Wednesday, January 22, 2020

हाइकु (नव-दुर्गा)

शैलपुत्री माँ
हिम गिरि तनया
वांछित-लाभा।
**

ब्रह्मचारिणी
कटु तप चारिणी
वैराग्य दात्री।
**

माँ चन्द्रघण्टा
शशि सम शीतला
शांति प्रदाता।
**

देवी कूष्माण्डा
माँ ब्रह्मांड सृजेता
उन्नति दाता।
**

श्री स्कंदमाता
कार्तिकेय की माता
वृत्ति निरोधा।
**

माँ कात्यायनी
कात्यायन तनया
पुरुषार्थ दा।
**

कालरात्रि माँ
तम-निशा स्वरूपा
भय विमुक्ता।
**

माँ महागौरी
शुभ्र वस्त्र धारिणी
पाप नाशिनी।
**

माँ सिद्धिदात्री
अष्ट सिद्धि रूपिणी
कामना पुर्णी।
**

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
09-10-19

सायली (होली)

होली
पावन त्योहार
जीवन में लाया
रंगों की
बौछार।
*********

होली
जला देती
अत्याचार, कपट, छल
निष्पाप भक्त
बचाती।
*********

होली
लाई रंग
हों सभी लाल
खेलें पलाश
संग।
*********

होली
देती छेद
ऊँच नीच के
मन से
भेद।
**********

होली
बीस की
कोरोना की तूती
देश में
बोली।
**********

बासुदेव
रखे चाहना
पूरे ग्रूप को
होली की
शुभकामना।

*****
1-2-3-2-1 शब्द
*****

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
12-03-2017

क्षणिका (वृद्धाश्रम)

(1)

वृद्धाश्रम का
एक बूढ़ा पलास
जो पतझड़ में
ठूँठ बना
था बड़ा उदास!
तभी एक
वृद्ध लाठी टेकता
आया उसके पास
जो वर्षों से
रहा कर वहीं निवास,,,
उसे देता दिलासा, कहा
क्या मुझ से भी ज्यादा
तू है निराश??
अरे तेरा तो,,
आने वाला है मधुमास
पर मैं तो जी रहा
रख उस बसंत की आस....
जब इस स्वार्थी जग में
ले लूँगा आखिरी श्वास।
**
(2)

बद्रिकाश्रम में जा
प्रभु की माला जपना,
अमर नाथ
यात्रा का सपना
वृद्धाश्रम में
आ टूटा।


बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
01-03-19

कहमुकरी (दिवाली)

जगमग जगमग करता आये,
धूम धड़ाका कर वह जाये,
छा जाती उससे खुशयाली,
क्या सखि साजन? नहीं दिवाली।

चाव चढ़े जब घर में आता,
फट पड़ता तो गगन हिलाता,
उत्सव इस बिन किसने चाखा,
क्या सखि साजन? नहीं पटाखा।

ये बुझता होता अँधियारा,
खिलता ये छाता उजियारा,
इस बिन करता धक-धक जीया
क्या सखि साजन, ना सखि दीया।

गीत सुनाये जी बहलाये,
काम यही सुख दुख में आये,
उसके बिन हो जाऊँ घायल,
क्या सखि साजन? ना मोबायल।

जी करता चिपकूँ बस उससे,
बिन उसके बातें हो किससे,
उसकी हूँ मैं पूरी कायल,
क्या सखि साजन? ना मोबायल।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
10-10-18

Thursday, January 16, 2020

विविध मुक्तक -2

जहाँ भर को ही जबसे आज़माने हम लगे हैं,
हमारी शख्शियत को खुद मिटाने हम लगे हैं,
लगें पर्दानशीं का हम उठाने जबसे पर्दा,
हमारा खुद का ही चेह्रा दिखाने हम लगे हैं।

(1222*3  122)
**********

छिपी हुई बहु मूल्य संपदा, इस शरीर के पर्दों में।
इस क्षमता के बल पर ही तुम, जान फूँक दो गर्दों में।
वो ताकत पहचान अगर लो, रोग मिटा दो दुनिया के।
ढूंढे भी फिर नहीं मिलेंगे, लोग रहें जो दर्दों में।

(लावणी छंद)
**********

जन्म नहीं है सब कुछ जग में, मान प्रतिष्ठा कर्म दिलाता,
जग में होता जन्म श्रेष्ठ तो, सूत-पुत्र क्यों कर्ण कहाता,
ऊँचे कुल का गर्व व्यर्थ है, किया नहीं कुछ यदि जीवन में,
बैन नहीं दिखलाते हैं गुण, गुण तो हरदम कर्म दिखाता।

(32 मात्रिक छंद)
**********
(अखबार)

ज्योंही सुबह होती हमें मिलती खबर अखबार से,
काले जो धंधे उनकी सब हिलती खबर अखबार से,
क्या हो रहा है देश में सब जानकारी दे ये झट,
नेताओं की तो पोल की खिलती खबर अखबार से।

(2212×4)
*********
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
15-10-18

मुक्तक (इश्क़, दिल)

उल्फ़त में चोट खाई उसका उठा धुँआ है,
अब दिल कहाँ बचा है सुलगी हुई चिता है,
होती है खुद से दहशत जब दिल की देखुँ वहशत,
इस मर्ज की सबब जो वो ही फकत दवा है।

(221  2122)*2
*********

हमारा इश्क़ अब तो ख्वाबिदा होने लगा है,
वहीं अब उनसे मिलना बारहा होने लगा है,
मुझे वे देख, नज़रों को झुका, झट से देते चल,
ख़ुदा क्यों उनसे अब यूँ सामना होने लगा है।

(1222*3 + 122)
*********

दिले नादान हालत क्यों तेरी इतनी हुई नाज़ुक,
कहीं क्या फिर नई इक बेवफ़ा तुझको मिली नाज़ुक,
हसीनों की भला फ़ितरत को तू क्या जान पायेगा,
रखे सीने में पत्थर दिल मगर लगतीं बड़ी नाज़ुक।

(1222×4)
*********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
24-09-16

पुछल्लेदार मुक्तक "उपवास"

कवि सम्मेलन का आमंत्रण मिला न मुझको आने का।
कर उपवास बताऊँगा अब क्या मतलब न बुलाने का।
मौका हाथ लगा छिप कर के छोले खूब उड़ाने का।
अवसर आया गिरगिट जैसा मेरा रंग दिखाने का।।

उजले कपड़ों में सजधज आऊँ,
चेलों को साथ लाऊँ,
मैं फोटुवें खिंचाऊँ,
महिमा उपवास की है भारी,
बासुदेव कहे सुनो नर नारी।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

मुक्तक (संस्कृति, संस्कार, शिक्षा)

संस्कृति अरु संस्कार हमारे, होते विकशित शिक्षा से,
रहन-सहन, उद्देश्य, आचरण,  हों निर्धारित शिक्षा से,
अंधाधुंध पढ़ाते फिर भी, हम बच्चों को अंग्रेजी,
सही दिशा क्या देश सकेगा, पा इस कलुषित शिक्षा से।

जीवन-उपवन के माली हैं, गुरुवर वृन्द हमारे ये,
भवसागर में डगमग नौका, उसके दिव्य सहारे ये,
भावों का आगार बना कर, जीवन सफल बनाते हैं,
बन्द नयन को ज्ञान ज्योति से, खोलें गुरुजन न्यारे ये।

(ताटंक छंद आधारित)
*********

चरैवेति का मूल मन्त्र ले, आगे बढ़ते जाएंगे,
जीव मात्र से प्रेम करेंगे, सबको गले लगाएंगे,
ऐतरेय ब्राह्मण ने हमको, अनुपम ये सन्देश दिया,
परि-व्राजक बन सदा सत्य का, अन्वेषण कर लाएंगे।

(लावणी छंद आधारित)
*******

मुक्तक (समर्पण)

उपकार को जो मानने में मन से ही असमर्थ है,
मन में नहीं यदि त्याग तो जीने का फिर क्या अर्थ है,
माता, पिता, गुरु, देश हित जिसमें समर्पण है नहीं,
ऐसे अधम पशु तुल्य का जीना जगत में व्यर्थ है।

(2212*4)
******

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
21-11-16

Saturday, January 11, 2020

सरसी छंद "खेत और खलिहान"

गाँवों में हैं प्राण हमारे, दें इनको सम्मान।
भारत की पहचान सदा से, खेत और खलिहान।।

गाँवों की जीवन-शैली के, खेत रहे सोपान।
अर्थ व्यवस्था के पोषक हैं, खेत और खलिहान।।

अन्न धान्य से पूर्ण रखें ये, हैं अपने अभिमान।
फिर भी सुविधाओं से वंचित, खेत और खलिहान।।

अंध तरक्की के पीछे हम, भुला रहे पहचान।
बर्बादी की ओर अग्रसर, खेत और खलिहान।।

कृषक आत्महत्या करते हैं, सरकारें अनजान।
चुका रहे कीमत इनकी अब, खेत और खलिहान।।

अगर बचाना हमें देश को, मन में हो ये भान।
आगे बढ़ते रहें सदा ही, खेत और खलिहान।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
08-03-18

सार छंद "आधुनिक ढोंगी साधु"

छन्न पकैया छन्न पकैया, वैरागी ये कैसे।
काम क्रोध मद लोभ बसा है, कपट 'पाक' में जैसे।
नाम बड़े हैं दर्शन छोटे, झूठा इनका चोंगा।
छापा तिलक जनेऊ रखते, पण्डित पूरे पोंगा।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, झूठी सच्ची करते।
कागज की संस्थाओं से वे, झोली अपनी भरते।
लोग गाँठ के पूरे ढूंढे, और अकल के अंधे।
बिना उस्तरा के ही मूंडे, चंदे के सब धंधे।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, गये साधु बन ढोंगी।
रमणी जहाँ दिखी सुंदर सी, फेंके फंदे भोगी।
आसमान में पहले टाँगे, लल्लो चप्पो करते।
रोज शान में पढ़ें कसीदे, दूम चाटते फिरते।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, फिर वे देते दीक्षा।
हर सेवा अपनी करवाये, कहते इसको भिक्षा।
मुँह में राम बगल में छूरी, दाढ़ी में है तिनका।
सर पे जटा गले में कण्ठी, कर में माला मिनका।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, छिपे भेड़िये अंदर।
खाल भेड़ की औढ़ रखें ये, झपटे जैसे बन्दर।
गिरगिट से ये रंग बदलते, अजगर से ये घाती।
श्वान-पूंछ से हैं ये टेढ़े, गीदड़ सी है छाती।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, बोले वचन सुहावा।
धुला चरण चरणामृत देते, आशीर्वाद दिखावा।
शिष्य बना के फेंके पासे, गुरु बन देते मंतर।
ऐसे गुरु से बच के रहना, झूठे जिनके तंतर।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
22-08-2016

सोरठा "राम महिमा"

मंजुल मुद आनंद, राम-चरित कलि अघ हरण।
भव अधिताप निकंद, मोह निशा रवि सम दलन।।

हरें जगत-संताप, नमो भक्त-वत्सल प्रभो।
भव-वारिध के आप, मंदर सम नगराज हैं।।

शिला और पाषाण, राम नाम से तैरते।
जग से हो कल्याण, जपे नाम रघुनाथ का।।

जग में है अनमोल, विमल कीर्ति प्रभु राम की।
इसका कछु नहिं तोल, सुमिरन कर नर तुम सदा।।

हृदय बसाऊँ राम, चरण कमल सिर नाय के।
सभी बनाओ काम, तुम बिन दूजा कौन है।।

गले लगा वनबास, बनना चाहो राम तो।
मत हो कभी उदास, धीर वीर बन के रहो।।

रखो राम पे आस, हो अधीर मन जब कभी।
प्राणी तेरे पास, कष्ट कभी फटके नहीं।।

सदा रहे आनन्द, रामकृपा बरसे जहाँ।
मन में परमानन्द, माया का बन्धन कटे।।

राम करे उद्धार, दीन पतित जन का सदा।
भव से कर दे पार,  प्रभु से बढ़ कर कौन जो।।

सुध लेवो रघुबीर, दर्शन के प्यासे नयन।
कबसे हृदय अधीर, अब तो प्यास मिटाइये।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
30-04-19

वर्ष छंद "एक बाल कविता"

बिल्ली रानी आवत जान।
चूहा भागा ले कर प्रान।।
आगे पाया साँप विशाल।
चूहे का जो काल कराल।।

नन्हा चूहा हिम्मत राख।
जल्दी कूदा ऊपर शाख।।
बेचारे का दारुण भाग।
शाखा पे बैठा इक काग।।

पत्तों का डाली पर झुण्ड।
जा बैठा ले भीतर मुण्ड।।
कौव्वा बोले काँव कठोर।
चूँ चूँ से दे उत्तर जोर।।

ये है गाथा केवल एक।
देती शिक्षा पावन नेक।।
बच्चों हारो हिम्मत नाय।
लाखों चाहे संकट आय।।
================
लक्षण छंद:-

"माताजा" नौ वर्ण सजाय।
प्यारी छंदा 'वर्ष' लुभाय।।

"माताजा" = मगण तगण जगण

222  221 121 = 9 वर्ण
चार चरण दो दो समतुकांत।
*******************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
12-02-2017

वरूथिनी छन्द "प्रदीप हो"

प्रचंड रह, सदैव बह, कभी न तुम, अधीर हो।
महान बन, सदा वतन, सुरक्ष रख, सुवीर हो।।
प्रयत्न कर, बना अमर, अटूट रख, अखंडता।
कभी न डर, सदैव धर, रखो अतुल, प्रचंडता।।

निशा प्रबल, सभी विकल, मिटा तमस, प्रदीप हो।
दरिद्र जन , न वस्त्र तन, करो सुखद, समीप हो।।
सुकाज कर, गरीब पर, सदैव तुम, दया रखो।
मिटा विपद, उन्हें सुखद, बना सरस, सुधा चखो।।

हुँकार भर, दहाड़ कर, जवान तुम, बढ़े चलो।
त्यजो अलस, न हो विवस, मशाल बन, सदा जलो।।
अराति गर, उठाय सर, दबोच तुम, उसे वहीं।
धरो पकड़, रखो जकड़, उसे भगन, न दो कहीं।

प्रशस्त नभ, करो सुलभ, सभी डगर, बिना रुके।
रहो सघन, डिगा न मन, बढ़ो युवक, बिना झुके।।
हरेक थल, रहो अटल, विचार नित, नवीन हो।
बढ़ा वतन, छुवा गगन, सभी जगह, प्रवीन हो।।
=====================
लक्षण छंद:-

"जनाभसन,जगा" वरण, सुछंद रच, प्रमोदिनी।
विराम सर,-त्रयी सजत,  व चार पर, 'वरूथिनी'।।

"जनाभसन,जगा" = जगण+नगण+भगण+सगण+नगण+जगण+गुरु
121  11,1  211  1,12  111,  121  2
सर,-त्रयी सजत = सर यानि बाण जो पाँच की संख्या का भी द्योतक है। सर-त्रयी यानि 5,5,5।

(१९ वर्ण, ४ चरण, क्रमश: ५,५,५,४ वर्ण पर यति, दो-दो चरण समतुकान्त)
***************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
26-01-19

Monday, January 6, 2020

ग़ज़ल (इश्क़ की मेरी इब्तिदा है वो)

ग़ज़ल (इश्क़ की मेरी इब्तिदा है वो)

बह्र:- 2122  1212   22

इश्क़ की मेरी इब्तिदा है वो,
हमनवा और दिलरुबा है वो।

मेरा दिल तो है एक दरवाज़ा,
हर किसी के लिए खुला है वो।

आँख से जो चुरा ले काजल भी,
अपने फ़न में मजा हुआ है वो।

बाँध पट्टी जो जीता आँखों पे,
बैल जैसा ही जी रहा है वो।

आदमी खुद को जो ख़ुदा समझे,
पूरा अंदर से खोखला है वो।

दोष क्या दूसरों का है इस में, 
अपनी नज़रों से खुद गिरा है वो।

दिल उसे बा-वफ़ा भले ही कहे,
जानता हूँ कि बेवफ़ा है वो।

खुद में खुद को ही ढूंढ़ता जो बशर,
पारसा वो नहीं तो क्या है वो।

जो 'नमन' जग के वास्ते जीता,
ज़िंदगी अपनी जी चुका है वो।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
8-10-19

ग़ज़ल (आपके पास हैं दोस्त ऐसे, कहें)

बह्र:- 212*4

आपके पास हैं दोस्त ऐसे, कहें,
साथ जग छोड़ दे, संग वे ही रहें।

दोस्त ऐसे हों जो बाँट लें दर्द-ओ-ग़म,
दिल की पीड़ा को संग_आपके जो सहें।

धैर्य रख जो सुनें बात हैं मित्र वे,
और जो साथ में भावना में बहें।

बेरुखी की जहाँ की लगे आग जब,
मित्र के सीने में भी वे शोले दहें।

मित्र सच्चे 'नमन', मित्र का देख दुख,
हाथ खुद के बढ़ा, मित्र के कर गहें।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
14-06-19

ग़ज़ल (तुम्हें जब भी हमारी छेड़खानी)

बह्र:- 1222 1222 1222 1222

तुम्हें जब भी हमारी छेड़खानी याद आएगी
यकीनन यार होली की सुहानी याद आएगी।

तुम्हारी मेज़बानी की चलेगी जब कभी चर्चा,
हमें महफ़िल के गीतों की रवानी याद आएगी।

मची है धूम होली की ज़रा खिड़की से झाँको तो,
इसे देखोगे तो अपनी जवानी याद आएगी।

कभी आभासी जग मोबायलों का छोड़ के देखो,
तो यारों में ही सिमटी जिंदगानी याद आएगी।

जमीं रंगी फ़िज़ा रंगी बिना तेरे नहीं कुछ ये,
झलक तेरी मिले तो हर पुरानी याद आएगी।

कन्हैया की करेंगे याद जब भी बाल लीलाएँ,
लिए हाथों में लकुटी नंदरानी याद आएगी।

'नमन' होली की पी के भंग खुल्ला छोड़ दे खुद को,
तुझे बीते दिनों की हर कहानी याद आएगी।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
15-02-18

नेताओं पर मुसलसल ग़ज़ल

2*7 (नेताओं पर मुसलसल ग़ज़ल)

माल पराया खाएँ हम,
नेता तब कहलाएँ हम।

जनता की दुखती रग से,
अपनी जीत पकाएँ हम।

देश भले लुटता जाए,
अपनी फ़िक्र जताएँ हम।

अपनी तो तिकड़म सारी,
कैसे कुर्सी पाएँ हम।

बात किसी की हम न सुनें,
बस खुद की ही गाएँ हम।

झूठे सपनों को दिखला,
जनता खूब लुभाएँ हम।

'नमन' किसे परवाह यहाँ,
भाएँ या ना भाएँ हम।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
2-5-19