Friday, August 16, 2019

पुछल्लेदार मुक्तक "नेताओं का खेल"

नेताओं ने आज देश में कैसा खेल रचाया है।
इनकी मनमानी के आगे सर सबका चकराया है।
लूट लूट जनता को इनने भारी माल बनाया है।
स्विस बैंकों में खाते रखकर काला धन खिसकाया है।।

सत्ताधीशों ने देश को है बाँटा,
करारा मारा चाँटा,
यही तो चुभे काँटा,
सुनोरे मेरे सब भाइयों,
बासुदेव कवि दर्द ये सुनाता।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
28-04-18

मुक्तक (साहित्य, भाषा)

भरा साहित्य सृजकों से हमारा ये सुखद परिवार,
बड़े गुरुजन का आशीर्वाद अरु गुणग्राहियों का प्यार,
यहाँ सम्यक समीक्षाओं से रचनाएँ परिष्कृत हों,
कहाँ संभव कि ऐसे में किसी की कुंद पड़ जा धार।

1222*4
*********

यहाँ काव्य की रोज बरसात होगी।
कहीं भी न ऐसी करामात होगी।
नहाओ सभी दोस्तो खुल के इसमें।
बड़ी इससे क्या और सौगात होगी।।

122×4
*********
हिन्दी

संस्कृत भाषा की ये पुत्री, सर्व रत्न की खान है,
आज अभागी सन्तानों से, वही रही खो शान है,
थाल पराये में मुँह मारो, पर ये हरदम याद हो,
हिन्दी ही भारत को जग में, सच्ची दे पहचान है।

(16+13 मात्रा)
*********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-10-16

मौक्तिका (जो सत्यता ना पहचानी)

2*9 (मात्रिक बहर)
(पदांत 'ना पहचानी', समांत 'आ' स्वर)

दूजों के गुण भारत तुम गाते,
अपनों की प्रतिभा ना पहचानी।
तुम मुख अन्यों का रहे ताकते,
पर स्वावलम्बिता ना पहचानी।।

सोने की चिड़िया देश हमारा,
था जग-गुरु का पद सबसे न्यारा।
किस हीन भावना में घिर कर अब,
वो स्वर्णिम गरिमा ना पहचानी।।

जिनको तूने उपदेश दिया था,
असभ्य से जिनको सभ्य किया था।
पर आज उन्हीं से भीख माँग के,
वह खोई लज्जा ना पहचानी।।

सम्मान के' जो सच्चे अधिकारी,
है जिनकी प्रतिभा जग में न्यारी।
उन अपनों की अनदेखी कर के,
उनकी अभिलाषा ना पहचानी।।

मूल्यांकन जो प्रतिभा का करते,
बुद्धि-हीन या पैसों पे मरते।
परदेशी वे अपनों पे थोप के',
देश की अस्मिता ना पहचानी।।

गुणी सुधी जन अब देश छोड़ कर,
विदेश जा रहे मुख को मोड़ कर।
लोहा उनने सब से मनवाया,
पर यहाँ रिक्तता ना पहचानी।।

सम्बल विदेश का अब तो छोड़ो,
अपनों से यूँ ना मुख को मोड़ो।
हे भारत 'नमन' करो उसको तुम,
अब तक जो सत्यता ना पहचानी।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
10-07-2016

कहमुकरी (विविध)

मीठा बोले भाव उभारे
तोड़े वादों में नभ तारे
सदा दिलासा झूठी देता
ए सखि साजन? नहिं सखि नेता!

सपने में नित इसको लपकूँ
मिल जाये तो इससे चिपकूँ
मेरे ये उर वसी उर्वसी
ए सखा सजनि? ना रे कुर्सी!

जिसके डर से तन मन काँपे
घात लगा कर वो सखि चाँपे
पूरा वह निष्ठुर उन्मादी
क्या साजन? न आतंकवादी!

गिरगिट जैसा रंग बदलता
रार करण वो सदा मचलता
उसकी समझुँ न कारिस्तानी
क्या साजन? नहिं पाकिस्तानी!

भेद न जो काहू से खोलूँ
इससे सब कुछ खुल के बोलूँ
उर में छवि जिसकी नित रखली
ए सखि साजन? नहिं तुम पगली!

बारिस में हो कर मतवाला,
नाचे जैसे पी कर हाला,
गीत सुनाये वह चितचोर,
क्या सखि साजन, ना सखि मोर।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-05-17

"कह मुकरी विधान"

कह मुकरी काव्य की एक पुरानी मगर बहुत खूबसूरत विधा है। यह चार पंक्तियों की संरचना है। यह विधा दो सखियों के परस्पर वार्तालाप पर आधारित है। जिसकी प्रथम 3 पंक्तियों में एक सखी अपनी दूसरी अंतरंग सखी से अपने साजन (पति अथवा प्रेमी) के बारे में अपने मन की कोई बात कहती है। परन्तु यह बात कुछ इस प्रकार कही जाती है कि अन्य किसी बिम्ब पर भी सटीक बैठ सकती है। जब दूसरी सखी उससे यह पूछती है कि क्या वह अपने साजन के बारे में बतला रही है, तब पहली सखी लजा कर चौथी पंक्ति में अपनी बात से मुकरते हुए कहती है कि नहीं वह तो किसी दूसरी वस्तु के बारे में कह रही थी ! यही "कह मुकरी" के सृजन का आधार है।

इस विधा में योगदान देने में अमीर खुसरो एवम् भारतेंदु हरिश्चन्द्र जैसे साहित्यकारों के नाम प्रमुख हैं ।

यह ठीक 16 मात्रिक चौपाई वाले विधान की रचना है। 16 मात्राओं की लय, तुकांतता और संरचना बिल्कुल चौपाई जैसी होती है। पहली एवम् दूसरी पंक्ति में सखी अपने साजन के लक्षणों से मिलती जुलती बात कहती है। तीसरी पंक्ति में स्थिति लगभग साफ़ पर फिर भी सन्देह जैसे कि कोई पहेली हो। चतुर्थ पंक्ति में पहला भाग 8 मात्रिक जिसमें सखी अपना सन्देह पूछती है यानि कि प्रश्नवाचक होता है और दुसरे भाग में (यह भी 8 मात्रिक) में स्थिति को स्पष्ट करते हुए पहली सखी द्वारा उत्तर दिया जाता है ।

हर पंक्ति 16 मात्रा, अंत में 1111 या 211 या 112 या 22 होना चाहिए। इसमें कहीं कहीं 15 या 17 मात्रा का प्रयोग भी देखने में आता है। न की जगह ना शब्द इस्तेमाल किया जाता है या नहिं भी लिख सकते हैं। सखी को सखि लिखा जाता है।

कुछ उदाहरण

1
बिन आये सबहीं सुख भूले।
आये ते अँग-अँग सब फूले।।
सीरी भई लगावत छाती।
ऐ सखि साजन ? ना सखि पाती।।
........अमीर खुसरो......

2
रात समय वह मेरे आवे।
भोर भये वह घर उठि जावे।।
यह अचरज है सबसे न्यारा।
ऐ सखि साजन ? ना सखि तारा।।
........अमीर खुसरो......

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

Tuesday, August 13, 2019

दोहा (प्रभु ही रखते ध्यान)

जीव जंतु जंगम जगत, सबको समझ समान।
योग क्षेम करके वहन, प्रभु ही रखते ध्यान।।

राम, कृष्ण, वामन कभी, कूर्म, मत्स्य अभिधान।
पाप बढ़े अवतार ले, प्रभु ही रखते ध्यान।।

ब्रह्म-रूप उद्गम करे, रुद्र-रूप अवसान।
विष्णु-रूप में सृष्टि का, प्रभु ही रखते ध्यान।।

अर्जुन के बन सारथी, गीता कीन्हि बखान।
भक्त दुखों में जब घिरे, प्रभु ही रखते ध्यान।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
11-06-19

कश्मीरी पत्थरबाजों पर दोहे

धरती का जो स्वर्ग था, बना नर्क वह आज।
गलियों में कश्मीर की, अब दहशत का राज।।

भटक गये सब नव युवक, फैलाते आतंक।
सड़कों पर तांडव करें, होकर के निःशंक।।

उग्रवाद की शह मिली, भटक गये कुछ छात्र।
ज्ञानार्जन की उम्र में, बने घृणा के पात्र।।

पत्थरबाजी खुल करें, अल्प नहीं डर व्याप्त।
सेना का भी भय नहीं, संरक्षण है प्राप्त।।

स्वारथ की लपटों घिरा, शासन दिखता पस्त।
छिन्न व्यवस्थाएँ सभी, जनता भय से त्रस्त।।

खुल के पत्थर बाज़ ये, बरसाते पाषाण।
देखें सब असहाय हो, कहीं नहीं है त्राण।।

हाथ सैनिकों के बँधे, करे न शस्त्र प्रयोग।
पत्थर बाज़ी झेलते, व्यर्थ अन्य उद्योग।।

सत्ता का आधार है, तुष्टिकरण का मंत्र।
बेबस जनता आज है, 'नमन' तुझे जनतंत्र।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-01-2019

रति छंद "प्यासा मन-भ्रमर"

मन मोहा, तन कुसुम सम तेरा।
हर लीन्हा, यह भ्रमर मन मेरा।।
अब तो ये, रह रह छटपटाये।
कब तृष्णा, परिमल चख बुझाये।।

मृदु हाँसी, जिमि कलियन खिली है।
घुँघराली, लट-छवि झिलमिली है।।
मधु श्वासें, मलय-महक लिये है।
कटि बांकी, अनल-दहक लिये है।।

मतवाली, शशि वदन यह गोरी।
मृगनैनी, चपल चकित चकोरी।।
चलती तो, लख हरिण शरमाये।
यह न्यारी, छवि न वरणत जाये।।

लगते हैं, अधर पुहुप लुभाये।
तब क्यों ना, सब मिल मन जलाये।।
मन भौंरा, निरखत डगर तेरी।
मिल ने को, बिलखत कर न देरी।।
===============
लक्षण छंद:-

'रति' छंदा', रख गण "सभनसागे"।
यति चारा, अरु नव वरण साजे।।

"सभनसागे" = सगण भगण नगण सगण गुरु

( 112  2,11  111  112  2)
13वर्ण, यति 4-9 वर्णों पर,
4 चरण,दो-दो चरण समतुकांत
*****************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
26-01-19

रक्ता छंद "शारदा वंदन"

ब्रह्म लोक वासिनी।
दिव्य आभ भासिनी।।
वेद वीण धारिणी।
हंस पे विहारिणी।।

शुभ्र वस्त्र आवृता।
पद्म पे विराजिता।।
दीप्त माँ सरस्वती।
नित्य तू प्रभावती।।

छंद ताल हीन मैं।
भ्रांति के अधीन मैं।।
मन्द बुद्धि को हरो।
काव्य की प्रभा भरो।।

छंद-बद्ध साधना।
काव्य की उपासना।
मैं सदैव ही करूँ।
भाव से इसे भरूँ।।

मात ये विचार हो।
देश का सुधार हो।।
ज्ञान का प्रसार हो।
नष्ट अंधकार हो।।

शारदे दया करो।
ज्ञान से मुझे भरो।।
काव्य-शक्ति दे मुझे।
दिव्य भक्ति दे मुझे।।

===========
विधान~ [रगण जगण गुरु]
( 212 121 2 ) = 7 वर्ण, 4 चरण
[दो-दो या चारों चरण समतुकांत]

**********
बासुदेव अग्रवाल नमन,
तिनसुकिया
10-02-19

यशोदा छंद "प्यारी माँ"

तु मात प्यारी।
महा दुलारी।।
ममत्व पाऊँ।
तुझे रिझाऊँ।।

गले लगाऊँ।
सदा मनाऊँ।।
करूँ तुझे माँ।
प्रणाम मैं माँ।।

तु ही सवेरा।
हरे अँधेरा।।
बिना तिहारे।
कहाँ सहारे।।

दुलार देती।
बला तु लेती।।
सनेह दाता।
नमामि माता।।
===========
लक्षण छंद:-

"जगाग" राचो।
'यशोदा' पाओ।।

121+ गुरु+ गुरु =5 वर्ण,4 चरण  दो-दो तुकांत
**************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
05-06-17

Friday, August 9, 2019

हाइकु (राजनेता)

पिता कोमल
संपूर्ण-स्वामी सुत
रोज दंगल।
**
बुआ की छाया
भतीजा भरमाया
अजब माया।
**
अहं सम्राज्य
हिंसा में घिरा राज्य
ममता लुप्त।
**
राहु-लगन
पीढ़ियों का सम्राज्य
हुआ समाप्त।
**

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
26-06-19

पिरामिड (तेरी याद)

(1-7 और 7-1) आरोही अवरोही

पी
कर
ये आँसू
जी  रहे  हैं
किसी तरह।
आँसू बह  रहे
आँखों से रह रह।

नहीं टिक रहा है
अब कहीं भी जी।
याद में तेरी
हर रोज
जी रहे
खून
पी।
******

जी
रहे
जिंदगी
अब हम
आसरे तेरे।
उजालों में छाए
घनघोर  अंधेरे।

गुजरते  हैं   दिन
अब आँसू पी पी।
तेरी याद में
है कितना
तड़पा
मेरा
जी।
*****

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
11-11-16

ताँका (प्रकृति)

जापानी विधा (5-7-5-7-7)

निशा ने पाया
मयंक सा साजन
हुई निहाल,
धारे तारक-माल
खूब करे धमाल।
**
तारक अस्त
हुई शर्म से लाल
भोर है मस्त,
रवि-रश्मि संघात
सरसे जलजात।
**
भ्रमर गूँज,
मधुपरी नर्तन,
हर्षित कूँज,
आया नव विहान
रजनी अवसान।
**
ग्राम्य-जीवन
संदल उपवन
सरसावन,
सुरभित पवन
वास बरसावन।
**
हवा में बहे
सेमली शुभ्र गोले,
आ कर सजे,
हरित दूब पर
जैसे झरे हों ओले।
**

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
20-06-19

चौका (उन्माद)

जापानी विधा चौका
5-7, 5-7, 5-7 -------- +7

अंधा विश्वास
अंधी आस्था करती
विवेक शून्य,
क्षणिक आवेश में
मानव भूले
क्या सही क्या गलत?
होकर पस्त,,,
यही तो है उन्माद।
मनुष्य नाचे
कठपुतली बन,
जिसकी डोर
बाज़ीगर के हाथ,
जैसे वो चाहे
नचाए पुतलों को
ये खिलौनों से
मस्तिष्क से रहित
मचा तांडव
करें नग्न नर्तन
लूट हिंसा का
मचा आतंकवाद
यही तो है उन्माद।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
08-09-17

क्षणिका (मानवीय क्षमता)

हे मानवीय क्षमता
क्या छोटी पड़ गई धरा?
जो चढ़ बैठी हो,
अंतरिक्ष में
जहाँ से अपने बनाये
उपग्रही खिलौनों की आँख से
तुम देख,,,,
अट्टहास कर सको
बेरोजगारी और गरीबी का दानव
अपने पंजों में जकड़ता
सिसकता, कराहता मानव।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-02-18

Wednesday, August 7, 2019

रोला छंद "दो राही"

जग-ज्वाला से दग्ध, पथिक इक था अति व्याकुल।
झूठे रिश्ते नातों के, प्रति भी शंकाकुल।।
मोह-बन्ध सब त्याग, शांति की चला खोज में।
जग झूठा जंजाल, भाव ये मन-सरोज में।1।

नश्वर यह मानव-तन, लख वैराग्य हुआ था।
क्षणभंगुरता पर जग की, नैराश्य हुआ था।।
उसका मन जग-ज्वाल, सदा रहती झुलसाती।
तृष्णा की ये बाढ़, हृदय रह रह बिलखाती।2।

स्वार्थ बुद्धि लख घोर, घृणा के उपजे अंकुर।
ज्ञान मार्ग की राह चले, मन था अति आतुर।।
अर्थी जग की धनसंचयता, से उद्वेलित।
जग की घोर स्वार्थपरता से, मन भी विचलित।3।

बन सन्यासी छोड़, चला वह जग की ज्वाला।
लगा ढूंढने मार्ग, शांति का हो मतवाला।।
परम शांति का एक मार्ग, वैराग्य विचारा।
आत्मज्ञान का अन्वेषण, ही एक सहारा।4।

एक और भी देह, धरा था जग में राही।
मोह और माया के, गुण का ही वह ग्राही।।
वृत्ति स्वार्थ से पूर्ण, सदा उसने अपनाई।
रहता इसमें मग्न, अधम वह कर कुटिलाई।5।

पाप लोभ मद के पथ पर, वह हुआ अग्रसर।
विचरण करता दम्भ क्षोभ, नद के नित तट पर।।
भेद-नीति से सब पर, अपनी धौंस जमाता।
पाशवता के निर्झर से, वह तृषा मिटाता।6।

एकमात्र था लक्ष्य, नित्य ही धन का संचय।
अन्यों का शोषण करना, उसका दृढ़ निश्चय।।
जुल्म अनेकों अपने से, अबलों पर ढ़ाहे।
अन्यों की आहों पर, निर्मित निज गृह चाहे।7।

अंतर इन दोनो पथिकों में, बहुत बड़ा है।
एक चाहता मुक्ति, दूसरा यहीं अड़ा है।।
मोक्ष-मार्ग पहले ने, बन्धन त्यज अपनाया।
पड़ा मोह माया में दूजा, रुदन मचाया।8।

नश्वर जग में धन्यवान, केवल पहले जन।
वृत्ति सुधा सम धार, अमिय मय करते जीवन।।
ज्ञान-रश्मि से वे प्रकाश, जग में फैलाते।
प्रेम-वारि जग उपवन में, वे नित बरसाते।9।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
27-05-2016

रोला छंद "विधान"

रोला चार चरणों का, प्रत्येक चरण में 24 मात्रा का छंद है। चरणान्त गुरु अथवा 2 लघु से होना आवश्यक है। तुक दो दो चरण में होती है।

कुंडलियाँ छंद के कारण रोला बहु प्रचलित छंद है। कुंडलियाँ में प्रथम दो पंक्ति दोहा की तथा अंतिम चार पंक्ति रोला की होती है। दोहा का चौथा चरण रोला की प्रथम पंक्ति के आरंभ में पुनरुक्त होता है, अतः रोला की प्रथम यति 11 मात्रा पर होना सर्वथा सिद्ध है। साथ ही इस यति का ताल (2 1) से अंत भी होना चाहिये।

परन्तु अति प्रतिष्ठित कवियों की रचनाओं से देखा गया है कि रोला छंद इस बन्धन में बंधा हुआ नहीं है। रोल बहुत व्यापक छंद है।  भिखारीदास ने छंदार्णव पिंगल में रोला को 'अनियम ह्वै है रोला' तक कह दिया है। रोला छंद 11, 13 की यति में भी बंधा हुआ नहीं है और न ही प्रथम यति का अंत गुरु लघु से होना चाहिये, इस बंधन में। अनेक प्रतिष्ठित कवियों की रचनाओं के आधार पर रोला की मात्रा बाँट  8-6-2-6-2 निश्चित होती है।
8 = अठकल या 2 चौकल।
6 = 3+3 या 4+2 या 2+4
2 = 1 + 1 या 2
यति भी 11, 12, 14, 16 मात्रा पर सुविधानुसार कहीं भी रखी जा सकती है। प्रसाद जी की कामायनी की कुछ पंक्तियाँ देखें।

मैं यह प्रजा बना कर कितना तुष्ट हुआ था,
किंतु कौन कह सकता इन पर रुष्ट हुआ था।
मैं नियमन के लिए बुद्धि-बल से प्रयत्न कर,
इनको कर एकत्र चलाता नियम बना कर।
रूप बदलते रहते वसुधा जलनिधि बनती,
उदधि बना मरुभूमि जलधि में ज्वाला जलती।
विश्व बँधा है एक नियम से यह पुकार-सी,
फैल गयी है इसके मन में दृढ़ प्रचार-सी।

पर कुंडलियाँ छंद में 11, 13 की यति रख कर ही रचना करनी चाहिए। इस छंद में रोला के मान्य रूप को ही रखना चाहिये जो रोला की चारों पंक्ति की प्रथम पंक्ति से अनुरूपता के लिए भी अति आवश्यक है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

रूपमाला छंद "राम-महिमा"

राम की महिमा निराली, राख मन में ठान।
अन्य रस का स्वाद फीका, भक्ति रस की खान।
जागती यदि भक्ति मन में, कृपा बरसी जान।
नाम साँचो राम को है, लो हृदय में मान।।

राम को भज मन निरन्तर, भक्ति मन में राख।
इष्ट पे रख पूर्ण आश्रय, मत बढ़ाओ शाख।
शांत करके मन-भ्रमर को, एक का कर जाप।
राम-रस को घोल मन में, दूर हो सब ताप।।

नाम प्रभु का दिव्य औषधि, नित करो उपभोग।
दाह तन मन की हरे ये, काटती भव-रोग।।
सेतु सम है राम का जप, जग समुद्र विशाल।
आसरा इसका मिले तो, पार हो तत्काल।।

रत्न सा जो है प्रकाशित, राम का वो नाम।
जीभ पे इसको धरो अरु, देख इसका काम।।
ज्योति इसकी जगमगा दे, हृदय का हर छोर।
रात जो बाहर भयानक, करे उसकी भोर।।

गीध, शबरी और बाली, तार दीन्हे आप।
आप सुनते टेर उनकी, जो करें नित जाप।।
राम का जप नाम हर क्षण, पवनसुत हनुमान।
सकल जग के पूज्य हो कर, बने महिमावान।।

राम को जो छोड़ थामे, दूसरों का हाथ।
अंत आयेगा निकट जब, कौन देगा साथ।
नाम पे मन रख भरोसा, सब बनेंगे काज।
राम से बढ़कर जगत में, कौन दूजो आज।।
************
रूपमाला छंद *विधान*

यह एक अर्द्धसममात्रिक छन्द है, जिसके प्रत्येक चरण में 14 और 10 के विश्राम से 24 मात्राएँ और चरणान्त गुरु-लघु से होता है. इसको मदन छन्द भी कहते हैं. यह चार चरणों का छन्द है, जिसमें दो-दो पदों पर तुकान्तता बनती है।

इसकी मात्रा बाँट 3 सतकल और अंत ताल यानि
गुरु लघु से होता है। सतकल की मात्रा बाँट
3 2 2 है जिसमें द्विकल के दोनों रूप (2, 1 1) और त्रिकल के तीनों रूप (2 1, 1 2, 1 1 1) मान्य है।अतः निम्न बाँट तय होती है:
3 2 2  3 2 2 = 14 मात्रा और

3 2 2  2 1 = 10 मात्रा

इस छंद को 2122  2122, 2122  21 के बंधन में बाँधना उचित नहीं। प्रसाद जी का कामायनी के वासना सर्ग का उदाहरण देखें।

स्पर्श करने लगी लज्जा, ललित कर्ण कपोल,
खिला पुलक कदंब सा था, भरा गदगद बोल।
किन्तु बोली क्या समर्पण, आज का हे देव!
बनेगा-चिर बंध नारी, हृदय हेतु सदैव।
============

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
29-08-2016

रास छंद "कृष्णावतार"

हाथों में थी, मात पिता के, सांकलियाँ।
घोर घटा में, कड़क रही थी, दामिनियाँ।
हाथ हाथ को, भी ना सूझे, तम गहरा।
दरवाजों पर, लटके ताले, था पहरा।।

यमुना मैया, भी ऐसे में, उफन पड़ी।
विपदाओं की, एक साथ में, घोर घड़ी।
मास भाद्रपद, कृष्ण पक्ष की, तिथि अठिया।
कारा-गृह में, जन्म लिया था, मझ रतिया।।

घोर परीक्षा, पहले लेते, साँवरिया।
जग को करते, एक बार तो, बावरिया।
सीख छिपी है, हर विपदा में, धीर रहो।
दर्शन चाहो, प्रभु के तो हँस, कष्ट सहो।।

अर्जुन से बन, जीवन रथ का, स्वाद चखो।
कृष्ण सारथी, रथ हाँकेंगे, ठान रखो।
श्याम बिहारी, जब आते हैं, सब सुख हैं।
कृष्ण नाम से, सारे मिटते, भव-दुख हैं।।
====================
रास छंद विधान:-

रास छंद 22 मात्राओं का छंद है जिसमें 8, 8, 6 मात्राओं पर यति होती है। चरणान्त 112 से होना आवश्यक है। चार चरणों का एक छंद होता है जिसमें 2-2 पंक्ति तुकांत होनी चाहिये। मात्रा बाँट प्रथम और द्वितीय यति में एक अठकल या 2 चौकल का है। अंतिम यति में 2 - 1 - 1 - 2 का है।
********************
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
24-08-2016

प्लवंगम छंद "सरिता"

भूधर बिखरें धरती पर हर ओर हैं।
लुप्त गगन में ही कुछ के तो छोर हैं।।
हैं तुषार मंडित जिनके न्यारे शिखर।
धवल पाग भू ने ज्यों धारी शीश पर।।

एक सरित इन शैल खंड से बह चली।
बर्फ विनिर्मित तन की थी वह चुलबली।।
ले अथाह जल अरु उमंग मन में बड़ी।
बलखाती इठलाती नदी निकल पड़ी।।

बाधाओं को पथ की सारी पार कर।
एक एक भू-खंडों को वह अंक भर।।
राहों के सब नाले, मिट्टी, तरु बहा।
हुई अग्रसर गर्जन करती वह महा।।

कभी मधुरतम कल कल ध्वनि से वह बहे।
श्रवणों में ज्यों रागों के सुर आ रहे।।
कभी भयंकर रूप धरे तांडव मचे।
धारा में जो भी पड़ जाये ना बचे।।

लदी हुई मानव-आशा के भार से।
सींचे धरती वरदानी सी धार से।
नगरों, मैदानों को करती पार वह।
हर्ष मोद का जग को दे भंडार वह।।

मधुर वारि से सींच अनेकों खेत को।
कृषकों के वह साधे हर अभिप्रेत को।।
हरियाली की खुशियों भरी खिला कली।
वह अथाह सागर के पट में छिप चली।।
********************
प्लवंगम छंद "विधान"

21 मात्रा। चार चरण, दो दो तुकांत।
मात्रा बाँट:-   8-8-2-1-2
================

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
16-04-2016

Sunday, August 4, 2019

ग़ज़ल (आप का साथ मिला)

बह्र: 2122 1122 1122  22

आप का साथ मिला, मुझ को सँवर जाना था,
पर लिखा मेरे मुक़द्दर में बिखर जाना था।

आ सका आपके नज़दीक न उल्फ़त में सनम,
तो मुझे इश्क़ में क्या हद से गुज़र जाना था।

पहले गर जानता ग़म इस में हैं दोनों के लिये,
इस मुहब्बत से मुझे तब ही मुकर जाना था।

जब भी वो आँख दिखाता है, ख़ता खाता है,
शर्म गर होती उसे कब का सुधर जाना था।

जो लड़े हक़ के लिये, सर पे कफ़न रखते थे,
अहले दुनिया से भला क्यों उन्हें डर जाना था।

सात दशकों से अधिक हो गये आज़ादी को,
देश का भाग्य तो इतने में निखर जाना था।

सैंकड़ों बार 'नमन' ऐसे जवानों को दूँ,
देश-हित लड़ के जिन्हें फख्र से मर जाना था।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
21-02-19

Saturday, August 3, 2019

2122 1122 1122 22 बह्र के गीत

1 वो मेरी नींद मेरा चैन मुझे लौटा दो

2 ऐ सनम जिसने तुझे चाँद सी सूरत दी है

3 तेरी ज़ुल्फ़ों से जुदाई तो नहीं माँगी थी

4 जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते हैं लोग

5 कौन आया कि निगाहों में चमक जाग उठी

6 कोई फरियाद तेरे दिल में छुपी हो जैसे

ग़ज़ल (प्यार फिर झूठा जताने आये)

बह्र:- 2122  1122  22/112

प्यार फिर झूठा जताने आये,
साथ ले सौ वे बहाने आये।

बार बार_उन से मैं मिल रोई हूँ,
सोच क्या फिर से रुलाने आये।

दुनिया मतलब से ही चलती, वरना
कौन अब किसको मनाने आये।

राख ये जिस्म तो पहले से ही,
क्या बचा जो वे जलाने आये।

फिर नये वादों की झड़ लेकर वो,
आँसु घड़ियाली बहाने आये।

और अब कितना है ठगना बाकी,
जो वही मुँह ले रिझाने आये।

'बासु' नेताजी से पूछे जनता,
कौन सा भेष दिखाने आये।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-12-2018

ग़ज़ल (उनके हुस्न का गज़ब जलाल है)

बह्र:- 212  1212  1212

उनके हुस्न का गज़ब जलाल है,
ये बनाने वाले का कमाल है।

चहरा मरमरी गढ़ा ये क्या खुदा,
काम ये बहुत ही बेमिशाल है।

जब से रूठ के गये हैं जाने मन,
हम सके नहीं मना मलाल है।

नूर आँख का हुआ ये दूर क्या,
पूछिये न क्या हमारा हाल है।

रात रात बात चाँद से करें,
दिन गुज़रता बीतता ज्यों साल है।

इस अँधेरी शब की होगी क्या सहर,
दिल में अब तो एक ही सवाल है।

अब 'नमन' की हर ग़ज़ल के दर्द में,
उनका ही रहे पिन्हा खयाल है।

जलाल- तेज, चमक; पिन्हा- छुपा हुआ

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-06-19

ग़ज़ल (वो जब भी मिली)

बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम (12112*2)

वो जब भी मिली, महकती मिली,
गुलाब सी वो, खिली सी मिली।

हो गगरी कोई, शराब की ज्यों,
वो वैसी मुझे, छलकती मिली।

दिखाई पड़ीं, वे जब भी मुझे,
उन_आँखों में बस, खुमारी मिली।

लगाने की दिल, ये कैसी सज़ा,
वफ़ा की जगह, जफ़ा ही मिली।

कभी वो मुझे, बताए ज़रा,
जो मुझ में उसे, ख़राबी मिली।

गिला भी किया, ज़रा भी अगर,
पुरानी मगर, सफाई मिली।

'नमन' तो चला, भलाई की राह,
उसे तो सदा, बुराई मिली।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
06-07-19

Saturday, July 20, 2019

मौक्तिका (नव वर्ष स्वागत)

1222*4 (विधाता छंद पर आधारित)
(पदांत का लोप, समांत 'आएगा')

नया जो वर्ष आएगा, करें मिल उसका हम स्वागत;
नये सपने नये अवसर, नया ये वर्ष लाएगा।
करें सम्मान इसका हम, नई आशा बसा मन में;
नई उम्मीद ले कर के, नया ये साल आएगा।

मिला के हाथ सब से ही, सभी को दें बधाई हम;
जहाँ हम बाँटते खुशियाँ, वहीं बाँटें सभी के ग़म।
करें संकल्प सब मिल के, उठाएँगे गिरें हैं जो;
तभी कुछ कर गुजरने का, नया इक जोश छाएगा।

दिलों में मैल है बाकी, पुराने साल का कुछ गर;
मिटाएँ उसको पहले हम, नये रिश्तों से सब जुड़ कर।
कसक मन की मिटा करके, दिखावे को परे रख के;
दिलों की गाँठ को खोलें, तभी नव वर्ष भाएगा।

गरीबी ओ अमीरी के, मिटाएँ भेद भावों को;
अशिक्षित ना रहे कोई, करें खुशहाल गाँवों को।
'नमन' नव वर्ष में जागें, ये' सपने सब सजा दिल में;
तभी ये देश खुशियों के, सुहाने गीत गाएगा।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
26-12-16

सावन विरह-गीत

सावन मनभावन तन हरषावन आया।
घायल कर पागल करता बादल छाया।।

क्यों मोर पपीहा मन में आग लगाये।
सोयी अभिलाषा तन की क्यों ये जगाये।
पी की यादों ने क्यों इतना मचलाया।
सावन -----

ये झूले भी मन को ना आज रिझाये।
ना बाग बगीचों की हरियाली भाये।
बेदर्द पिया ने कैसा प्यार जगाया।
सावन------

जब उमड़ घुमड़ के बैरी बादल कड़के।
तड़के जब बिजली आतुर जियरा धड़के।
याद करूँ ऐसे में पिय ने जब चिपटाया।
सावन-----

झूम झूम के सावन बीते क्या कहती।
यादों में उनकी ही मैं खोई रहती।
क्यों सखि ऐसे में निष्ठुर ने बिसराया।
सावन-----

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-07-16

मुक्तक (सामयिक समस्या)

सिमटा ही जाये देश का देहात शह्र में।
लोगों के खोते जा रहे जज़्बात शह्र में।
सरपंच गाँव का था जो आ शह्र में बसा।
खो बैठा पर वो सारी ही औक़ात शह्र में।।

221  2121  1221  212
*********

खड़ी समस्या कर के कुछ तो, पैदा हुए रुलाने को,
इनको रो रो बाकी सारे, हैं कुहराम मचाने को,   
यदि मिलजुल हम एक एक कर, इनको निपटाये होते,
सुरसा जैसे मुँह फैला ये, आज न आतीं खाने को।

(ताटंक छंद आधारित)
***********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
19-06-19

मुक्तक (उद्देश्य,स्वार्थ)

बेवज़ह सी जिंदगी में कुछ वज़ह तो ढूंढ राही,
पृष्ठ जो कोरे हैं उन पर लक्ष्य की फैला तु स्याही,
सामने उद्देश्य जब हों जीने की मिलती वज़ह तब,
चाहतें मक़सद बनें गर हो मुरादें पूर्ण चाही।

(2122*4)
**********

वैशाखियों पे जिंदगी को ढ़ो रहे माँ बाप अब,
वे एक दूजे का सहारा बन सहे संताप सब,
सन्तान इतनी है कृतघ्नी घोर स्वारथ में पगी,
माँ बाप चाहे मौत निश दिन अरु मिटे भव-ताप कब।

(हरिगीतिका  (2212*4)
*********

ऐसा है कौन आज फरिश्ता कहें जिसे,
कोई बता दे एक मसीहा कहें जिसे,
देखें जिधर भी आज है मतलब का दौर बस,
इससे बचा न एक भी अच्छा कहें जिसे।

(221 2121 1221 212)
***********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-03-18

मुक्तक (राजनीति)

हम जैसों के अच्छे दिन तो, आ न सकें कुछ ने ठाना,
पास हमारे फटक न सकते, बुरे दिवस कुछ ने माना,
ये झुनझुना मगर अच्छा है, अच्छे दिन के ख्वाबों का,
मात्र खिलौना कुछ ने इसको, जी बहलाने का जाना

(ताटंक छंद आधारित)
*********

प्रथम विरोधी को शह दे कर, दिल के घाव दुखाते हैं,
फिर उन रिसते घावों पर वे, मलहम खूब लगाते हैं,
'फूट डालके राज करो' का, ये सिद्धांत पुराना है,
बचके रहना ऐसों से जो, अपना बन दिखलाते हैं।

(ताटंक छंद आधारित)
**********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
11-11-18

मुक्तक (ढोंगी बाबाओं पर व्यंग)

काम क्रोध के भरे पिटारे, कलियुग के ये बाबा,
बेच गये खा मन्दिर मस्ज़िद, काशी हो या काबा,
चकाचौंध इनकी झूठी है, बचके रहना इनसे,
भोले भक्तों को ठगने का, सारा शोर शराबा।

सार छंद आधारित
*********

लिप्त रहो जग के कर्मों में, ये कैसा सन्यास बता,
भगवा धारण करने से नहिं, आत्म-शुद्धि का चले पता,
राजनीति आश्रम से करते, चंदे का व्यापार चले,
मन की तृप्त न हुई कामना, त्यागी से क्यों रहे जता।

लावणी छंद आधारित
**********
(राम रहीम पर व्यंग)

'अड्डा झूठा कोठा' खोला, ढोंगी काम-कमीन,
'शैतानों का दूत' भूत सा, कुत्सित कीट मलीन,
जग आगे बेटी जो कन्या, राखै बना रखैल,
कारागृह में भेजें इसको, संपद सारी छीन।

सरसी छंद आधारित
*********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-05-19

मुक्तक (यमक युक्त)

सितम यूँ खूब ढ़ा लो।
या फिर तुम मार डालो।
मगर मुझ से जरा तुम।
मुहब्बत तो बढ़ालो।।
***

दुआ रब की तो पा लो।
बसर अजमेर चालो।
तमन्ना औलिया की।
जरा मन में तो पालो।।
***

अरी ओ सुन जमालो,
मुझे तुम आजमा लो,
ठिकाना अब तेरा तू,
मेरे दिल पे जमा लो।
***

ये ऊँचे ख्वाब ना लो।
जमीं पे पाँ टिका लो।
अरे छोड़ो भी ये जिद।
मुझे अपना बना लो।।
***

खरा सौदा पटा लो।
दया मन में बसा लो।
गरीबों की दुआ से।
सभी संताप टालो।।
***

तराने आज गा लो।
सभी को तुम रिझा लो।
जो सोयें हैं उन्हें भी।
खुशी से तुम जगा लो।।
***

1222 122
(काफ़िया=आ; रदीफ़=लो)
**********

सड़न से नाक फटती, हुई सब जाम नाली;
यहाँ रहना है दूभर, सजन अब चल मनाली;
किसी दूजी जगह का, कभी भी नाम ना ली;
खफ़ा होना वहाँ ना, यहाँ तो मैं मना ली।

(1222  122)*2
**********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
10-10-17

Friday, July 19, 2019

दोहा गीतिका (भूख)

काफ़िया = ई; रदीफ़ = भूख

दुनिया में सबसे बड़ी, है रोटी की भूख।
पाप कराये घोरतम, जब बिलखाती भूख।।

आँतड़ियाँ जब ऐंठती, जलने लगता पेट।
नहीं चैन मन को पड़े, समझो जकड़ी भूख।।

मान, प्रतिष्ठा, ओहदा, कभी न दें सन्तोष।
ज्यों ज्यों इनकी वृद्धि हो, त्यों त्यों बढ़ती भूख।।

कमला तो चंचल बड़ी, कहीं न ये टिक पाय।
प्राणी चाहे थाम रख, धन की ऐसी भूख।।

भला बूरा दिखता नहीं, चढ़े काम का जोर।
पशुवत् मानव को करे, ये जिस्मानी भूख।।

राजनीति के पैंतरे, नेताओं की चाल।
कुर्सी की इस देश में, सबसे भारी भूख।।

'नमन' भूख पर ही टिका, लोगों का व्यवहार।
जग की है फ़ितरत यही, सब पर हाबी भूख।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
08-12-2017

कुर्सी की महिमा (कुंडलियाँ)

महिमा कुर्सी की बड़ी, इससे बचा न कोय।
राजा चाहे रंक हो, कोउ न चाहे खोय।
कोउ न चाहे खोय, वृद्ध या फिर हो बालक।
समझे इस पर बैठ, सभी का खुद को पालक।
कहे 'बासु' कविराय, बड़ी इसकी है गरिमा।
उन्नति की सौपान, करे मण्डित ये महिमा।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
22-12-2018

सूर घनाक्षरी

8,8,8,6

मिलते विषम दोय, सम-कल तब होय,
सम ही कवित्त को तो, देत बहाव है।

आदि न जगन रखें, लय लगातार लखें,
अंत्य अनुप्रास से ही, या का लुभाव है।

शब्द रखें भाव भरे, लय ऐसी मन हरे,
भरें अलंकार जा का, खूब प्रभाव है।

गाके देखें बार बार, अटकें न मझधार,
रचिए कवित्त जा से, भाव रिसाव है।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
8-4-17

'छकलियाँ' (दर्द)

विपद
है विकट
हाथ पर हाथ
रख, देखें बाट;
कोई बचाएगा,
या फिर भाग जाएंगे।
**

न शांति
बुरी है,
न सहन शक्ति,
हो अत्याचार,,
शांति रख रख सहना?
अथवा पलायन स्वीकार!
**

जुल्म,,,
है खौफ,
सब चुपचाप,
अपनों का न साथ,
शासन को क्या पड़ी?
वोटों की पके खिचड़ी।
**
(मेरठ में हिंदू पलायन पर)

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
29-06-19

"छकलियाँ विधान"

मेरे द्वारा प्रतिपादित यह "छकलियाँ" हिंदी साहित्य में काव्य की एक नवीन विधा है। यह हाइकु, वर्ण पिरामिड जैसी लघु संरचना है। जापानी में हाइकु, ताँका, सेदोका इत्यादि और अंग्रेजी में हाइकु, ईथरी आदि लघु कविताएं सिलेबल की गिनती पर आधरित हैं और बहुत प्रचलित हैं। ये कविताएं अपने लघु विन्यास में भी गहनतम भावों का समावेश कर सकती हैं। हिंदी साहित्य में भी हाइकु, ताँका, सेदोका, चौका, पिरामिड आदि विधाएँ बहुत प्रचलित हो गई हैं। पर हिंदी में ये विधाएँ जापानी, अंग्रेजी की तरह सिलेबल की गणना पर आधारित न होकर अक्षरों की गणना पर आधारित हैं। इसलिए इन का कलेवर उतना विस्तृत नहीं है। उन भाषाओं में तो एक एक सिलेबल में 4, 5 अक्षरों तक का होना सामान्य बात है।

मेरे द्वारा निष्पादित यह 'छकलियाँ' कुल 6 पंक्तियों की संरचना है जिसमें 6 पंक्तियों में क्रमशः एक से लेकर छह दीर्घ वर्ण होते हैं। यानि प्रथम पंक्ति में एक दीर्घ वर्ण, दूसरी में दो और अंत की छठी पंक्ति में छह दीर्घ वर्ण होते हैं। इस तरह की संरचना वर्ण पिरामिड, हाइकु इत्यदि के रूप में हिंदी में पहले से प्रचलित है पर मेरी यह नवीन विधा उन सब से इस अर्थ में भिन्न है कि प्रचलित विधाओं में अक्षरों की गिनती होती है जबकि इस नवीन विधा में दीर्घ वर्ण की गिनती होती है। मैंने इसका बहुत ही सहज सा स्मृति पटल पर बस जाने वाला नामकरण 'छकलियाँ' के रूप में किया है। इसमें छह पंक्तियाँ एक लड़ी सी पिरोई हुई है और यही इसके नामकरण की सार्थकता है।

हिंदी छंद शास्त्र में मात्राओं की गणना लघु और गुरु वर्ण के आधार पर होती है। लघु वर्ण के उच्चारण में जितना समय लगता है, गुरु वर्ण के उच्चारण में उसका दुगुना लगता है। लघु का मात्रा भार 1 है तथा गुरु का 2।

लघु वर्ण:- स्वतंत्र अक्षर जैसे क,म,ह आदि या संयुक्त वर्ण जैसे स्व, क्य, प्र आदि जब अ, इ, उ, ऋ और अँ से युक्त हों। उदाहरण- क, चि, तु, कृ, हँ, क्ति आदि।

गुरु वर्ण:- स्वतंत्र या संयुक्त अक्षर जब आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः से युक्त हों। उदाहरण- का,  टी, फू, ये, जै, मो, रौ, दं, पः, प्रा आदि। इसके अतिरिक्त लघु वर्ण के पश्चात यदि संयुक्त वर्ण हो तो उसका भार उस लघु वर्ण पर आ जाता है और वह लघु वर्ण गुरु गिना जाता है। जैसे- अश्व, शुभ्र, प्रयुक्त, पवित्र में अ, शु, यु, वि गुरु वर्ण हैं। परन्तु यदि यह संयुक्त वर्ण ह के साथ है तो उच्चारण के अनुसार कुछ अपवाद भी हैं, जैसे- कन्हैया, तुम्हारा, मल्हार आदि में क, तु, म लघु ही रहते हैं।

दीर्घ वर्ण:- साधारणतया गुरु वर्ण को ही दीर्घ वर्ण कहा जाता है परंतु यहाँ इस दीर्घ वर्ण की परिभाषा थोड़ी भिन्न है। मैंने अपनी नव सृजित
'छकलियाँ' में इसी दीर्घ वर्ण की चर्चा की है। अतः इसे ध्यान से समझने की आवश्यकता है।

1- समस्त ऊपर बताये गये गुरु वर्ण दीर्घ गिने जाते हैं और लघु वर्ण आधा दीर्घ गिना जाता है।
2- शब्द में यदि दो लघु एक साथ रहते हों तो वे दो लघु एक दीर्घ गिने जाते हैं। जैसे- दो अक्षरों के शब्द- तुम, हम, गिरि आदि में दीर्घ भार एक गिना जाता है। दो से अधिक अक्षरों के शब्द में एक साथ आये दो लघु वर्ण। जैसे- मानव, भीषण, समता में नव,षण और सम एक दीर्घ वर्ण गिने जायेंगे। तीन अक्षरों के शब्द जिसमें तीनों अक्षर लघु हों तो अंतिम दो लघु मिल कर दीर्घ गिने जाते हैं और शब्द का प्रथम लघु आधा दीर्घ गिना जाता है। जैसे- कमल, अडिग, मधुर आदि 1.5 दीर्घ वर्ण गिने जाते हैं। हलचल, मधुकर आदि 2 दीर्घ हो गये। घबराहट में 3 दीर्घ गिने जाते हैं- घब, रा और हट। समन्वय में स= आधा, म= दीर्घ (न्व संयुक्त वर्ण), न्वय= दीर्घ कुल 2.5 दीर्घ।  हिंदी में दो लघु को दीर्घ मानने की परंपरा नहीं है पर उर्दू में यह शाश्वत दीर्घ माना जाता है।
इस नई विधा 'छकलियाँ' में कुछ विशेष छूट हैं जिन्हें ध्यान से समझने की आवश्यकता है।
दीर्घ गणना में विशेष छूट:-
(1) किसी शब्द के अंत में यदि गुरु और लघु वर्ण हों तो लघु वर्ण गणना से मुक्त है। उसे आधा भी नहीं गिना जाता। इसे ध्यान पूर्वक देखें। जैसे- राम, कृष्ण, भक्ति, भव्य आदि में केवल एक दीर्घ वर्ण गिना जायेगा। घनश्याम में घन का एक तथा श्याम का एक मिल कुल दो दीर्घ हुये। इस विशेष छूट के अंतर्गत महान, विचार, भविष्य जैसे शब्द 1.5 दीर्घ गिने जाते हैं।
(2) शब्द के मध्य में यदि दो गुरु वर्ण के मध्य में एक लघु हो तो उसे नहीं गिना जाता। जैसे- मेमना, ढोकला, देखना, छोकरी का दीर्घ भार केवल दो गिना जाता है। इन शब्दों में क्रमशः म, क, ख, क वर्ण नहीं गिने जाते। 'मसोसना' का दीर्घ भार 2.5 गिना जाता है क्योंकि दो गुरु के मध्य का स गणना से मुक्त है।
(3) शब्दान्त गुरु लघु में लघु वर्ण को न गिनने की छूट सामासिक शब्दों में भी प्रभावी है। विग्रह के पश्चात बचे मूल शब्द में यह छूट लागू है। जैसे- मध्यप्रदेश का दीर्घ भार 2.5 गिना जाएगा न कि 3। मध्य=1 और प्रदेश=1.5 जबकि शब्द के मध्य में ध्य प्र दो लघु एक साथ है। ऐसे ही रामकृपा= 2.5, सोचविचार= 2.5 जैसे शब्दों को समझा जा सकता है।

'छकलियाँ' की पंक्ति में आधे दीर्घ की छूट:- किसी पंक्ति का यदि दीर्घ वर्ण भार 1.5, 2.5 आदि हैं तो  आधा दीर्घ नहीं गिना जाता। इस छूट के अंतर्गत प्रथम पंक्ति में विचार, महान जैसे शब्द आ सकते हैं जिनका भार 1.5 है।

पंक्तियों की स्वतंत्रता:- इस विधा में भी हाइकु, ताँका, वर्ण पिरामिड की तरह पंक्तियों की स्वतंत्रता रखना अत्यन्त आवश्यक है। हर पंक्ति अपने आप में स्वतंत्र होनी चाहिये। एक ही वाक्य को तोड़कर पंक्तियाँ न बना दें। यह केवल 21 दीर्घ वर्णों की संरचना है और उसी में गागर में सागर भरना होता है अतः चमत्कारिक बात कहें।
पंक्तियों में यथासंभव तुकांतता रखें जिससे रचना में कविता दिखाई पड़े न कि गद्यात्मक कोई बात।

मैं 'छकलियाँ' की अपनी प्रथम रचना 'शारदा वंदना' के माध्यम से इसे और स्पष्ट करता हूँ।

मात (1 दीर्घ, त गणना मुक्त)
शारदा (2 दीर्घ, र गणना मुक्त)
हंसवाहिनी, (3 दीर्घ, स, हि गणना मुक्त)
वीणा वादिनी, (4 दीर्घ, दि गणना मुक्त)
अज्ञान घिरा हूँ मैं (5.5 दीर्घ, घिरा - 1.5 दीर्घ)
ज्ञान दो विद्या दायिनी। (6 दीर्घ, यि गणना मुक्त)

(5 वीं पंक्ति में अज्ञान का दीर्घ भार 2 है क्योंकि न 
गणना मुक्त है। कुल योग 2+1.5+1+1 = 5.5 जो 5 के लिए मान्य है। रचना में कुल 30 वर्ण।)

एक और रचना देखें:-

प्रीत (1 दीर्घ)
यही रीत, (2.5 दीर्घ)
जीत ले मीत, (3 दीर्घ)
प्रियतम के गीत, (4 दीर्घ, प्रियतम=2)
प्रणय सूत्र से प्रणीत (5 दीर्घ)
गगन धरा लेते जीत। (6 दीर्घ)

(रचना में तुकांतता देखें। प्रीत, मीत, गीत आदि शब्द का दीर्घ भार 1 है क्योंकि त गणना मुक्त है।
5 वीं पंक्ति में प्रणय=1.5, सूत्र=1, प्रणीत=1.5।
6 ठी पंक्ति में गगन=1.5, धरा=1.5। रचना में कुल 36 वर्ण। )

आप स्वयं देखें कि दीर्घ वर्ण की अवधारणा, शब्दान्त छूट तथा पंक्ति छूट आपके समक्ष सृजन के नव आयाम खोल रही है। ये सारे विचार जापानी और इंगलिश में प्रचलित सिलेबल गणना जितना विस्तृत कलेवर तो नहीं दे रहे पर हिंदी इतनी अधिक सक्षम है कि इतनी छूट भी सृजकों की कल्पना को नवीन ऊँचाइयाँ अवश्य प्रदान करेंगी।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-06-19

Tuesday, July 16, 2019

मौक्तिक दाम छंद "विनायक वंदन"

गजानन विघ्न करो सब दूर।
करो तुम आस सदा मम पूर।।
नवा कर माथ करूँ नित जाप।
कृपा कर के हर लो भव-ताप।।

प्रियंकर रूप सजे गज-भाल।
छटा अति मोहक तुण्ड विशाल।।
गले उपवीत रखो नित धार।
भुजा अति पावन सोहत चार।।

धरें कर में शुभ अंकुश, पाश।
करें उनसे रिपु, दैत्य विनाश।।
बिराजत हैं कमलासन नाथ।
रखें सर पे शुभदायक हाथ।।

दयामय विघ्न विनाशक आप।
हरो प्रभु जन्मन के सब पाप।।
बसो हिय पूर्ण करो सब काज।
रखो प्रभु भक्तन की पत आज।।
=============
विधान छंद:-

पयोधर चार मिलें क्रमवार।
भुजा तुक में कुल पाद ह चार।।
रचें सब छंद महा अभिराम।
कहावत है यह मौक्तिक दाम।।

पयोधर = जगन ।ऽ। के लिए प्रयुक्त होता है।
भुजा= दो का संख्यावाचक शब्द
121  121  121 121 = 12वर्ण

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
21-01-18

मोटनक छन्द "भारत की सेना"

सेना अरि की हमला करती।
हो व्याकुल माँ सिसकी भरती।।
छाते जब बादल संकट के।
आगे सब आवत जीवट के।।

माँ को निज शीश नवा कर के।
माथे रज भारत की धर के।।
टीका तब मस्तक पे सजता।
डंका रिपु मारण का बजता।।

सेना करती जब कूच यहाँ।
छाती अरि की धड़कात वहाँ।।
डोले तब दिग्गज और धरा।
काँपे नभ ज्यों घट नीर भरा।।

ये देख छटा रस वीर जगे।
सारी यह भू रणक्षेत्र लगे।।
गावें महिमा सब ही जिनकी।
माथे पद-धूलि धरूँ उनकी।।
=================
लक्षण छंद:-

"ताजाजलगा" सब वर्ण शुभं।
राचें मधु छंदस 'मोटनकं'।।

"ताजाजलगा"= तगण जगण जगण लघु गुरु।
221 121 121 12 = 11 वर्ण
चार चरण, दो दो समतुकांत।
******************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
16-03-2017

मलयज छंद "प्रभु-गुण"

सुन मन-मधुकर।
मत हिय मद भर।।
करत कलुष डर।
हरि गुण उर धर।।

सरस अमिय सम।
प्रभु गुण हरदम।।
मन हरि मँह रम।
हर सब भव तम।।

मन बहुत विकल।
हलचल प्रतिपल।।
पड़त न कछु कल।
हरि-दरशन हल।।

प्रभु-शरण लखत।
यह सर अब नत।।
तव चरण पड़त।
रख नटवर पत।।
=============
लक्षण छंद:-

"ननलल" लघु सब।
'मलयज' रच तब।

 "ननलल" = नगण नगण लघु लघु।
8 लघु, 4चरण समतुकांत
******************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
19-01-17

मनोज्ञा छंद "होली"

भर सनेह रोली।
बहुत आँख रो ली।।
सजन आज होली।
व्यथित खूब हो ली।।

मधुर फाग आया।
पर न अल्प भाया।।
कछु न रंग खेलूँ।
विरह पीड़ झेलूँ।।

यह बसंत न्यारी।
हरित आभ प्यारी।।
प्रकृति भी सुहायी।
नव उमंग छायी।।

पर मुझे न चैना।
कटत ये न रैना।।
सजन याद आये।
न कुछ और भाये।।

विकट ये बिमारी।
मन अधीर भारी।।
सुख समस्त छीना।
अति कठोर जीना।।

अब तुरंत आ के।
हृदय से लगा के।।
सुध पिया तु लेवो।
न दुख और देवो।।
=============
लक्षण छंद:-

"नरगु" वर्ण सप्ता।
रचत है 'मनोज्ञा'।।

"नरगु" = नगण रगण गुरु
111 212 + गुरु = 7-वर्ण
चार चरण, दो दो समतुकांत।
*****************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
11-03-17

Thursday, July 11, 2019

मत्त सवैया मुक्तकमाला (2019 चुनाव)

हर दल जो टुकड़ा टुकड़ा था, इस बार चुनावों ने छाँटा;
बाहर निकाल उसको फेंका, ज्यों चुभा हुआ हो वो काँटा;
जो अपनी अपनी डफली पर, बस राग स्वार्थ का गाते थे;
उस भ्रष्ट तंत्र के गालों पर, जनता ने मारा कस चाँटा।

इस बार विरोधी हर दल ने, ऐसा भारी झेला घाटा;
चित चारों खाने सभी हुए, हर ओर गया छा सन्नाटा।
जन-तंत्र-यज्ञ की वेदी में, उन सबकी आहुति आज लगी;
वे राजनीति को हाथ हिला, जल्दी करने वाले टा टा।

भारत में नव-उत्साह जगा, रिपु के घर में क्रंदन होगा;
बन विश्व-शक्ति उभरेंगे हम, जग भर में अब वंदन होगा;
हे मोदी! तुम कर्मठ नरवर, गांधी की पुण्य धरा के हो;
अब ओजपूर्ण नेतृत्व तले, भारत का अभिनंदन होगा।

तुम राष्ट्र-प्रेरणा के नायक, तुम एक सूत्र के दायक हो;
जो सकल विश्व को बेध सके, वैसे अमोघ तुम सायक हो;
भारत भू पर अवतरित हुये, ये भाग्य हमारा आज प्रबल;
तुम धीर वीर तुम शक्ति-पुंज, तुम जन जन के अधिनायक हो।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-05-19

राधेश्यामी छंद "विधान"

यह छंद मत्त सवैया के नाम से भी प्रसिद्ध है। पंडित राधेश्याम ने राधेश्यामी रामायण 32 मात्रिक चरण में रची। छंद में कुल चार चरण होते हैं तथा क्रमागत दो-दो चरण तुकान्त होते हैं। प्रति चरण पदपादाकुलक का दो गुना होता है l तब से यह छंद राधेश्यामी छंद के नाम से प्रसिद्धि पा गया।
पदपादाकुलक छंद के एक चरण में 16 मात्रा होती हैं , आदि में द्विकल (2 या 11) अनिवार्य होता है किन्तु त्रिकल (21 या 12 या 111) वर्जित होता है।
राधेश्यामी छंद का मात्रा बाँट इस प्रकार तय होता है:
2 + 12 + 2 = 16 मात्रा (चरण का प्रथम पद)
2 + 12 + 2 = 16 मात्रा (चरण का द्वितीय पद)
द्विकल के दोनों रूप (2 या 1 1) मान्य है। तथा 12 मात्रा में तीन चौकल, अठकल और चौकल या चौकल और अठकल हो सकते हैं। चौकल और अठकल के नियम निम्न प्रकार हैं जिनका पालन अत्यंत आवश्यक है।
चौकल:- (1) प्रथम मात्रा पर शब्द का समाप्त होना वर्जित है। 'करो न' सही है जबकि 'न करो' गलत है।
(2) चौकल में पूरित जगण जैसे सरोज, महीप, विचार जैसे शब्द वर्जित हैं।

अठकल:- (1) प्रथम और पंचम मात्रा पर शब्द समाप्त होना वर्जित है। 'राम कृपा हो' सही है जबकि 'हो राम कृपा' गलत है क्योंकि राम शब्द पंचम मात्रा पर समाप्त हो रहा है। यह ज्ञातव्य है
हो कि 'हो राम कृपा' में विषम के बाद विषम शब्द पड़ रहा है फिर भी लय बाधित है।
(2) 1-4 और 5-8 मात्रा पर पूरित जगण शब्द नहीं आ सकता।
(3) अठकल का अंत गुरु या दो लघु से होना आवश्यक है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

राधिका छंद "संकीर्ण मानसिकता"

अपने में ही बस मग्न, लोग क्यों सब हैं।
जीवन के सारे मूल्य, क्षीण क्यों अब हैं।।
हो दिशाहीन सब लोग, भटकते क्यों हैं।
दूजों का हर अधिकार, झटकते क्यों हैं।।

आडंबर का सब ओर, जोर है भारी।
दिखते तो स्थिर-मन किंतु, बहुत दुखियारी।।
ऊपर से चमके खूब, हृदय है काला।
ये कैसा भीषण रोग, सभी ने पाला।।

तन पर कपड़े रख स्वच्छ, शान झूठी में।
करना चाहें अब लोग, जगत मुट्ठी में।।
अब सिमट गये सब स्नेह, स्वार्थ अति छाया।
जीवन का बस उद्देश्य, लोभ, मद, माया।।

मानव खोया पहचान, यंत्रवत बन कर।
रिश्तों का भूला सार, स्वार्थ में सन कर।।
खो रहे योग्य-जन सकल, अपाहिज में मिल।
छिपती जाये लाचार, काग में कोकिल।।

नेता अभिनय में दक्ष, लोभ के मारे।
झूठे भाषण से देश, लूटते सारे।।
जनता भी केवल उन्हें, बिठाये सर पे।
जो ले लुभावने कौल, धमकता दर पे।।

झूठे वादों की बाढ़, चुनावों में अब।
बहुमत कैसे भी मिले, लखे नेता सब।।
हित आज देश के गौण, स्वार्थ सर्वोपर।
बिक पत्रकारिता गयी, लोभ में खो कर।।

है राजनीति सर्वत्र, खोखले नारे।
निज जाति, संगठन, धर्म, लगे बस प्यारे।।
ओछे विचार की बाढ़, भयंकर आयी।
कैसे जग-गुरु को आज, सोच ये भायी।।

मन से सारी संकीर्ण, सोच हम त्यागें।
रख कर नूतन उल्लास, सभी हम जागें।।
हम तुच्छ स्वार्थ से आज, तोड़ लें नाता।
धर उच्च भाव हम बनें, हृदय से दाता।।
***************
राधिका छंद *विधान*

इसके प्रत्येक चरण में 22 मात्रा होती हैं, 13,9 पर यति होती है, यति से पहले और बाद में त्रिकल आता है, कुल चार चरण होते हैं , क्रमागत दो-दो चरण तुकांत होते हैं l इसका मात्रा बाँट निम्न प्रकार से है।

2 6 2 3 = 13 मात्रा, प्रथम यति। द्विकल के दोनों रूप (2, 1 1) और त्रिकल के तीनों रूप (2 1, 1 2, 1 1 1) मान्य हैं। छक्कल के नियम लगेंगे जैसे प्रथम और पंचम मात्रा पर शब्द का समाप्त नहीं होना तथा प्रथम चार मात्रा में पूरित जगण (विचार आदि) नहीं हो सकते।

3 2 2 2 = 9 मात्रा, द्वितीय यति। द्विकल त्रिकल के सभी रूप मान्य।
===============
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
27-12-2018


जब मन में हो हनुमान, राम तो अपने।
सब बन जाते हैं काम, पूर्ण हो सपने।।
मन में रख के विश्वास, करो सब पूजा।
जो हर ले सारे कष्ट, नहीं है दूजा।।
*******

बेजान साज पर थिरक, रहीं क्यों अंगुल।
ये रात मिलन की रही, बीत हो व्याकुल।
अब साज हृदय का मचल, रहा बजने को।
सब तरस रहें हैं अंग, सजन सजने को।।

मुक्तामणि छंद "गणेश वंदना"

मात पिता शिव पार्वती, कार्तिकेय गुरु भ्राता।
पुत्र रत्न शुभ लाभ हैं, वैभव सकल प्रदाता।।
रिद्धि सिद्धि के नाथ ये, गज-कर से मुख सोहे।
काया बड़ी विशाल जो, भक्त जनों को मोहे।।

भाद्र शुक्ल की चौथ को, गणपति पूजे जाते।
आशु बुद्धि संपन्न ये, मोदक प्रिय कहलाते।।
अधिपति हैं जल-तत्त्व के, पीत वस्त्र के धारी।
रक्त-पुष्प से सोहते, भव-भय सकल विदारी।।

सतयुग वाहन सिंह का, अरु मयूर है त्रेता।
द्वापर मूषक अश्व कलि, हो सवार गण-नेता।।
रुचिकर मोदक लड्डुअन, शमी-पत्र अरु दूर्वा।
हस्त पाश अंकुश धरे, शोभा बड़ी अपूर्वा।।

विद्यारंभ विवाह हो, गृह-प्रवेश उद्घाटन।
नवल कार्य आरंभ हो, या फिर हो तीर्थाटन।।
पूजा प्रथम गणेश की, संकट सारे टारे।
काज सुमिर इनको करो, विघ्न न आए द्वारे।।

भालचन्द्र लम्बोदरा, धूम्रकेतु गजकर्णक।
एकदंत गज-मुख कपिल, गणपति विकट विनायक।।
विघ्न-नाश अरु सुमुख ये, जपे नाम जो द्वादश।
रिद्धि सिद्धि शुभ लाभ से, पाये नर मंगल यश।।

ग्रन्थ महाभारत लिखे, व्यास सहायक बन कर।
वरद हस्त ही नित रहे, अपने प्रिय भक्तन पर।।
मात पिता की भक्ति में, सर्वश्रेष्ठ गण-राजा।
'बासुदेव' विनती करे, सफल करो सब काजा।।
===========
विधान:-

दोहे का लघु अंत जब, सजता गुरु हो कर के।
'मुक्तामणि' प्रगटे तभी, भावों माँहि उभर के।।

मुक्तामणि चार चरणों का अर्ध सम मात्रिक छंद है जिसके विषम पद 13 मात्रा के ठीक दोहे वाले विधान के होते हैं तथा सम पद 12 मात्रा के होते हैं। इस प्रकार प्रत्येक चरण कुल 25 मात्रा का 13 और 12  मात्रा के दो पदों से बना होता है। दो दो चरण समतुकांत होते हैं। मात्रा बाँट:
विषम पद- 8+3 (ताल)+2 कुल 13 मात्रा
सम पद- 8+2+2 कुल 12 मात्रा।
अठकल की जगह दो चौकल हो सकते हैं। द्विकल के दोनों रूप (1 1 या 2) मान्य है।
*******************
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
05-09-2016

मरहठा छंद "कृष्ण लीलामृत"

धरती जब व्याकुल, हरि भी आकुल, लेते प्रभु अवतार।
कर कृपा भक्त पर, दुख जग के हर, दूर करे भू भार।।
द्वापर युग में जब, घोर असुर सब, देन लगे संताप।
हरि भक्त सेवकी, मात देवकी, सुत बन प्रगटे आप।।

यमुना जल तारन, कालिय कारन, जो विष से भरपूर।
कालिय शत फन पर, नाचे जम कर, किया नाग-मद चूर।।
दावानल भारी, गौ मझधारी, फँस कर व्याकुल घोर।
कर पान हुताशन, विपदा नाशन, कीन्हा माखनचोर।।

विधि माया कीन्हे, सब हर लीन्हे, गौ अरु ग्वालन-बाल।
बन गौ अरु बालक, खुद जग-पालक, मेटा ब्रज-जंजाल।।
ब्रह्मा इत देखे, उत भी पेखे, दोनों एक समान।
तुम प्रभु अवतारी, भव भय हारी, ब्रह्म गये सब जान।।

ब्रज विपदा हारण, सुरपति कारण, आये जब यदुराज।
गोवर्धन धारा, सुरपति हारा, ब्रज का साधा काज।
मथुरा जब आये, कुब्जा भाये, मुष्टिक चाणुर मार।
नृप कंस दुष्ट अति, मामा दुर्मति, वध कर, दी भू तार।।

पाण्डव के रक्षक, कौरव भक्षक, राजनीति मर्मज्ञ।
शिशुपाल हने जब, अग्र-पूज्य तब, राजसूय था यज्ञ।।
था युद्ध भयंकर, पार्थ शोक हर, दे गीता उपदेश।
कृष्णा-विपदा हर, चीर बढ़ा कर, बने भक्त-हृदयेश।।

ब्रज के तुम नायक, अति सुख दायक, सबका देकर साथ।
जब भीड़ पड़ी है, विपद हरी है, आगे आ तुम नाथ।।
हे कृष्ण मुरारी! जनता सारी, विपदा में है आज।
कर जोड़ सुमरते, विनती करते, रखियो हमरी लाज।
*************
मरहठा छंद विधान:-

यह प्रति चरण कुल 29 मात्रा का छंद है। इसमें यति विभाजन 10, 8,11 मात्रा का है।
मात्रा बाँट:-
प्रथम यति 2+8 =10 मात्रा
द्वितीय यति 8,
तृतीय यति 8+3 (ताल यानि 21) = 11 मात्रा
अठकल की जगह दो चौकल लिये जा सकते हैं। अठकल चौकल के सब नियम लगेंगे।
4 चरण सम तुकांत या दो दो चरण समतुकांत। अंत्यानुप्रास हो तो और अच्छा।
===========

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
31-10-2016

बरवै छंद "शिव स्तुति"

सदा सजे शीतल शशि, इनके माथ।
सुरसरिता सर सोहे, ऐसो नाथ।।

सुचिता से सेवत सब, है संसार।
हे शिव शंकर संकट, सब संहार।

आक धतूरा चढ़ते, घुटती भंग।
भूत गणों को हरदम, रखते संग।।

गले रखे लिपटा के, सदा भुजंग।
डमरू धारी बाबा, रहे मलंग।।

औघड़ दानी तुम हो, हर लो कष्ट।
दुख जीवन के सारे, कर दो नष्ट।।

करूँ समर्पित तुमको, सारे भाव।
दूर करो हे भोले, भव का दाव।।
==============
बरवै छंद विधान:-

यह बरवै दोहा भी कहलाता है। बरवै अर्द्धसम मात्रिक छन्द है। इसके प्रथम एवं तृतीय चरण में 12-12 मात्राएँ तथा द्वितीय एवं चतुर्थ चरण में 7-7 मात्राएँ हाती हैं। विषम चरण के अंत में गुरु या दो लघु होने चाहिए। सम चरणों के अन्त में ताल यानि 2 1 होना आवश्यक है। मात्रा बाँट विषम चरण का 8+4 और सम चरण का 4+3 है। अठकल की जगह दो चौकल हो सकते हैं। अठकल और चौकल के सभी नियम लगेंगे।
********************
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
21-08-2016

Saturday, July 6, 2019

212*4 बह्र के गीत

1) छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए
    ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए
2) कर चले हम फ़िदा जानो तन साथियों
3) बेखुदी में सनम उठ गए जो कदम
4) जिस गली में तेरा घर न हो बालमा
5) मेरे महबूब में क्या नहीं क्या नहीं   
6) दिल ने मज़बूर इतना ज़ियादा किया
7) ऐ वतन ऐ वतन तेरे सर की कसम
8) खुश रहे तू सदा ये दुआ है मेरी
9) हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी

गज़ल (याद आती हैं जब)

बह्र:- 212  212  212  212

याद आती हैं जब आपकी शोखियाँ,
और भी तब हसीं होती तन्हाइयाँ।

आपसे बढ़ गईं इतनी नज़दीकियाँ,
दिल के लगने लगीं पास अब दूरियाँ।

डालते गर न दरिया में कर नेकियाँ,
हारते हम न यूँ आपसे बाज़ियाँ।

गर न हासिल वफ़ा का सिला कुछ हुआ,
उनकी शायद रहीं कुछ हों मज़बूरियाँ।

मिलता हमको चराग-ए-मुहब्बत अगर,
शब सी काली ये आतीं न दुश्वारियाँ।

हुस्नवालों से दामन बचाना ए दिल,
मात दानिश को दें उनकी नादानियाँ।

आग मज़हब की जो भी लगाते 'नमन',
इसमें अपनी ही वे सेंकते रोटियाँ।

दानिश=अक्ल, बुद्धि

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
3-4-18

ग़ज़ल (गीत खुशियों के गाते)

बह्र:- 212*3 + 2

गीत खुशियों के गाते चलेंगे,
जख्म दिल के मिटाते चलेंगे।

रंग अपना जमाते चलेंगे,
रोतों को हम हँसाते चलेंगे।

जो मुहब्बत से महरूम तन्हा,
दिल में उनको बसाते चलेंगे।

झेले जेर-ओ-जबर अब तलक सब,
जग में सर अब उठाते चलेंगे।

सुनले अहल-ए-जहाँ कम नहीं हम,
सबसे आगे ही आते चलेंगे।

काम ऐसे करेंगे सभी मिल,
सबको दुनिया में भाते चलेंगे।

दोस्ती को 'नमन' करते हरदम,
नफ़रतों को भुलाते चलेंगे।

जेर-ओ-जबर=जबरदस्ती नीचे लाना, अस्त व्यस्तता
अहल-ए-जहाँ=दुनियाँ वालों

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
19-06-17

ग़ज़ल (राम सुमिरन बिना गत नहीं)

बह्र:- 212  212  212

राम सुमिरन बिना गत नहीं,
और चंचल ये मन रत नहीं।

व्यर्थ सब कुछ है संसार में,
नाम-जप की अगर लत नहीं।

है दिखावे का जप-तप वृथा,
भाव हैं यदि समुन्नत नहीं।

मन को थिर कर के भज राम को,
भक्ति उसकी जो अक्षत नहीं।

लाभ उसकी न चर्चा से कुछ,
बात जो शास्त्र-सम्मत नहीं।

नर वे पशुवत हैं, पर-पीड़ लख
भाव जिनके हों आहत नहीं।

नैन प्यासे 'नमन' मन विकल,
प्रभु-शरण बिन कहीं पत नहीं।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
8-04-18

ग़ज़ल (दरिया है बहुत गहरा)

बह्र:- (221  1222)*2

दरिया है बहुत गहरा, कश्ती भी पुरानी है,
हिम्मत की मगर दिल में, कम भी न रवानी है।

ज़ज़्बा हो जो बढ़ने का, कुछ भी न लगे मुश्किल,
कुछ करने की जीवन में, ये ही तो निशानी है।

दिल उनसे मिला जब से, बदली है फ़ज़ा तब से,
मदहोश नज़ारे हैं, हर शय ही सुहानी है।

बचपन के सुहाने दिन, रह रह के वे याद-आएं,
आँखों में हैं मंज़र सब, हर बात ज़ुबानी है।

औक़ात नहीं कुछ भी, पर आँख दिखाए वो
टकरायेगा हम से तो, मुँह की उसे खानी है।

सिरमौर बने जग का, भारत ये वतन प्यारा,
ये आस हमें पूरी, अब कर के दिखानी है।

जिस ओर 'नमन' देखे, मुफ़लिस ही भरें आहें,
अब सब को गरीबी ये, जड़ से ही मिटानी है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-06-19

Saturday, June 22, 2019

हाइकु (राजनीति)

सत्ता का यज्ञ
यजमान हैं विज्ञ
पुरोधा अज्ञ।
**
सत्ता-मिलिंद
पी स्वार्थी मकरंद
हुआ स्वच्छंद।
**
नेता हैं चोर
जनता करे शोर
तंत्र का जोर।
**
जनता ताके
बैठी बगलें झाँके
कुर्सी दे फाके
**
लोक सेवक
जनता का शोषक
स्वयं पोषक।
**
अंगुल पांच
सियासत का हाथ
सब समान।
**
गायों की रोटी
बन्दरों हाथ पड़ी
कुत्तों में बँटी।
****
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
19-06-19

सेदोका (किशान)

जापानी विधा (5-7-7-5-7-7)

किशान भाई
मौसम हरजाई
सरकार पराई।
अन्न उगाया
फसल की जगह
हाय रे! मौत उगी।
****

मिट्टी से लड़े
कृषक के फावड़े
तब फ़सल झड़े,
पर हाय रे
तभी मौसम अड़ा
भारी संकट पड़ा।
****

उगानेवाले
ग़म खा के जी रहे
खुद को मिटा रहे।
बेचनेवाले
बादाम पिस्ता खाते
हर  खुशी  मनाते।
****

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
3-09-16

सायली (चमकी बुखार)

चमकी
ऐसी भड़की
काल बन धमकी
मासूमों की
सिसकी।
*****

बिहार
बच्चे बीमार
सोयी पड़ी सरकार
करे हुँकार
बुखार।
*****

मुजफ्फरपुर
बुखार  निष्ठुर
आया बन महिषासुर
केवल चिंतातुर!
हस्तिनापुर।
*****

महाकाल
बुखार विकराल
बच्चों  पर  भूचाल
सरकारी अस्पताल
बदहाल।

*****
1-2-3-2-1 शब्द
*****

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-06-19

माहिया (कुड़िये)

कुड़िये कर कुड़माई,
बहना चाहे हैं,
प्यारी सी भौजाई।

धो आ मुख को पहले,
बीच तलैया में,
फिर जो मन में कहले।।

गोरी चल लुधियाना,
मौज मनाएँगे,
होटल में खा खाना।

नखरे भारी मेरे,
रे बिक जाएँगे,
कपड़े लत्ते तेरे।।

ले जाऊँ अमृतसर,
सैर कराऊँगा,
बग्गी में बैठा कर।

तुम तो छेड़ो कुड़ियाँ,
पंछी बिणजारा,
चलता बन अब मुँडियाँ।।

नखरे हँस सह लूँगा,
हाथ पकड़ देखो,
मैं आँख बिछा दूँगा।

दिलवाले तो लगते,
चल हट लाज नहीं,
पहले घर में कहते।।

**************
प्रथम और तृतीय पंक्ति तुकांत (222222)
द्वितीय पंक्ति अतुकांत (22222)
**************
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
14-12-16

रुद्र पिरामिड

आरोही अवरोही पिरामिड
(1-11 और 11-1)

हे
शिव
शंकर
जग के हो
तु रखवाले।
डमरू पे नाचे
हो कर मतवाले।
सर्प गले में लिपटे
प्यारा चन्दा जटा छिपाले।
भूत गणों के नाथ अनोखे
विष पी देवों की विपदा टाले।

तन  पर   बाघम्बर   भभूत
भोले की प्राणी महिमा गाले।
दूध  बेल पत्रों को  चढ़ा
पूजो आक  धतूरा ले।
ऐसे दानी बाबा को
पूजा से रिझाले।
'नमन' करो
चरणों में
माथे को
नवा
ले।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
12-4-18

ताँका (ईश्वर)

जापानी विधा (5-7-5-7-7)

जिसने दिये
कर दो समर्पण
उसे ही पाप,
बन जाओ उज्ज्वल
हो कर के निष्पाप।
**
पाप रहित
जो होता बन जाता
ईश स्वरूप,
फिर सब प्राणी में
देखे अपना रूप।
**
ईश्वर बैठा
अपने ही अंदर
पर मानव,
ढूंढे उसे बाहर
मंदिरों में जा कर।
**

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
21-06-19

चौका (पूर्वाग्रह)

 जापानी विधा चौका
5-7, 5-7, 5-7 -------- +7

पूर्वाग्रह क्या
अधकचरी सोच
तर्क-विहीन
कुंठाओं का आगार।
जो मन में है
वही शाश्वत सत्य
अन्य सकल
केवल निराधार।
नवीन सोच?
वैचारिक क्षुद्रता
परिवर्तन?
पथभ्रष्ट विचार।
पूर्वाग्रही तो...
स्वयंभू न्यायाधीश
थोपे जो न्याय
विरोध न स्वीकार।
पूर्वाग्रह दे
तानाशाही प्रवृत्ति,
दम्भ, पाखण्ड,
निर्लज्ज व्यवहार।
मानव-मन
पूर्वाग्रह ग्रसित
सदैव करे
स्वार्थ भरा व्यापार।
निर्मम अत्याचार।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
13-04-18

क्षणिका (आधुनिकता)

(1)

आधुनिकता का
है बोलबाला
सब कुछ होता जा रहा
छोटा और छोटा
केश और वेशभूषा
घर का अँगना
और मन का कोना।
**
क्षणिका (नई पीढ़ी)
(2)

निर्विकार शांत मुद्रा में
चक्की चला आटा पीसती
मेरी दादी जी का
तेल-चित्र
जो दादा जी ने
शायद अपनी जवानी में
बड़े शौक से
बनवाया था----
वो आज भी
घर की धरोहरों
में संजोया पड़ा है
नवीन पीढ़ी को
म्यूजियम में
खींचता हुआ।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
20-05-17

Sunday, June 16, 2019

पंक्तिका छंद "भारत पाक क्रिकेट मैच"

(2019 वर्ल्ड कप में भारत पाक के मैच पर)

हार पाक की हो मनाइये।
जीत के सभी गीत गाइये।।
खेल आप ऐसा दिखाइये।
धूल पाक को तो चटाइये।।

मार मार छक्के दिखाइये।
पाक के युँ छक्के छुड़ाइये।।
काव्य प्रेमियों को रिझाइये।
मंच को खुशी में डुबाइये।।

इंगलैंड से जीत आइये।
देश में महा मान पाइये।।
शान भारती की बढ़ाइये।
ये क्रिकेट ट्रॉफी दिलाइये।।
*****
शिल्प~
[रगण यगण जगण गुरु]
(212  122  121  2)
10वर्ण प्रति चरण,
4 चरण,2-2 चरण समतुकांत।
*****

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
16-06-19

Saturday, June 15, 2019

मनविश्राम छंद "माखन लीला"

माखन श्याम चुरा नित ही, कछु खावत कछु लिपटावै।
ग्वाल सखा सह धूम करे, यमुना तट गउन चरावै।।
फोड़त माखन की मटकी, सब गोरस नित बिखराये।
गोपिन भी लख हर्षित हैं, पर रोष बयन दिखलाये।।

मात यशोमत नित्य मथे, दधि की जब लबलब झारी।
मोहन आय तभी धमकै, अरु बाँह भरत महतारी।।
मात बिलोवत जाय रहे, तब कान्ह करत बरजोरी।
नन्द-तिया पुलकै मुलकै, सुत की लख नित नव त्योरी।।

माधव संग सखा सब ले, जब ग्वालिन गृह मँह धाये।
ऊधम खूब मचाय वहाँ, सब गोपिन हृदय लुभाये।।
पीठ चढ़े इक दूजन की, तब छींकन पर चढ़ जावै।
माखन लूटत भाजन से, दिखलाकर चख चख खावै।।

मोहन की छवि ये उर में, मन उज्ज्वल पर तन कारा।
रोज मचा हुड़दंग यही, हरता बृज-जन-मन सारा।।
गोपिन को ललचा कर के, मनमोहक छवि दिखलावै।
कृष्ण बसो उर में तुम आ, गुण 'बासु' नमन करि गावै।।
=====================
लक्षण छंद:-

"भाभभुभाभनुया" यति दें, दश रुद्र वरण अभिरामा।
छंद रचें कवि वृन्द सभी, मनभावन 'मनविशरामा'।।

"भाभभुभाभनुया" = भगण की 5 आवृत्ति फिर नगण यगण।

211  211  211  2,11  211  111  122
कुल 21 वर्ण, यति 10,11, चार चरण 2-2 समतुकांत
*****************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
14-01-2017

मकरन्द छंद "कन्हैया वंदना"

किशन कन्हैया, ब्रज रखवैया,
        भव-भय दुख हर, घट घट वासी।
ब्रज वनचारी, गउ हितकारी,
        अजर अमर अज, सत अविनासी।।
अतिसय मैला, अघ जब फैला,
         धरत कमलमुख, तब अवतारा।
यदुकुल माँही, तव परछाँही,
          पड़त जनम तुम, धरतत कारा।।

पय दधि पाना, मृदु मुसकाना,
         लख कर यशुमति, हरषित भारी।
कछु बिखराना, कछु लिपटाना,
         तब यह लगतत, द्युति अति प्यारी।।
मधुरिम शोभा, तन मन लोभा,
          निश दिन निरखत, ब्रज नर नारी।
सुख अति पाके, गुण सब गाके,
           बरणत यह छवि, जग मँह न्यारी।।

असुर सँहारे, बक अघ तारे,
            दनुज रहित महि, नटवर  कीन्ही।
सुर मुनि सारे, कर जयकारे,
            कहत विनय कर, सुध प्रभु लीन्ही।।
अनल दुखारी, वन जब जारी,
             प्रसरित कर मुख, तुम सब पी ली।
कर मुरली है, मन हर ली है,
              लखत सकल यह, छवि चटकीली।।

सुरपति क्रोधा, धर गिरि रोधा,
             विकट विपद हर, ब्रज भय टारा।
कर वध कंसा, गहत प्रशंसा,
             सकल जगत दुख, प्रभु तुम हारा।।
हरि गिरिधारी, शरण तिहारी,
             तुम बिन नहिं अब, यह मन मोहे।
छवि अति प्यारी, जन मन हारी,
             हृदय 'नमन' कवि, यह नित सोहे।।
===============
लक्षण छंद:-

"नयनयनाना, ननगग" पाना,
यति षट षट अठ, अरु षट वर्णा।
मधु 'मकरन्दा', ललित सुछंदा,
रचत सकल कवि, यह मृदु कर्णा।।

"नयनयनाना, ननगग" =  नगण यगण नगण यगण नगण नगण नगण नगण गुरु गुरु

(111  122,  111  122,  111  111 11,1 111  22)
26 वर्ण,4 चरण,यति 6,6,8,6,वर्णों पर
दो-दो या चारों चरण समतुकांत
******************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
02-10-2018

मंजुभाषिणी छंद "शहीद दिवस"

इस देश की भगत सिंह शान है।
सुखदेव राजगुरु आन बान है।।
हम आह आज बलिदान पे भरें।
उन वीर की चरण वन्दना करें।।

अति घोर कष्ट कटु जेल के सहे।
चढ़ फांस-तख्त पर भी हँसे रहे।।
निज प्राण देश-हित में जिन्हें दिये।
उनको लगा कर सदा रखें हिये।।

तिथि मार्च तेइस शहीद की मने।
उनके समान जन देश के बने।।
प्रण आज ये हृदय धार लें सभी।
नहिं देश का हनन गर्व हो कभी।।

हम पुष्प अर्पित समाधि पे करें।
इस देश की सब विपत्तियाँ हरें।।
यह भाव-अंजलि सही तभी हुये।
जब विश्व भी चरण देश के छुये।।

(23 मार्च शहीद दिवस पर श्रद्धांजलि।)
================
लक्षण छंद:-

"सजसाजगा" रचत 'मंजुभाषिणी'।
यह छंद है अमिय-धार वर्षिणी।।

"सजसाजगा" = सगण जगण सगण जगण गुरु

112 121 112 121+गुरु =13 वर्ण
चार चरण, दो दो समतुकांत।
*********************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-03-17

भृंग छंद "विरह विकल कामिनी"

सँभल सँभल चरण धरत, चलत जिमि मराल।
बरनउँ किस विध मधुरिम, रसमय मृदु चाल।।
दमकत यह तन-द्युति लख, थिर दृग रह जात।
तड़क तड़ित सम चमकत, बिच मधु बरसात।।

शशि-मुख छवि अति अनुपम, निरख बढ़त प्यास।
यह लख सुरगण-मन मँह, जगत मिलन आस।।
विरह विकल अति अब यह, कनक वरण नार।
दिन निशि कटत न समत न, तरुण-वयस भार।।

अँखियन थकि निरखत मग, इत उत हर ओर।
हलचल विकट हृदय मँह, उठत अब हिलोर।
पुनि पुनि यह कथन कहत, सुध बिसरत मोर।
लगत न जिय पिय बिन अब, बढ़त अगन जोर।।

मन हर कर छिपत रहत, कित वह मन-चोर।
दरसन बिन तड़पत दृग, कछु न चलत जोर।।
विरह डसन हृदय चुभत, मिलत न कछु मन्त्र।
जलत सकल तन रह रह, कछुक करहु तन्त्र।।
===================
लक्षण छंद:-

"ननुननुननु गल" पर यति, दश द्वय अरु अष्ट।
रचत मधुर यह रसमय, सब कवि जन 'भृंग'।।

"ननुननुननु गल" = नगण की 6 आवृत्ति फिर गुरु लघु।

111 111  111  111 // 111  111  21
20 वर्ण,यति 12,8 वर्ण,4 चरण 2-2 तुकांत
******************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-10-17

Wednesday, June 12, 2019

जनक छंद (2019 चुनाव)

करके सफल चुनाव को,
माँग रही बदलाव को,
आज व्यवस्था देश की।
***

बहुमत बड़ा प्रचंड है,
सत्ता लगे अखंड है,
अब जवाबदेही बढ़ी।
****

रूढ़िवादिता तोड़ के,
स्वार्थ लिप्तता छोड़ के,
काम करे सरकार यह।
***

राजनीति की स्वच्छता,
सभी क्षेत्र में दक्षता,
निश्चित अब तो दिख रही।
***

आसमान को छू रहा,
रग रग से यह चू रहा,
लोगों का उत्साह अब।
***

आशा का संचार है,
भ्रष्टों का प्रतिकार है,
बी जे पी के राज में।
***

युग आया विश्वास का,
सर्वांगीण विकास का,
मोदी के नेतृत्व में।
***


बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
28-05-19

जनक छंद "विधान"

जनक छंद रच के मधुर,
कविगण कहते कथ्य को,
वक्र-उक्तिमय तथ्य को।
***

तेरह मात्रिक हर चरण,
ज्यों दोहे के पद विषम,
तीन चरण का बस 'जनक'।
****

पहला अरु दूजा चरण,
समतुकांतता कर वरण,
'पूर्व जनक' का रूप ले।
***

दूजा अरु तीजा चरण,
ले तुकांतमय रूप जब,
'उत्तर जनक' कहाय तब।
***

प्रथम और तीजा चरण,
समतुकांत जब भी रहे,
'शुद्ध जनक' का हो भरण।
***

तुक बन्धन से मुक्त हों,
इसके जब तीनों चरण,
'सरल जनक' तब रूप ले।
***

सारे चरण तुकांत जब,
'घन' नामक हो छंद तब,
'नमन' विवेचन शेष अब।
***
जनक छंद एक परिचय:-
जनक छंद कुल तीन चरणों का छंद है जिसके प्रत्येक चरण में13 मात्राएं होती हैं। ये 13 मात्राएँ ठीक दोहे के विषम चरण वाली होती हैं। विधान और मात्रा बाँट भी ठीक दोहे के विषम चरण की है। यह छंद व्यंग, कटाक्ष और वक्रोक्तिमय कथ्य के लिए काफी उपयुक्त है। यह छंद जो केवल तीन पंक्तियों में समाप्त हो जाता है, दोहे और ग़ज़ल के शेर की तरह अपने आप में स्वतंत्र है। कवि चाहे तो एक ही विषय पर कई छंद भी रच सकता है।

तुकों के आधार पर जनक छंद के पाँच भेद माने गए हैं। यह पाँच भेद हैं:—

1- पूर्व जनक छंद; (प्रथम दो चरण समतुकांत)
2- उत्तर जनक छंद; (अंतिम दो चरण समतुकांत)
3- शुद्ध जनक छंद; (पहला और तीसरा चरण समतुकांत)
4- सरल जनक छंद; (सारे चरण अतुकांत)
5- घन जनक छंद। (सारे चरण समतुकांत)

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
30-05-19

शिव-महिमा (छप्पय)

करके तांडव नृत्य, प्रलय जग की शिव करते।
विपदाएँ भव-ताप, भक्त जन का भी हरते।
देवों के भी देव, सदा रीझें थोड़े में।
करें हृदय नित वास, शैलजा सँग जोड़े में।
प्रभु का निवास कैलाश में, औघड़ दानी आप हैं।
भज ले मनुष्य जो आप को, कटते भव के पाप हैं।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
22-02-19

अग्रसेन महाराज (छप्पय)

अग्रसेन नृपराज, सूर्यवंशी अवतारी।
विप्र धेनु सुर संत, सभी के थे हितकारी।
द्वापर का जब अंत, धरा पर हुआ अवतरण।
भागमती प्रिय मात, पिता वल्लभ के भूषण।
नागवंश की माधवी, इन्हें स्वयंवर में वरी।
अग्रोहा तब नव बसा, झोली माँ लक्ष्मी भरी।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
20-04-18

छप्पय छंद "विधान"

छप्पय एक अर्द्ध सममात्रिक छंद है। यह भी कुंडलिया छंद की तरह छह चरणों का एक मिश्रित छंद है जो दो छंदों के संयोग से बनता है। इसके प्रथम चार चरण रोला छंद के, जिसके प्रत्येक चरण में 24-24 मात्राएँ होती हैं तथा यति 11-13 पर होती है। आखिर के दो चरण उल्लाला छंद के होते हैं। उल्लाला छंद के दो भेदों के अनुसार इस छंद के भी दो भेद मिलते हैं। प्रथम भेद में 13-13 यानि कुल 26 मात्रिक उल्लाला के दो चरण आते हैं और दूसरे भेद में 15-13 यानि कुल 28 मात्रिक उल्लाला के दो चरण आते हैं।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

Friday, June 7, 2019

गीत (देश हमारा न्यारा प्यारा)

देश हमारा न्यारा प्यारा,
देश हमारा न्यारा प्यारा।
सब देशों से है यह प्यारा,
देश हमारा न्यारा प्यारा।।

उत्तर में गिरिराज हिमालय,
इसका मुकुट सँवारे।
दक्षिण में पावन रत्नाकर,
इसके चरण पखारे।
अभिसिंचित इसको करती है,
गंगा यमुना की जलधारा।
देश हमारा न्यारा प्यारा -----।।

विंध्य, नीलगिरि, कंचनजंघा,
इसका गगन सजाते।
इसके कानन, उपवन आगे,
सुर के बाग लजाते।
सुरम्य क्षेत्रों की हरियाली,
इसकी है जन-मन  की हारा।
देश हमारा न्यारा प्यारा ----।।

उगले कनक सम शस्य फसल,
इसकी रम्य धरा नित।
इसकी अलग विविधता करती,
जन जन को सदा चकित।
कलरव से पशु-पक्षि लगाएँ
यहाँ स्वतन्त्रता का नारा ।
देश हमारा न्यारा प्यारा ----।।

सब जाति धर्म के नर नारी,
इस में खुश हों पलते।
बल, बुद्धि और सद्विद्या के,
स्वामी इसपे बसते।
इनके ही सद्गुण के बल पर,
आश्रित देश हमारा।
देश हमारा न्यारा प्यारा ----।।

न्योछावर कर दें सब कुछ,
हम इस के ही कारण।
बलशाली बन हम दुखियों के,
दुख का करें निवारण।
भारत के नभ में विकास का,
चमकाएं ध्रुवतारा।
देश हमारा न्यारा प्यारा ----।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
06-05-2016

गीत (दूर कितने तुम रहे)

बहर:- 2122 2122 2122 212

पास रहके भी हमीं से दूर कितने तुम रहे।
जान लेलो पर हमें यूँ ना सताओ बिन कहे।।

जो न आते पास तुम तो ना तड़पते रात दिन।
आग ना लगती दिलों में बेवजह या बात बिन।
ग़म भला क्योंकर के कोई बिन खता के यूँ सहे।।
पास रहके भी हमीं से दूर कितने तुम रहे।।

जिंदगी उलझी हमारी इंतज़ारों में अटक।
मंजिलें सारी खतम है राह में तेरी भटक।
प्यार की धारा में यारा हम सदा यूँ ही बहे।।
पास रहके भी हमीं से दूर कितने तुम रहे।।

जो बने उम्मीद के थे आशियाँ जुड़ जुड़ कभी।
सुनहरे सपने सजाये उन घरों में चुन सभी।
जान पाये हम कभी ना सब घरौंदे कब ढ़हे।।
पास रहके भी हमीं से दूर कितने तुम रहे।।

राख बनता जा रहा है दिल हमारा अब सनम।
जब मिलन होगा हमारा बच गये कितने जनम।
देख सकते देख लो तुम दिल सदा धू धू दहे।।
पास रहके भी हमीं से दूर कितने तुम रहे।।

एक ही बच अब गया है जिंदगी का रास्ता।
आँख ना हमसे चुराना दे रही हूँ वास्ता।
आस बाकी उन पलों की हाथ कोई जब गहे।।
पास रहके भी हमीं से दूर कितने तुम रहे।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-07-16

गीत (चलो स्कूल चलो)

(धुन: चलो दिलदार चलो)

चलो स्कूल चलो,
बस्ता पीठ लाद चलो,
सब हैं तैयार चलो,
आई बस भाग चलो।

हम पढ़ाई में बनेंगें बड़े-2
राह में कोई न हमरी अड़े
हमरी अड़े
चलो स्कूल चलो----

नाम दुनिया में करेंगें रोशन-2
होने देंगें न किसीका शोषन
किसीका शोषन
चलो स्कूल चलो----

देश का मान बढ़ाएँगें हम-2
साथ मिल सबके चलें हरदम
चलें हरदम
चलो स्कूल चलो----

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
10-07-2017

करवा चौथ पर आरती

ओम जय पतिदेव प्रिये
स्वामी जय पतिदेव प्रिये।
चौथ मात से विनती-2
शत शत वर्ष जिये।।

कार्तिक लगते आई, चौथ तिथी प्यारी।
करवा चौथ कहाये, सब से ये न्यारी।।
ओम जय पतिदेव प्रिये।

सूर्योदय से लेकर, जब तक चाँद दिखे।
तेरे कारण धारूँ, व्रत कुछ भी न चखे।।
ओम जय पतिदेव प्रिये।

सुनूँ कहानी माँ की, लाल चुनर धारूँ।
करवा रख कर पुजूँ, माँ पर सब वारूँ।।
ओम जय पतिदेव प्रिये।

चन्द्र ओट ले देखूँ, अर्ध्य उसे देऊँ।
दीर्घ आयु का तेरा, उससे वर लेऊँ।।
ओम जय पतिदेव प्रिये।

तेरे हाथों फिर मैं, व्रत तोड़ूँ साजन।
'नमन' सदा ही रखना, मुझको प्रिय भाजन।।
ओम जय पतिदेव प्रिये
स्वामी जय पतिदेव प्रिये।
चौथ मात से विनती-2
शत शत वर्ष जिये।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
07-10-17

नवगीत (भगवन चाटुकार मैं भी बन जाऊँ)

भगवन चाटुकार मैं भी बन जाऊँ।
बन्द सफलताओं पे पड़े तालों की कुँजी पा जाऊँ।।

विषधर नागों से नेता, सत्ता वृक्षों में लिपटे हैं;
उजले वस्त्रों में काले तन, चमचे उनसे चिपटे हैं;
जनता से पूरे कटकर, सुरा सुंदरी में सिमटे हैं;
चरण वन्दना कर उनकी सत्ता सुख थोड़ा पा जाऊँ।
भगवन चाटुकार मैं भी बन जाऊँ।।

इंजीनियर के बंगलों में, ठेकेदार बन काटूँ चक्कर;
नये नये तोहफों से रखूं, घर आँगन उसका सजाकर;
कुत्तों से उसके करूँ दोस्ती, हाय हलो टॉमी कहकर;
सीमेंट में बालू मिलाने की बेरोकटोक आज्ञा पा जाऊँ।
भगवन चाटुकार मैं भी बन जाऊँ।।

मंत्री के बीवी बच्चों को, नई नई शॉपिंग करवाऊँ;
उसके सेक्रेटरी से लेकर, कुक तक कुछ कुछ भेंट चढाऊँ;
पीक थूकता देख हथेली, आगे कर पीकदान बन जाऊँ;
सप्लाई में बिना दिए कुछ यूँ ही बिल पास करा लाऊँ।
भगवन चाटुकार मैं भी बन जाऊँ।।

बड़े बड़े भर्ती अफसर के, दफ्तर में जा तलवे चाटूँ;
दुम हिलाते कुत्ते सा बन, हाँ हाँ में झूठे सुख दुख बाँटूँ;
इंटरव्यू को झोंक भाड़ में, अच्छी भर्ती खुद ही छाँटूँ;
अकल के अंधे गाँठ के पूरे ऊँचे ओहदों पर बैठाऊँ।
भगवन चाटुकार मैं भी बन जाऊँ।।

मंचों के ओहदेदारों के, अनुचित को उचित बनाऊँ;
चाहे ढपोरशँख भी हो तो, झूठी वाह से 'सूर' बनाऊँ;
पढूँ कसीदे शान में उनकी, हार गले में पहनाऊँ;
नभ में टांगूँ वाहवाही से बदले में कुछ मैं भी पा जाऊँ।
भगवन चाटुकार मैं भी बन जाऊँ।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
14-06-2016

Thursday, June 6, 2019

ग़ज़ल (जाम चले)

बह्र:- 2112

काफ़िया - आम; रदीफ़ - चले

जाम चले
काम चले।

मौत लिये
आम चले।

खुद का कफ़न
थाम चले।

सांसें आठों
याम चले।

सुब्ह हो या
शाम चले।

लोग अवध
धाम चले।

मन में बसा
राम चले।

पैसा हो तो
नाम चले।

जग में 'नमन'
दाम चले

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया।
25-09-17

ग़ज़ल (खता मेरी अगर जो हो)

बह्र:- 1222*4

काफ़िया=आ
रदीफ़= मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर (लंबे से लंबे रदीफ़ की ग़ज़ल)

खता मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर,
सजा मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर।

वतन के वास्ते जीना, वतन के वास्ते मरना,
वफ़ा मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर।

नशा ये देश-भक्ति का, रखे चौड़ी सदा छाती,
अना मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर।

रहे चोटी खुली मेरी, वतन में भूख है जब तक,
शिखा मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर।

गरीबों के सदा हक़ में, उठा आवाज़ जीता हूँ,
सदा मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर।

रखूँ जिंदा शहीदों को, निभा किरदार मैं उनका,
अदा मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर।

मेरी मर्जी तो ये केवल, बढ़े ये देश आगे ही,
रज़ा मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर।

रहे रोशन सदा सब से, वतन का नाम हे भगवन,
दुआ मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर।

चढ़ातें सीस माटी को, 'नमन' वे सब अमर होते,
कज़ा मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया।
10-10-2017

ग़ज़ल (आज फैशन है)

बह्र:- 1222*4

लतीफ़ों में रिवाजों को भुनाना आज फैशन है,
छलावा दीन-ओ-मज़हब को बताना आज फैशन है।

ठगों ने हर तरह के रंग के चोले रखे पहने,
सुनहरे स्वप्न जन्नत के दिखाना आज फैशन है।

दबे सीने में जो शोले जमाने से रहें महफ़ूज़,
पराई आग में रोटी पकाना आज फैशन है।

कभी बेदर्द सड़कों पे न ऐ दिल दर्द को बतला,
हवा में आह-ए-मुफ़लिस को उड़ाना आज फैशन है।

रहे आबाद हरदम ही अना की बस्ती दिल पे रब,
किसी वीराँ जमीं पे हक़ जमाना आज फैशन है।

गली कूचों में बेचें ख्वाब अच्छे दिन के लीडर अब,
जहाँ मौक़ा लगे मज़मा लगाना आज फैशन है।

इबादत हुस्न की होती जहाँ थी देश भारत में,
नुमाइश हुस्न की करना कराना आज फैशन है।

नहीं उम्मीद औलादों से पालो इस जमाने में,
बड़े बूढ़ों के हक़ को बेच खाना आज फैशन है।

नहीं इतना भी गिरना चाहिए फिर से न उठ पाओ,
गिरें जो हैं उन्हें ज्यादा गिराना आज फैशन है।

तिज़ारत का नया नुस्ख़ा है लूटो जितनी मन मर्ज़ी,
'नमन' मज़बूरियों से धन कमाना आज फैशन है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
30-04-18

Tuesday, June 4, 2019

1222*4 बह्र के गीत

बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है।

किसी पत्थर की मूरत से महोब्बत का इरादा है।

भरी दुनियां में आके दिल को समझाने कहाँ जाएँ।

चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों।

ये मेरा प्रेम पत्र पढ़ कर , कि तुम नाराज न होना।

कभी पलकों में आंसू हैं कभी लब पे शिकायत है।

ख़ुदा भी आस्मां से जब ज़मीं पर देखता होगा।

ज़रा नज़रों से कह दो जी निशाना चूक न जाए।

मुहब्बत ही न समझे वो जालिम प्यार क्या जाने।

हजारों ख्वाहिशें इतनी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले।

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं।

मुहब्बत हो गई जिनको वो परवाने कहाँ जाएँ।

मुझे तेरी मुहब्बत का सहारा मिल गया होता।

कभी तन्हाईयों में भी हमारी याद आएगी।

परस्तिश की तमन्ना है, इबादत का इरादा है।

ग़ज़ल (शब-ए-वस्ल इतनी सुहानी लगी)

बह्र:- 122  122  122  12

शब-ए-वस्ल इतनी सुहानी लगी,
हमें ख्वाब सी जिंदगानी लगी।

सहर जब हुई मुख़्तसर रात की,
हक़ीक़त हमें ये कहानी लगी।

छुड़ा हाथ लेना, वो हँस टालना,
सभी शय ही उनकी लसानी लगी।

वे नाज़ुक अदाएँ, हया उनकी! उफ़,
बड़ी जल्द शब की रवानी लगी।

मिली जबसे उनकी मुहब्बत हमें,
तभी से लुभाने जवानी लगी।

जिसे देखिये ग़म से सैराब वो,
कहीं खोने अब शादमानी लगी।

मसर्रत कहीं तो, कहीं रंज-ओ- ग़म,
'नमन' सारी दुनिया ही फ़ानी लगी।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
29-05-19

Wednesday, May 22, 2019

मत्तगयंद सवैया "माँ दुर्गा"

7 भगण (211) की आवृत्ति के बाद 2 गुरु

माँ दुर्गा (1)

पाप बढ़े चहुँ ओर भयानक हाथ कृपाण त्रिशूलहु धारो।
रक्त पिपासु लगे बढ़ने दुखके महिषासुर को अब टारो।
ताण्डव से अरि रुण्डन मुण्डन को बरसा कर के रिपु मारो।
नाहर पे चढ़ भेष कराल बना कर ताप सभी तुम हारो।।
=====
माँ दुर्गा (2)

नेत्र विशाल हँसी अति मोहक तेज सुशोभित आनन भारी।
क्रोधित रूप प्रचण्ड महा अरि के हिय को दहलावन कारी।
हिंसक शोणित बीज उगे अरु पाप बढ़े सब ओर विकारी।
शोणित पी रिपु नाश करो पत भक्तन की रख लो महतारी।।
=======
माँ दुर्गा (3)

शुम्भ निशुम्भ हने तुमने धरणी दुख दूर सभी तुम कीन्हा।
त्राहि मची चहुँ ओर धरा पर रूप भयावह माँ तुम लीन्हा।
अष्ट भुजा अरु आयुध भीषण से रिपु नाशन माँ कर दीन्हा।
गावत वेद पुराण सभी यश जो वर माँगत देवत तीन्हा।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
22-07-2017

सवैया छंद विधान

सवैया चार चरणों का वार्णिक छंद है जिसके प्रति चरण में 22 से 26 तक वर्ण रहते हैं। चारों चरण समतुकांत होते हैं। सवैया किसी गण पर आश्रित होता है जिसकी 7 या 8 आवृति रहती है। इन्ही आवृतियों के प्रारंभ में एक या दो साधारणतया लघु वर्ण और अंत में एक या दो लघु गुरु वर्ण जोड़ कर इस छंद के अनेक विभेद मिलते हैं।
आवृति का रूप या तो गुरु लघु लघु (211) रहता है या फिर गुरु गुरु लघु (221) और यही सवैया की विशेषता है और इसके माधुर्य का कारण है। इस आवृति से एक लय का सृजन होता है जो समस्त भगण (211) आश्रित सवैयों की एक समान क्षिप्र गति की रहती है और तगण (221) आश्रित सवैयों की एक समान मन्द गति की रहती है।

हिन्दी के भक्तिकाल और रीतिकाल से ही विभिन्न प्रकार के सवैये प्रचलित रहे हैं। तुलसी की कवितावली में विभिन्न प्रकार के सवैये मिलते हैं। उन्होंने एक ही सवैये में एक से अधिक प्रकार के सवैये मिला कर अनेक उपजाति सवैये भी रचे हैं।
रीतिकालीन कवियों जैसे पद्माकर, देव आदि ने श्रृंगार रस के विभिन्न अंगों, विभाव, अनुभाव, आलम्बन, उद्दीपन, संचारी, नायक-नायिका भेद आदि के लिए इनका चित्रात्मक तथा भावात्मक प्रयोग किया है।रसखान, घनानन्द, केशव जैसे प्रेमी-भक्त कवियों ने भक्ति-भावना के उद्वेग तथा आवेग की सफल अभिव्यक्ति सवैया में की है।भूषण ने वीर रस के लिए इस छन्द का प्रयोग किया है। आधुनिक कवियों में हरिश्चन्द्र, जगन्नाथ रत्नाकर, दिनकर ने इनका सुन्दर प्रयोग किया है।

सवैया में उर्दू की ग़ज़ल की तरह मात्रा पतन के प्रचुर उदाहरण मिलते हैं। लगभग तुलसी से लेकर आधुनिक कवियों तक, समस्त कवि गण ने निशंकोच सवैयों में मात्रा पतन किया है। कुछेक छंदों में यह मान्य है कि कारक की विभक्तियों के एक शब्द के चिह्न लघु की तरह व्यवहार में लाये जा सकते हैं। जैसे-
कर्ता - ने को न की तरह उच्चारित किया सकता है.
कर्म - को इसे क पढ़ा जा सकता है.
करण, अपादान - से स की तरह पढ़ सकते हैं.
सम्बन्ध - का, के, की  के लिए भी मात्र क कहा जा सकता है.
अधिकरण - में, पे आदि क्रमशः मँ और प की तरह उच्चारित हो सकते हैं.
इसके अतिरिक्त एक शब्द की सहायक क्रियाएँ, सर्वनाम और अव्यय शब्द जैसे है, हैं, था, ही, भी, जो, तो इत्यादि भी आवश्यकतानुसार लघु माने जाते रहे हैं।

अब कुछ प्रमुख कवियों के मात्रा पतन के उदाहरण देखें।

जहाँ सब संकट, दुर्गट सोचु, तहाँ मे'रो' साहे'बु राखै' रमैया॥ (तुलसी कवितावली 'वाम सवैया')

मानुष हौं तो' वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के' ग्वारन।
जो पसु हौं तो' कहा बस मेरो' चरौं नित नंद की' धेनु मँझारन।। (रसखान 'किरीट सवैया)

वह खड्ग लिए था' खड़ा, इससे मुझको भी' कृपाण उठाना था क्या ?
द्रौ'पदी के' पराभव का बदला कर देश का' नाश चुकाना था क्या ? (दिनकर 'मगणान्त दुर्मिल')

पैहौं' कहाँ ते' अटारी' अटा, जिनके विधि दीन्‍ही' है' टूटी' सी' छानी।
जो पै' दरिद्र लिख्‍यो है' लिलार, तो' काहू' पै' मेटि न जात अजानी।।(नरोत्तम दास 'मत्तगयंद')

परन्तु आजकल के तथाकथित स्वयंभू आचार्य न जाने क्यों एक मात्रा का पतन भी देख रचना को ही सिरे से नकार देते हैं, जो कि इस बहुआयामी छंद के विकास में बाधक ही है।

नीचे भगण आश्रित 14 सवैया और तगण आश्रित 6 सवैया की तालिका दी गई है। चरणान्त के अनुसार विभागों में भी बाँटे गए हैं। कोई चाहे तो एक विभाग के सवैये मिश्रित कर उपजाति सवैये भी रच सकता है।
====================
      भगण = 211 आश्रित सवैये
====================
1) मत्तगयन्द-       211*7 + 22
2) सुन्दरी  -   11+211*7 + 22
3) वाम      -     1+211*7 + 22
4) मोद-211*5+222+11+ 22
===================
5) मदिरा     -        211*7 + 2
6) दुर्मिल     -11 +211*7 + 2
7) सुमुखी    -  1 +211*7 + 2
===================
8) चकोर    -         211*7 + 21
9) अरविन्द - 11 +211*7 + 21
10)मुक्ताहरा-   1+211*7 + 21
===================
11)किरीट   -        211*8
12)सुखी     - 11+211*8
13)लवंगलता-  1+211*8
===================
14)अरसात  -       211*7 + 212
====================
       तगण = 221 आश्रित सवैये
==================== 
15) मंदारमाला   -  221*7 + 2
16) गंगोदक  -21+221*7 + 2
17) वागीश्वरी -  1+221*7 + 2
====================
18)सर्वगामी -         221*7 + 22
19)भुजंगप्रयात -1+221*7 + 22
====================
20) आभार    -       221*8
**************************
**************************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
29-04-19

Tuesday, May 21, 2019

"गण-विचार दोहा"

'यरता' लघु 'भजसा' गुरो, आदि मध्य अरु अंत।
'ना' लघु सब 'मा' गुरु सभी, गण विचारते संत।।

गण विचार कैसे करें:-

कुल गण 8 होते हैं, तथा किसी भी गण में 3 वर्ण होते हैं। उस वर्ण की मात्रा या तो दीर्घ (2) होगी अन्यथा लघु (1) होगी।

'यरता' लघु सूत्र से अक्षर के अनुसार 3 गण दिग्दर्शित होते हैं जो क्रमश: यगण, रगण और तगण हैं। अब इनमें क्रमश: लघु वर्ण की स्थिति आदि, मध्य और अंत है। तो इन 3 गणों का निम्न रूप बनेगा।
यगण=122
रगण=212
तगण=221
इसी प्रकार 'भजसा' गुरो सूत्र से अक्षर के अनुसार 3 गण दिग्दर्शित होते हैं जो क्रमश: भगण, जगण और सगण हैं। अब इनमें क्रमश: दीर्घ वर्ण की स्थिति आदि, मध्य और अंत है। तो इन 3 गणों का निम्न रूप बनेगा।
भगण=211
जगण=121
सगण=112

'ना' लघु सब अर्थात नगण=111

'मा' गुरु सभी अर्थात मगण=222

इसप्रकार मेरे स्वरचित उपरोक्त दोहे से किसी भी गण के मात्रा-विन्यास का शीघ्र पता लग जाता है। जैसे जगण का नाम आते ही मस्तिष्क में तुरन्त 'भजसा गुरो' कौंधना चाहिए और भजसा में ज मध्य में है तो, हमें तुरन्त पता चल जाता है कि इसका रूप 121 है।


बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
10-05-2019

"दोहों का परिवार"

दोहों के मुख्य 21 प्रकार हैं। ये 21 भेद दोहे में गुरु लघु वर्ण की गिनती पर आधारित हैं। किसी भी दोहे में कुल 48 मात्रा होती हैं। दो विषम चरण 13, 13 मात्रा के तथा दो सम चरण 11, 11 मात्रा के। दोहे के सम चरणों का अंत ताल यानि गुरु लघु (2,1) वर्ण से होना आवश्यक है। अतः किसी भी दोहे में कम से कम 2 गुरु वर्ण आवश्यक हैं। साथ ही विषम चरणों की 11वीं मात्रा लघु होनी आवश्यक है। इस प्रकार विषम चरणों के दो लघु तथा सम चरणों के भी 2 आवश्यक लघु मिलाने से किसी भी दोहे में कम से कम 4 लघु आवश्यक हैं। चार लघु की 4 मात्रा तथा बाकी बची (48-4) = 44 मात्रा में अधिकतम 22 गुरु हो सकते हैं। इस प्रकार अधिकतम 22 गुरु वर्ण से निम्नतम 2 गुरु वर्ण तक कुल 21 सम्भावनाएँ हैं और इन सम्भावनाओं के आधार पर दोहों के 21 भेद कहे गये हैं जो निम्न हैं।

1.भ्रमर, 2.सुभ्रमर, 3.शरभ, 4.श्येन, 5.मण्डूक,6.मर्कट, 7.करभ, 8.नर, 9.हंस,10.गयंद,11.पयोधर, 12.बल, 13.पान, 14.त्रिकल, 15.कच्छप, 16.मच्छ, 17.शार्दूल, 18.अहिवर, 19.व्याल, 20.विडाल, 21.श्वान।

इनमें 'भ्रमर' दोहा में 22 गुरु तथा क्रमशः एक एक गुरु वर्ण कम करते हुए अंतिम 'श्वान' दोहा में 2 गुरु होते हैं। दोनों छोर के एक एक मेरे स्वरचित दोहों की बानगी देखें।

भ्रमर दोहा (22 दीर्घ, 4 लघु)

बीती जाये जिंदगी, त्यागो ये आराम।
थोड़ी नेकी भी करो, छोड़ो दूजे काम।।

श्वान दोहा (2 दीर्घ, 44 लघु)

मन हर कर छिप कर रहत, वह नटखट दधि-चोर।
ब्रज-रज पर लख चरण-छवि, मन सखि उठत हिलोर।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
20-04-18

Sunday, May 19, 2019

आंग्ल नव-वर्ष दोहे

प्रथम जनवरी क्या लगी, काम दिये सब छोड़।
शुभ सन्देशों की मची, चिपकाने की होड़।।

पराधीनता की हमें, जिनने दी कटु पाश।
उनके इस नव वर्ष में, हम ढूँढें नव आश।।

सात दशक से ले रहे, आज़ादी में साँस।
पर अब भी हम जी रहे, डाल गुलामी फाँस।।

व्याह पराया हो रहा, मची यहाँ पर धूम।
अब्दुल्ला इस देश का, नाच रहा है झूम।।

अपनों को दुत्कारते, दूजों से रख चाह।
सदियों से हम भोगते, आये इसका दाह।।

सत्य सनातन छोड़ कर, पशुता से क्यों प्रीत।
'बासुदेव' मन है व्यथित, लख यह उलटी रीत।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
01-01-2019

दोहा *विधान*

दोहा एक अर्धसम मात्रिक छन्द है। जिसमें 13,11 और 13,11 मात्रा की दो पंक्ति और प्रत्येक पंक्ति में 2 चरण होते हैं। 13 मात्रा के चरण को विषम चरण कहा जाता है और 11 मात्रा के चरण को सम चरण कहा जाता है। दूसरे और चौथे चरण यानि सम चरणों का समतुकान्त होना आवश्यक है।

विषम चरण -- कुल 13 मात्रा (मात्रा बाँट = 8+2+1+2)
सम चरण -- कुल 11 मात्रा (मात्रा बाँट = 8+ताल यानि गुरु+लघु)

अठकल यानि 8 में दो चौकल (4+4) हो सकते हैं। चौकल और अठकल के निम्न नियम हैं जो अनुपालनीय हैं।

चौकल:- (1) प्रथम मात्रा पर शब्द का समाप्त होना वर्जित है। 'करो न' सही है जबकि 'न करो' गलत है।
(2) चौकल में पूरित जगण जैसे सरोज, महीप, विचार जैसे शब्द वर्जित हैं।

अठकल:- (1) प्रथम और पंचम मात्रा पर शब्द समाप्त होना वर्जित है। 'राम कृपा हो' सही है जबकि 'हो राम कृपा' गलत है क्योंकि राम शब्द पंचम मात्रा पर समाप्त हो रहा है। यह ज्ञातव्य हो कि 'हो राम कृपा' में विषम शब्द के बाद विषम शब्द पड़ रहा है फिर भी लय बाधित है।
(2) 1-4 और 5-8 मात्रा पर पूरित जगण शब्द नहीं आ सकता।
(3) अठकल का अंत गुरु या दो लघु से होना आवश्यक है।

जगण प्रयोग:-
(1) चौकल की प्रथम और अठकल की प्रथम और पंचम मात्रा से पूरित जगण शब्द प्रारम्भ नहीं हो सकता।
(2) चौकल की द्वितीय मात्रा से जगण शब्द के प्रारम्भ होने का प्रश्न ही नहीं है क्योंकि प्रथम मात्रा पर शब्द का समाप्त होना वर्जित है।
(3) चौकल की तृतीय और चतुर्थ मात्रा से जगण शब्द प्रारम्भ हो सकता है।

दोहे का शाब्दिक अर्थ है- दुहना, अर्थात् शब्दों से भावों का दुहना। इसकी संरचना में भावों की प्रतिष्ठा इस प्रकार होती है कि दोहे के प्रथम व द्वितीय चरण में जिस तथ्य या विचार को प्रस्तुत किया जाता है, उसे तृतीय व चतुर्थ चरणों में सोदाहरण (उपमा, उत्प्रेक्षा आदि के साथ) पूर्णता के बिन्दु पर पहुँचाया जाता है, अथवा उसका विरोधाभास प्रस्तुत किया जाता है।

वर्ण्य विषय की दृष्टि से दोहों का संसार बहुत विस्तृत है। यह यद्यपि नीति, अध्यात्म, प्रेम, लोक-व्यवहार, युगबोध- सभी स्फुट विषयों के साथ-साथ कथात्मक अभिव्यक्ति भी देता आया है, तथापि मुक्तक काव्य के रूप में ही अधिक प्रचलित और प्रसिद्ध रहा है। अपने छोटे से कलेवर में यह बड़ी-से-बड़ी बात न केवल समेटता है, बल्कि उसमें कुछ नीतिगत तत्व भी भरता है। तभी तो इसे गागर में सागर भरने वाला बताया गया है।

दोहों की संरचना में कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। जैसे -

 1-  दोहा मुक्त छंद है। कथ्य (जो बात कहना चाहें वह) एक दोहे में पूर्ण हो जाना चाहिए।

2- श्रेष्ठ दोहे में लाक्षणिकता, संक्षिप्तता, मार्मिकता (मर्मबेधकता), आलंकारिकता, स्पष्टता, पूर्णता तथा सरसता होनी चाहिए।

3- दोहे में संयोजक शब्दों और, तथा, एवं आदि का प्रयोग यथा संभव न करें। औ' वर्जित 'अरु' स्वीकार्य।

4- दोहे में कोई भी शब्द अनावश्यक न हो। हर शब्द ऐसा हो जिसके निकालने या बदलने पर दोहा न कहा जा सके।

5- दोहे में कारक (ने, को, से, के लिए, का, के, की, में, पर आदि)का प्रयोग कम से कम हो।

6- हिंदी में खाय, मुस्काय, आत, भात, डारि, मुस्कानि, होय, जोय, तोय जैसे देशज क्रिया-रूपों का उपयोग यथासंभव न करें।

7- दोहा में विराम चिन्हों का प्रयोग यथास्थान अवश्य करें।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
30-04-19

Tuesday, May 14, 2019

भूमिसुता छंद "जीव-हिंसा"

जीवों की हिंसा प्राणी क्यों, हो करते।
तेरे कष्टों से ही आहें, ये भरते।।
भारी अत्याचारों को ये, झेल रहे।
इन्सां को मूकों की पीड़ा, कौन कहे।।

कष्टों के मारे बेचारे, जीव सभी।
पूरी जो ना हो राखे ना, चाह कभी।।
जो भी दे दो वो ही खा के, मस्त रहे।
इन्सां तेरे दुःखों को क्यों, मूक सहे।।

जाँयें तो जाँयें कैसे ये, भाग कहीं।
प्राणों के घाती ही पायें, जाँय वहीं।।
इंसानों ने भी राखा है, बाँध इन्हें।
थोड़ी भी आजादी है दी, नाँहि जिन्हें।।

लाचारी में पीड़ा झेलें, नित्य महा।
दुःखों में ऐसे हैं ये जो, जा न कहा।।
हैं संसारी रिश्ते नाते, स्वार्थ सने।
लागें हैं दूजों को सारे, ही डसने।।
================
लक्षण छंद:-

"मामामासा" तोड़ो आठा, चार सजा।
सारे भाई चाखो छंदा, 'भूमिसुता'।।

"मामामासा" = मगण मगण मगण सगण
222  222 222 112 = 12वर्ण, यति 8,4
चार चरण, दो दो समतुकांत।
*********************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
07-06-17

भुजंग प्रयात छंद "नोट बन्दी"

हुई नोट बन्दी ठगा सा जमाना।
किसी को रुलाना किसी को हँसाना।।
कहीं आँसुओं की झड़ी सी लगी है।
कहीं पे खुशी की दिवाली जगी है।।

इकट्ठा जिन्होंने किया वित्त काला।
उन्हीं का पिटा आज देखो दिवाला।।
बसी थी जहाँ अल्प ईमानदारी।
खरे लोग देखो सभी हैं सुखारी।।

कहीं नोट की लोग होली जलाते।
कहीं बन्द बोरे नदी में बहाते।।
किसी के जगे भाग खाते खुला के।
कराए जमा नोट काले धुला के।।

सभी बैंक में आ गई भीड़ सारी।
लगी हैं कतारें मचा शोर भारी।।
कमी नोट की सामने आ रही है।
नहीं जानते क्या हुआ ये सही है।।
===================
लक्षण:-
4 यगण (122) यानि कुल 12 वर्ण प्रत्येक चरण में। चार चरण दो दो समतुकांत।
*************************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
12-12-16

भक्ति छंद "कृष्ण-विनती"

दो भक्ति मुझे कृष्णा।
मेटो जग की तृष्णा।।
मैं पातक संसारी।
तू पापन का हारी।।

मैं घोर अनाचारी।
तू दिव्य मनोहारी।।
चाहूँ करुणा तेरी।
दे दो न करो देरी।।

वृंदावन में जाऊँ।
शोभा ब्रज की गाऊँ।।
मैं वेणु सुनूँ प्यारी।
छानूँ धरती न्यारी।।

गोपाल चमत्कारी।
तेरी महिमा भारी।।
छायी अँधियारी है।
तू तो अवतारी है।।

आशा मन में धारे।
आया प्रभु के द्वारे।।
गाऊँ नित केदारी।
आभा वरनूँ थारी।।

ये 'बासु' रचे गाथा।
टेके दर पे माथा।।
दो दर्श उसे नाथा।
राखो सर पे हाथा।।
============
लक्षण छंद:-

"तायाग" सजी क्या है।
ये 'भक्ति' सुछंदा है।।

"तायाग" = तगण यगण, गुरु
221  122  2
7 वर्ण  4 चरण
दो-दो चरण समतुकांत या चारों चरण समतुकांत।
***********
बासुदेव अग्रवाल नमन,
तिनसुकिया
10-02-19

बुदबुद छंद "बसंत पंचमी"

सुखद बसंत पंचमी।
पतझड़ शुष्कता थमी।।
सब फिर से हरा-भरा।
महक उठी वसुंधरा।।

विटप नवीन पर्ण में।
कुसुम अनेक वर्ण में।।
खिल कर झूमने लगे।
यह लख भाग्य ही जगे।।

कुहुक सुनाय कोयली।
गरजत मन्द बादली।।
भ्रमर-गुँजार छा रही।
सरगम धार सी बही।।

शुभ ऋतुराज आ गया।
अनुपम चाव छा गया।।
कलरव दिग्दिगंत में।
मुदित सभी बसंत में।।
=========
लक्षण छंद:-

"नजर" सु-वर्ण नौ रखें।
'बुदबुद' छंद को चखें।।

"नजर" = नगण, जगण, रगण

(111  121  212)
9 वर्ण,4 चरण
दो-दो चरण समतुकांत
***********
बासुदेव अग्रवाल नमन,
तिनसुकिया
10-02-19

बिंदु छंद "राम कृपा"

सत्यसनातन, ये है ज्ञाना।
भक्ति बिना नहिं, हो कल्याना।।
राम-कृपा जब, होती प्राणी।
हो तब जागृत, अन्तर्वाणी।।

चक्षु खुले मन, हो आचारी।
दूर हटे तब, माया सारी।।
प्रीत बढ़े जब, सद्धर्मों में।
जी रहता नित, सत्कर्मों में।

राम समान न, कोई देवा।
इष्ट धरो अरु, चाखो मेवा।।
नित्य जपे नर, जो भी माला।
दुःख हरे सब, वे तत्काला।

पाप भरी यह, मेरी काया।
मैं नतमस्तक, हो के आया।।
राम दयामय, मोहे तारो।
कष्ट सभी प्रभु, मेरे हारो।।
================
लक्षण छंद:-

"भाभमगा" यति, छै ओ' चारी।
'बिंदु' रचें सब, छंदा प्यारी।।

"भाभमगा" = भगण भगण मगण गुरु

(211  211,  222   2)
10 वर्ण,4 चरण,(यति 6-4)
दो-दो चरण समतुकांत।
*******************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
26-01-19

Saturday, May 11, 2019

नवगीत (कहाँ गया सच्चा प्रतिरोध)

सुन ओ भारतवासी अबोध,
कहाँ गया सच्चा प्रतिरोध?

आये दिन करता हड़ताल,
ट्रेनें फूँके हो विकराल,
धरने दे कर रोके चाल,
सड़कों पर लाता भूचाल,
करे देश को तू बदहाल,
और बजाता झूठे गाल,
क्या यही तेरा है आत्म-बोध,
कहाँ गया सच्चा प्रतिरोध?

क्या व्यर्थ व्यवस्था के ये तंत्र,
चाहे रोये लोकतंत्र,
पड़े रहे क्या बंद यंत्र,
मौन रहें क्या जीवन-मंत्र,
औरों के हित तो केवल व्यर्थ
उनके दुख का भला क्या अर्थ,
कर स्व जाति, धर्म, दल कृतार्थ,
पूरे करता अपने ही स्वार्थ,
क्या बस तेरा यही प्रबोध,
कहाँ गया सच्चा प्रतिरोध?

चाहे बच्चे ढूंढ़ें कचरे में जीविका,
झुग्गी, झोंपड़ झेलें विभीषिका,
नारी होती रहे घर्षिता,
सिसके नैतिकता, मानवता,
पर तेरी आँखें रहेंगी बंद,
बुद्धि तेरी पड़ जाती कुंद,
भूल गया क्या सब अवरोध,
कहाँ गया सच्चा प्रतिरोध?

हक़ की क्या है यही लड़ाई,
या लोकतंत्र की है तरुणाई,
या तेरी अबतक की कमाई,
क्या स्वतंत्रता यही विचार की,
या पराकाष्ठा अधिकार की,
क्या यही सीख है संस्कार की,
या अति है उदण्ड व्यवहार की,
क्या यही तेरी अबतक की शोध,
कहाँ गया सच्चा प्रतिरोध?

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
11-01-2019

गीत (आज बसंत की छाई लाली)

आज बसंत की छायी लाली,
बागों में छायी खुशियाली,
आज बसंत की छायी लाली॥

वृक्ष वृक्ष में आज एक नूतन है आभा आयी।
बीत गयी पतझड़ की उनकी वह दुखभरी रुलायी।
आज खुशी में झूम झूम मुसकाती डाली डाली।
आज बसंत की छायी लाली॥1॥

इस बसंतने किये प्रदान हैं उनको नूतन पल्लव।
चहल पहल में बदल गया अब उनका जीवन नीरव।
गूँज रही है अब उन सब पर मधुकर की गूँजाली।
आज बसंत की छायी लाली॥2॥

स्वर्णिम आभा छिटक रही आज रम्य अमराई में।
महक उठी बौरों से डालें बाला ज्यों तरुणाई में।
फिर कानों में मिश्री घोल रही कोयल मतवाली।
आज बसंत की छायी लाली॥3॥

आज चाव में फूल रहे हैं पौधे वृक्ष लता हर।
बाग बगीचे सजा रहे मृदु आभा को बिखरा कर।
कैसी छायी दिग दिगंत में ये मोहक हरियाली।
आज बसंत की छायी लाली॥4॥

मंद पवन के हल्के झोंके तन को करते सिहरित।
फूलों की मादक सौरभ है मन को करती मोहित।
श्रवणों में संगीत के स्वर दे पुर्वा पाली पाली।
आज बसंत की छायी लाली॥5॥

बिखरा सुंदर नीलापन इस विस्तृत नभ मंडल में।
संध्या की लाली छायी फिर मोहक नील पटल में।
उस पर पक्षी चहक रहे हैं भर मन में खुशियाली।
आज बसंत की छायी लाली॥6॥

आज जगत की सकल वस्तु में नव उमंग है छायी।
इस बसंत की खुशियां जा हर मन में आज समायी।
जिसकी रचना ऐसी फिर वह कितना सुंदर माली।
आज बसंत की छायी लाली॥7॥

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-04-2016 

गीत (करुण पूकार)

बहर:- 2122  -  2122  -  212

छुप गये हो श्याम सुंदर तुम कहाँ,
रो रही है आज मानवता यहाँ।

देश सारा खो गया है भीड़ में,
रो रहे सारे ही मानव पीड़ में।
द्रौपदी सी लाज रखलो तुम जहाँ,
छुप गये हो श्याम सुंदर तुम कहाँ।

स्वार्थ में अंधे यहाँ के लोग हैं,
भोग वश कैसे लगे ये रोग हैं।
राजनेता भी बने भक्षक यहाँ,
छुप गये हो श्याम सुंदर तुम कहाँ।

नारियों की अस्मिता अब दाव पे,
कौन मलहम अब लगाये घाव पे।
दीन दुखियों का सहारा ना रहा,
छुप गये हो श्याम सुंदर तुम कहाँ।

लूट शोषण का यहाँ पे जोर है,
आह अबलों की उठे चहुँ ओर है।
मच गया आतंक का ताण्डव यहाँ,
छुप गये हो श्याम सुंदर तुम कहाँ।

बढ़ गया है इस धरा पे पाप अब,
ले रहे अवतार मोहन फिर से कब।
अब न जाता ओर हमसे कुछ सहा,
छुप गये हो श्याम सुंदर तुम कहाँ।

रोक लो इस पाप की अब धार को,
बन खिवैया थाम लो पतवार को।
आँसुओं की बाढ़ में सब कुछ बहा,
छुप गये हो श्याम सुंदर तुम कहाँ।

(इस बहर का प्रमुख गीत- दिल के अरमाँ आँसुओं में बह गये।)

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
30-07-16

गीत (आँख के नशे में जब)

(धुन- हम तो ठहरे परदेशी)

(212 1222)×2

आँख के नशे में जब, वो हमें डुबाते हैं।
एक बार डूबें तो, डूबते ही जाते हैं।।

जो न इसमें डूबे हैं, पूछते हैं वो हम से;
आँख का नशा क्या है, हम उन्हें बताते हैं।
आँख के नशे में जब, वो हमें डुबाते हैं।।

झील सी ये गहरी हैं, मय से ये लबालब भी;
भूल जाते दुनिया को, गहरे जितने आते हैं।
आँख के नशे में जब, वो हमें डुबाते हैं।।

हद शराब की होती, देर कुछ नशा टिकता;
पर जो डूबते इसमें, थाह तक न पाते हैं।
आँख के नशे में जब, वो हमें डुबाते हैं।।

सुर ओ ताल जीवन की, सब इन्हीं में बसती है;
गहरे डूब इनमें ही, लय सभी मिलाते हैं।
आँख के नशे में जब, वो हमें डुबाते हैं।।
एक बार डूबें तो, डूबते ही जाते हैं।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
03-10-18