Monday, January 21, 2019

रथोद्धता छंद ("आह्वाहन")

मात अम्ब सम रूप राख के।
देश-भक्ति रस भंग चाख के।
गर्ज सिंह सम वीर जागिये।
दे दहाड़ अब नींद त्यागिये।।

आज है दुखित मात भारती।
आर्त होय सबको पुकारती।।
वीर जाग अब आप जाइये।
धूम शत्रु-घर में मचाइये।।

देश का हित कभी न शीर्ण हो।
भाव ये हृदय से न जीर्ण हो।।
ये विचार रख के बढ़े चलो।
ही किसी न अवरोध से टलो।।

रौद्र रूप अब वीर धारिये।
मातृ भूमि पर प्राण वारिये।
अस्त्र शस्त्र कर धार लीजिये।
मुंड काट रिपु ध्वस्त कीजिये।।
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रथोद्धता (लक्षण छंद)

"रानरा लघु गुरौ" 'रथोद्धता'।
तीन वा चतुस तोड़ के सजा।

"रानरा लघु गुरौ"  =  212  111  212  12

रथोद्धता इसके चार चरण होते हैं |
प्रत्येक चरण में ११-११ वर्ण होते हैं |
हर चरण में तीसरे या चौथे वर्ण के बाद यति होती है।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
21-01-19

Sunday, January 20, 2019

शिखरिणी छंद ("भारत वंदन")

शिखरिणी छंद ("भारत वंदन")

बड़ा ही प्यारा है, जगत भर में भारत मुझे।
सदा शोभा गाऊँ, पर हृदय की प्यास न बुझे।
तुम्हारे गीतों को, मधुर सुर में गा मन भरूँ
नवा माथा मेरा, चरण-रज माथे पर धरूँ।।

तुम्हारी रक्षा में, तन मन लगा तत्पर रहूँ।
जरा भी बाधा हो, अगर इसमें तो हँस सहूँ।
प्रतिज्ञा ये धारूँ, विपद दुखियों की सब हरूँ।
इन्हीं भावों को ले, 'नमन' तुझको अर्पित करूँ।।

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शिखरिणी (लक्षण छंद)

"यमोनासाभाले,ग" रच षट वर्णे यति रखें।
चतुष् पादा छंदा, सब 'शिखरिणी' का रस चखें।।

"यमोनासाभालेग" = यगण, मगण, नगण, सगण, भगण लघु गुरु ( कुल 17 वर्ण)

122  222,  111  112  211 12

(शिव महिम्न श्लोक इसी छंद में है।)
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
08-01-2019

शालिनी छन्द ("राम स्तवन")

शालिनी छन्द ("राम स्तवन")

हाथों में वे, घोर कोदण्ड धारे।
लंका जा के, दैत्य दुर्दांत मारे।।
सीता माता, को छुड़ा नाथ लाये।
ऐसे न्यारे, रामचन्द्रा सुहाये।।

माता रामो, है पिता रामचन्द्रा।
स्वामी रामो, है सखा रामचन्द्रा।।
हे देवों के, देव मेरे दुलारे।
मैं तो जीऊँ, आप ही के सहारे।।
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लक्षण छंद (शालिनी छंद)

राचें बैठा, सूत्र "मातातगागा"।
गावें प्यारी, 'शालिनी' छंद रागा।।

"मातातगागा"= मगण, तगण, तगण, गुरु, गुरु

222  221  221  22

(शालिनी छन्द के प्रत्येक चरण मे 11 वर्ण होते हैं। यति चार वर्ण पे देने से छंद लय युक्त होती है।)
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
12-01-19

वसन्त तिलका छंद ("मनोकामना")

मैं पूण्य भारत धरा, पर जन्म लेऊँ।
संस्कार वैदिक मिले, सब देव सेऊँ।।
यज्ञोपवीत रखके, नित नेम पालूँ।
माथे लगा तिलक मैं, रख गर्व चालूँ।।

गीता व मानस करे, दृढ़ राह सारी।
सत्संग प्राप्ति हर ले, भव-ताप भारी।।
है बासुदेवमय ही, यह सृष्टि सारी।
जो दिव्य ब्रह्म नित है, इसका सँचारी।।

सारी धरा समझलूँ, परिवार मेरा।
हो नित्य ही अतिथि का, घर माँहि डेरा।।
देवों समान उनको, समझूँ सदा ही।
मैं आर्ष रीति विधि का, बन जाउँ वाही।।

प्राणी समस्त सम हैं, यह भाव राखूँ।
ऐसे विचार रख के, रस दिव्य चाखूँ।।
हे नाथ! पूर्ण कर दो, यह आस मेरी।
तेरी कृपा अगर हो, कुछ भी न देरी।।
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वसन्त तिलका (लक्षण छंद)

"ताभाजजागगु" गणों पर वर्ण राखो।
प्यारी 'वसन्त तिलका' तब छंद चाखो।।

"ताभाजजागगु" = तगण, भगण, जगण, जगण और दो गुरु।

221  211  121  121  22

वसन्त तिलका चौदह वर्णों का छन्द है। यति 8,6 पर रखने से छंद मधुर लगता है पर आवश्यक नहीं है। उदाहरण देखिए:

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा | 
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां में कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ||
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
08-01-2019

वंशस्थ छंद ("शीत-वर्णन")

तुषार आच्छादित शैल खण्ड है।
समस्त शोभा रजताभ मण्ड है।
प्रचण्डता भीषण शीत से पगी।
अलाव तापें यह चाह है जगी।।

समीर भी है सित शीत से महा।
प्रसार ऐसा कि न जाय ही सहा।
प्रवाह भी है अति तीव्र वात का।
प्रकम्पमाना हर रोम गात का।।

व्यतीत ज्यों ही युग सी विभावरी।
हरी भरी दूब तुषार से भरी।।
लगे की आयी नभ को विदारके।
उषा गले मौक्तिक हार धार के।।

लगा कुहासा अब व्योम घेरने।
प्रभाव हेमंत लगा बिखेरने।।
खिली हुई धूप लगे सुहावनी।
सुरम्य आभा लगती लुभावनी।।
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लक्षण छंद (वंशस्थ)

"जताजरौ" द्वादश वर्ण साजिये।
 प्रसिद्ध 'वंशस्थ' सुछन्द राचिये।।

"जताजरौ" = जगण, तगण, जगण, रगण
121  221  121  212

(वंशस्थ छन्द के प्रत्येक चरण में 12 वर्ण होते हैं।) 
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
12-01-19

मालिनी छंद ("हनुमत स्तुति")

पवन-तनय प्यारा, अंजनी का दुलारा।
तपन निगल डारा, ठुड्ड टेढ़ा तुम्हारा।।
हनुमत बलवाना, वज्र देही महाना।
सकल गुण निधाना, ज्ञान के हो खजाना।।

जलधि उतर पारा, सीय को खोज डारा।
कनक-नगर जारा, राम का काज सारा।।
अवधपति सहायी, नित्य रामानुयायी।
अतिसय सुखदायी, भक्त को शांतिदायी।।

भुजबल अति भारी, शैल आकार धारी।
दनुज दलन कारी, व्योम के हो विहारी।।
घिर कर जग-माया, घोर संताप पाया।
तव दर प्रभु आया, नाथ दो छत्रछाया।।

सकल जगत त्राता, मुक्ति के हो प्रदाता।
नित गुण तव गाता, आपका रूप भाता।।
भगतन हित कारी, नित्य हो ब्रह्मचारी।
प्रभु शरण तिहारी, चाहता ये पुजारी।।
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मालिनी (लक्षण छंद)

"ननिमयय" गणों में, 'मालिनी' छंद जोड़ें।
यति अठ अरु सप्ता, वर्ण पे आप तोड़ें।।

"ननिमयय" = नगण, नगण, मगण, यगण, यगण।
111  111  22,2  122  122

मालिनी छन्द में प्रत्येक चरण में 15 वर्ण होते हैं और इसमें यति आठवें और सातवें वर्णों के बाद होती है। सुंदर काण्ड का 'अतुलित बलधामं' श्लोक इसी छंद में है।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
09-09-2019

द्रुतविलम्बित छंद ("गोपी विरह")

द्रुतविलम्बित छंद ("गोपी विरह")

मन बसी जब से छवि श्याम की।
रह गई नहिं मैं कछु काम की।
लगत वेणु निरन्तर बाजती।
श्रवण में धुन ये बस गाजती।।

मदन मोहन मूरत साँवरी।
लख हुई जिसको अति बाँवरी।
हृदय व्याकुल हो कर रो रहा।
विरह और न जावत ये सहा।।

विकल हो तकती हर राह को।
समझते नहिं क्यों तुम चाह को।
उड़ गया मन का सब चैन ही।
तृषित खूब भये दउ नैन ही।।

मन पुकार पुकार कहे यही।
तु करुणाकर जानत क्या सही।
दरश दे कर कान्ह उबार दे।
नयन-प्यास बुझा अब तार दे।।
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द्रुतविलम्बित (लक्षण छंद)

"नभभरा" इन द्वादश वर्ण में।
'द्रुतविलम्बित' दे धुन कर्ण में।।

नभभरा = नगण, भगण, भगण और रगण।(12 वर्ण)
111  211  211  212

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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
09-01-2019