Wednesday, April 21, 2021

लावणी छंद आधारित गीत (आओ सब मिल कर संकल्प करें)

आओ सब मिल कर संकल्प करें।
चैत्र शुक्ल नवमी है कुछ तो, नूतन आज करें।
आओ सब मिल कर संकल्प करें॥

मर्यादा में रहना सीखें, सागर से बन कर हम सब।
सिखलाएँ इस में रहना हम, तोड़े कोई इसको जब।
मर्यादा के स्वामी की यह, धारण सीख करें।
आओ सब मिल कर संकल्प करें॥
 
मात पिता गुरु और बड़ों की, सेवा का हरदम मन हो।
भाई मित्र और सब के ही, लिए समर्पित ये तन हो।
समदर्शी सा बन कर सबसे, हम व्यवहार करें।
आओ सब मिल कर संकल्प करें॥

आज रामनवमी के दिन हम, दृढ हो कर व्रत यह लेवें।
दीन दुखी आरत जो भी हैं, उन्हें सहारा हम देवें।
राम-राज्य का सपना भू पर, हम साकार करें।
आओ सब मिल कर संकल्प करें॥

उत्तम आदर्शों को अपना, जीवन सफल बनाएँ हम।
कर चरित्र निर्माण स्वयं का, जग का दूर करें सब तम।
उत्तम बन कर पुरुषोत्तम को, हम सब 'नमन' करें।
आओ सब मिल कर संकल्प करें॥

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
15-04-16

Friday, April 16, 2021

मुक्तक (दुख, दर्द)

बेजुबां की पीड़ा का गर न दर्द सीने में,
सार कुछ नहीं फिर है इस जहाँ में जीने में।
मारते हो जीवों को ढूँढ़ते ख़ुदा को हो,
गर नहीं दया मन में क्या रखा मदीने में।

(212  1222)*2
*********

इस जमीं के सिवा कोई बिस्तर नहीं, आसमाँ के सिवा सर पे है छत नहीं।
मुफ़लिसी को गले से लगा खुश हैं हम, ये हमारे लिये कुछ मुसीबत नहीं।
उन अमीरों से पूछो जरा दोस्तों, जितना रब ने दिया उससे खुश हैं वो क्या।
पेट खाली भी हो तो न परवाह यहाँ, इस जमाने से फिर भी शिकायत नहीं।।

(212×8)
**********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
28-06-17

राजस्थानी डाँखला (2)

ढोकलास गाँव रो यो ढोकलो हलवाइड़ो,
जिस्यो नाँव बिस्यो डोल ढोलकी सो भाइड़ो।
धोलै बालाँ री है सिर पर छँटणी,
लागै लिपटी है नारैलाँ री चटणी।
तण चालै जिंया यो ही गाँव रो जँवाइड़ो।।
*****

नेता बण्या जद से ही गाँव रा ये लप्पूजी,
राजनीति माँय बे चलाण लाग्या चप्पूजी।
बेसुरी अलापै राग,
सुण सारा जावै भाग।
बाजण लाग्या तब से ही गाँव में वे भप्पूजी।।
*****

रेल रा पुराना इंजन धुआँलाल सेठ जी,
कलकत्ता री गल्याँ माँय डोले जमा पेठ जी।
मुँह में दबा धोली नाल,
धुआँ छोड़े धुआँलाल,
पुलिस्यां के सागै पुग्या ठिकाणा में ठेठ जी।।
*****

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
09-09-20

Saturday, April 10, 2021

पड़ोसन (कुण्डलियाँ)

हो पड़ोस में आपके, कोई सुंदर नार।
पत्नी करती प्रार्थना, साजन नैना चार।
साजन नैना चार, रात दिन गुण वो गाते।
सजनी नित श्रृंगार, करे सैंया मन भाते।
मनमाफिक यदि आप, चाहते सजनी हो तो।
नई पड़ोसन एक,  बसालो सुंदर जो हो।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
22-09-2016

दोहे (लगन)

मन में धुन गहरी चढ़े, जग का रहे न भान।
कार्य असम्भव नर करे, विपद नहीं व्यवधान।।

तुलसी को जब धुन चढ़ी, हुआ रज्जु सम व्याल।
मीरा माधव प्रेम में, विष पी गयी कराल।।

ज्ञान प्राप्ति की धुन चढ़े, कालिदास सा मूढ़।
कवि कुल भूषण वो बने, काव्य रचे अति गूढ़।।

ज्ञानार्जन जब लक्ष्य हो, करलें चित्त अधीन।
ध्यान ध्येय पे राखलें, लखे सर्प ज्यों बीन।।

आस पास को भूल के, मन प्रेमी में लीन।
गहरा नाता जोड़िए, ज्यों पानी से मीन।।

अंतर में जब ज्ञान का, करता सूर्य प्रकाश।
अंधकार अज्ञान का, करे निशा सम नाश।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
12-10-2016

राधेश्यामी छंद "शशिकला"

रात्री देवी के आँगन में, जब गगन मार्ग से शशि जाता।
शीतल किरणों को फैला कर, यह शुभ्र ज्योत्स्ना है छाता।।
कर व्योम मार्ग को आलोकित, बढ़ता मयंक नभ-मंडल पे।
आनन से छिटका मुस्काहट, दिन जैसा करे धरा तल पे।।

खेले जब आंखमिचौली यह, प्यारे तारों से मिलजुल के।
बादल समूह के पट में छिप, रह जाये कभी कभी घुल के।।
लुकछिप कर कभी देखता है, रख ओट मेघ के अंबर की।
घूंघट-पट से नव वधु जैसे, निरखे छवि अपने मन-हर की ।।

चञ्चलता लिये नवल-शिशु सी, दिन प्रति दिन रूप बदलता है।
ले पूर्ण रूप को निखर कभी, हर दिन घट घट कर चलता है।।
रजनी जब सुंदर थाल सजा, इसका आ राजतिलक करती।
आरूढ़ गगन-सिंहासन हो, कर दे यह रजतमयी धरती।।

बुध तारागण के बैठ संग, यह राजसभा में अंबर की।
संचालन करे राज्य का जब, छवि देखे बनती नृप वर की।।
यह रजत-रश्मि को बिखरा कर, भूतल को आलोकित करता।
शीतल सुरम्य किरणों से फिर, दाहकता हृदयों की हरता।।

जो शष्य कनक सम खेतों का, पा रजत रश्मियों की शोभा।
वह हेम रजतमय हो कर के, छवि देता है मन की लोभा।।
धरती का आँचल धवल हुआ, सरिता-धारा झिलमिल करती।
ग्रामीण गेह की शुभ्रमयी, प्रांजल शोभा मन को हरती।।

दे मधुर कल्पना कवियों को, मृगछौना सा भोलाभाला।
मनमोहन सा प्यारा चंदा, सब के मन को हरने वाला।।
रजनी के शासन में करके, यह 'नमन' धरा अरु अम्बर को।
यह भोर-पटल में छिप जाता, दे कर पथ प्यारे दिनकर को।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
21-05-2016

Monday, April 5, 2021

ग़ज़ल (आ गयी होली)

बह्र:- 2122 2122 2122 2

पर्वों में सब से सुहानी आ गयी होली,
फागुनी रस में नहाई आ गयी होली।

टेसुओं की ले के लाली आ गयी होली,
रंग बिखराती बसंती आ गयी होली।

देखिए अमराइयों में कोयलों के संग,
मंजरी की ओढ़ चुनरी आ गयी होली।

चंग की थापों से गुंजित फाग की धुन में,
होलियारों की ले टोली आ गयी होली।

दूर जो परदेश में हैं उनके भावों में,
याद अपनों की जगाती आ गयी होली।

होलिका के संग सारे हम जला कर भेद,
भंग पी लें देश-हित की आ गयी होली।

एकता के सूत्र में बँध हम 'नमन' झूमें,
प्रीत की अनुभूति देती आ गयी होली।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
22-3-21

ग़ज़ल (जब तलक उनकी करामात)

बह्र:- 2122 1122 1122 22

जब तलक उनकी करामात नहीं होती है,
आफ़तों की यहाँ बरसात नहीं होती है।

जिनकी बंदूकें चलें दूसरों के कंधों से,
उनकी खुद लड़ने की औक़ात नहीं होती है।

आड़ ले दोस्ती की भोंकते खंजर उनकी,
दोस्ती करने की ही जा़त नहीं होती है।

अब हमारी भी हैं नज़दीकियाँ उनसे यारो,
यार कहलाने लगे बात नहीं होती है।

राह चुनते जो सदाक़त की यकीं उनका यही,
इस पे चलने से कभी मात नहीं होती है।

वे भला समझेंगे क्या ग़म के अँधेरे जिनकी,
ग़म की रातों से मुलाक़ात नहीं होती है।

ऐसी दुनिया से 'नमन' दूर ही रहना जिस में,
चैन से सोने की भी रात नहीं होती है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-07-2020

ग़ज़ल (झूठे रोज बहाना कर)

बह्र:- 22  22  22  2

झूठे रोज बहाना कर,
क्यों तरसाओ ना ना कर।

फ़िक्र जमाने की छोड़ो,
दिल का कहना माना कर।

मेटो मन से भ्रम सारे,
खुद को तो पहचाना कर।

कब तक जग भरमाओगे,
झूठे जोड़ घटाना कर।

चैन तभी जब सोओगे,
कुछ नेकी सिरहाना कर।

जग में रहना है फिर तो,
इस जग से याराना कर।

दुखियों का दुख दूर 'नमन',
कोशिश कर रोजाना कर।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन',
तिनसुकिया
3-1-19

Thursday, March 25, 2021

कजरी गीत (सावन रुत)

अरे रामा! सावन की रुत जी जलाये - 2
सखि मोहे सजना की याद सताये,
हाये सखि सजना की याद सताये।

कारे मेघा उमड़ डरायें,
अरे रामा मेघा डरायें!!!
कारे मेघा उमड़ डरायें,
देख बिजुरिया जी घबराये,
ऐसे में भर अंक सजनवा,
सखि भर अंक सजनवा,
अरे रामा छतिया से वे चिपकायें
सखि मोहे सजना की याद सताये।

खिली हुई प्यारी हरियाली,
हे रामा प्यारी हरियाली!!!
खिली हुई प्यारी हरियाली,
कूक रही कोयल मतवाली,
पर मेरे हैं दूर सजनवा,
हाय सखि दूर सजनवा,
अरे रामा रह रह जिया तड़पायें,
सखि मोहे सजना की याद सताये।

झूल रहीं बागों में सखियाँ,
अरे रामा बागों में सखियाँ!!!
झूल रहीं बागों में सखियाँ,
गायें कजरी मटका अँखियाँ,
सबके हैं घर में ही सजनवा,
हाय सखि घर में सजनवा,
अरे रामा मुझ को भी गीत सुनायें,
सखि मोहे सजना की याद सताये।

अरे रामा! सावन की रुत जी जलाये,
सखि मोहे सजना की याद सताये।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
31-08-20

मनहरण घनाक्षरी "होली के रंग"

(1)

होली की मची है धूम, रहे होलियार झूम,
मस्त है मलंग जैसे, डफली बजात है।

हाथ उठा आँख मींच, जोगिया की तान खींच,
मुख से अजीब कोई, स्वाँग को बनात है।

रंगों में हैं सराबोर, हुड़दंग पुरजोर,
शिव के गणों की जैसे, निकली बरात है।

ऊँच-नीच सारे त्याग, एक होय खेले फाग,
'बासु' कैसे एकता का, रस बरसात है।।

****************
(2)

फाग की उमंग लिए, पिया की तरंग लिए,
गोरी जब झूम चली, पायलिया बाजती।

बाँके नैन सकुचाय, कमरिया बल खाय,
ठुमक के पाँव धरे, करधनी नाचती।

बिजुरिया चमकत, घटा घोर कड़कत,
कोयली भी ऐसे में ही, कुहुक सुनावती।

पायल की छम छम, बादलों की रिमझिम,
कोयली की कुहु कुहु, पञ्च बाण मारती।।

****************
(3)

बजती है चंग उड़े रंग घुटे भंग यहाँ,
उमगे उमंग व तरंग यहाँ फाग में।

उड़ता गुलाल भाल लाल हैं रसाल सब,
करते धमाल दे दे ताल रंगी पाग में।

मार पिचकारी भीगा डारी गोरी साड़ी सारी,
भरे किलकारी खेले होरी सारे बाग में।

'बासु' कहे हाथ जोड़ खेलो फाग ऐंठ छोड़,
किसी का न दिल तोड़ मन बसी लाग में।।


बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
07-03-2017

Thursday, March 18, 2021

प्रणय निवेदन कर रहा

 चतुष्पदी

प्रणय निवेदन कर रहा,

करले तू स्वीकार,

प्यासा मन भटकै फिरै,

इस पर कर अधिकार।


मुक्तक (जवानी)

खुले नभ की ये छत हो सर पे सुहानी,
करे तन को सिहरित हवा की रवानी,
छुअन मीत की हो किसे फिर है परवाह,
कि बैठें हैं कैसे, यही तो जवानी।

(122*4)
***********

जवानी का मजा है
हसीनों की सजा है
मरें हर रोज इसमें
कहाँ ऐसी क़जा है।

(1222 122)
********

न ऐसी कभी जिंदगानी लगी,
न दुनिया ही इतनी सुहानी लगी,
मिली जबसे उनकी मुहब्बत हमें,
न ऐसी कभी ये जवानी लगी।

(122*3 12)
************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-02-17

विविध मुक्तक -7

उचित सम्मान देने से यथा सम्मान मिलता है,
निरादर जो करे सबका उसे अपमान मिलता है,
न पद को देख दो इज्जत नहीं दो देख धन दौलत,
वृथा की वाहवाही से तो' बस अभिमान मिलता है।

(1222*4)
***********

खुदा के न्याय से बढ़कर नहीं कोई अदालत है,
नहीं हक़ की जिरह से बढ़ जहाँ में कुछ वकालत है,
लड़ो मजलूम की खातिर सहो हँस जुल्म की आँधी,
जहाँ में इससे बढ़ कर के नहीं कोई सदाकत है।

(1222×4)
**********

खुशी के गा तराने मैं हमेशा।
तुम्हें आया हँसाने मैं हमेशा।
करूँ हल्का तुम्हारा ग़म, मेरा भी।
दिखा सपने सुहाने मैं हमेशा।।

(1222 1222 122)
**********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
8-10-19

Friday, March 12, 2021

रोला छंद "शाम'

रवि को छिपता देख, शाम ने ली अँगड़ाई।
रक्ताम्बर को धार, गगन में सजधज आई।।
नृत्य करे उन्मुक्त, तपन को देत विदाई।
गा कर स्वागत गीत, करे रजनी अगुवाई।।

सांध्य-जलद हो लाल, नृत्य की ताल मिलाए।
उमड़-घुमड़ कर मेघ, छटा में चाँद खिलाए।।
पक्षी दे संगीत, मधुर गीतों को गा कर।
मोहक भरे उड़ान, पंख पूरे फैला कर।।

मुखरित किये दिगन्त, शाम ने नभ में छा कर।
भर दी नई उमंग, सभी में खुशी जगा कर।।
विहग वृन्द ले साथ, करे सन्ध्या ये नर्तन।
अद्भुत शोभा देख, पुलक से भरता तन मन।।

नारी का प्रतिरूप, शाम ये देती शिक्षा।
सम्बल निज पे राख, कभी मत चाहो भिक्षा।।
सूर्य पुरुष मुँह मोड़, त्याग के देता जब चल।
रजनी देख समक्ष, सांध्य तब भी है निश्चल।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-01-2017

लावणी छन्द (ईश गरिमा)

तेरी ईश सृष्टि की महिमा, अद्भुत बड़ी निराली है;
कहीं शीत है कहीं ग्रीष्म है, या बसन्त की लाली है।
जग के जड़ चेतन जितने भी, सब तेरे ही तो कृत हैं;
जो तेरी छाया से वंचित, वे अस्तित्व रहित मृत हैं।।

धैर्य धरे नित भ्रमणशील रह, धार रखे जीवन धरती;
सागर की उत्ताल तरंगें, अट्टहास तुझसे करती।
कलकल करते सरिता नद में, तेरी निपुण सृष्टि झलके;
अटल खड़े गिरि खंडों से भी, तेरी आभा ही छलके।।

रम्य अरुणिमा प्राची में भर, भोर क्षितिज में जब सोहे;
रक्तवर्ण वृत्ताकृति शोभा, बाल सूर्य की जग मोहे।
चंचल चपल चांदनी में तू, शशि की शीतलता में है।
तारा युक्त चीर से शोभित, निशि की नीरवता में है,

मैदानों की हरियाली में, घाटी की गहराई में;
कोयल की कुहु-कुहु से गूँजित, बासन्ती अमराई में।
अन्न भार से शीश झुकाए, खेतों की इन फसलों में; 
तेरा ही चातुर्य झलकता, कामधेनु की नसलों में।।

विस्तृत एवम् स्वच्छ सलिल से, नील सरोवर भरे हुए;
पुष्पों के गुच्छों से मुकुलित, तरुवर मोहक लदे हुए।
घिरे हुए जो कुमुद दलों से, इठलाते प्यारे शतदल;
तेरी ही आभा के द्योतक, ये गुलाब पुष्पित अति कल।।

पंक्ति बद्ध विहगों का कलरव, रसिक जनों को हर्षाए;
वन गूँजाती वनराजों की, सुन दहाड़ मन थर्राए।
चंचल हिरणी की आँखों में, माँ की प्यार भरी ममता,
तुझसे ही तो सब जीवों की, शोभित रहती है क्षमता।।

हे ईश्वर हे परमपिता प्रभु, दीनबन्धु जगसंचालक;
तेरी कृतियों का बखान है, करना अति दुष्कर पालक।
अखिल जगत सम्पूर्ण चराचर, तुझसे ही तो निर्मित है;
तुझसे लालित पालित होता, तुझसे ही संहारित है।।

भाव प्रसून खिला दे हे प्रभु, हृदय वाटिका में मेरी;
काव्य-सृजन से सुरभित राखूँ, पा कर इसे कृपा तेरी।
मनोकामना पूर्ण करो ये, ईश यही मेरी विनती;
तेरे उपकारों की कोई, मेरे पास नहीं गिनती।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
07-05-2016

सार छंद "टेसू और नेता"

ज्यों टेसू की उलझी डालें, वैसा है ये नेता।
स्वारथ का पुतला ये केवल, अपनी नैया खेता।।
पंच वर्ष तक आँसू देता, इसका पतझड़ चलता।
जिस में सोता कुम्भकरण सा, जनता का जी जलता।।

जब चुनाव नेड़े आते हैं, तब खुल्ले में आता।
नव आश्वासन की झड़ से ये, भारी शोर मचाता।।
ज्यों बसंत में टेसू फूले, त्यों चुनाव में नेता।
पाँच साल में एक बार यह, जनता की सुधि लेता।।

क्षण क्षण रूप बदलता रहता, गिरगिट के ये जैसा।
चाल भाँप लोगों की पहले, रंग दिखाता वैसा।।
रंग दूर से ही टेसू का, लगता बड़ा सुहाना।
फिर तो उसका यूँ ही झड़ कर, व्यर्थ चला है जाना।।

एक लक्ष्य इस नेता का है, कैसे कुर्सी पाये।
साम, दाम जैसे भी हो ये, सत्ता बस हथियाये।।
चटक मटक ऊपर की ओढ़े, गन्ध हीन टेसू सा।
चार दिनों की शोभा इसकी, फिर उलझे गेसू सा।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-03-17

Friday, March 5, 2021

ग़ज़ल (प्यास दिल की न यूँ बढ़ाओ)

बह्र:- 2122  1212  22

प्यास दिल की न यूँ बढ़ाओ तुम,
जान ले लो न पर सताओ तुम।

पास आ के जरा सा बैठो तो,
फिर न चाहे गलेे लगाओ तुम।

चोट खाई बहुत जमाने से,
कम से कम आँख मत चुराओ तुम।

इल्तिज़ा आख़िरी ये जानेमन,
अब तो उजड़ा चमन बसाओ तुम।

खुद की नज़रों से खुद ही गिर कर के,
आग नफ़रत की मत लगाओ तुम,

बीच सड़कों के क़त्ल, शील लुटे,
देख कर सब ये तिलमिलाओ तुम।

ख़ारों के बीच रह के भी ए 'नमन'
खुद भी हँस औरों को हँसाओ तुम।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
12-02-2017

ग़ज़ल (तीर नज़रों का उनका चलाना हुआ)

बह्र:- 212*4

तीर नज़रों का उनका चलाना हुआ,
और दिल का इधर छटपटाना हुआ।

हाल नादान दिल का न पूछे कोई,
वो तो खोया पड़ा आशिक़ाना हुआ।

ये शब-ओ-रोज़, आब-ओ-हवा आसमाँ,
शय अज़ब इश्क़ है सब सुहाना हुआ।

अब नहीं बाक़ी उसमें किसी की जगह,
जिनकी यादों का दिल आशियाना हुआ।

क्या यही इश्क़ है, रूठा दिलवर उधर,
और दुश्मन इधर ये जमाना हुआ।

जो परिंदा महब्बत का दिल में बसा,
बाग़ उजड़ा तो वो बेठिकाना हुआ।

शायरी ग़म भुलाती थी तेरे 'नमन',
शौक़ उल्फ़त का पर दिल जलाना हुआ।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
30-09-19

ग़ज़ल (ग़म पी पी कर दिल जब ऊबा)

बह्र:- 2222 2222 2222 222

ग़म पी पी कर दिल जब ऊबा, तब मयखाने याद आये,
तेरी आँखों की मदिरा के, सब पैमाने याद आये।

उम्मीदों की मिली हवाएँ जब भी दिल के शोलों को 
तेरे साथ गुजारे वे मदहोश ज़माने याद आये।

मदहोशी में कुछ गाने को जब भी प्यासा दिल मचला, 
तेरा हाथ पकड़ जोे गाये, सभी तराने याद आये।

ख्वाबों में भी मैंने चाहा, जब भी तुझ को छूने को,
इठला कर वो ना ना करते, हसीं बहाने याद आये।

संगी साथी संग कभी गर दिल हल्का करना चाहा,
तू मुझ में मैं तुझ में खोया दो दीवाने याद आये।

पल जो तेरे साथ गुजारे, तरस गया हूँ अब उनको,
तेरी मीठी नोक झोंक के, सब अफ़साने याद आये।

नए कभी उपहार मिलें तो, टीस 'नमन'-मन में उठती,
होठों से जो तुझ से मिले थे, वे नज़राने याद आये।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
15-12-16

Sunday, February 21, 2021

राजस्थानी डाँखला (1)

(1)

लिछमी बाईसा री न्यारी नगरी है झाँसी,
गद्दाराँ रै गलै री बणी थी जकी फाँसी।
राणी सा रा ठाठ बाठ,
गाताँ थकै नहीं भाट।
सुण सुण फिरंग्याँ के चाल जाती खाँसी।।
****
(2)

बाकी सब गढणियाँ गढ तो चित्तौडगढ़,
उपज्या था वीर अठै एक से ही एक बढ।
कुंभा री हो ललकार,
साँगा री या तलवार,
देशवासी बणो बिस्या गाथा वाँ री पढ पढ।।
****
(3)

राजनीति माँय बड़ग्या सगला उचक्का चोर,
श्राधां आला कागला सा उतपाती घनघोर।
पड़ जावै जठै पाँव,
मचा देवे काँव काँव।
चाटग्या ये देश सारो निकमा मुफतखोर।
****

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
08-09-20

क्षणिकाएँ

(बीती जवानी)

(1)
जवानी में जो
इरादे पत्थर से
मजबूत होते थे,,,
वे अब अक्सर
पुराने फर्नीचर से
चरमरा टूट जाते हैं।
**

(2)

क्षणिका  (परेशानी)

जो मेरी परेशानियों पर
हरदम हँसते थे
पर अब मैंने जब
परेशानियों में
हँसना सीख लिया है
वे ही मुझे अब
देख देख
रो रहे हैं।
**

(3)

क्षणिका (पहचान)

आभासी जग में 
पहचान बनाते बनाते
अपनी पहचान
खो रहे हैं----
मेलजोल के चक्कर में
और अकेले
हो रहे हैं।
**

बासुदेव अग्रवाल नमन
तिनसुकिया
15-06-19

पथिक (नवगीत)

जो सदा अस्तित्व से 
अबतक लड़ा है।
वृक्ष से मुरझा के 
पत्ता ये झड़ा है।

चीर कर 
फेनिल धवल 
कुहरे की चद्दर,
अव्यवस्थित से 
लपेटे तन पे खद्दर,
चूमने 
कुहरे में डूबे 
उस क्षितिज को,
यह पथिक 
निर्द्वन्द्व हो कर 
चल पड़ा है।

हड्डियों को 
कँपकँपाती 
ये है भोर,
शांत रजनी सी 
प्रकृति में
है न थोड़ा शोर,
वो भला इन सब से 
विचलित क्यों रुकेगा?
दूर जाने के लिए 
ही जो अड़ा है।

ठूंठ से जो वृक्ष हैं 
पतझड़ के मारे,
वे ही साक्षी 
इस महा यात्रा 
के सारे,
हे पथिक चलते रहो 
रुकना नहीं तुम,
तुमको लेने ही 
वहाँ कोई खड़ा है।

जीव का परब्रह्म में 
होना समाहित,
सृष्टी की धारा 
सतत ये है 
प्रवाहित,
लक्ष्य पाने की ललक 
रुकने नहीं दे,
प्रेम ये 
शाश्वत मिलन का 
ही बड़ा है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
8-4-17

Monday, February 15, 2021

मुक्तक (श्रद्धांजलि)

(नेताजी)

आज तेइस जनवरी है याद नेताजी की कर लें,
हिन्द की आज़ाद सैना की हृदय में याद भर लें,
खून तुम मुझको अगर दो तो मैं आज़ादी तुम्हें दूँ,
इस अमर ललकार को सब हिन्दवासी उर में धर लें।

(2122*4)
*********

तुलसीदास जी की जयंती पर मुक्तक पुष्प

लय:- इंसाफ की डगर पे

तुलसी की है जयंती सावन की शुक्ल सप्तम,
मानस सा ग्रन्थ जिसने जग को दिया है अनुपम,
चरणों में कर के वन्दन करता 'नमन' में तुमको,
भारत के गर्व तुम हो हिन्दी की तुमसे सरगम।।

(221 2122)*2
*********

(चन्द्र शेखर आज़ादजी की पुण्य तिथि पर। जन्म 1906।)

तुम शुभ्र गगन में भारत के, चमके जैसे चन्दा उज्ज्वल।
ऐंठी मूंछे, चोड़ी छाती, आज़ाद खयालों के थे प्रतिपल।
अंग्रेजों को दहलाया था, दे अपना उत्साही यौवन।
हे शेखर! 'नमन' तुम्हें शत शत, जो खिले हृदय में बन शतदल।।

(मत्त सवैया आधारित)
***********

(ताटंक छंद में झांसी की रानी को श्रद्धांजलि)

बुन्देलखण्ड की ज्वाला थी, झांसी की तू रानी थी।
करवाने आज़ाद देश ये, तूने मन में ठानी थी।
भारतवासी के हृदयों में, स्थान अमर रानी तेरा।
खूब लड़ी थी अंग्रेजों से, ना तेरी ही सानी थी।।


बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-02-18

मुक्तक (घमण्ड, गुमान)

इतना भी ऊँची उड़ान में, खो कर ना इतराओ,
पाँव तले की ही जमीन का, पता तलक ना पाओ,
मत रौंदो छोटों को अपने, भारी भरकम तन से,
भारी जिनसे हो उनसे ही, हल्के ना हो जाओ।

(सार छंद)
*********

बिल्ले की शह से चूहा भी, शेर बना इतराता है,
लगे गन्दगी वह बिखेरने, फूल फुदकता जाता है,
खोया ही रहता गुमान में, वह नादान नहीं जाने,
हँसे जमाना उसकी मति पर, और तरस ही खाता है।

(ताटंक छंद)
*********

हवा बहुत ही भारी भारी, दम सा घुटता लगता है,
अहंकार की गर्म हवा में, तन मन जलता लगता है,
पंछी हम आज़ाद गगन के, अपनी दुनिया में चहकें,
रोज झपटते बाजों से अब, हृदय धड़कता लगता है।

(लावणी छंद)
*********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-12-16

विविध मुक्तक -6

अर्थ जीवन का है बढना ये नदी समझा रही,
खिल सदा हँसते ही रहना ये कली समझा रही,
हों कभी पथ से न विचलित झेलना कुछ भी पड़े,
भार हर सह धीर रखना ये मही समझा रही।

(2122*3 212)

1-09-20
********

हबीब जो थे हमारे रकीब अब वे हुए,
हमारे जितने भी दुश्मन करीब उन के हुए,
हक़ीम बन वे दिखाएँ हमारे जख्मों के,
हमारे वास्ते सारे सलीब जैसे हुए।

(1212  1122  1212  22)
*********

चाहे नहीं तू खेद जताने के लिये आ,
पर घर से निकल हाथ हिलाने के लिये आ,
मैं खुद की ही ढ़ो लाश रहा जा तेरे घर से,
जीते का ही मातम तो मनाने के लिये आ।

(221 1221 1221 122)
***********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
8-09-20

Wednesday, February 10, 2021

दोहे (क्रोध)

मन वांछित जब हो नहीं, प्राणी होता क्रुद्ध।
बुद्धि काम करती नहीं, हो विवेक अवरुद्ध।।

नेत्र और मुख लाल हो, अस्फुट उच्च जुबान।
गात लगे जब काम्पने, क्रोध चढ़ा है जान।।

सदा क्रोध को जानिए, सब झंझट का मूल।
बात बढ़ाए चौगुनी, रह रह दे कर तूल।।

वशीभूत मत होइए, कभी क्रोध के आप।
काम बिगाड़े आपका, मन को दे संताप।।

वश में हो कर क्रोध के, रावण मारी लात।
मिला विभीषण शत्रु से, किया सर्व कुल घात।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
19-10-2016

ताटन्क छंद "भ्रष्टाचारी सेठों ने"

(मुक्तक शैली की रचना)

अर्थव्यवस्था चौपट कर दी, भ्रष्टाचारी सेठों ने।
छीन निवाला दीन दुखी का, बड़ी तौंद की सेठों ने।
केवल अपना ही घर भरते, घर खाली कर दूजों का।
राज तंत्र को बस में कर के, सत्ता भोगी सेठों ने।।

कच्चा पक्का खूब करे ये, लूट मचाई सेठों ने।
काली खूब कमाई करके, भरी तिजौरी सेठों ने।
भ्रष्ट आचरण के ये पोषक, शोषक जनता के ये हैं।
दो खाते रख करी बहुत है, कर की चोरी सेठों ने।।

देकर रिश्वत पाल रखे हैं, मंत्री संत्री सेठों ने।
काले धन से काली दुनिया, अलग बसाई सेठों ने।
ढोंग धर्म का भारी करते, काले पाप छिपाने में।
दान दक्षिणा सभी दिखावा, साख खरीदी सेठों ने।

लोगों की कुचली सांसों से, दौलत बाँटी सेठों ने।
सुख सुविधाएँ इस दुनिया की, सारी छाँटी सेठों ने।
दुखियों के दिन फिरने वाले, अंत सभी का होता है।
सारी साख गँवा दी है अब, शोषणकारी सेठों ने।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
16-11-2016

गणेश-वंदन (कुण्डलियाँ)

पूजा प्रथम गणेश की, संकट देती टाल।
रिद्धि सिद्धि के नाथ ये, गज का इनका भाल।
गज का इनका भाल, पेट है लम्बा जिनका।
काया बड़ी विशाल, मूष है वाहन इनका।
विघ्न करे सब दूर, कौन ऐसा है दूजा।
भाद्र शुक्ल की चौथ, करो गणपति की पूजा।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
05-09-2016

Thursday, February 4, 2021

ग़ज़ल (जब से अंदर और बाहर)

बह्र:- 2122 2122 2122 212

जब से अंदर और बाहर एक जैसे हो गये,
तब से दुश्मन और प्रियवर एक जैसे हो गये।

मन की पीड़ा आँख से झर झर के बहने जब लगी,
फिर तो निर्झर और सागर एक जैसे हो गये।

लूट हिंसा और चोरी, उस पे सीनाजोरी है,
आजकल तो जानवर, नर एक जैसे हो गये।

अर्थ के या शक्ति के या पद के फिर अभिमान में,
आज नश्वर और ईश्वर एक जैसे हो गये।

हाल कुछ ऐसा ही है संसद का इस जन-तंत्र में,
फिर से क्या नर और वानर एक जैसे हो गये।

साफ़ छवि रख काम कोई कैसे कर सकता यहाँ,
भ्रष्ट सब जब एक होकर एक जैसे हो गये।

जब से याराना फकीरी से 'नमन' का हो गया,
मान अरु अपमान के स्वर एक जैसे हो गये।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
30-09-20

ग़ज़ल (शुक सा महान)

बह्र:- 221  2121 1221 212

शुक सा महान कोई भी ज्ञानी नहीं मिला,
भगवत-कथा का ऐसा बखानी नहीं मिला।

गाथा अमर है कर्ण की सुन जिसको सब कहें,
उसके समान सृष्टि को दानी नहीं मिला।

संसार छान मारा है ऋषियों के जैसा अब,
बगुलों को छोड़ कोई भी ध्यानी नहीं मिला।

भगवान के मिले हैं अनुग्रह सभी जिसे,
संतुष्ट फिर भी हो जो वो प्रानी नहीं मिला।

मतलब के यार खूब मिले किंतु एक भी,
दुख दर्द बाँट ले जो वो जानी नहीं मिला।

जो दूसरे ही पल में मुकर जाते बात से,
चहरों पे ऐसों के कभी पानी नहीं मिला।

ले दे के ये 'नमन' की नयी पेश है ग़ज़ल,
ऊला नहीं मिला कभी सानी नहीं मिला।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
27-05-19

ग़ज़ल (कब से प्यासे नैना दो)

बहरे मीर:- 22  22  22  2

कब से प्यासे नैना दो,
अब तो सूरत दिखला दो।

आज सियासत बस इतनी,
आग लगा कर भड़का दो।

बदली में ओ घूँघट में,
छत पर चमके चन्दा दो।

आगे आकर नवयुवकों,
देश की किस्मत चमका दो।

दीन दुखी पर ममता का,
अपना आँचल फैला दो।

मंसूबों को दुश्मन के,
ज्वाला बन कर दहका दो।

रमते जोगी अपना क्या,
लेना एक न देना दो।

रच कर काव्य 'नमन' ऐसा,
तुम क्या हो ये बतला दो।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
12-11-2019

Thursday, January 21, 2021

मौक्तिका (रोटियाँ)

बहर :- 122*3+ 12 (शक्ति छंद आधारित)
(पदांत 'रोटियाँ', समांत 'एं')

लगे ऐंठने आँत जब भूख से,
क्षुधा शांत तब ये करें रोटियाँ।।
लखे बाट सब ही विकल हो बड़े, 
तवे पे न जब तक पकें रोटियाँ।।

तुम्हारे लिए पाप होतें सभी, 
तुम्हारी कमी ना सहन हो कभी।
रहे म्लान मुख थाल में तुम न हो, 
सभी बात मन की कहें रोटियाँ।।

भजन हो न जब पेट खाली रहे, 
सभी मान अपमान भूखा सहे।
नहीं काम में मन लगे तुम बिना,
किसी की न कुछ भी सुनें रोटियाँ।।

तुम्हीं से चले आज व्यापार सब, 
तुम्हारे बिना चैन हो प्राप्त कब।
जगत की रही एक चाहत यही, 
लगे भूख जब भी मिलें रोटियाँ।।

अगर भूख जग को सताती नहीं, 
न होता लहू का खराबा कहीं।
'नमन' ईश तुझसे यही प्रार्थना, 
हरिक थाल में नित सजें रोटियाँ।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
16-03-18

गीत (बार लंका वासी घाळै)

बार लंका वासी घाळै।
देखो आज अभागण लंका, बजरंगी बाळै।।

जात वानरा की पण स्याणा, राम-दूत बण आया,
आदर स्यूँ माता सँभलाद्यो, हाथ जोड़ समझाया,
आ बात वभीषण जी बोल्या, लात बापड़ा खाया,
बैरा भाठां आगै जोर न, कोई रो चाळै।
बार लंका वासी घाळै।
देखो आज अभागण लंका, बजरंगी बाळै।।

अक्षय बाग उजाड़ एकला, राम-शक्ति दिखलाई,
पण राजाजी आग पूँछ में, फिर भी क्यों लगवाई,
सिर में बड़ बेमाता काँई, थी करली अधिकाई,
बुद्धि-भ्रष्ट ही इसी मुसीबत, घर बैठ्याँ पाळै।
बार लंका वासी घाळै।
देखो आज अभागण लंका, बजरंगी बाळै।।

खरदूषण बाली जिण मार्या, किया वानरा भैळा,
लंकापति ऐसे समर्थ स्यूँ, क्यों कीन्ह्या मन मैला,
गाल बजावणिया रावणजी, और सभासद गैला,
ऐसो राज प्रजा ने हरदम, आफत में डाळै। 
बार लंका वासी घाळै।
देखो आज अभागण लंका, बजरंगी बाळै।।

सब से प्यारी म्हाँकी लंका, तीन लोक स्यूँ न्यारी,
छोटो चाहे बड़ो न कोई, थो अट्ठै दुखियारी,
वीराँ री या नगरी आँख्याँ, आगै बळरी सारी,
चुड़्याँ पैर्याँ बैठ्या सगळा, यो दुख जी साळै।
बार लंका वासी घाळै।
देखो आज अभागण लंका, बजरंगी बाळै।।

इंद्रजीत तू बण्यो नाम को, वरुण-अस्त्र कद ल्यासी,
कुम्भकरण जी भी सुत्या कुण, लपटां फूँक बुझ्यासी,
अहिरावण नारांतक थारो, जोर काम कद आसी,
रैग्या वीर नहीं लंका में, जो विपदा टाळै।
बार लंका वासी घाळै।
देखो आज अभागण लंका, बजरंगी बाळै।।

सुनो भगत जी थारै प्रभु रो, रैग्यो अब तो सारो,
राम लखण नै सागै ल्याओ, माता नै उद्धारो,
'बासुदेव' लंकावासी नै, ई विपदा स्यूँ तारो,
राम-कृपा बिन नहीं जगत में, पत्तो ही हाळै।
बार लंका वासी घाळै।
देखो आज अभागण लंका, बजरंगी बाळै।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
22-10-2018

Saturday, January 16, 2021

हाइकु (गरीब)

हाय अनाथ
आवास फुटपाथ
जाड़े की रात।
**

दीन लाचार
शर्दी गर्मी की मार
झेले अपार।
**

हाय गरीब
जमाना ही रकीब
खोटा नसीब।
**

तेरी गरीबी
बड़ी बदनसीबी
सदा करीबी।
**

लाचार दीन
दुर्बल तन-मन
कैसा जीवन?
**

दैन्य का जोर
तपती लू सा घोर
कहीं ना ठौर।
**

दीन की खुशी
नित्य की एकादशी
ओढ़ी खामोशी।
**

सुविधा हीन
दुख पर आसीन
अभागा दीन।
**

दीन का जोखा
जग भर ने सोखा
केवल धोखा।
****

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
20-06-19

आरोही अवरोही पिरामिड (वक्त का मोल)

(1-7 और 7-1)

(वक्त का मोल)

जो
मोल
वक़्त का
ना  समझे
पछताते वो।
हो काम का वक़्त
सोये रह जाते वो।

हाथों  को  मलने से
लाभ अब क्या हो?
जो बीत  गये
पल नहीं
लौट के
आते
वो।।
*****

(क्षणभंगुर जीवन)

ये
चार
दिनों का
जीवन है
नाम कमा ले।
सत्कर्मों की पूँजी
ले के पैठ जमा ले।

हीरे सा ये जीवन
न माटी में मिला।
परोपकार
कर यहाँ
धूनी तु
रमा
ले।।
********

(वर्तमान)

जो
बीत
चुका है
उस  पर
नयन बन्द
लेना तुम कर;
यूनान मिश्र रोमाँ
मिटे आज खो कर;
नेत्र रखो खुल्ला
वर्तमान  पे;
सार सदा
इस में
जग
में।
*****

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
14-08-18

क्षणिका (कैनवस)

(1)

पेड़ की पत्तियों का
सौंदर्य,
तितलियों का रंग,
उड़ते विहगों की
नोकीली चोंच की कूँची;
मेरे प्रेम के
कैनवस पर
प्रियतम का चित्र
उकेर रही है,
न जाने
कब पूरा होगा।
**

क्षणिका (जिंदगी)
(2)

जिंदगी
चैत्र की बासन्ती-वास,
फिर ज्येष्ठ की
तपती दुपहरी,
उस पर फिर
सावन की फुहार,
तब कार्तिक की
शरद सुहानी
और अंत में
पौष सी ठंडी पड़
शाश्वत शांत
**

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
1-06-19

Sunday, January 10, 2021

मनहरण घनाक्षरी "मौन त्याग दीजिये"

जुल्म का हो बोलबाला, मुख पे न जड़ें ताला,
बैठे बैठे चुपचाप, ग़म को न पीजिये।

होये जब अत्याचार, करें कभी ना स्वीकार,
पुरजोर प्रतिकार, जान लगा कीजिये।

देश का हो अपमान, टूटे जब स्वाभिमान,
कभी न तटस्थ रहें, मन ठान लीजिये।

हद होती सहने की, बात कहें कहने की,
सदियों पुराना अब, मौन त्याग दीजिये।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
22-06-17

दोहे (मोदी जी पर)

भरा पाप-घट तब हुआ, मोदी का अवतार।
बड़े नोट के बन्द से, मेटा भ्रष्टाचार।।

जमाखोर व्याकुल भये, कालाधन बेकार।
सेठों की नींदें उड़ी, दीन करे जयकार।।

नई सुबह की लालिमा, नई जगाये आश।
प्राची का सूरज पुनः, जग में करे प्रकाश।।

चोर चोर का था मचा, सकल देश में शोर।
शोर तले जनता लखे, नव आशा की भोर।
भोर सुहानी स्वप्नवत, जिसकी सब को आस।
आस करेगा पूर्ण अब, जो कहलाया चोर।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
19-11-2016

32 मात्रिक छंद "मन्दभाग"

फटाहाल दिखला ये अपना, करुण कहानी किसे बताते।
टपका कर आँखों से  मोती, अन्तः वाणी किसे सुनाते।
सूखे अधरों की पपड़ी से, अंतर्ज्वाला किसे दिखाते।
अपलक नेत्रों की भाषा के, मौन निमन्त्रण किसे बुलाते।।1।।

रुक रुक कर ये प्यासी आँखें, देख रही हैं किसकी राहें।
बींधे मन के दुख से निकली, किसे सुनाते दारुण आहें।
खाली लोचन का यह प्याला, घुमा रहे क्यों सब के आगे।
माथे की टेढ़ी सल दिखला, क्यों फिरते हो भागे भागे।।2।।

देख अस्थि पिंजर ये कलुषित, आँखें सबकी थमतीं इस पर।
पर आगे वे बढ़ जाती हैं, लख कर काया इसकी जर्जर।
करुण भाव में पूर्ण निमज्जित, एक ओर ये लोचन आतुर।
घोर उपेक्षा के भावों से, लिप्त उधर हैं जग के चातुर।।3।।

देख रहे हैं वे इसको पर, पूछ रही हैं उनकी आँखें।
किस धरती के कीचड़ की ये, इधर खिली हैं पंकिल पाँखें।
वक्र निगाहें घूर घूर के, मन्दभाग से पूछ रही ये।
हे मलीन ! क्यों अपने जैसी, कुत्सित करते दिव्य मही ये।।4।।

मन्दभाग! क्यों निकल पड़े हो, जग की इन कपटी राहों में।
उस को ही स्वीकार नहीं जब, डूब रहे क्यों इन आहों में।
गेह न तेरा इन राहों में, स्वार्थ भरा जिन की रग रग में।
'नमन' करो निज क्षुद्र जगत को, जाग न और स्वार्थ के जग में।।5।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
17-05-2016

Monday, January 4, 2021

ग़ज़ल (जनवरी के मास की छब्बीस)

बह्र:- 2122  2122  2122  212

जनवरी के मास की छब्बीस तारिख आज है,
आज दिन भारत बना गणतन्त्र सबको नाज़ है।

ईशवीं उन्नीस सौ पच्चास की थी शुभ घड़ी,
तब से गूँजी देश में गणतन्त्र की आवाज़ है।

आज के दिन देश का लागू हुआ था संविधान,
है टिका जनतन्त्र इस पे ये हमारी लाज है।

सब रहें आज़ाद हो रोजी कमाएँ खुल यहाँ,
एक हक़ सब का यहाँ जो एकता का राज़ है।

राजपथ पर आज दिन जब फ़ौज़ की देखें झलक,
छातियाँ दुश्मन की दहले उसकी ऐसी गाज़ है।

संविधान_इस देश की अस्मत, सुरक्षा का कवच,
सब सुरक्षित देश में सर पे ये जब तक ताज है।

मान दें सम्मान दें गणतन्त्र को नित कर 'नमन',
ये रहे हरदम सुरक्षित ये सभी का काज है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-01-17

ग़ज़ल (गिर्दाब में सफ़ीना है पतवार भी नहीं)

बह्र:- 221  2121  1221  212 

गिर्दाब में सफ़ीना है पतवार भी नहीं,
चारों तरफ अँधेरा, मददगार भी नहीं।

इंकार गर नहीं है तो इक़रार भी नहीं,
नफ़रत भले न दिल में हो पर प्यार भी नहीं।

फ़ितरत हमारे देश के नेताओं की यही,
जितना दिखाते उतने मददगार भी नहीं।

रिश्तों से कट के दुनिया बसाओ तो सोच लो,
परिवार गर नहीं है तो घरबार भी नहीं।

इतने भी दूर हों न किसी से, ये ग़म रहे,
बाक़ी यहाँ पे सुल्ह के आसार भी नहीं।

बेज़ार अब न हों तो करें और क्या बता,
मुड़ के उन्होंने देखा था इक बार भी नहीं।

सुहबत का जिसकी रहता था कायल सदा 'नमन',
साबित हुआ वो इतना समझदार भी नहीं।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-10-19

ग़ज़ल (जग में जो भी आने वाला)

22  22  22  22

जग में जो भी आने वाला,
वह सब इक दिन जाने वाला।

कौन निभाये साथ दुखों में,
हर कोई समझाने वाला।

साथ चला रहबर बन जो भी,
निकला ख़ार बिछाने वाला।

लाखों घी डालें जलती में,
बिरला आग बुझाने वाला।

आज कहाँ मिलता है कोई,
सच्ची राह दिखाने वाला।

ऊपर से ले नीचे तक हर,
सत्ता में है खाने वाला।

खुद पे रख विश्वास 'नमन' तू,
कोइ न हाथ बँटाने वाला।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
4-2-19