Wednesday, May 22, 2019

मत्तगयंद सवैया "माँ दुर्गा"

7 भगण (211) की आवृत्ति के बाद 2 गुरु

माँ दुर्गा (1)

पाप बढ़े चहुँ ओर भयानक हाथ कृपाण त्रिशूलहु धारो।
रक्त पिपासु लगे बढ़ने दुखके महिषासुर को अब टारो।
ताण्डव से अरि रुण्डन मुण्डन को बरसा कर के रिपु मारो।
नाहर पे चढ़ भेष कराल बना कर ताप सभी तुम हारो।।
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माँ दुर्गा (2)

नेत्र विशाल हँसी अति मोहक तेज सुशोभित आनन भारी।
क्रोधित रूप प्रचण्ड महा अरि के हिय को दहलावन कारी।
हिंसक शोणित बीज उगे अरु पाप बढ़े सब ओर विकारी।
शोणित पी रिपु नाश करो पत भक्तन की रख लो महतारी।।
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माँ दुर्गा (3)

शुम्भ निशुम्भ हने तुमने धरणी दुख दूर सभी तुम कीन्हा।
त्राहि मची चहुँ ओर धरा पर रूप भयावह माँ तुम लीन्हा।
अष्ट भुजा अरु आयुध भीषण से रिपु नाशन माँ कर दीन्हा।
गावत वेद पुराण सभी यश जो वर माँगत देवत तीन्हा।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
22-07-2017

सवैया छंद विधान

सवैया चार चरणों का वार्णिक छंद है जिसके प्रति चरण में 22 से 26 तक वर्ण रहते हैं। चारों चरण समतुकांत होते हैं। सवैया किसी गण पर आश्रित होता है जिसकी 7 या 8 आवृति रहती है। इन्ही आवृतियों के प्रारंभ में एक या दो साधारणतया लघु वर्ण और अंत में एक या दो लघु गुरु वर्ण जोड़ कर इस छंद के अनेक विभेद मिलते हैं।
आवृति का रूप या तो गुरु लघु लघु (211) रहता है या फिर गुरु गुरु लघु (221) और यही सवैया की विशेषता है और इसके माधुर्य का कारण है। इस आवृति से एक लय का सृजन होता है जो समस्त भगण (211) आश्रित सवैयों की एक समान क्षिप्र गति की रहती है और तगण (221) आश्रित सवैयों की एक समान मन्द गति की रहती है।

हिन्दी के भक्तिकाल और रीतिकाल से ही विभिन्न प्रकार के सवैये प्रचलित रहे हैं। तुलसी की कवितावली में विभिन्न प्रकार के सवैये मिलते हैं। उन्होंने एक ही सवैये में एक से अधिक प्रकार के सवैये मिला कर अनेक उपजाति सवैये भी रचे हैं।
रीतिकालीन कवियों जैसे पद्माकर, देव आदि ने श्रृंगार रस के विभिन्न अंगों, विभाव, अनुभाव, आलम्बन, उद्दीपन, संचारी, नायक-नायिका भेद आदि के लिए इनका चित्रात्मक तथा भावात्मक प्रयोग किया है।रसखान, घनानन्द, केशव जैसे प्रेमी-भक्त कवियों ने भक्ति-भावना के उद्वेग तथा आवेग की सफल अभिव्यक्ति सवैया में की है।भूषण ने वीर रस के लिए इस छन्द का प्रयोग किया है। आधुनिक कवियों में हरिश्चन्द्र, जगन्नाथ रत्नाकर, दिनकर ने इनका सुन्दर प्रयोग किया है।

सवैया में उर्दू की ग़ज़ल की तरह मात्रा पतन के प्रचुर उदाहरण मिलते हैं। लगभग तुलसी से लेकर आधुनिक कवियों तक, समस्त कवि गण ने निशंकोच सवैयों में मात्रा पतन किया है। कुछेक छंदों में यह मान्य है कि कारक की विभक्तियों के एक शब्द के चिह्न लघु की तरह व्यवहार में लाये जा सकते हैं। जैसे-
कर्ता - ने को न की तरह उच्चारित किया सकता है.
कर्म - को इसे क पढ़ा जा सकता है.
करण, अपादान - से स की तरह पढ़ सकते हैं.
सम्बन्ध - का, के, की  के लिए भी मात्र क कहा जा सकता है.
अधिकरण - में, पे आदि क्रमशः मँ और प की तरह उच्चारित हो सकते हैं.
इसके अतिरिक्त एक शब्द की सहायक क्रियाएँ, सर्वनाम और अव्यय शब्द जैसे है, हैं, था, ही, भी, जो, तो इत्यादि भी आवश्यकतानुसार लघु माने जाते रहे हैं।

अब कुछ प्रमुख कवियों के मात्रा पतन के उदाहरण देखें।

जहाँ सब संकट, दुर्गट सोचु, तहाँ मे'रो' साहे'बु राखै' रमैया॥ (तुलसी कवितावली 'वाम सवैया')

मानुष हौं तो' वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के' ग्वारन।
जो पसु हौं तो' कहा बस मेरो' चरौं नित नंद की' धेनु मँझारन।। (रसखान 'किरीट सवैया)

वह खड्ग लिए था' खड़ा, इससे मुझको भी' कृपाण उठाना था क्या ?
द्रौ'पदी के' पराभव का बदला कर देश का' नाश चुकाना था क्या ? (दिनकर 'मगणान्त दुर्मिल')

पैहौं' कहाँ ते' अटारी' अटा, जिनके विधि दीन्‍ही' है' टूटी' सी' छानी।
जो पै' दरिद्र लिख्‍यो है' लिलार, तो' काहू' पै' मेटि न जात अजानी।।(नरोत्तम दास 'मत्तगयंद')

परन्तु आजकल के तथाकथित स्वयंभू आचार्य न जाने क्यों एक मात्रा का पतन भी देख रचना को ही सिरे से नकार देते हैं, जो कि इस बहुआयामी छंद के विकास में बाधक ही है।

नीचे भगण आश्रित 14 सवैया और तगण आश्रित 6 सवैया की तालिका दी गई है। चरणान्त के अनुसार विभागों में भी बाँटे गए हैं। कोई चाहे तो एक विभाग के सवैये मिश्रित कर उपजाति सवैये भी रच सकता है।
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      भगण = 211 आश्रित सवैये
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1) मत्तगयन्द-       211*7 + 22
2) सुन्दरी  -   11+211*7 + 22
3) वाम      -     1+211*7 + 22
4) मोद-211*5+222+11+ 22
===================
5) मदिरा     -        211*7 + 2
6) दुर्मिल     -11 +211*7 + 2
7) सुमुखी    -  1 +211*7 + 2
===================
8) चकोर    -         211*7 + 21
9) अरविन्द - 11 +211*7 + 21
10)मुक्ताहरा-   1+211*7 + 21
===================
11)किरीट   -        211*8
12)सुखी     - 11+211*8
13)लवंगलता-  1+211*8
===================
14)अरसात  -       211*7 + 212
====================
       तगण = 221 आश्रित सवैये
==================== 
15) मंदारमाला   -  221*7 + 2
16) गंगोदक  -21+221*7 + 2
17) वागीश्वरी -  1+221*7 + 2
====================
18)सर्वगामी -         221*7 + 22
19)भुजंगप्रयात -1+221*7 + 22
====================
20) आभार    -       221*8
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
29-04-19

Tuesday, May 21, 2019

"गण-विचार दोहा"

'यरता' लघु 'भजसा' गुरो, आदि मध्य अरु अंत।
'ना' लघु सब 'मा' गुरु सभी, गण विचारते संत।।

गण विचार कैसे करें:-

कुल गण 8 होते हैं, तथा किसी भी गण में 3 वर्ण होते हैं। उस वर्ण की मात्रा या तो दीर्घ (2) होगी अन्यथा लघु (1) होगी।

'यरता' लघु सूत्र से अक्षर के अनुसार 3 गण दिग्दर्शित होते हैं जो क्रमश: यगण, रगण और तगण हैं। अब इनमें क्रमश: लघु वर्ण की स्थिति आदि, मध्य और अंत है। तो इन 3 गणों का निम्न रूप बनेगा।
यगण=122
रगण=212
तगण=221
इसी प्रकार 'भजसा' गुरो सूत्र से अक्षर के अनुसार 3 गण दिग्दर्शित होते हैं जो क्रमश: भगण, जगण और सगण हैं। अब इनमें क्रमश: दीर्घ वर्ण की स्थिति आदि, मध्य और अंत है। तो इन 3 गणों का निम्न रूप बनेगा।
भगण=211
जगण=121
सगण=112

'ना' लघु सब अर्थात नगण=111

'मा' गुरु सभी अर्थात मगण=222

इसप्रकार मेरे स्वरचित उपरोक्त दोहे से किसी भी गण के मात्रा-विन्यास का शीघ्र पता लग जाता है। जैसे जगण का नाम आते ही मस्तिष्क में तुरन्त 'भजसा गुरो' कौंधना चाहिए और भजसा में ज मध्य में है तो, हमें तुरन्त पता चल जाता है कि इसका रूप 121 है।


बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
10-05-2019

"दोहों का परिवार"

दोहों के मुख्य 21 प्रकार हैं। ये 21 भेद दोहे में गुरु लघु वर्ण की गिनती पर आधारित हैं। किसी भी दोहे में कुल 48 मात्रा होती हैं। दो विषम चरण 13, 13 मात्रा के तथा दो सम चरण 11, 11 मात्रा के। दोहे के सम चरणों का अंत ताल यानि गुरु लघु (2,1) वर्ण से होना आवश्यक है। अतः किसी भी दोहे में कम से कम 2 गुरु वर्ण आवश्यक हैं। साथ ही विषम चरणों की 11वीं मात्रा लघु होनी आवश्यक है। इस प्रकार विषम चरणों के दो लघु तथा सम चरणों के भी 2 आवश्यक लघु मिलाने से किसी भी दोहे में कम से कम 4 लघु आवश्यक हैं। चार लघु की 4 मात्रा तथा बाकी बची (48-4) = 44 मात्रा में अधिकतम 22 गुरु हो सकते हैं। इस प्रकार अधिकतम 22 गुरु वर्ण से निम्नतम 2 गुरु वर्ण तक कुल 21 सम्भावनाएँ हैं और इन सम्भावनाओं के आधार पर दोहों के 21 भेद कहे गये हैं जो निम्न हैं।

1.भ्रमर, 2.सुभ्रमर, 3.शरभ, 4.श्येन, 5.मण्डूक,6.मर्कट, 7.करभ, 8.नर, 9.हंस,10.गयंद,11.पयोधर, 12.बल, 13.पान, 14.त्रिकल, 15.कच्छप, 16.मच्छ, 17.शार्दूल, 18.अहिवर, 19.व्याल, 20.विडाल, 21.श्वान।

इनमें 'भ्रमर' दोहा में 22 गुरु तथा क्रमशः एक एक गुरु वर्ण कम करते हुए अंतिम 'श्वान' दोहा में 2 गुरु होते हैं। दोनों छोर के एक एक मेरे स्वरचित दोहों की बानगी देखें।

भ्रमर दोहा (22 दीर्घ, 4 लघु)

बीती जाये जिंदगी, त्यागो ये आराम।
थोड़ी नेकी भी करो, छोड़ो दूजे काम।।

श्वान दोहा (2 दीर्घ, 44 लघु)

मन हर कर छिप कर रहत, वह नटखट दधि-चोर।
ब्रज-रज पर लख चरण-छवि, मन सखि उठत हिलोर।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
20-04-18

Sunday, May 19, 2019

आंग्ल नव-वर्ष दोहे

प्रथम जनवरी क्या लगी, काम दिये सब छोड़।
शुभ सन्देशों की मची, चिपकाने की होड़।।

पराधीनता की हमें, जिनने दी कटु पाश।
उनके इस नव वर्ष में, हम ढूँढें नव आश।।

सात दशक से ले रहे, आज़ादी में साँस।
पर अब भी हम जी रहे, डाल गुलामी फाँस।।

व्याह पराया हो रहा, मची यहाँ पर धूम।
अब्दुल्ला इस देश का, नाच रहा है झूम।।

अपनों को दुत्कारते, दूजों से रख चाह।
सदियों से हम भोगते, आये इसका दाह।।

सत्य सनातन छोड़ कर, पशुता से क्यों प्रीत।
'बासुदेव' मन है व्यथित, लख यह उलटी रीत।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
01-01-2019

दोहा *विधान*

दोहा एक अर्धसम मात्रिक छन्द है। जिसमें 13,11 और 13,11 मात्रा की दो पंक्ति और प्रत्येक पंक्ति में 2 चरण होते हैं। 13 मात्रा के चरण को विषम चरण कहा जाता है और 11 मात्रा के चरण को सम चरण कहा जाता है। दूसरे और चौथे चरण यानि सम चरणों का समतुकान्त होना आवश्यक है।

विषम चरण -- कुल 13 मात्रा (मात्रा बाँट = 8+2+1+2)
सम चरण -- कुल 11 मात्रा (मात्रा बाँट = 8+ताल यानि गुरु+लघु)

अठकल यानि 8 में दो चौकल (4+4) हो सकते हैं। चौकल और अठकल के निम्न नियम हैं जो अनुपालनीय हैं।

चौकल:- (1) प्रथम मात्रा पर शब्द का समाप्त होना वर्जित है। 'करो न' सही है जबकि 'न करो' गलत है।
(2) चौकल में पूरित जगण जैसे सरोज, महीप, विचार जैसे शब्द वर्जित हैं।

अठकल:- (1) प्रथम और पंचम मात्रा पर शब्द समाप्त होना वर्जित है। 'राम कृपा हो' सही है जबकि 'हो राम कृपा' गलत है क्योंकि राम शब्द पंचम मात्रा पर समाप्त हो रहा है। यह ज्ञातव्य हो कि 'हो राम कृपा' में विषम शब्द के बाद विषम शब्द पड़ रहा है फिर भी लय बाधित है।
(2) 1-4 और 5-8 मात्रा पर पूरित जगण शब्द नहीं आ सकता।
(3) अठकल का अंत गुरु या दो लघु से होना आवश्यक है।

जगण प्रयोग:-
(1) चौकल की प्रथम और अठकल की प्रथम और पंचम मात्रा से पूरित जगण शब्द प्रारम्भ नहीं हो सकता।
(2) चौकल की द्वितीय मात्रा से जगण शब्द के प्रारम्भ होने का प्रश्न ही नहीं है क्योंकि प्रथम मात्रा पर शब्द का समाप्त होना वर्जित है।
(3) चौकल की तृतीय और चतुर्थ मात्रा से जगण शब्द प्रारम्भ हो सकता है।

दोहे का शाब्दिक अर्थ है- दुहना, अर्थात् शब्दों से भावों का दुहना। इसकी संरचना में भावों की प्रतिष्ठा इस प्रकार होती है कि दोहे के प्रथम व द्वितीय चरण में जिस तथ्य या विचार को प्रस्तुत किया जाता है, उसे तृतीय व चतुर्थ चरणों में सोदाहरण (उपमा, उत्प्रेक्षा आदि के साथ) पूर्णता के बिन्दु पर पहुँचाया जाता है, अथवा उसका विरोधाभास प्रस्तुत किया जाता है।

वर्ण्य विषय की दृष्टि से दोहों का संसार बहुत विस्तृत है। यह यद्यपि नीति, अध्यात्म, प्रेम, लोक-व्यवहार, युगबोध- सभी स्फुट विषयों के साथ-साथ कथात्मक अभिव्यक्ति भी देता आया है, तथापि मुक्तक काव्य के रूप में ही अधिक प्रचलित और प्रसिद्ध रहा है। अपने छोटे से कलेवर में यह बड़ी-से-बड़ी बात न केवल समेटता है, बल्कि उसमें कुछ नीतिगत तत्व भी भरता है। तभी तो इसे गागर में सागर भरने वाला बताया गया है।

दोहों की संरचना में कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। जैसे -

 1-  दोहा मुक्त छंद है। कथ्य (जो बात कहना चाहें वह) एक दोहे में पूर्ण हो जाना चाहिए।

2- श्रेष्ठ दोहे में लाक्षणिकता, संक्षिप्तता, मार्मिकता (मर्मबेधकता), आलंकारिकता, स्पष्टता, पूर्णता तथा सरसता होनी चाहिए।

3- दोहे में संयोजक शब्दों और, तथा, एवं आदि का प्रयोग यथा संभव न करें। औ' वर्जित 'अरु' स्वीकार्य।

4- दोहे में कोई भी शब्द अनावश्यक न हो। हर शब्द ऐसा हो जिसके निकालने या बदलने पर दोहा न कहा जा सके।

5- दोहे में कारक (ने, को, से, के लिए, का, के, की, में, पर आदि)का प्रयोग कम से कम हो।

6- हिंदी में खाय, मुस्काय, आत, भात, डारि, मुस्कानि, होय, जोय, तोय जैसे देशज क्रिया-रूपों का उपयोग यथासंभव न करें।

7- दोहा में विराम चिन्हों का प्रयोग यथास्थान अवश्य करें।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
30-04-19

Tuesday, May 14, 2019

भूमिसुता छंद "जीव-हिंसा"

जीवों की हिंसा प्राणी क्यों, हो करते।
तेरे कष्टों से ही आहें, ये भरते।।
भारी अत्याचारों को ये, झेल रहे।
इन्सां को मूकों की पीड़ा, कौन कहे।।

कष्टों के मारे बेचारे, जीव सभी।
पूरी जो ना हो राखे ना, चाह कभी।।
जो भी दे दो वो ही खा के, मस्त रहे।
इन्सां तेरे दुःखों को क्यों, मूक सहे।।

जाँयें तो जाँयें कैसे ये, भाग कहीं।
प्राणों के घाती ही पायें, जाँय वहीं।।
इंसानों ने भी राखा है, बाँध इन्हें।
थोड़ी भी आजादी है दी, नाँहि जिन्हें।।

लाचारी में पीड़ा झेलें, नित्य महा।
दुःखों में ऐसे हैं ये जो, जा न कहा।।
हैं संसारी रिश्ते नाते, स्वार्थ सने।
लागें हैं दूजों को सारे, ही डसने।।
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लक्षण छंद:-

"मामामासा" तोड़ो आठा, चार सजा।
सारे भाई चाखो छंदा, 'भूमिसुता'।।

"मामामासा" = मगण मगण मगण सगण
222  222 222 112 = 12वर्ण, यति 8,4
चार चरण, दो दो समतुकांत।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
07-06-17

भुजंग प्रयात छंद "नोट बन्दी"

हुई नोट बन्दी ठगा सा जमाना।
किसी को रुलाना किसी को हँसाना।।
कहीं आँसुओं की झड़ी सी लगी है।
कहीं पे खुशी की दिवाली जगी है।।

इकट्ठा जिन्होंने किया वित्त काला।
उन्हीं का पिटा आज देखो दिवाला।।
बसी थी जहाँ अल्प ईमानदारी।
खरे लोग देखो सभी हैं सुखारी।।

कहीं नोट की लोग होली जलाते।
कहीं बन्द बोरे नदी में बहाते।।
किसी के जगे भाग खाते खुला के।
कराए जमा नोट काले धुला के।।

सभी बैंक में आ गई भीड़ सारी।
लगी हैं कतारें मचा शोर भारी।।
कमी नोट की सामने आ रही है।
नहीं जानते क्या हुआ ये सही है।।
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लक्षण:-
4 यगण (122) यानि कुल 12 वर्ण प्रत्येक चरण में। चार चरण दो दो समतुकांत।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
12-12-16

भक्ति छंद "कृष्ण-विनती"

दो भक्ति मुझे कृष्णा।
मेटो जग की तृष्णा।।
मैं पातक संसारी।
तू पापन का हारी।।

मैं घोर अनाचारी।
तू दिव्य मनोहारी।।
चाहूँ करुणा तेरी।
दे दो न करो देरी।।

वृंदावन में जाऊँ।
शोभा ब्रज की गाऊँ।।
मैं वेणु सुनूँ प्यारी।
छानूँ धरती न्यारी।।

गोपाल चमत्कारी।
तेरी महिमा भारी।।
छायी अँधियारी है।
तू तो अवतारी है।।

आशा मन में धारे।
आया प्रभु के द्वारे।।
गाऊँ नित केदारी।
आभा वरनूँ थारी।।

ये 'बासु' रचे गाथा।
टेके दर पे माथा।।
दो दर्श उसे नाथा।
राखो सर पे हाथा।।
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लक्षण छंद:-

"तायाग" सजी क्या है।
ये 'भक्ति' सुछंदा है।।

"तायाग" = तगण यगण, गुरु
221  122  2
7 वर्ण  4 चरण
दो-दो चरण समतुकांत या चारों चरण समतुकांत।
***********
बासुदेव अग्रवाल नमन,
तिनसुकिया
10-02-19

बुदबुद छंद "बसंत पंचमी"

सुखद बसंत पंचमी।
पतझड़ शुष्कता थमी।।
सब फिर से हरा-भरा।
महक उठी वसुंधरा।।

विटप नवीन पर्ण में।
कुसुम अनेक वर्ण में।।
खिल कर झूमने लगे।
यह लख भाग्य ही जगे।।

कुहुक सुनाय कोयली।
गरजत मन्द बादली।।
भ्रमर-गुँजार छा रही।
सरगम धार सी बही।।

शुभ ऋतुराज आ गया।
अनुपम चाव छा गया।।
कलरव दिग्दिगंत में।
मुदित सभी बसंत में।।
=========
लक्षण छंद:-

"नजर" सु-वर्ण नौ रखें।
'बुदबुद' छंद को चखें।।

"नजर" = नगण, जगण, रगण

(111  121  212)
9 वर्ण,4 चरण
दो-दो चरण समतुकांत
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बासुदेव अग्रवाल नमन,
तिनसुकिया
10-02-19

बिंदु छंद "राम कृपा"

सत्यसनातन, ये है ज्ञाना।
भक्ति बिना नहिं, हो कल्याना।।
राम-कृपा जब, होती प्राणी।
हो तब जागृत, अन्तर्वाणी।।

चक्षु खुले मन, हो आचारी।
दूर हटे तब, माया सारी।।
प्रीत बढ़े जब, सद्धर्मों में।
जी रहता नित, सत्कर्मों में।

राम समान न, कोई देवा।
इष्ट धरो अरु, चाखो मेवा।।
नित्य जपे नर, जो भी माला।
दुःख हरे सब, वे तत्काला।

पाप भरी यह, मेरी काया।
मैं नतमस्तक, हो के आया।।
राम दयामय, मोहे तारो।
कष्ट सभी प्रभु, मेरे हारो।।
================
लक्षण छंद:-

"भाभमगा" यति, छै ओ' चारी।
'बिंदु' रचें सब, छंदा प्यारी।।

"भाभमगा" = भगण भगण मगण गुरु

(211  211,  222   2)
10 वर्ण,4 चरण,(यति 6-4)
दो-दो चरण समतुकांत।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
26-01-19

Saturday, May 11, 2019

नवगीत (कहाँ गया सच्चा प्रतिरोध)

सुन ओ भारतवासी अबोध,
कहाँ गया सच्चा प्रतिरोध?

आये दिन करता हड़ताल,
ट्रेनें फूँके हो विकराल,
धरने दे कर रोके चाल,
सड़कों पर लाता भूचाल,
करे देश को तू बदहाल,
और बजाता झूठे गाल,
क्या यही तेरा है आत्म-बोध,
कहाँ गया सच्चा प्रतिरोध?

क्या व्यर्थ व्यवस्था के ये तंत्र,
चाहे रोये लोकतंत्र,
पड़े रहे क्या बंद यंत्र,
मौन रहें क्या जीवन-मंत्र,
औरों के हित तो केवल व्यर्थ
उनके दुख का भला क्या अर्थ,
कर स्व जाति, धर्म, दल कृतार्थ,
पूरे करता अपने ही स्वार्थ,
क्या बस तेरा यही प्रबोध,
कहाँ गया सच्चा प्रतिरोध?

चाहे बच्चे ढूंढ़ें कचरे में जीविका,
झुग्गी, झोंपड़ झेलें विभीषिका,
नारी होती रहे घर्षिता,
सिसके नैतिकता, मानवता,
पर तेरी आँखें रहेंगी बंद,
बुद्धि तेरी पड़ जाती कुंद,
भूल गया क्या सब अवरोध,
कहाँ गया सच्चा प्रतिरोध?

हक़ की क्या है यही लड़ाई,
या लोकतंत्र की है तरुणाई,
या तेरी अबतक की कमाई,
क्या स्वतंत्रता यही विचार की,
या पराकाष्ठा अधिकार की,
क्या यही सीख है संस्कार की,
या अति है उदण्ड व्यवहार की,
क्या यही तेरी अबतक की शोध,
कहाँ गया सच्चा प्रतिरोध?

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
11-01-2019

गीत (आज बसंत की छाई लाली)

आज बसंत की छायी लाली,
बागों में छायी खुशियाली,
आज बसंत की छायी लाली॥

वृक्ष वृक्ष में आज एक नूतन है आभा आयी।
बीत गयी पतझड़ की उनकी वह दुखभरी रुलायी।
आज खुशी में झूम झूम मुसकाती डाली डाली।
आज बसंत की छायी लाली॥1॥

इस बसंतने किये प्रदान हैं उनको नूतन पल्लव।
चहल पहल में बदल गया अब उनका जीवन नीरव।
गूँज रही है अब उन सब पर मधुकर की गूँजाली।
आज बसंत की छायी लाली॥2॥

स्वर्णिम आभा छिटक रही आज रम्य अमराई में।
महक उठी बौरों से डालें बाला ज्यों तरुणाई में।
फिर कानों में मिश्री घोल रही कोयल मतवाली।
आज बसंत की छायी लाली॥3॥

आज चाव में फूल रहे हैं पौधे वृक्ष लता हर।
बाग बगीचे सजा रहे मृदु आभा को बिखरा कर।
कैसी छायी दिग दिगंत में ये मोहक हरियाली।
आज बसंत की छायी लाली॥4॥

मंद पवन के हल्के झोंके तन को करते सिहरित।
फूलों की मादक सौरभ है मन को करती मोहित।
श्रवणों में संगीत के स्वर दे पुर्वा पाली पाली।
आज बसंत की छायी लाली॥5॥

बिखरा सुंदर नीलापन इस विस्तृत नभ मंडल में।
संध्या की लाली छायी फिर मोहक नील पटल में।
उस पर पक्षी चहक रहे हैं भर मन में खुशियाली।
आज बसंत की छायी लाली॥6॥

आज जगत की सकल वस्तु में नव उमंग है छायी।
इस बसंत की खुशियां जा हर मन में आज समायी।
जिसकी रचना ऐसी फिर वह कितना सुंदर माली।
आज बसंत की छायी लाली॥7॥

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-04-2016 

गीत (करुण पूकार)

बहर:- 2122  -  2122  -  212

छुप गये हो श्याम सुंदर तुम कहाँ,
रो रही है आज मानवता यहाँ।

देश सारा खो गया है भीड़ में,
रो रहे सारे ही मानव पीड़ में।
द्रौपदी सी लाज रखलो तुम जहाँ,
छुप गये हो श्याम सुंदर तुम कहाँ।

स्वार्थ में अंधे यहाँ के लोग हैं,
भोग वश कैसे लगे ये रोग हैं।
राजनेता भी बने भक्षक यहाँ,
छुप गये हो श्याम सुंदर तुम कहाँ।

नारियों की अस्मिता अब दाव पे,
कौन मलहम अब लगाये घाव पे।
दीन दुखियों का सहारा ना रहा,
छुप गये हो श्याम सुंदर तुम कहाँ।

लूट शोषण का यहाँ पे जोर है,
आह अबलों की उठे चहुँ ओर है।
मच गया आतंक का ताण्डव यहाँ,
छुप गये हो श्याम सुंदर तुम कहाँ।

बढ़ गया है इस धरा पे पाप अब,
ले रहे अवतार मोहन फिर से कब।
अब न जाता ओर हमसे कुछ सहा,
छुप गये हो श्याम सुंदर तुम कहाँ।

रोक लो इस पाप की अब धार को,
बन खिवैया थाम लो पतवार को।
आँसुओं की बाढ़ में सब कुछ बहा,
छुप गये हो श्याम सुंदर तुम कहाँ।

(इस बहर का प्रमुख गीत- दिल के अरमाँ आँसुओं में बह गये।)

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
30-07-16

गीत (आँख के नशे में जब)

(धुन- हम तो ठहरे परदेशी)

(212 1222)×2

आँख के नशे में जब, वो हमें डुबाते हैं।
एक बार डूबें तो, डूबते ही जाते हैं।।

जो न इसमें डूबे हैं, पूछते हैं वो हम से;
आँख का नशा क्या है, हम उन्हें बताते हैं।
आँख के नशे में जब, वो हमें डुबाते हैं।।

झील सी ये गहरी हैं, मय से ये लबालब भी;
भूल जाते दुनिया को, गहरे जितने आते हैं।
आँख के नशे में जब, वो हमें डुबाते हैं।।

हद शराब की होती, देर कुछ नशा टिकता;
पर जो डूबते इसमें, थाह तक न पाते हैं।
आँख के नशे में जब, वो हमें डुबाते हैं।।

सुर ओ ताल जीवन की, सब इन्हीं में बसती है;
गहरे डूब इनमें ही, लय सभी मिलाते हैं।
आँख के नशे में जब, वो हमें डुबाते हैं।।
एक बार डूबें तो, डूबते ही जाते हैं।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
03-10-18

Friday, May 10, 2019

आधुनिक नारी (कुंडलियाँ)

सारी पहने लहरिया, घर से निकली नार।
रीत रिवाजों में फँसी, लम्बा घूँघट डार।
लम्बा घूँघट डार, फोन यह कर में धारे।
शामत उसकी आय, हाथ इज्जत पर डारे।
अबला इसे न जान, लाज की खुद रखवारी।
कर देती झट दूर, अकड़ चप्पल से सारी।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
19-5-17

मोबॉयली कुण्डलियाँ

मोबॉयल से मिट गये, बड़ों बड़ों के खेल।
नौकर, सेठ, मुनीमजी, इसके आगे फेल।
इसके आगे फेल, काम झट से निपटाता।
मुख को लखते लोग, मार बाजी ये जाता।
निकट समस्या देख, करो नम्बर को डॉयल।
सौ झंझट इक साथ, दूर करता मोबॉयल।।

मोबॉयल में गुण कई, सदा राखिए संग।
नूतन मॉडल हाथ में, देख लोग हो दंग।
देख लोग हो दंग, पत्नियाँ आहें भरती।
कैसी है ये सौत, कभी आराम न करती।
कहे 'बासु' कविराय, लोग अब इतने कायल।
दिन देखें ना रात, हाथ में है मोबॉयल।।

मोबॉयल बिन आज है, सूना सब संसार।
जग के सब इसपे चले, रिश्ते कारोबार।
रिश्ते कारोबार, चले व्हाट्सप के इसपे।
टिका फेसबुक, वेब, गेम जग सारा जिसपे।
मधुर सुनाए गीत, दिखाए छमछम पायल।
झट से फोटो लेत, सौ गुणों का मोबॉयल।।

मोबॉयल क्या चीज है, प्रेमी जन का वाद्य।
नारी का जेवर बड़ा, बच्चों का आराध्य।
बच्चों का आराध्य, रखे जो खूबी सारी।
नहीं देखते लोग, दाम कितने हैं भारी।
दो पल भी विलगाय, कलेजा होता घायल।
कहे 'बासु' कविराय, मस्त है ये मोबॉयल।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
10-06-2016

कुंडलियाँ छंद "विधान"

कुंडलियाँ दोहा और रोला के संयोग से बना छंद है। इस छंद के ६ चरण होते हैं तथा प्रत्येक चरण में २४ मात्राएँ होती है। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि कुंडलियाँ के पहले दो चरण दोहा के तथा शेष चार चरण रोला से बने होते हैं।

दोहा के प्रथम एवं तृतीय पद में १३-१३ मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे पद में ११-११ मात्राएँ होती हैं। कुंडलियाँ में दोहे के चौथे पद की रोला के प्रथम पद के रूप में पुनरावृति होती है। रोला के प्रत्येक चरण में २४ मात्राएँ होती है। चूँकि दोहे का चौथा पद रोला का प्रथम पद बनता है अतः रोला के चारों चरणों की सम रूपता बनाये रखने के लिए रोला के चारों चरणों की यति ११वीं मात्रा पर रखनी आवश्यक है, साथ ही इस पदका अंत  भी गुरु लघु से होना आवश्यक है।

रोला की मात्रा बाँट ८-६-२-६-२ की है। इसमें प्रथम यति की 11 मात्राएँ ८-३(गुरु लघु) तथा अंतिम यति की 13 मात्राएँ ३-२-६-२ के मात्रा बाँट में रहती है। त्रिकल के तीनों रूप(1-1-1, 2-1, 1-2) तथा द्विकल के दोनों रूप(1-1, 2) मान्य है।

कुंडलियाँ छंद का प्रारंभ जिस शब्द या शब्द-समूह से होता है, छंद का अंत भी उसी शब्द या शब्द-समूह से होता है। सोने में सुहागा तब है जब कुंडलियाँ के प्रारंभ का और अंत का शब्द एक होते हुए भी दोनों जगह अलग अलग अर्थ रखता हो। साँप की कुंडली की तरह रूप होने के कारण ही इसका नाम कुंडलियाँ पड़ा है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

Wednesday, May 8, 2019

ग़ज़ल (हमारे मन में ये व्रत धार लेंगे )

बह्र:- 1222  1222  122

हमारे मन में ये व्रत धार लेंगे,
भुला नफ़रत सभी को प्यार देंगे।

रहेंगे जीते हम झूठी अना में,
भले ही घूँट कड़वे हम पियेंगे।

इसी उम्मीद में हैं जी रहे अब,
कभी तो आसमाँ हम भी छुयेंगे।

रे मन परवाह जग की छोड़ करना,
भले तुझको दिखाएँ लोग ठेंगे।

रहो बारिश में अच्छे दिन की तुम तर,
मगर हम पे जरा ये कब चुयेंगे।

नए ख्वाबों की झड़ लगने ही वाली,
उन्हीं पे पाँच वर्षों तक जियेंगे।

वे ही घोड़े, वही मैदान, दर्शक,
नतीज़े भी वे ही फिर क्या रहेंगे?

तु सुध ले या न ले, यादों के तेरी,
ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे।

रखो कोशिश 'नमन' दिल जोड़ने की,
कभी तो टूटे दिल वापस मिलेंगे।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
10-11-18

ग़ज़ल (तिजारत हुक्मरानी हो गई है)

बह्र:- 1222  1222  122

तिजारत हुक्मरानी हो गई है,
कहीं गुम शादमानी हो गई है।

न गांधी शास्त्री से अब हैं रहबर,
शहादत उनकी फ़ानी हो गई है।

कहाँ ढूँढूँ तुझे ओ नेक नियत,
तेरी गायब निशानी हो गई है।

तेरा तो हुश्न ही दुश्मन है नारी,
कठिन इज्जत बचानी हो गई है।

लगी जब बोलने बिटिया हमारी,
वो घर में सबकी नानी हो गई है।

तू आयी जिंदगी में जब से जानम,
तेरी हर शय सुहानी हो गई है।

हमीं से चार लेकर एक दे कर,
'नमन' सरकार दानी हो गई है।

हुक्मरानी=शासन करना
तिजारत=व्यापार
शादमानी=खुशी
रहबर=पथ-प्रदर्शक

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
2-10-17

ग़ज़ल (रहें बस चुप! शराफ़त है)

बह्र:- 1222   1222   122

रहें बस चुप! शराफ़त है? नहीं तो,
जुबाँ खोलें? इजाजत है? नहीं तो।

करें हासिल अगर हक़ लड़के अपना,
तो ये लड़ना अदावत है? नहीं तो।

बड़े मासूम बन वादों से मुकरो,
कोई ये भी सियासत है? नहीं तो।

दिखाए आँख हाथी को जो चूहा,
भला उसकी ये हिम्मत है? नहीं तो।

है आमादा कोई गर जंग पर ही,
सुलह चाहें जलालत है? नहीं तो।

कयामत ढ़ा रही है मुफ़लिसी अब,
ज़रा भी दिल में हैरत है? नहीं तो।

'नमन' जुल्म-ओ-सितम पर चुप ही रहना,
यही दुनिया की फ़ितरत है? नहीं तो।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
15-04-2017

Monday, May 6, 2019

कुण्डला मौक्तिका (लावारिस वस्तु)

(पदांत 'मिलती', समांत 'ओ' स्वर)

मिलती पथ में कुछ पड़ी, वस्तु करें स्वीकार,
समझ इसे अधिकार, दबा लेते जो मिलती।।
अनायास कुछ प्राप्ति का, लिखा राशि में योग,
बंदे कर उपभोग, भाग्य वालों को मिलती।।

जन्मांतर के पुण्य सब, लगे साथ में जागे,
इस कारण से आज ये, आई आँखों आगे।
देने वाले देवता, देत पात्र को देख,
लिखी टले नहिं रेख, हमें तब ही तो मिलती।।

पुरखों के बड़ भाग से, लावारिस चल आती,
बिन प्रयास के कुछ मिले, हृदय कली खिल जाती।
लख के यहाँ अभाव मन, उनका जाता डोल,
भेजें वे जी खोल, तभी चाहें वो मिलती।।

घड़ी पुण्य की ये बड़ी, नजर वस्तु जब आई,
इधर उधर में ताक के, हमने शीघ्र उठाई।
पाकिट में हम डाल के, सोच रहे बिन लाज,
'नमन' भाग्य था आज, अन्यथा सबको मिलती।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
14-10-2016

मौक्तिका (चीन की बेटी)

2*8 (मात्रिक बहर)
(पदांत 'कर डाला', समांत 'आ' स्वर)

यहाँ चीन की आ बेटी ने,
सबको मतवाला कर डाला।
बच्चा, बूढ़ा या जवान हो,
कद्रदान अपना कर डाला।।

होता लख के चहरा तेरा,
तेरे आशिक जन का' सवेरा।
जब तक शम्मा सी ना आये,
तड़पत परवाना कर डाला।।

लब से गर्म गर्म ना लगती,
आँखों से न खुमारी भगती।
करवट बदले बाट देखते,
जादू ये कैसा कर डाला।।

कड़क रहो तो लगे मस्त तू,
मिले न जब तक करे पस्त तू।
लगी गले से जब मतवाली,
तन मन जोशीला कर डाला।।

गरम रहो तो हमें लुभाती,
ठण्डी तू बिलकुल न सुहाती।
चहरे पे दे गर्म भाप को,
पागल तन मन का कर डाला।।

जो तु लिये हो पूरी लाली,
तीखी और मसालेवाली।
चुश्की चुश्की ले चखने पर,
खुशबू से पगला कर डाला।।

चाय पियें जो वे पछतातेे,
जो न पियें वे भी ग़म खाते।
'नमन' चीन की बेटी तूने,
ये देश दिवाना कर डाला।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
30-06-2016

मौक्तिका (पापा का लाडला)

1222*4 (विधाता छंद आधारित)
(पदांत 'तुम्हें पापा', समांत 'आऊँगा')

अभी नन्हा खिलौना हूँ , बड़ा प्यारा दुलारा हूँ;
उतारो गोद से ना तुम, मनाऊँगा तुम्हें पापा।।
भरूँ किलकारियाँ प्यारी, करूँ अठखेलियाँ न्यारी;
करूँ कुछ खाश मैं नित ही, रिझाऊँगा तुम्हें पापा।।

इजाजत जो तुम्हारी हो, करूँ मैं पेश शैतानी;
हवा में जोर से उछलूँ, दिखाऊँ एक नादानी।
खुला है आसमाँ फैला, लगाऊँगा छलाँगें मैं;
अभी नटखट बड़ा हूँ मैं, सताऊँगा तुम्हें पापा।।

बलैयाँ खूब मेरी लो, गले से तुम लगा कर अब;
करूँ शैतानियाँ मोहक, करो तुम प्यार जी भर अब।
नहीं कोई खता मेरी, लड़कपन ये सुहाना है;
बड़ा ही हूँ खुरापाती, भिजाऊँगा तुम्हें पापा।।

चलाओ चाल अंगुल से, पढ़ाओ पाठ जीवन का;
बताओ बात मतलब की, सिखाओ मोल यौवन का।
जमाना याद जो रखता, वही शिक्षा मुझे देओ;
'नमन' मेरा तुम्हें अर्पण, बढाऊँगा तुम्हें पापा।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
12-07-2016

मौक्तिका विधान

हिन्दी काव्य की एक विधा जिसमें चार चार पद के 'मुक्ता' एक माला की तरह गूँथे जाते हैं। मैंने इसका नाम मौक्तिका दिया है क्योंकि इस में 'मुक्ता' शेर की तरह पिरोये जाते हैं। मौक्तिका में मुक्ताओं की संख्या कितनी होगी इसके लिए कोई निश्चित नियम नहीं है फिर भी 4 तो होने ही चाहिए। मौक्तिका के सारे मुक्ता एक दूसरे से सम्बंधित हो कर मौक्तिका को एक पूर्ण कविता का रूप प्रदान करते हैं।

मौक्तिका का मुक्ता 4 पद या पंक्तियों की एक रचना है।
मुक्ता के दो भाग है जिन्हें मैंने अलग अलग नाम दिया है---
(1) तुकांतिका- मुक्ता के प्रथम दो पद जो समतुकांत होने आवश्यक हैं।
(2) मुक्तिका- मुक्ता के अंतिम दो पद जिनकी संरचना ठीक ग़ज़ल के शेर जैसी होती है। मुक्तिका के दोनों पद समतुकांत नहीं होने चाहिए।तुकांतिका और मुक्तिका का प्रथम पद 'पूर्व पद' और दूसरा पद 'पूरक पद' कहलाता है। मुक्तिका के पूरक पद का अंत किसी खास शब्द या शब्दों से होता है जो पूरी मौक्तिका की हर मुक्तिका में एक ही रहता है। इसे पदांत के नाम से जाना जाता है। यही उर्दू में रदीफ़ कहलाता है। इसके अलावा हर पदांत के ठीक पहले आया हुआ शब्द हर मुक्तिका में हमेशा समतुकांत रहता है जिसे समांत कहा जाता है। उर्दू में यही काफ़िया कहलाता है। हर मुक्तिका में समांत का होना आवश्यक है जबकि पदांत का लोप भी किया जा सकता है। मौक्तिका की प्रत्येक मुक्तिका में एक ही समांत का होना ही मौक्तिका की विशेषता है।

मौक्तिका का पहला मुक्ता प्रमुख होता है और इसे मुखड़ा के नाम से जाना जाता है। मुखड़ा में तुकांतिका नहीं होती केवल दो मुक्तिका होती हैं। मुखड़ा से ही मौक्तिका की हर मुक्तिका के पदांत और समांत का निर्धारण होता है। मुखड़ा के बाद के हर मुक्ता में तुकांतिका और मुक्तिका दोनों होती है।

मौक्तिका के अंतिम मुक्ता को मनका के नाम से जाना जाता है जिसमें मौक्तिका का उपसंहार होता है इस में कवि अपना नाम या उपनाम भी पिरो सकता है।

मौक्तिका सदैव छंद या बहर आधारित होनी चाहिए। हिंदी की कोई भी मात्रिक या वार्णिक छंद ली जा सकती है। गजलों की मान्य बहरों के अतिरिक्त लघु दीर्घ के निश्चित क्रम के कुछ भी लयात्मक वर्णवृत्त लिए जा सकते हैं। गजलों में जिस प्रकार की मात्रा गिराने की छूट रहती है मौक्तिका में भी वह रहती है। इससे रचनाकार को मौक्तिका में मन चाहे भाव समेटने में आसानी हो जाती है। मौक्तिका में एक साथ आये हुए दो लघु चाहे वे एक ही शब्द में हो या अलग अलग शब्द में हो, छंद के विधान के अनुसार दो लघु भी गिने जा सकते हैं अथवा एक दीर्घ भी। केवल 2 के आवर्तन से बनी मात्रिक बहरों जैसे 2*4, 2*15 आदि में दो लघु एक साथ न भी हो तो एक दीर्घ गिने जा सकते हैं पर ये सब छूट लेते समय यह सदैव ध्यान रहे कि लय और प्रवाह भंग न हो।

हिंदी में एक छंद में चार चरण या पद रहते हैं। दोहे में भी चार पद होते हैं किंतु 2 पंक्तियों में लिखने की परंपरा है। मौक्तिका के मुक्ता में भी हिंदी की इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए मैंने चार पद रखे हैं। हिंदी में एक रचना के हर छंद में स्वतंत्र विचार दोहों और सौरठों में ही रखे जाते हैं जबकि अन्य छन्दों में पूरी रचना एक ही भाव पर केंद्रित एक कविता का रूप रखती है। एक मौक्तिका भी अपने आप में एक ही विषय वस्तु पर केंद्रित एक पूर्ण कविता होती है न कि छुटपुट मुक्ताओं का संग्रह मात्र।

मौक्तिका में लय, छंद, वर्ण विन्यास और क्रम के साथ साथ गजल वाली तुकांतता की एक रूपता भी है और साथ ही एक पूर्ण कविता का गुण भी। इन्हीं सब तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए मैंने इस विधान पर प्रयोग करते हुए कुछ रचनाएँ लिखी और इस आलेख में इसके विधान की रूप रेखा प्रस्तुत करने की चेष्टा की है।

कुण्डला मौक्तिका:- मौक्तिका का एक भेद। इसकी संरचना कुंडलियाँ छंद के आधार पर की गई है। इसमें मुक्तिका का पूर्व पद दोहा की एक पंक्ति होती है तथा पूरक पद रोला छंद की एक पंक्ति होती है। दोहा के सम पद की रोला के विषम पद से तुक भी मिलाई जा सकती है। कुंडलियाँ छंद की तरह दोहा की पंक्ति जिस शब्द या शब्द समूह से प्रारंभ होती है रोला की पंक्ति का समापन भी उसी शब्द या शब्द समूह से होना आवश्यक है। यह शब्द या शब्द समूह पूरी रचना में पदांत का काम करता है। इस पदांत के अतिरिक्त समांत का होना भी आवश्यक है। तुकांतिका में मुक्तामणि या रोला छंद की दो पंक्तियाँ रखी जा सकती है। मेरी 'बेटी' शीर्षक की कुण्डला मौक्तिका का मुखड़ा एवं एक मुक्ता देखें-

बेटी शोभा गेह की, मात पिता की शान,
घर की है ये आन, जोड़ती दो घर बेटी।।
संतानों को लाड दे, देत सजन को प्यार,
रस की करे फुहार, नेह दे जी भर बेटी।।

रिश्ते नाते जोड़ती, मधुर सभी से बोले,
रखती घर की एकता, घर के भेद न खोले।
ममता की मूरत बड़ी, करुणा की है धार,
घर का सामे भार, काँध पर लेकर बेटी।।

दोहा 'बेटी' शब्द से प्रारंभ हो रहा है और यह रचना में पदांत का काम कर रहा है। हर मुक्तिका में पदांत के ठीक पहले समांत  घर, भर, कर हैं। दोहे की पंक्ति के अंत में आये शब्द शान, प्यार, धार आदि से रोला की प्रथम यति में तुक मिलाई गयी है। तुकांतिका मुक्तामणि छंद की दो पंक्तियाँ है। यह छंद दोहे की पंक्ति का अंत जो सदैव लघु रहता है, उसको दीर्घ करने से बन जाता है। अतः बहुत उपयुक्त है। मुक्तामणि की जगह रोला की  भी दो पंक्तियाँ रखी जा सकती हैं।


बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
10-06-16