौकिक
शुभ्र सात्विक।
**
अग्हन पोष
'हेमन्त' भरे रोष
सौड़ी में तोष।
**
माघ फाल्गुन
'शिशिर' है पाहुन
तापें आगुन।
*******

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
14-01-2019

Saturday, February 2, 2019

इन्द्रवज्रा/उपेंद्र वज्रा/उपजाति छंद "शिवेंद्रवज्रा स्तुति"

परहित कर विषपान, महादेव जग के बने।

सुर नर मुनि गा गान, चरण वंदना नित करें।।


माथ नवा जयकार, मधुर स्तोत्र गा जो करें।
भरें सदा भंडार, औघड़ दानी कर कृपा।।

कैलाश वासी त्रिपुरादि नाशी।
संसार शासी तव धाम काशी।
नन्दी सवारी विष कंठ धारी।
कल्याणकारी शिव दुःख हारी।।१।।

ज्यों पूर्णमासी तव सौम्य हाँसी।
जो हैं विलासी उन से उदासी।
भार्या तुम्हारी गिरिजा दुलारी।
कल्याणकारी शिव दुःख हारी।।२।।

जो भक्त सेवे फल पुष्प देवे।
वाँ की तु देवे भव-नाव खेवे।
दिव्यावतारी भव बाध टारी।
कल्याणकारी शिव दुःख हारी।।३।।

धूनी जगावे जल को चढ़ावे।
जो भक्त ध्यावे उन को तु भावे।
आँखें अँगारी गल सर्प धारी।
कल्याणकारी शिव दुःख हारी।।४।।

माथा नवाते तुझको रिझाते।
जो धाम आते उन को सुहाते।
जो हैं दुखारी उनके सुखारी।
कल्याणकारी शिव दुःख हारी।।५।।

मैं हूँ विकारी तु विराग धारी।
मैं व्याभिचारी तुम काम मारी।
मैं जन्मधारी तु स्वयं प्रसारी।
कल्याणकारी शिव दुःख हारी।।६।।

द्वारे तिहारे दुखिया पुकारे।
सन्ताप सारे हर लो हमारे।
झोली उन्हारी भरते उदारी।
कल्याणकारी शिव दुःख हारी।।७।।

सृष्टी नियंता सुत एकदंता।
शोभा बखंता ऋषि साधु संता।
तु अर्ध नारी डमरू मदारी।
पिनाक धारी शिव दुःख हारी।८।।

जा की उजारी जग ने दुआरी।
वा की निखारी तुमने अटारी।
कृपा तिहारी उन पे तु डारी।
पिनाक धारी शिव दुःख हारी।९।।

पुकार मोरी सुन ओ अघोरी।
हे भंगखोरी भर दो तिजोरी।
माँगे भिखारी रख आस भारी।
पिनाक धारी शिव दुःख हारी।।१०।।

भभूत अंगा तव भाल गंगा।
गणादि संगा रहते मलंगा।
श्मशान चारी सुर-काज सारी।
पिनाक धारी शिव दुःख हारी।।११।।

नवाय माथा रचुँ दिव्य गाथा। 
महेश नाथा रख सीस हाथा।
त्रिनेत्र थारी महिमा अपारी।
पिनाक धारी शिव दुःख हारी।।१२।।

करके तांडव नृत्य, प्रलय जग की शिव करते।
विपदाएँ भव-ताप, भक्त जन का भी हरते।
देवों के भी देव, सदा रीझो थोड़े में। 
करो हृदय नित वास, शैलजा सँग जोड़े में।
रच "शिवेंद्रवज्रा" रखे, शिव चरणों में 'बासु' कवि।
जो गावें उनकी रहे, नित महेश-चित में छवि।।

(छंद १ से ७ इंद्र वज्रा में, ८ से १० उपजाति में और ११ व १२ उपेंद्र वज्रा में।

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆
लक्षण छंद "इन्द्रवज्रा"

"ताता जगेगा" यदि सूत्र राचो।
तो 'इन्द्रवज्रा' शुभ छंद पाओ।

"ताता जगेगा" = तगण, तगण, जगण, गुरु, गुरु
221  221  121  22
**************
लक्षण छंद "उपेंद्रवज्रा"

"जता जगेगा" यदि सूत्र राचो।
'उपेन्द्रवज्रा' तब छंद पाओ।

"जता जगेगा" = जगण, तगण, जगण, गुरु, गुरु
121  221  121  22
**************
लक्षण छंद "उपजाति छंद"

उपेंद्रवज्रा अरु इंद्रवज्रा।
दोनों मिले तो 'उपजाति' छंदा।

चार चरणों के छंद में कोई चरण इन्द्रवज्रा का हो और कोई उपेंद्र वज्रा का तो वह 'उपजाति' छंद के अंतर्गत आता है।
**************


बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
28-11-2018

आँसू छंद "कल और आज"

आँसू छंद "कल और आज"

भारत तू कहलाता था, सोने की चिड़िया जग में।
तुझको दे पद जग-गुरु का, सब पड़ते तेरे पग में।
बल पे विपुल ज्ञान के ही, जग पर शासन फैलाया।
कितनों को इस संपद से, तूने जीना सिखलाया।।1।।

तेरी पावन वसुधा पर, नर-रत्न अनेक खिले थे।
बल, विक्रम और दया के, जिनको गुण खूब मिले थे।
अपनी अमृत-वाणी से, जग मानस को लहराया।
उनने धर्म आचरण से, था दया केतु फहराया।।2।।

समता की वीणा-धुन से, मानस लहरी गूँजाई।
जग के सब वन उपवन में, करुणा की लता सजाई।
अपने पावन इन गुण से, तू जग का गुरु कहलाया।
रँग एक वर्ण में सब को, अपना सम्मान बढ़ाया।।3।।

पर आज तुने हे भारत, वह गौरव भुला दिया है।
वह भूल अतीत सुहाना, धारण नव-वेश किया है।
तेरे दीपक की लौ में, जिनके थे मिटे अँधेरे।
तुझको सिखा रहें हैं वे, अब बन कर अग्रज तेरे।।4।।

तूने ही सब से पहले, उनको उपदेश दिया था।
जग का ज्ञान-भानु बन कर, सब का तम दूर किया था।
वह मान बड़ाई तूने, अपने मन से बिसरा दी।
वह छवि अतीत की पावन, उर से ही आज मिटा दी।।5।।

तेरे प्रकाश में जग का, था आलोकित हृदयांगन।
तूने ही तो सिखलाया, जग-जन को वह ज्ञानांकन।
वह दिव्य जगद्गुरु का पद, तू  पूरा भूल गया है।
सब ओर तुझे अब केवल, दिखता सब नया नया है।।6।।

जग-जन कृपा दृष्टि के जो, आकांक्षी कभी तुम्हारी। 
अपना आँचल फैलाये, बन कर जो दीन भिखारी।
उनकी कृपा दृष्टि की अब, तू मन में रखता आशा।
क्या भान नहीं है इसका, कैसे पलटा यह पासा।।7।।

बिसराये तूने अपने, सब रिवाज, खाना, पीना।
भूषा और वेश भूला, छोड़ा रिश्तों में जीना।
अपनी जाति, वर्ण, कुल का, मन में भान नहीं  अब है।
तूने रंग विदेशी ही, ठाना अपनाना सब है।।8।।

कण कण में व्याप्त हुई है, तेरे भीषण कृत्रिमता।
केवल आज विदेशी की, तुझ में दिखती व्यापकता।
जाती दृष्टि जिधर को अब, हैं रंग नये ही दिखते।
नव रंग रूप ये तेरी, हैं भाग्य-रेख को लिखते।।9।।
===============
आँसू छंद विधान

14 - 14 मात्रा (चरण में कुल 28 मात्रा। दो दो चरण सम तुकांत)
मात्रा बाँट:- 2 - 8 - 2 - 2  प्रति यति में।
मानव छंद में किंचित परिवर्तन कर प्रसाद जी ने पूरा 'आँसू' खंड काव्य इस छंद में रचा है, इसलिए इस छंद का नाम ही आँसू छंद प्रचलित हो गया है।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
17-04-2016

ग़ज़ल (बना है बोझ ये जीवन कदम)

ग़ज़ल (बना है बोझ ये जीवन कदम)

बह्र:- 1212  1122  1212  1122

बना है बोझ ये जीवन कदम थमे थमे से हैं,
कमर दी तोड़ गरीबी बदन झुके झुके से हैं।

लिखा न एक निवाला नसीब हाय ये कैसा,
सहन ये भूख न होती उदर दबे दबे से हैं।

पड़े दिखाई नहीं अब कहीं भी आस की किरणें,
गगन में आँख गड़ाए नयन थके थके से हैं।

मिली सदा हमें नफरत करे जलील जमाना,
हथेली कान पे रखते वचन चुभे चुभे से हैं।

दिखी कभी न बहारें मिले सदा हमें पतझड़,
मगर हमारे मसीहा कमल खिले खिले से हैं।

सताए भूख तो निकले कराह दिल से हमारे,
नया न कुछ जो सुनें हम कथन सुने सुने से हैं।

सदा ही देखते आए ये सब्ज बाग घनेरे,
'नमन' तुझे है सियासत सपन बुझे बुझे से हैं।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
14-10-2016

आल्हा छंद "अग्रदूत अग्रवाल"

अग्रोहा की नींव रखे थे, अग्रसेन नृपराज महान।
धन वैभव से पूर्ण नगर ये, माता लक्ष्मी का वरदान।।
आपस के भाईचारे पे, अग्रोहा की थी बुनियाद।
एक रुपैया एक ईंट के, सिद्धांतों पर ये आबाद।।

ऊँच नीच का भेद नहीं था, वासी सभी यहाँ संपन्न।
दूध दही की बहती नदियाँ, प्राप्य सभी को धन अरु अन्न।।
पूर्ण अहिंसा पर जो आश्रित, वणिक-वृत्ति को कर स्वीकार।
सवा लक्ष जो श्रेष्ठि यहाँ के, नाम कमाये कर व्यापार।।

कालांतर में अग्रसेन के, वंशज 'अग्रवाल' कहलाय।
सकल विश्व में लगे फैलने, माता लक्ष्मी सदा सहाय।।
गौत्र अठारह इनके शाश्वत, रिश्ते नातों के आधार।
मर्यादा में रह ये पालें, धर्म कर्म के सब व्यवहार।।

आशु बुद्धि के स्वामी हैं ये, निपुण वाकपटु चतुर सुजान।
मंदिर गोशाला बनवाते, संस्थाओं में देते दान।।
माँग-पूर्ति की खाई पाटे, मिलजुल करते कारोबार।
जो भी इनके द्वारे आता, पाता यथा योग्य सत्कार।।

सदियों से लक्ष्मी माता का, मिला हुआ पावन वरदान। 
अग्रवंश के सुनो सपूतों, तुम्हें न ये दे दे अभिमान।।
धन-लोलुपता बढ़े न इतनी, स्वारथ में तुम हो कर क्रूर।
'ईंट रुपैयै' की कर बैठो, रीत सनातन चकनाचूर।।

'अग्र' भाइयों से तुम नाता, देखो लेना कभी न तोड़।
अपने काम सदा आते हैं, गैर साथ जब जायें छोड़।।
उत्सव की शोभा अपनों से, उनसे ही हो हल्का शोक।
अपने करते नेक कामना, जीवन में छाता आलोक।।

सगे बिरादर बांधव से सब, रखें हृदय से पूर्ण लगाव।
जैसे भाव रखेंगे उनमें, वैसे उनसे पाएँ भाव।।
अपनों की कुछ हो न उपेक्षा, धन दौलत में हो कर चूर। 
नाम दाम सब धरे ही रहते, अपने जब हो जातें दूर।।

बूढ़े कहते आये हरदम, रुपयों की नहिं हो खनकार।
वैभव का तो अंध प्रदर्शन, अहंकार का करे प्रसार।।
अग्रसेन जी के युग से ही, अपनी यही सनातन रीत।
भाव दया के सब पर राखें, जीव मात्र से ही हो प्रीत।।

वैभव में कुछ अंधे होकर, भूल गये सच्ची ये राह।
जीवन का बस एक ध्येय रख, मिल जाये कैसे भी वाह।।
अंधी दौड़ दिखावे की कुछ, इस समृद्ध-कुल में है आज।
वंश-प्रवर्तक के मन में भी, लख के आती होगी लाज।।

छोड़ें उत्सव, खुशी, व्याह को, अरु उछाव के सारे गीत।
बिना दिखावे के नहिं निभती, धर्म कर्म तक की भी रीत।।
'बासुदेव' विक्षुब्ध देख कर, 'अग्र' वंश की अंधी चाल।
इसमें आगे आ समाज अब, निर्णय कर थामें तत्काल।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया 

06-05-18

आल्हा/वीर छंद "विधान"

आल्हा छंद या वीर छंद दो पदों के चार चरणों में रचा जाता है। इसे मात्रिक सवैया भी कहते हैं। इसमें यति १६-१५ मात्रा पर नियत होती है। दो दो या चारों चरण समतुकांत होने चाहिए। 

16 मात्रिक वाले पद का विधान और मात्रा बाँट ठीक चौपाई छंद वाला है। 15 मात्रिक पद का अंत ताल यानि गुरु लघु से होना आवश्यक है। तथा बची हुई 12 मात्राएँ तीनों चौकल हो सकती हैं या फिर एक अठकल और एक चौकल हो सकती है। चौकल और अठकल के सभी नियम लागू होंगे। 

ध्यातव्य है कि इस छंद का ’यथा नाम तथा गुण’ की तरह इसके कथ्य अकसर ओज भरे होते हैं और सुनने वाले के मन में उत्साह और उत्तेजना पैदा करते हैं। जनश्रुति इस छंद की विधा को यों रेखांकित करती है - 

आल्हा मात्रिक छन्द, सवैया, सोलह-पन्द्रह यति अनिवार्य। 
गुरु-लघु चरण अन्त में रखिये, सिर्फ वीरता हो स्वीकार्य।
अलंकार अतिशयताकारक, करे राइ को तुरत पहाड़। 
ज्यों मिमयाती बकरी सोचे, गुँजा रही वन लगा दहाड़। 

परन्तु इसका यह अर्थ भी नहीं कि इस छंद में वीर रस के अलावा अन्य रस की रचना नहीं रची जा सकती।
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भारत के जवानों पर चार पंक्तियाँ।

लिया सम्भाल मोर्चा झट से, ज्योंही हुआ शत्रु का भान।
उछल उछल के कूद पड़े वो, भरी हुई बन्दूकें तान।
नस नस इनकी फड़क उठी है, करने रिपु का शोणित पान।
झपट पड़े हैं क्रुद्ध सिंह से, भारत के ये वीर जवान।।


(बासुदेव अग्रवाल 'नमन' रचित)

अहीर छंद "प्रदूषण"

बढ़ा प्रदूषण जोर।
इसका कहीं न छोर।।
संकट ये अति घोर।
मचा चतुर्दिक शोर।।

यह भीषण वन-आग।
हम सब पर यह दाग।।
जाओ मानव जाग।
छोड़ो भागमभाग।।

मनुज दनुज सम होय।
मर्यादा वह खोय।।
स्वारथ का बन भृत्य।
करे असुर सम कृत्य।।

जंगल किए विनष्ट।
सहता है जग कष्ट।।
प्राणी सकल कराह।
भरते दारुण आह।।

धुआँ घिरा विकराल।
ज्यों उगले विष व्याल।।
जकड़ जगत निज दाढ़।
विपदा करे प्रगाढ़।।

दूषित नीर समीर।
जंतु समस्त अधीर।।
संकट में अब प्राण।
उनको कहीं न त्राण।।

प्रकृति-संतुलन ध्वस्त।
सकल विश्व अब त्रस्त।।
अन्धाधुन्ध विकास।
आया जरा न रास।।

विपद न यह लघु-काय।
शापित जग-समुदाय।।
मिलजुल करे उपाय।
तब यह टले बलाय।।
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अहीर छंद विधान:-

यह 11 मात्रा का छंद है जिसका अंत जगण 121 से होना आवश्यक है। एक छंद में कुल 4 चरण होते हैं और छंद के दो दो या चारों चरण सम तुकांत होने चाहिए। इन 11 मात्राओं का विन्यास ठीक दोहे के 11 मात्रिक सम चरण जैसा है बस 8वीं मात्रा सदैव लघु रहे। दोहे के सम चरण का कल विभाजन है:
8+3(ताल यानि 21)
अठकल में 2 चौकल हो सकते हैं। अठकल और चौकल के सभी नियम अनुपालनीय हैं। निम्न संभावनाएँ हो सकती हैं।
3,3,1,1
2, जगण,1,1
3, जगण,1
4,2,1,1
4,3,1
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
08-11-16