Saturday, December 28, 2019

माहिया (विरही रात)

सीपी में आँखों की,
मौक्तिक चंदा भर,
भेंट मिली पाँखों की।

नव पंख लगा उड़ती
सपनों के नभ में,
प्रियतम से मैं जुड़ती।

तारक-चूनर ओढ़ी,
रजनी की मोहक,
चल दी साजन-ड्योढ़ी।

बादल नभ में छाये,
ढ़क लें चंदा को,
फिर झट मुँह दिखलाये।

आँख मिचौली करता,
चन्द्र लगे ज्यों पिय,
प्रेम-ठिठौली करता।

सूनी जीवन-बगिया,
तन के पंजर में
कैद पड़ी मन-चिड़िया।

रातें छत पर कटती,
और चकोरी ये,
व्याकुल पिउ पिउ रटती।

तकती नभ को रहती,
निर्मोही पिय की
विरह-व्यथा सहती।

**************
प्रथम और तृतीय पंक्ति तुकांत (222222)
द्वितीय पंक्ति अतुकांत (22222)
**************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
20-06-19

चौका (गुलाब बनो)

जापानी विधा चौका
5-7, 5-7, 5-7 -------- +7

गुलाब बनो
सौरभ बिखराओ,
राहगीर को
काँटे मत चुभाओ,
चिराग बनो
आलोक छिटकाओ,
आग लगा के
घर मत जलाओ,
बिजली बनो
जग जगमगाओ,
पर दीन पे
गिर कर उसका,
अस्तित्व न मिटाओ।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
30-06-19

कहमुकरी (वाहन)

आता सीटी सा ये बजाता,
फिर नभ के गोते लगवाता,
मिटा दूरियाँ देता चैन,
क्या सखि साजन?ना सखि प्लैन।

सीटी बजा बढ़े ये आगे,
पहले धीरे फिर ये भागे,
इससे जीवन के सब खेल,
क्या सखि साजन? ना सखि रेल।

इसको ले बन ठन कर जाऊँ,
मन में फूली नहीं समाऊँ,
इस बिन मेरा सूना द्वार,
क्या सखि साजन? ना सखि कार।

वाहन ये जीवन का मेरा,
कहीं न लगता इस बिन फेरा,
सच्चा साथी रहता घुलमिल,
क्या सखि साजन? नहीं साइकिल।

रुक रुक मंजिल तय करता है,
पर हर दूरी को भरता है,
इस बिन हो न सकूँ मैं टस मस,
क्या सखि साजन? ना सखि ये बस।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
26-11-2018

Tuesday, December 24, 2019

गीत (रहे देश का नाम ऊँचा तभी)

बहर:- 122 122 122 12 (भुजंगी छंद)

गरीबी रहे ना यहाँ पे कभी।
रहे देश का नाम ऊँचा तभी।।

रखें भावना प्यार की सबसे हम,
दुखी जो हैं उनके करें दुख को कम,
दिलों में दया भाव धारें सभी।
रहे देश का नाम ऊँचा तभी।।

मिला हाथ आगे बढ़ें सब सदा,
न कोई रहे कर्ज़ से ही लदा,
दुखी दीन को दें सहारा सभी।
रहे देश का नाम ऊँचा तभी।।

हुये बेसहारा उन्हें साथ दें,
गिरें हैं जमीं पे उन्हें हाथ दें,
जवानों बढ़ो आज आगे सभी।
रहे देश का नाम ऊँचा तभी।।

वतन के लिए जान हँस हँस के दें,
तिरंगे को झुकने कभी हम न दें,
बढ़े देश आगे सुखी हों सभी।
रहे देश का नाम ऊँचा तभी।।

'नमन' देश को कर ये प्रण हम करें,
नहीं भूख से लोग आगे मरें,
जो खुशहाल होंगें यहाँ पर सभी।
रहे देश का नाम ऊँचा तभी।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
24-11-2016

गीत (भारत तु जग से न्यारा)

(तर्ज़- दिल में तुझे बिठा के)

(2212  122 अंतरा 22×4 // 22×3)

भारत तु जग से न्यारा, सब से तु है दुलारा,
मस्तक तुझे झुकाएँ, तेरे ही गीत गाएँ।।

सन सैंतालिस मास अगस्त था, तारिख पन्द्रह प्यारी,
आज़ादी जब हमें मिली थी, भोर अज़ब वो न्यारी।
चारों तरफ खुशी थी, छायी हुई हँसी थी,
ये पर्व हम मनाएँ, तेरे ही गीत गाएँ।।

आज़ादी के नभ का यारों, मंजर था सतरंगा,
उतर गया था जैक वो काला, लहराया था तिरंगा।
भारत की जय थी गूँजी, अनमोल थी ये पूँजी,
सपने नये सजाएँ, तेरे ही गीत गाएँ।।

बहुत दिये बलिदान मिली तब, आज़ादी ये हमको,
हर कीमत दे इसकी रक्षा, करनी है हम सबको।
दुश्मन जो सर उठाएँ, उनको सबक सिखाएँ,
मन में यही बसाएँ, तेरे ही गीत गाएँ।।

भारत तु जग से न्यारा, सब से तु है दुलारा,
मस्तक तुझे झुकाएँ, तेरे ही गीत गाएँ।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
13-08-17

विविध मुक्तक -1

जिंदा जब तक थे अपनों के हित तो याद बहुत आये,
लिख वसीयतें हर अपने के कुछ कुछ तो ख्वाब सजाये,
पर याद न आयी उन अन्धो की जीवन की वीरानी,
जिन के लिए वसीयत हम इन आँखों की कर ना पाये।

(2*15)
**********

परछाँई देखो अतीत की, जब तू था बालक लाचार।
चलना तुझे सिखाया जिनने, लुटा लुटा कर अपना
प्यार।
रोनी रोनी सूरत क्यों है, आज उन्हीं की अंगुल थाम।
कद तेरा क्या आज बढ़ गया, रहा उन्हें जो तू दुत्कार।

(आल्हा छंद आधारित)
************

चंद्र ! ग्रसित होना ही शायद, नियति तुम्हारी लगती है।
रूप बदल लो चाहे जितने, दीप्ति भला कब छुपती है।
भरे पड़े हैं राहु जगत में, पथ-पथ में, हर मोड़ों पे।
जो चमकेगा उसको ही तो, समय नागिनी डँसती है।

(लावणी छंद आधारित)
*************
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
15-10-17

रुबाई (4-6)

रुबाई-4

हाथी को दिखा आँख रहा चूहा है,
औकात नहीं कुछ भी मगर फूला है,
कश्मीर न खैरात में बँटता है ए सुन,
लगता है तु पैदा ही हुआ भूखा है।

रुबाई-5

झकझोर हमें सकते न ये झंझावात,
जितनी भी मिले ज़ख्मों की चाहे सौगात,
जीते हैं सदा फ़क्र से रख अपनी अना,
जो हिन्द में है वैसी कहाँ ओर ये बात।

रुबाई-6

शबनम सा जबीं पर है पसीना छलका,
क्या हुस्न का ये आब जो यूँ है झलका,
या टूट गया सब्र घटा से छाये,
लहराती हुई जुल्फों के इन बादल का।
*******
विधान:- 221  1221  122  22/112
1,2,4 चरण तुकांत।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
24-09-19

Saturday, December 21, 2019

मत्तगयंद सवैया (पैर मिले)

7 भगण (211) की आवृत्ति के बाद 2 गुरु

पैर मिले करने सब तीरथ, हाथ दुखारिन दान दिलाने।
कान मिले सुनिए प्रभु का जस, नैन मिले छवि श्याम बसाने।
बैन मिले नित गा हरि के गुण, माथ दयानिधि पाँव नवाने।
'बासु' कहे सब नीक दिये प्रभु, क्यों फिर पेटहु पाप कमाने।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
03-09-17

मनहरण घनाक्षरी "गीत ऐसे गाइए"

माटी की महक लिए, रीत की चहक लिए,
प्रीत की दहक लिए, भाव को उभारिए।

छातियाँ धड़क उठें, हड्डियाँ कड़क उठें,
बाजुवें फड़क उठें, वीर-रस राचिए।

दिलों में निवास करें, तम का उजास करें,
देश का विकास करें, मन में ये धारिए।

भारती की आन बान, का हो हरदम भान,
विश्व में दे पहचान, गीत ऐसे गाइए।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
12-05-17

दोहा गीतिका (शब्द)

काफ़िया = आये, रदीफ़ = शब्द

मान और अपमान दउ, देते आये शब्द।
अतः तौल के बोलिये, सब को भाये शब्द।।

सजा हस्ति उपहार में, कभी दिलाये शब्द।
उसी हस्ति के पाँव से, तन कुचलाये शब्द।।

शब्द ब्रह्म अरु नाद हैं, शब्द वेद अरु शास्त्र।
कण कण में आकाश के, रहते छाये शब्द।।

शब्दों से भाषा बने, भाषा देती ज्ञान।
ज्ञान कर्म का मूल है, कर्म सिखाये शब्द।।

देश काल अरु पात्र का, करलो पूर्ण विचार।
सोच समझ बोलो तभी, हृदय सजाये शब्द।।

ठेस शब्द की है बड़ी, झट से तोड़े प्रीत।
बिछुड़े प्रेमी के मनस, कभी मिलाये शब्द।।

वन्दन क्रंदन अरु 'नमन', काव्य छंद सुर ताल।
भक्ति शक्ति अरु मुक्ति का, द्वार दिखाये शब्द।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
10-08-17

Monday, December 9, 2019

चौपाल (कुंडलियाँ)

धोती कुर्ता पागड़ी, धवल धवल सब धार।
सुड़क रहे हैं चाय को, करते गहन विचार।।
करते गहन विचार, किसी की शामत आई।
बैठे सारे साथ, गाँव के बूढ़े भाई।।
झगड़े सब निपटाय, समस्या सब हल होती।
अद्भुत यह चौपाल, भेद जो सब ही धोती।।

बासुदेव अग्रवाल नमन
तिनसुकिया
29-06-18

आल्हा छंद "आलस्य"

कल पे काम कभी मत छोड़ो, आता नहीं कभी वह काल।
आगे कभी नहीं बढ़ पाते, देते रोज काम जो टाल।।
किले बनाते रोज हवाई, व्यर्थ सोच में हो कर लीन।
मोल समय का नहिं पहचाने, महा आलसी प्राणी दीन।।

बोझ बने जीवन को ढोते, तोड़े खटिया बैठ अकाज।
कार्य-काल को व्यर्थ गँवाते, मन में रखे न शंका लाज।
नहीं भरोसा खुद पे रखते, देते सदा भाग्य को दोष,
कभी नहीं पाते ऐसे नर, जीवन का सच्चा सन्तोष।।

आलस ऐसा शत्रु भयानक, जो जर्जर कर देता देह।
मान प्रतिष्ठा क्षीण करे यह, अरु उजाड़ देता है गेह।।
इस रिपु से जो नहीं चेतते, बनें हँसी के जग में पात्र।
बन कर रह जाते हैं वे नर, इसके एक खिलौना मात्र।।

कुकड़ू कूँ से कुक्कुट प्रतिदिन, देता ये पावन संदेश।
भोर हुई है शय्या त्यागो, कर्म-क्षेत्र में करो प्रवेश।।
चिड़िया चहक चहक ये कहती, गौ भी कहे यही रंभाय।
वातायन से छन कर आती, प्रात-प्रभा भी यही सुनाय।।

पर आलस का मारा मानस, इस सब से रह कर अनजान।
बिस्तर पे ही पड़ा पड़ा वह, दिन का कर देता अवसान।।
ऊहापोह भरी मन-स्थिति के, घोड़े दौड़ा बिना लगाम।
नये बहाने नित्य गढ़े वह, टालें कैसे दैनिक काम।।

मानव की हर प्रगति-राह में, खींचे आलस उसके पाँव।
अकर्मण्य रूखे जीवन पर, सुख की पड़ने दे नहिं छाँव।।
कार्य-क्षेत्र में नहिं बढ़ने दे, हर लेता जो भी है पास।
घोर व्यसन यह तन मन का जो, जीवन में भर देता त्रास।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन,
तिनसुकिया
02-09-16

32 मात्रिक छंद "अनुत्तरित प्रश्न"

जो भी विषय रखो तुम आगे, प्रश्न सभी के मन में मेरे।
प्रश्न अधूरे रह जाते हैं, उत्तर थोड़े प्रश्न घनेरे।।
रह रह करके प्रश्न अनेकों, मन में हरदम आते रहते।
नहीं सूझते उत्तर उनके, बनता नहीं किसी से कहते।।

झूठ, कपट ले कर के कोई, जग में जन्म नहीं लेता है।
दिया राम का सब कुछ तो फिर, राम यही क्या सब देता है?
दूर सदा हम दुख से भागें, रहना सुख में हरदम चाहें।
हत्या कर जीवों की फिर क्यों, लेते उनकी दारुण आहें?

'साँच बरोबर तप' को हम सब, बचपन से ही रटते आये।
बात बात में क्यों फिर हमको, झूठ बोलना निशदिन भाये?
ओरों से अपमानित हम हों, घूँट लहू के आये पीते।
अबलों, दुखियों की फिर हम क्यों, रोज उपेक्षा करके जीते?

सन्तानों से हम सब चाहें, आज्ञा सब हमरी वे माने।
मात पिता बूढ़े जब होते, बोझ समझ क्यों देते ताने?
मान मिले हमको सब से ही, चाहत मन में सदा रही है।
करते रहें निरादर सबका, क्या हमरी ये नीत सही है?

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
12-11-16

रोचक छंद "फागुन मास"

फागुन मास सुहावना आया।
मौसम रंग गुलाल का छाया।।
पुष्प लता सब फूल के सोहे।
आज बसन्त लुभावना मोहे।।

ये ऋतुराज बड़ा मनोहारी।
दग्ध करे मन काम-संचारी।।
यौवन भार लदी सभी नारी।
फागुन के रस भीग के न्यारी।।

आज छटा ब्रज में नई राचे।
खेलत फाग सभी यहाँ नाचे।।
गोकुल ग्राम उछाह में झूमा।
श्याम यहाँ हर राह में घूमा।।

कोयल बागन बीच में कूँजे।
श्यामल भंवर बौर पे गूँजे।।
शीत विदा अब माँगके जाए।
ग्रीष्म पसारत पाँव को आए।।
==================
लक्षण छंद:-

"भाभरगाग" रचें सभी भाई।
'रोचक' छंद सजे तभी आई।।

"भाभरगाग" = भगण भगण रगण गुरु गुरु

211  211  212  22 = 11 वर्ण
चार चरण। दो दो समतुकांत
********************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
19-02-2017

रुचि छंद "कालिका स्तवन"

माँ कालिका, लपलप जीभ को लपा।
दुर्दान्तिका, रिपु-दल की तु रक्तपा।।
माहेश्वरी, खड़ग धरे हुँकारती।
कापालिका, नर-मुँड माल धारती।।

तू मुक्त की, यह महि चंड मुंड से।
विच्छेद के, असुरन माथ रुंड से।।
गूँजाय दी, फिर नभ अट्टहास से।
थर्रा गये, तब त्रयलोक त्रास से।।

तू हस्त में, रुधिर कपाल राखती।
आह्लादिका,असुर-लहू चाखती।।
माते कृपा, कर अवरुद्ध है गिरा
पापों भरे, जगत-समुद्र से तिरा।।

हो सिंह पे, अब असवार अम्बिका।
संसार का, सब हर भार चण्डिका।।
मातेश्वरी, वरद कृपा अपार दे।
निस्तारिणी, जगजननी तु तार दे।।
================
लक्षण छंद:-

"ताभासजा, व ग" यति चार और नौ।
ओजस्विनी, यह 'रुचि' छंद राच लौ।।

"ताभासजा, व ग" = तगण भगण सगण जगण गुरु
(221  211  112   121   2)
13 वर्ण, 4 चरण, (यति 4-9)
[दो-दो चरण समतुकांत]
*************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
30-01-19

Wednesday, December 4, 2019

ग़ज़ल (चढ़ी है एक धुन मन में)

ग़ज़ल (चढ़ी है एक धुन मन में)

नारी शक्ति को समर्पित मुसलसल ग़ज़ल।

1222   1222   1222   1222

चढ़ी है एक धुन मन में पढ़ेंगी जो भी हो जाए,
बड़ी अब इस जहाँ में हम बनेंगी जो भी हो जाए।

कोई कमजोर मत समझो नहीं हम कम किसी से हैं,
सफलता की बुलन्दी पे चढ़ेंगी जो भी हो जाए।

बहुत गहरी है खाई नर व नारी में सदा से ही,
बराबर उसको करने में लगेंगी जो भी हो जाए।

हिक़ारत से नहीं देखे हमें दुनिया समझ ले अब,
नहीं हक़ जो मिला लेके रहेंगी जो भी हो जाए।

जमीं हो आसमां चाहे समंदर हो या पर्वत हो,
मिला कदमों को मर्दों से चलेंगी जो भी हो जाए।

भरेंगी फौज को हम भी चलेंगी संग सैना के,
वतन के वास्ते हम भी लड़ेंगी जो भी हो जाए।

हिमालय से इरादे हैं अडिग विश्वास वालीं हम,
'नमन' हम पूर्ण मन्सूबे करेंगी जो भी हो जाए।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन,
तिनसुकिया
17-10-2016

ग़ज़ल (लगाए बहुत साल याँ आते आते)

बह्र:- 122  122  122  122

लगाए बहुत साल याँ आते आते,
रुला ही दिया क़द्र-दाँ आते आते।

बहुत थक गए हम रह-ए-ज़िन्दगी में,
थकीं पर न दुश्वारियाँ आते आते।

घुटी साँस ज्यूँ ही गली आई उनकी,
न मर जाएँ उनका मकाँ आते आते।

करें याद गर वो ज़रा भी नहीं ग़म,
निकल जाए दम हिचकियाँ आते आते।

बड़ी गर्मजोशी से दावत सजी थी,
हुआ ठंडा सब मेज़बाँ आते आते।

बताऐँ तुझे क्या ए ख्वाबों की मंज़िल,
कहाँ पहुँचे थे हम यहाँ आते आते।

'नमन' क्या बचा जो करें फ़िक्र उसकी,
लुटा कारवाँ पासबाँ आते आते।

(पासबाँ - रक्षक, चौकीदार)

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
15-10-19

ग़ज़ल (चरागों के साये में बुझते रहे)

बह्र:- 122  122  122  12

चरागों के साये में बुझते रहे,
अँधेरे में पर हम दहकते रहे।

डगर गर न आसाँ तो परवाह क्या,
भरोसा रखे खुद पे चलते रहे।

जमाना हमें खींचता ही रहा,
मगर था हमें बढ़ना बढ़ते रहे।

जहाँ से थपेड़े ही खाये सदा,
मगर हम मुसीबत में ढलते रहे।

जवानों के जज़्बे का क्या हम कहें,
सदा हाथ दुश्मन ही मलते रहे।

महब्बत की मंजिल न ढूंढे मिली,
कदम दर कदम हम भटकते रहे।

गुलाबों सी फितरत मिली है 'नमन',
गले से लगा खार हँसते रहे।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
2-09-19

ग़ज़ल (मुसीबतों में जो घिर के बिखरते जाते हैं)

बह्र: 1212  1122  1212  22

मुसीबतों में जो घिर के बिखरते जाते हैं,
समझ लो पंख वे खुद के कतरते जाते हैं।

अकेले आहें भरें और' सिहरते जाते हैं,
किसी की यादों में लम्हे गुजरते जाते हैं।

हजार आफ़तों में भी जो मुस्कुरा के जियें,
वे ज़िंदगी में सदा ही निखरते जाते हैं।

सभी के साथ मिलाकर क़दम जो चलते नहीं,
वो हर मक़ाम पे यारो ठहरते जाते हैं।

किसी के इश्क़ का ऐसा असर हुआ उनपर
कि देख आइना घँटों सँवरते जाते हैं।

उलझ के दुनिया की बातों में जो नहीं रहते,
वो ज़िन्दगी में बड़े काम करते जाते हैं

'नमन' तू उनसे बचा कर ही चलना दामन को,
जो दूसरों पे ही इल्ज़ाम धरते जाते हैं।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
05-10-19

Tuesday, November 26, 2019

दोहा "राम महिमा"

शीश नवा वन्दन करूँ, हृदय बसो रघुनाथ।
तुलसी के प्रभु रामजी, धनुष बाण ले हाथ।।

राही अब तो चेत जा, भज ले मन से राम।
कष्ट मिटे सब राह के, बनते बिगड़े काम।।

महिमा है प्रभु राम की, चारों ओर अनंत।
गावै वेद पुराण सब, ऋषि मुनि साधू संत।।

रघुकुल भूषण राम का, ऐसा प्रखर प्रताप।
नाम जाप से ही कटे, भव के सारे पाप।।

दीन पतित जन का सदा, राम करे उद्धार।
प्रभु से बढ़ कर कौन जो, भव से करता पार।।

सीता माता लाज रख, नित करता मैं ध्यान।
देकर के आशीष तुम, मात बढ़ाओ मान।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
10-01-19

ताँका (संदल तन)

जापानी विधा (5-7-5-7-7)

संदल तन
चंचल चितवन
धीरे मुस्काना,
फिर आँख झुकाना
कर देता दीवाना।
**

उजड़े बाग
धूमिल है पराग
कागजी फूल,
घरों में सज रहे
पर्यावरण दहे।
**

अच्छा सोचना
लिखना व बोलना
अलग बात,
उस पर चलना
सब की न औकात।
**

शीत कठोर!
स्मृति-सलाकाओं पे
बुनूँ स्वेटर,
माँ के खोये नेह का
कुछ तो गर्मी वो दे।
**

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
10-11-2019

Tuesday, November 19, 2019

क्षणिका (लोकतंत्र)

कुछ इंसान शेर
बाकी बकरियाँ,,,,
कुछ बाज
बाकी चिड़ियाँ,,
कुछ मगर, शार्क
बाकी मछलियाँ,,
और जब ये सब,
बकरी, चिड़िया, मछली,,
अपनी अपनी राग में
अलग अलग सुर में,
इन शेर, बाज, शार्क से,
जीने का हक और
सुरक्षा माँगने लगें,
तो समझ लें
यही लोकतंत्र है?

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
30-06-19

सेदोका (निर्झर)

5-7-7-5-7-7 वर्ण

(1)
स्वच्छ निर्झर
पर्वत से गिरता,
नदी बन बहता।
स्वार्थी मानव!
डाले कूड़ा कर्कट,
समस्या है विकट।
**

(2)
निर्झर देता
जीवन रूपी जल,
चीर पर्वत-तल।
सदा बहना
शीत ताप सहना,
है इसका गहना।
**

(3)
यह झरना
जो पर्वत से छूटा,
सीधा भू पर फूटा।
धवल वेणी,
नभ से धरा तक
सर्प सी लहराए।
**

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
29-06-19

मनहरण घनाक्षरी "कतार की महिमा"


                               (1)
जनसंख्या भीड़ दिन्ही, भीड़ धक्का-मुक्की किन्ही,
धक्का-मुक्की से ही बनी, व्यवस्था कतार की।

राशन की हो दुकान, बैंकों का हो भुगतान,
चाहे लेना हो मकान, महिमा कतार की।

देना हो जो इम्तिहान, लेना हो या अनुदान,
दर्श भगवान का हो, है छटा कतार की।

दिखलाओ चाहे मर्ज, लेना हो या फिर कर्ज,
वोट देने नोट लेने, में प्रभा कतार की।।

                       (2)
माचे खलबली घोर, छाये चहुँ ओर शोर,
नियंत्रित भीड़ झट, करत कतार है।

हड़कम्प मचे जब, उथल-पुथल सब,
सीख अनुशासन की, देवत कतार है।

भीड़ सुशासित करे, अव्यवस्था झट हरे,
धैर्य की भी पहचान, लेवत कतार है।

मोतियों की माल जैसे, लोग जुड़ते हैं वैसे,
संगठन के बल से, बनत कतार है।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
7-12-16

शिव महिमा

7 भगण (211) की आवृत्ति के बाद 2 गुरु


भष्म रमाय रहे तन में प्रभु, चन्द्र बसे सज माथ तिहारे।
वीर षडानन मूषक वाहन, बन्धुन के तुम तात दुलारे।
पावन गंग सजे सर ऊपर, भाल त्रिपुण्ड सदैव सँवारे।
शंकर नाथ अनाथन के तुम, दीनन के तुम एक सहारे।

बासुदेव अग्रवाल नमन
तिनसुकिया
25-07-17

Thursday, November 14, 2019

मुक्तक (राजनैतिक व्यंग)

एक राजनैतिक व्यंग मुक्तक

भारत के जब से वित्त मंत्री श्री जेटली।
तुगलकी फरमानों की नित खुलती पोटली।
मोदीजी इनसे बचके रहें आप तो जरा।
पकड़ा न दें ये चाय की वो फिर से केटली।।

*********
(चीन पर व्यंग)

सामान बेचते हो आँख भी दिखा रहे।
फूटी किस्मत में चीन धूल क्यों लिखा रहे।
ग्राहक भगवान का ही दूसरा है रूप।
व्यापार की ये रीत तुझे हम सिखा रहे।।

*********
(राहुल गांधी की हार पर व्यंग)

हार क्यों मेरी हुई यह सोच मैं हलकान हूँ,
कैसे चौकीदार अंकल जीता मैं अनजान हूँ,
लोग क्यों पप्पू मुझे कहते इसे समझा नहीं,
माँ बता दे तू मुझे क्या मैं अभी नादान हूँ।

(2122*3+212)
*********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-05-19

मुक्तक (भाव-प्रेरणा)

नन्दन कानन में स्मृतियों के, खोया खोया मैं रहता हूँ,
अवचेतन के राग सुनाने, भावों में हर पल बहता हूँ,
रहता सदा प्रतीक्षा रत मैं, कैसे नई प्रेरणा जागे,
प्रेरित उससे हो भावों को, काव्य रूप में तब कहता हूँ।

बहे काव्य धारा मन में नित, गोते जिसमें खूब लगाऊँ,
दिव्य प्रेरणा का अभिनन्दन, भावों में बह करता जाऊँ,
केवट सा बन कर खेऊँ मैं,  भावों की बहती जल धारा,
भाव गीत बन के तब उभरे, केवट का मैं गान सुनाऊँ।

(32 मात्रिक छंद)

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया।
14-04-18

मुक्तक (समसामयिक-1)

(विश्वकर्मा तिथि)

सत्रह सेप्टेंबर की तिथि है, देव विश्वकर्मा की न्यारी,
सृजन देव ये कहलाते हैं, हाथी जिनकी दिव्य सवारी,
अर्चन पूजा कर इनकी हम, सुध कुछ उनकी भी ले लेते,
जिन मजदूरों से इस भू पर, खिलती निर्माणों की क्यारी।

(32 मात्रिक छंद)
*********

मुक्तक (बधाई, शुभ संदेश)

अहो भाग्य भारत का यह है, मोदी जी सा नेता पाया,
देव विश्व कर्मा की तिथि पर, जन्म दिवस उनका शुभ आया,
सत्तरवें इस जन्म दिवस की, भावों भरी बधाई उनको,
भारत की क्षमता का लोहा, जग भर से जिनने मनवाया।

(समान सवैया)

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
17-09-20
*******

(पर्यटक दिवस)

विश्व-पर्यटक दिन घोषित है, दिवस सताइस सेप्टेंबर,
घोषित किंतु नहीं कोई है, सार्वजनिक छुट्टी इस पर,
मार दोहरी के जैसा है, आज पर्यटन बिन छुट्टी,
आफिस में पैसे कटते हैं, बाहर के खर्चे दूभर।

(लावणी छंद)

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
19-10-2016

देव घनाक्षरी (सिंहावलोकन के साथ)

8+8+8+9 अंत नगण

भड़क के ऑफिस से, आज फिर सैंया आए,
लगता पड़ी है डाँटें, बॉस की कड़क कड़क।

कड़क गरजते हैं, घर में ये बिजली से,
वहाँ का दिखाए गुस्सा, यहाँ पे फड़क फड़क।

फड़क के बोले शब्द, दिल भेदे तीर जैसे,
छलनी कलेजा हुआ, करता धड़क धड़क,

धड़क बढे है ज्यों ज्यों, आ रहा रुदन भारी,
सुलगे जिया में अब, आग ये भड़क भड़क।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
16-10-19

डमरू घनाक्षरी

8 8 8 8  --32 मात्रा (बिना मात्रा के)

मन यह नटखट, छण छण छटपट,
मनहर नटवर, कर रख सर पर।

कल न पड़त पल, तन-मन हलचल,
लगत सकल जग, अब बस जर-जर।

चरणन रस चख, दरश-तड़प रख,
तकत डगर हर, नयनन जल भर।

मन अब तरसत, अवयव मचलत,
नटवर रख पत, जनम सफल कर।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
1-03-18

Sunday, November 10, 2019

रसाल छंद "यौवन"

यौवन जब तक द्वार, रूप रस गंध सुहावत।
बीतत दिन जब चार, नाँहि  मन को कछु भावत।।
वैभव यह अनमोल, व्यर्थ मत खर्च इसे कर।
वापस कबहु न आय, खो अगर दे इसको नर।।

यौवन सरित समान, वेगमय चंचल है अति।
धीर हृदय मँह धार, साध नर ले इसकी गति।।
हो कर इस पर चूर, जो बढ़त कार्य बिगारत।
जो पर चलत सधैर्य, वो सकल काज सँवारत।।

यौवन सब सुख सार, स्वाद तन का यह पावन।
ये नित रस परिपूर्ण, ज्यों बरसता मधु सावन।।
दे जब तक यह साथ, सृष्टि लगती मनभावन।
जर्जर जब तन होय, घोर तब दे झुलसावन।।

कांति चमक अरु वीर्य, पूर्ण जब देह रहे यह।
मानव कर तु उपाय, पार भव हो जिनसे यह।।
रे नर जनम सुधार,  यत्न करके जग से तर।
जीवन यह उपहार, व्यर्थ इसको मत तू कर।। 
=================
लक्षण छंद:-

"भानजभजुजल" वर्ण, और यति नौ दश पे रख।
पावन मधुर 'रसाल', छंद-रस रे नर तू चख।।

"भानजभजुजल" = भगण नगण जगण भगण जगण जगण लघु।
211 111 121 // 211 121 121 1
19 वर्ण, यति 9,10 वर्ण पर, दो दो या चारों चरण समतुकांत।

(इसका मात्राविन्यास रोला छंद से मिलता है। रसाल गणाश्रित छंद है अतः हर वर्ण की मात्रा नियत है जबकि रोला मात्रिक छंद है और ऐसा बन्धन नहीं है।)
*******************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
16-10-17

जय गोविंदजी की टिप्पणी 5-4-19 काव्य सम्मेलन
लेखन चलत अमंद, भाव भर खूब लुभावत
पावन मधुर रसाल, छंद नित गान जु गावत
धन्य नमन कविराय, नेह भर छंद रचावत
ज्ञान जु अनुपम तोर, भान नित नव्य करावत।

रसना छंद "पथिक आह्वाहन"

डगर कहे चीख, जरा ठहर पथिक सुनो।
कठिन सभी मार्ग, सदैव कर मनन चुनो।
जगत भरा कंट, परन्तु तुम सँभल चलो।
तमस भरी रात, प्रदीप बन स्वयम जलो।।

दुखमय संसार, अभाव अधिकतर सहे।
सुखमय तो मात्र, कुछेक सबल जन रहे।।
रह उनके साथ, विनष्ट यह जग जिनका।
कुछ करके काज, बसा घर नवल उनका।।

तुम कर के पान, समस्त दुख विपद बढ़ो।
गिरि सम ये राह, बना सरल सुगम चढ़ो।।
तुम रख सौहार्द्र, सुकार्य अबल-हित करो।
इस जग में धीर, सुवीर बन कर उभरो।।

विकृत हुआ देश, हवा बहत अब पछुआ।
सब चकनाचूर, यहाँ ऋषि-अभिमत हुआ।।
तुम बन आदर्श, कदाचरण सकल हरो।
यह फिर से देश, समृद्ध पथिक तुम करो।।
================
लक्षण छंद:-

"नयसननालाग", रखें सत अरु दश यतिं।
मधु 'रसना' छंद, रचें  ललित मृदुल गतिं।

"नयसननालाग" = नगण यगण सगण नगण नगण लघु गुरु।

( 111  122  1,12  111  111  12 )
17वर्ण, यति{7-10} वर्णों पर,4 चरण
दो-दो चरण समतुकांत।
*********************
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-01-19

रमेश छंद "नन्ही गौरैया"

फुदक रही हो तरुवर डाल।
सुन चिड़िया दे कह निज हाल।।
उड़ उड़ छानो हर घर रोज।
तुम करती क्या नित नव खोज।।

चितकबरी रंगत लघु काय।
गगन परी सी हृदय लुभाय।।
दरखत पे तो कबहु मुँडेर।
फुर फुर जाती करत न देर।।

मधुर सुना के तुम सब गीत।
वश कर लेती हर घर जीत।।
छत पर दाना जल रख लोग।
कर इसका ले रस उपभोग।।

चहक बजाती मधुरिम साज।
इस चिड़िया का सब पर राज।।
नटखट नन्ही मन बहलाय।
अब इसको ले जगत बचाय।।
================
लक्षण छंद:-

"नयनज" का दे गण परिवेश।
रचहु सुछंदा मृदुल 'रमेश'।।

"नयनज" = [ नगण यगण नगण जगण]
( 111  122  111  121 )
12 वर्ण, 4 चरण, दो-दो चरण समतुकांत।
**********************
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
27-01-19

सोरठा "कृष्ण महिमा"

नयन भरा है नीर, चखन श्याम के रूप को।
मन में नहिं है धीर, नयन विकल प्रभु दरस को।।

शरण तुम्हारी आज, आया हूँ घनश्याम मैं।
सभी बनाओ काज, तुम दीनन के नाथ हो।।

मन में नित ये आस, वृन्दावन में जा बसूँ।
रहूँ सदा मैं पास, फागुन में घनश्याम के।।

फूलों का श्रृंगार, माथे सजा गुलाल है।
तन मन जाऊँ वार, वृन्दावन के नाथ पर।।

पड़त नहीं है चैन, टपक रहे दृग बिंदु ये।
दिन कटते नहिं रैन, श्याम तुम्हारे दरस बिन।।

हे यसुमति के लाल, मन मोहन उर में बसो।
नित्य नवाऊँ भाल, भव बन्धन सारे हरो।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
30-04-19

सोरठा "विधान"

दोहा की तरह सोरठा भी अर्ध सम मात्रिक छंद है। इसमें भी चार चरण होते हैं। प्रथम व तृतीय चरण विषम तथा द्वितीय व चतुर्थ चरण सम कहे जाते हैं। सोरठा में दोहा की तरह दो पंक्तियाँ होती हैं और प्रत्येक पंक्ति में २४ मात्राएँ होती हैं। सोरठा और दोहा के विधान में कोई अंतर नहीं है केवल चरण पलट जाते हैं। दोहा के सम चरण सोरठा में विषम बन जाते हैं और दोहा के विषम चरण सोरठा के सम। तुकांतता भी वही रहती है। यानि सोरठा में विषम चरण में तुकांतता निभाई जाती है जबकि पंक्ति के अंत के सम चरण अतुकांत रहते हैं।

दोहा और सोरठा में मुख्य अंतर गति तथा यति में है। दोहा में 13-11 पर यति होती है जबकि सोरठा में 11 - 13 पर यति होती है। यति में अंतर के कारण गति में भी भिन्नता रहती है।

मात्रा बाँट प्रति पंक्ति
8+2+1, 8+2+1+2

परहित कर विषपान, महादेव जग के बने।
सुर नर मुनि गा गान, चरण वंदना नित करें।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

Tuesday, November 5, 2019

ग़ज़ल (दुनिया है अलबेली)

बहरे मीर:- 2*6

दुनिया है अलबेली,
ये अनबूझ पहेली।

कड़वा जगत-करेला,
रस लो तो गुड़-भेली।

गले लगा या ठुकरा,
पर मत कर अठखेली।

किस्मत भोज बनाये,
या फिर गंगू तेली।

नेता आज छछूंदर,
सर पे मले चमेली।

आराजक बन छाये,
सत्ता जिनकी चेली।

'नमन' उठा सर जीओ,
दुनिया बना सहेली।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
31-08-19

ग़ज़ल (छेड़ाछाड़ी कर जब कोई)

बह्र:- 2222 2222 2222 222

छेड़ाछाड़ी कर जब कोई सोया शेर जगाए तो,
वह कैसे खामोश रहे जब दुश्मन आँख दिखाए तो।

चोट सदा उल्फ़त में खायी अब तो ये अंदेशा है,
उसने दिल में कभी न भरने वाले जख्म लगाए तो।

जनता ये आखिर कब तक चुप बैठेगी मज़बूरी में,
रोज हुक़ूमत झूठे वादों से इसको बहलाए तो।

अच्छे और बुरे दिन के बारे में सोचें, वक़्त कहाँ,
दिन भर की मिहनत भी जब दो रोटी तक न जुटाए तो।

उसके हुस्न की आग में जलते दिल को चैन की साँस मिले,
होश को खो के जोश में जब भी वह आगोश में आए तो।

हाय मुहब्बत की मजबूरी जोर नहीं इसके आगे, 
रूठ रूठ कोई जब हमसे बातें सब मनवाए तो।

दुनिया के नक्शे पर लाये जिसको जिस्म तोड़ अपना,
टीस 'नमन' दिल में उठती जब खंजर वही चुभाए तो।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
15-10-17

ग़ज़ल (इंसान के खूँ की नहीं)

ग़ज़ल (इंसान के खूँ की नहीं)

बह्र:- 2212*4

इंसान के खूँ की नहीं प्यासी कभी इंसानियत,
पर खून बहता ही रहा, रोती रही इंसानियत।

चोले में हर इंसान के रहती छिपी इंसानियत।
पर चूर मद में नर भुला देते यही इंसानियत।

आतंक का ले कर सहारा जी रहें वे सोच लें,
लाचार दहशतगर्दी से हो कब डरी इंसानियत।

जो बन के जालिम जुल्म अबलों पर करें खूँखार बन,
वे लोग जिंदा दिख रहे पर मर गई इंसानियत।

बौछार करते गोलियों की भीड़ पर आतंकी जब,
उस भीड़ की दहशत में तब सिसकारती इंसानियत।

जग को मिटाने की कोई जितनी भी करलें कोशिशें,
दुनिया चलेगी यूँ ही जबतक है बची इंसानियत।

थक जाओगे आतंकियों तुम जुल्म कर कहता 'नमन',
आतंक के आगे न झुकना जानती इंसानियत।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
22-08-16

ग़ज़ल (हिन्दी हमारी जान है)

बह्र:- 2212   2212

हिन्दी  हमारी जान है,
ये देश की पहचान है।

है मात जिसकी संस्कृत,
माँ  शारदा का दान है।

साखी  कबीरा की यही,
केशव की न्यारी शान है।

तुलसी की रग रग में बसी,
रसखान की ये तान है।

ये सूर  के  वात्सल्य में,
मीरा का इसमें गान है।

सब छंद, रस, उपमा की ये
हिन्दी हमारी खान है।

उपयोग  में  लायें इसे,
अमृत का ये तो पान है।

ये  मातृभाषा विश्व में,
सच्चा हमारा मान है।

इसको करें हम नित 'नमन',
भारत की हिन्दी आन है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
14-09-2016

Friday, October 25, 2019

रमणीयक छंद "कृष्ण महिमा"

मोर पंख सर पे, कर में मधु बाँसुरी।
पीत वस्त्र, कटि में कछनी अति माधुरी।।
ग्वाल बाल सँग धेनु चरावत मोहना।
कौन नित्य नहिं चाहत ये छवि जोहना।।

दिव्य रूप मनमोहन का नर चाख ले।
नाम-जाप रस को मन में तुम राख ले।।
कृष्ण श्याम मुरलीधर मोहन साँवरा।
एक नाम कछु भी जपले मन बावरा।।

मैं गँवार मति पाप-लिप्त अति दीन हूँ।
भोग और धन-संचय में बस लीन हूँ।।
धर्म आचरण का प्रभु मैं नहिं विज्ञ हूँ।
भाव भक्ति अरु अर्चन से अनभिज्ञ हूँ।।

मैं दरिद्र शरणागत हो प्रभु आ गया।
हाथ थाम कर हे ब्रजनाथ करो दया।।
भीर कोउ पड़ती तुम्हरा तब आसरा।
कष्टपूर्ण भव-ताप हरो इस दास रा।।
===================
लक्षण छंद:-

वर्ण राख कर पंच दशं "रनभाभरा"।
छंद राच 'रमणीयक' हो मन बावरा।।

"रनभाभरा" = रगण नगण भगण भगण रगण
212 111 211 211 212 =15 वर्ण
चार चरण, दो दो या चारों समतुकांत।
**********************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

13-07-17

रथपद छंद "मधुर स्मृति"

जब तुम प्रियतम में खोती।
हलचल तब मन में होती।।
तुम अतिसय दुख की मारी।
विरह अगन सहती सारी।।

बरसत अँसुवन की धारा।
तन दहकत बन अंगारा।।
मरम रहित जग से हारी ।
गुजर करत सह लाचारी।।

निश-दिन तब कितने प्यारे।
जब पिय प्रणय-सुधा डारे।।
तन मन हरषित था भारी।
सरस प्रकृति नित थी न्यारी।।

मधुरिम स्मृति गठरी ढ़ोती।
स्मर स्मर कर उनको रोती।।
लहु कटु अनुभव का पीती।
बस दुख सह कर ही जीती।।
============
लक्षण छंद:-

"ननुसगग" वरण की छंदा।
'रथपद' रचत सभी बंदा।।

"ननुसगग" =  नगण नगण सगण गुरु गुरु

( 111  111  112   2   2 )
11वर्ण,4 चरण, दो-दो चरण समतुकांत
***************
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-01-19

गीता महिमा (कुंडलियाँ)

गीता अद्भुत ग्रन्थ है, काटे भव की दाह।
ज्ञान अकूत भरा यहाँ, जिसकी कोइ न थाह।
जिसकी कोइ न थाह, लगाओ जितना गोता।
कटे पाप की पाश, गात मन निर्मल होता।
कहे 'बासु' समझाय, ग्रन्थ यह परम पुनीता।
सब ग्रन्थों का सार, पढें सारे नित गीता।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
17-12-18

Wednesday, October 23, 2019

गीत (छठ मैया)

चरणन में छठ माँ के,
कोसिया भरावण के,
दऊरा उठाई चले,
सब नर नार हो।

गंगा के घाट लगी,
भीड़ भगतन की,
देखो छठ मइया की,
महिमा अपार हो।

माथे पे सब चले दऊरा उठाई,
बबुआ, देवर, कहीं भतीजा, भाई,
सुहानी नार सजी,
बिहाने बिहाने चली,
पग में महावर लगी,
सँग भरतार हो।

जल में खड़े हो अर्घ देवन को,
उगते सूरज की पूजा करन को,
सब दिवले जलाये,
फल, पुष्पन चढाये,
माला अर्पण करे,
करो स्वीकार हो।

छठ माई पूर्ण करो इच्छाएँ सारी,
तेरी तो महिमा जग में है भारी,
अन-धन भंडार भरो,
सब को निरोग रखो,
चाही सन्तान देवो,
सुखी संसार हो।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
10-11-2018

नवगीत (मन-भ्रमर)

मन-भ्रमर काव्य-उपवन में
पगले डोल।

जिन कलियों को नित चूमे,
जिन पर तुम गुंजार करे,
क्यों मग्न हुआ इतना झूमे,
निश्चित उनका मकरंद झरे,
लो ठीक से तोल।
  मन-भ्रमर काव्य-उपवन में
  पगले डोल।

क्षणिक मधु के पीछे भागे,
नश्वर सुख में है तु रमा,
कैसे तेरे भाग हैं जागे,
जो इनमें तु रहा समा,
मन की गाँठें खोल।
  मन-भ्रमर काव्य-उपवन में
  पगले डोल।

नव रस के जहाँ पुष्प खिले,
शांत, करुण तो और श्रृंगार,
वात्सल्य कभी तो भक्ति मिले,
तो वीर, हास्य की है फुहार,
जीवन में इनको घोल।
  मन-भ्रमर काव्य-उपवन में
  पगले डोल।

छंदों के रंग बिरंगे हैं दल,
रस अनेक भाव के यहाँ भरे,
जीवन यहाँ का निश्छल,
अलंकार सब सन्ताप हरे,
ना इनका कोई मोल।
  मन-भ्रमर काव्य-उपवन में
  पगले डोल।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-08-2016

Sunday, October 20, 2019

कुण्डला मौक्तिका (बेटी)

(पदांत 'बेटी', समांत 'अर')

बेटी शोभा गेह की, मात पिता की शान,
घर की है ये आन, जोड़ती दो घर बेटी।।
संतानों को लाड दे, देत सजन को प्यार,
रस की करे फुहार, नेह दे जी भर बेटी।।

रिश्ते नाते जोड़ती, मधुर सभी से बोले,
रखती घर की एकता, घर के भेद न खोले।
ममता की मूरत बड़ी, करुणा की है धार,
घर का सामे भार, काँध पर लेकर बेटी।।

परिचर्या की बात हो, नारी मारे बाजी,
सेवा करती धैर्य से, रोगी राखे राजी।
आलस सारा त्याग के, करती सारे काम,
रखती अपना नाम, सभी से ऊपर बेटी।।

लगे अस्मिता दाव पे, प्रश्न शील का आए,
बड़ी जागरुक नार है, खल कामी न सुहाए।
लाख प्रलोभन सामने, इज्जत की हो बात,
नहीं छून दे गात, मारती ठोकर बेटी।।

चले नहीं नारी बिना, घर गृहस्थ की गाडी,
पूर्ण काज सम्भालती, नारी सब की लाडी।
हक देवें, सम्मान दें, उसकी लेवें राय,
दिल को लो समझाय, नहीं है नौकर बेटी।।

जिस हक की अधिकारिणी, कभी नहीं वह पाई,
नर नारी के भेद की, पाट सकी नहिं खाई।
पीछा नहीं छुड़ाइए, देकर चुल्हा मात्र,
सदा 'नमन' की पात्र, रही जग की हर बेटी।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
14-10-2016

Friday, October 18, 2019

दुर्मिल सवैया (सरस्वती वंदना)

(8सगण)

शुभ पुस्तक हस्त सदा सजती, पदमासन श्वेत बिराजत है।
मुख मण्डल तेज सुशोभित है, वर वीण सदा कर साजत है।
नर-नार बसन्तिय पंचम को, सब शारद पूजत ध्यावत है।
तुम हंस सुशोभित हो कर माँ, प्रगटो वर सेवक माँगत है।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
01-02-2017

विजया घनाक्षरी (कामिनी)

(8, 8, 8, 8 पर यति अनिवार्य।
प्रत्येक यति के अंत में हमेशा लघु गुरु (1 2) अथवा 3 लघु (1 1 1) आवश्यक।
आंतरिक तुकान्तता के दो रूप प्रचलित हैं। प्रथम हर चरण की तीनों आंतरिक यति समतुकांत। दूसरा समस्त 16 की 16 यति समतुकांत। आंतरिक यतियाँ भी चरणान्त यति (1 2) या (1 1 1) के अनुरूप रखें तो उत्तम।)


तम में घिरी यामिनी, चमक रही दामिनी,
पिया में रमी कामिनी, कौन यह सुहासिनी।

आयी मिलने की घड़ी, व्याकुलता लिये बड़ी,
घर से निकल पड़ी, काम-विह्वल मानिनी।

सुनसान डगरिया, तन की न खबरिया,
लचकाय कमरिया, ठुमक चले भाविनी।

मन हरषाय रही, तन को लुभाय रही,
मद छलकाय रही, नार यह उमंगिनी।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
22-06-19

कृपाण घनाक्षरी (विनती)

8,8,8,8 अंत गुरु लघु हर यति समतुकांत।

जगत ये पारावार, फंस गया मझधार,
दिखे नहीं आर-पार, थाम प्रभु पतवार।

नहीं मैं समझदार, जानूँ नहीं व्यवहार,
कैसे करूँ मनुहार, करले तु अंगीकार।

चारों ओर भ्रष्टाचार, बढ़ गया दुराचार,
मच गया हाहाकार, धारो अब अवतार।

छाया घोर अंधकार, प्रभु कर उपकार,
करके तु एकाकार, करो मेरा बेड़ा पार।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
13-05-17

Monday, October 14, 2019

मुक्तक (आँसू)

मानस सागर की लहरों के हैं उफान मेरे आँसू,
वर्षों से जो दबी हृदय में वो पीड़ा कहते आँसू,
करो उपेक्षा मत इनकी तुम सुनलो ओ दुनियाँ वालों,
शब्दों से जो व्यक्त न हो उसको कह जाते ये आँसू।

(2×15)
*********

देख कर के आपकी ये जिद भरी नादानियाँ,
हो गईं लाचार सारी ही मेरी दानाइयाँ,
झेल जिनको कब से मैं बस खूँ के आँसू पी रहा,
लोग सरहाते बता कर आपकी ये खूबियाँ।

(2122*3 + 212)
**********

हम न वो राह से जो भटक जाएंगे,
इसकी दुश्वारियाँ देख थक जाएंगे,
हम तो खारों में भी हँसते गुल की तरह,
ये वो आँसू नहीं जो छलक जाएंगे

(212*3)
**********

बासुदेव अग्रवाल ,'नमन'
तिनसुकिया
24-08-17

मुक्तक (मुहब्बत)

अगर तुम मिल गई होती मुहब्बत और हो जाती,
खुशी के गीत गाते दिल की फ़ितरत और हो जाती,
लिखा जब ठोकरें खाना गिला करने से अब क्या हो,
मिले होते अगर दिल तो हक़ीक़त और हो जाती।

अगर ये दिल नहीं होता मुहब्बत फिर कहाँ होती,
मुहब्बत गर न होती तो इबादत फिर कहाँ होती,
इबादत के उसूलों पे टिके जग के सभी मजहब,
अगर मजहब न होता तो इनायत फिर कहाँ होती।

(1222*4)
*********

हर गीत मुहब्बत का चाहत से सँवारा है,
दी दिल ने सदा जब भी तुझको ही पुकारा है,
यादों में तेरी जानम दिन रो के गुजारें हैं,
तू फिर भी रहे रूठी कब दिल को गवारा है।

(221  1222)*2
*********

इश्क़ के चक्कर में ये कैसी ज़हालत हो गयी,
देखते ही देखते रुस्वा मुहब्बत हो गयी,
सोच ये आगे बढ़े थे, दिल पे उनका है करम,
पर किया ज़ाहिर तो बोले ये हिमाक़त हो गयी।

(2122*3 +  212)
*********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
20-08-17

पुछल्लेदार मुक्तक "चारा घोटाला"

बन्द तबेलों में सिसके हैं पड़ी पड़ी भैंसें सारी।
स्वारथ के अन्धों ने उनके पेटों पर लातें मारी।
बेच खा गये चारा उनका घोटाला करके भारी।
ऐसे चोर उचक्कों का क्या करलें भैसें बेचारी।।

चोरों ने किया चारा सारा मीसिंग,
की नोटों पे खूब कीसिंग,
अब जेलों में चक्की पीसिंग,
सुनो रे मेरे सब भाइयों
बासुदेव कवि पोल आज खोलिंग।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
22-04-18

मुक्तक (देश भक्ति)

सभी देशों में अच्छा देश भारतवर्ष प्यारा है,
खिले हम पुष्प इसके हैं बगीचा ये हमारा है,
हजारों आँधियाँ झकझोरती इसको सदा आईं,
मगर ये बाँटता सौरभ रहा उनसे न हारा है।

(1222*4)
*********

यह देश हमारी माँ, हम आन रखें इसकी।
चरणों में झुका माथा, सब शान रखें इसकी।
इस जन्म-धरा का हम, अब शीश न झुकने दें।
सब प्राण लुटा कर के, पहचान रखें इसकी।

(221 1222)*2
*********

देश के गद्दार जो हैं जान लो सब,
उनके' मंसूबों को' तुम पहचान लो सब,
नाग कोई देश में ना फन उठाए,
नौजवानों आज मन में ठान लो सब।

देश का ऊँचा करें मिल नाम हम सब,
देश-हित के ही करें बस काम हम सब,
एकता के बन परम आदर्श जग में,
देश को पावन बनाएं धाम हम सब।

(2122*3)
*********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
11-04-18

Thursday, October 10, 2019

सुजान छंद (पर्यावरण)

पर्यावरण खराब हुआ, यह नहिं संयोग।
मानव का खुद का ही है, निर्मित ये रोग।।

अंधाधुंध विकास नहीं, आया है रास।
शुद्ध हवा, जल का इससे, होय रहा ह्रास।।

यंत्र-धूम्र विकराल हुआ, छाया चहुँ ओर।
बढ़ते जाते वाहन का, फैल रहा शोर।।

जनसंख्या विस्फोटक अब, धर ली है रूप।
मानव खुद गिरने खातिर, खोद रहा कूप।।

नदियाँ मैली हुई सकल, वन का नित नाश।
घोर प्रदूषण जकड़ रहा, धरती, आकाश।।

वन्य-जंतु को मिले नहीं, कहीं जरा ठौर।
चिड़ियों की चहक न गूँजे, कैसा यह दौर।।

चेतें जल्दी मानव अब, ले कर संज्ञान।
पर्यावरण सुधारें वे, हर सब व्यवधान।।

पर्यावरण अगर दूषित, जगत व्याधि-ग्रस्त।
यह कलंक मानवता पर, हो जीवन त्रस्त।।
**********

(सुजान २३ मात्राओं का मात्रिक छंद है. इस छंद में हर पंक्ति में १४ तथा ९ मात्राओं पर यति तथा गुरु लघु पदांत का विधान है। अंत ताल 21 से होना आवश्यक है।)

***********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
13-06-19

सार छंद (वाल्मीकि ऋषि)

दस्यु राज रत्नाकर जग में, वाल्मीकि कहलाये।
उल्टा नाम राम का इनको, नारद जी जपवाये।।
मरा मरा से राम राम की, सुंदर धुन जब आई।
वाल्मीकि जी ने ब्रह्मा सी, प्रभुताई तब पाई।।

घोर तपस्या में ये भूले, तन की सुध ही सारी।
चींटे इनके तन से चिपटे, त्वचा पूर्ण खा डारी।।
प्रणय समाहित क्रोंच युगल को, तीर व्याध जब मारा।
प्रथम अनुष्टुप् छंद इन्होंने, करुणा में रच डारा।।

'नमन' आदि कवि को मेरा है, चरणों में है वन्दन।
शरद पूर्णिमा के दिन इनका, जग करता अभिनंदन।।
रामायण से महाकाव्य की, इनने सरित बहाई।
करे निमज्जन उसमें ये जग, होते राम सहाई।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
05-10-17

सार छंद "विधान"

सार छंद चार चरणों का समपाद मात्रिक छंद है। प्रति चरण 28 मात्रा होती है। यति 16 और 12 मात्रा पर है। दो दो चरण तुकान्त। मात्रा बाँट-
16 मात्रिक ठीक चौपाई वाला चरण और 12 मात्रा वाला में तीन चौकल अथवा एक अठकल और एक चौकल हो सकते हैं। 12 मात्रिक पद का   अंत गुरु या 2 लघु से होना आवश्यक है।

बासुदेव अग्रवाल नमन
तिनसुकिया

सरसी छंद "राजनाथजी"

भंभौरा में जन्म लिया है, यू पी का यक गाँव।
रामबदन खेतीहर के घर, अपने रक्खे पाँव।।
सन इक्यावन की शुभ बेला, गुजरातीजी मात।
राजनाथजी जन्म लिये जब, सबके पुलके गात।।

पाँव पालने में दिखलाये, होनहार ये पूत।
थे किशोर तेरह के जब ये, बने शांति के दूत।।
जुड़ा संघ से कर्मवीर ये, आगे बढ़ता जाय।
पीछे मुड़ के कभी न देखा, सब के मन को भाय।।

राजनाथ जी सदा रहे हैं, सभी गुणों की खान।
किया दलित पिछड़ों की खातिर, सदा गरल का पान।।
सदा देश का मान बढ़ाया, स्पष्ट बात को बोल।
हिन्दी को इनने दिलवाया, पूरे जग में मोल।।

गृह मंत्रालय थाम रखा है, होकर के निर्भीक।
सिद्धांतों पर कभी न पीटे, तुष्टिकरण की लीक।।
अभिनन्दन 'संसार करत है, 'नमन' आपको 'नाथ'।
बरसे सौम्य हँसी इनकी नित, बना रहे यूँ साथ।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया (असम)
28-09-17

तोमर छंद (अव्यवस्था)

हर नगर है बदहाल।
अब जरा देख न भाल।।
है व्यवस्था लाचार।
दिख रही चुप सरकार।।

वाहन खड़े यक ओर।
पशु सड़क बीच विभोर।।
कुछ बची शर्म न लाज।
हर तरफ जंगल राज।।

मन मौज में कुछ लोग।
हर चीज का उपयोग।।
वे करे निज अनुसार।
बन कर सभी पर भार।।

ये दौड़ अंधी आज।
जा रही दब आवाज।।
आराजकों का शोर।
बस अब दिखाये जोर।।
******
12 मात्रा। अंत ताल से आवश्यक। चार चरण। दो दो तुकांत।
बाँट 2-3-2-2-3(ताल)
*****

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
21-09-19

Sunday, October 6, 2019

ग़ज़ल (आँखों के तीर दिल)

बह्र:- 221  2121  1221  212

आँखों के तीर दिल में चुभा कर चले गये,
घायल को छोड़ मुँह को छुपा कर चले गये।

चुग्गा वे शोखियों का चुगा कर चले गये,
सय्याद बनके पंछी फँसा कर चले गये।

आना भी और जाना भी उनका था हादसा,
अनजान से ही मन में समा कर चले गये।

सहरा में है सराब सा उनका ये इश्क़ कुछ,
पूरे न हो वो ख्वाब दिखा कर चले गये।

ताउम्र क़ैद चाहता था अब्रे जुल्फ़ में,
दिखला घटा, वो प्यास बढ़ा कर चले गये।

अनजानों से न आँख लड़ाना ए दिल कभी,
ये सीख कीमती वे सिखा कर चले गये।

अब तो 'नमन' है चश्मे वफ़ा का ही मुंतज़िर,
ख्वाहिश हुजूर क्यों ये जगा कर चले गये।

सहरा=रेगिस्तान
सराब=मृगतृष्णा
अब्रे ज़ुल्फ़=जुल्फ का बादल
चश्मे वफ़ा=वफ़ा भरी नज़र
मुंतज़िर=प्रतीक्षारत

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-06-17

ग़ज़ल "ईद मुबारक़"

बह्र:- 221 1221 1221 122

रमजान गया आई नज़र ईद मुबारक,
खुशियों का ये दे सबको असर ईद मुबारक।

घुल आज फ़ज़ा में हैं गये रंग नये से,
कहती है ये खुशियों की सहर ईद मुबारक।

पाँवों से ले सर तक है धवल आज नज़ारा,
दे कर के दुआ कहता है हर ईद मुबारक।

सब भेद भुला ईद गले लग के मनायें,
ये पर्व रहे जग में अमर ईद मुबारक।

ये ईद है त्योहार मिलापों का अनोखा,
दूँ सब को 'नमन' आज मैं कर ईद मुबारक।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-06-17

ग़ज़ल (आजकल उनसे मुलाकातें)

बह्र:- 2122   2122   2122   212

आजकल उनसे मुलाकातें कहानी हो गईं,
शोखियाँ उनकी अदाएँ अब पुरानी हो गईं।

हम नहीं उनको मना पाये गए जब रूठ वों,
ज़िंदगी में गलतियाँ कुछ ना-गहानी हो गईं।

प्यार उनका पाने की मन में कई थी हसरतें,
चाहतें लेकिन वो सारी आज पानी हो गईं।

फाग बीता आ गई मधुमास की रंगीं फ़िजा,
टेसुओं की टहनियाँ सब जाफ़रानी हो गईं।

हुक्मरानों की बढ़ी है ऐसी कुछ चमचागिरी,
हरकतें बचकानी उनकी बुद्धिमानी हो गईं।

थे मवाली जो कभी वे आज नेता हैं बड़े,
देखिए सारी तवायफ़ खानदानी हो गईं।

बोलबाला आज अंग्रेजी का ऐसा देश में,
मातृ भाषाएँ हमारी नौकरानी हो गईं।

बंसी-वट पे साँवरे की जब कभी बंसी बजी,
गोपियाँ घर छोड़ उसकी ही दिवानी हो गईं।

हाथ रख सर पे सदा आगे बढ़ाते आये जो,
अब 'नमन' रूहें वो सारी आसमानी हो गईं।

ना-गहानी= अकस्मात्

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
16-03-2017

Saturday, October 5, 2019

ग़ज़ल (करे क्या हूर)

बह्र:- 122  21

करे क्या हूर
मिला लंगूर।

नहीं अब आस
जमाना क्रूर।

नहीं तहज़ीब,
जरा भी लूर।

दिखा मत आँख
यहाँ सब शूर।

दबे जो घाव
बने नासूर।

बड़े निरुपाय
व्यथा भरपूर।

'नमन' की नज़्म
बड़ी मगरूर।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-09-19

ग़ज़ल (कुछ अजीब धाराएं)

बह्र:- (212 1222)*2

कुछ अजीब धाराएं, थी घिरीं सवालों में,
अब फँसीं नहीं वे हैं, उन सियासी चालों में।

होता है कोई ऐसा, शख़्स पैदा सालों में,
छा जो जाये दुनिया के, सारे न्यूज वालों में।

बदगुमानी अब तक जो, करते देश से आये,
राज़ उनके अब सारे, आ गये रिसालों में।

खुद की हाँकनी छोड़ें, अब तो आप नेताजी,
सुनिये दर्द पिंहाँ जो, मुफ़लिसों के नालों में।

खिलखिलाना यूँ छोड़ो, ये डुबो न दें हम को।
पड़ते गहरे जो गड्ढे, इन तुम्हारे गालों में।

बेजुबाँ तेरी मय में, बात वो कहाँ साकी,
बात जो दहकते से, लब के उन पियालों में।

ज़ाफ़रान की खुशबू, छा 'नमन' गयी फिर से,
छँट गये अँधेरे सब, सांस लें उजालों में।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
19-08-19

Friday, September 20, 2019

रत्नकरा छंद "अतृप्त प्रीत"

चंदा चित्त चुरावत है।
नैना नीर बहावत है।।
प्यासी प्रीत अतृप्त दहे।
प्यारा प्रीतम दूर रहे।।

ये भृंगी मन गूँजत है।
रो रो पीड़ सुनावत है।।
माला नित्य जपूँ पिय की।
भूली मैं सुध ही जिय की।।

रातें काट न मैं सकती।
तारों को नभ में तकती।।
बारंबार फटे छतिया।
है ये व्याकुल बावरिया।।

आँसू धार लिखी पतिया।
भेजूँ साजन लो सुधिया।।
चीखों की कुछ तो धुन ले।
निर्मोही सजना सुन ले।।
===========
लक्षण छंद:-

"मासासा" नव अक्षर लें।
प्यारी 'रत्नकरा' रस लें।।

"मासासा" = मगण सगण सगण
( 222  112  112 )
9वर्ण, 4 चरण,
दो-दो चरण समतुकांत।
****************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-01-19

रतिलेखा छंद "विरह विदग्धा"

मन तो ठहर ठहर अब, सकपकाये।
पिय की डगर निरख दृग, झकपकाये।।
तुम क्यों अगन सजन यह, तन लगाई।
यह चाह हृदय मँह प्रिय, तुम जगाई।।

तुम आ कर नित किस विध, गुदगुदाते।
सब याद सजन फिर हम, बुदबुदाते।।
अब चाहत पुनि चित-चक, चहचहाना।
नित दूर न रह प्रियवर, कर बहाना।।

दहके विरह अगन सह, हृदय भारी।
मन ही मन बिलखत यह, दुखित नारी।।
सजना किन गलियन मँह, रह रहे हो।
सरिता नद किन किन सह, बह रहे हो।।

तुम तो नव कलियन रस, नित चखो रे।
इस और कबहु मधुकर, नहिं लखो रे।।
किस कारण विरहण सब, दुख सहेगी।
दुखिया यह पिय सँग अब, कब रहेगी।।
==============
लक्षण छंद:-

"सननानसग" षट दशम, वरण छंदा।
यति एक दश अरु पँचम, सु'रतिलेखा'।।

"सननानसग"=  सगण नगण नगण नगण सगण गुरु

( 112  111  111 11,1  112   2 )
16वर्ण, यति{11-5} वर्णों पर,4 चरण
दो-दो चरण समतुकांत
***************
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-01-19

Sunday, September 15, 2019

दोहा (मकर संक्रांति)

हुआ सूर्य का संक्रमण, मकर राशि में आज।
मने पर्व संक्रांति का, ले कर पूरे साज।।

शुचिता तन मन की रखें, धरें सूर्य का ध्यान।
यथा शक्ति सब ही करें, तिल-लड्डू का दान।।

सुख वैभव सम्पत्ति का, यह पावन है पर्व।
भारत के हर प्रांत में, इसका न्यारा गर्व।।

पोंगल, खिचड़ी, लोहड़ी, कहीं बिहू का रंग।
कहीं पतंगों का दिवस, इसके अपने ढंग।।

संस्कृति, रीत, परम्परा, अपनी सभी अनूप।
सबके अपने अर्थ हैं, सबके अपने रूप।।

भेद भाव त्यज हम सभी, मानें ये त्योहार।
प्रीत नेह के रस भरे, पावन ये आगार।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
15-01-19

किरीट सवैया

(8 भगण 211)

भीतर मत्सर लोभ भरे पर, बाहर तू तन खूब
सजावत।
अंतर में जग-मोह बसा कर, क्यों भगवा फिर धार दिखावत।
दीन दुखी पर भाव दया नहिं, आरत हो भगवान
मनावत।
पाप घड़ा उर माँहि भरा रख, पागल अंतरयामि
रिझावत।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
20-11-18

वागीश्वरी सवैया

(122×7  +  12)

दया का महामन्त्र धारो मनों में, दया से सभी को लुभाते चलो।
न हो भेद दुर्भाव कैसा किसी से, सभी को गले से लगाते चलो।
दयाभूषणों से सभी प्राणियों के, उरों को सदा ही सजाते चलो।
दुखाओ दिलों को न थोड़ा किसी के,  दया की सुधा को बहाते चलो।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-10-16

घनाक्षरी विभेद

घनाक्षरी पाठक या श्रोता के मन पर पूर्व के मनोभावों को हटाकर अपना प्रभाव स्थापित कर अपने अनुकूल बना लेनेवाला छंद है। घनाक्षरी में शब्द प्रवाह इस तरह होता है मानो मेघ की गर्जन हो रही हो। साथ ही इसमें शब्दों की बुनावट सघन होती है जैसे एक को ठेलकर दूसरा शब्द आने की जल्दी में हो। शायद इसके नाम के पीछे यही सभी कारण रहे होंगे। घनाक्षरी छंद के कई भेदों के उदाहरण मिलते हैं।

(1) मनहरण घनाक्षरी
इस को घनाक्षरी का सिरमौर कहें तो अनुचित नहीं होगा।
कुल वर्ण संख्या = 31
16, 15 पर यति अनिवार्य। 8,8,8,7 के क्रम में लिखें तो और अच्छा।
चरणान्त हमेशा गुरु ही रहता है।

(2) जनहरण घनाक्षरी
कुल वर्ण संख्या = 31 । इसमें चरण के प्रथम 30 वर्ण लघु रहते हैं तथा केवल चरणान्त दीर्घ रहता है।
16, 15 पर यति अनिवार्य। 8,8,8,7 के क्रम में लिखें तो और अच्छा।

(3) रूप घनाक्षरी
कुल वर्ण संख्या = 32
16, 16 पर यति अनिवार्य। 8,8,8,8 के क्रम में लिखें तो और अच्छा।
चरणान्त हमेशा गुरु लघु (2 1)।

(4) जलहरण घनाक्षरी
कुल वर्ण संख्या = 32
16, 16 पर यति अनिवार्य। 8,8,8,8 के क्रम में लिखें तो और अच्छा।
चरणान्त हमेशा लघु लघु (1 1)।

(5) मदन घनाक्षरी
कुल वर्ण संख्या = 32
16, 16 पर यति अनिवार्य। 8,8,8,8 के क्रम में लिखें तो और अच्छा।
चरणान्त हमेशा गुरु गुरु (2 2)।

(6) डमरू घनाक्षरी
कुल वर्ण संख्या = 32 सभी मात्रा रहित वर्ण आवश्यक।
16, 16 पर यति अनिवार्य। 8,8,8,8 के क्रम में लिखें तो और अच्छा।

(7) कृपाण घनाक्षरी
कुल वर्ण संख्या 32
8, 8, 8, 8 पर यति अनिवार्य।
चरणान्त हमेशा गुरु लघु (2 1)।
हर यति समतुकांत होनी आवश्यक। एक चरण में चार यति होती है। इस प्रकार 16 यति समतुकांत होगी।

(8) विजया घनाक्षरी
कुल वर्ण संख्या 32
8, 8, 8, 8 पर यति अनिवार्य।
चरणान्त हमेशा लघु गुरु (1 2) अथवा 3 लघु (1 1 1) आवश्यक।
आंतरिक तूकान्तता के दो रूप प्रचलित हैं। प्रथम हर चरण की तीनों आंतरिक यति समतुकांत। दूसरा समस्त 16 की 16 यति समतुकांत। आंतरिक यतियाँ भी चरणान्त यति (1 2) या (1 1 1) के अनुरूप रखें तो उत्तम।

(9) हरिहरण घनाक्षरी
कुल वर्ण संख्या 32
8, 8, 8, 8 पर यति अनिवार्य।
चरणान्त हमेशा लघु लघु (1 1) आवश्यक।
आंतरिक तुकान्तता के दो रूप प्रचलित हैं। प्रथम हर चरण की तीनों आंतरिक यति समतुकांत। दूसरा समस्त 16 की 16 यति समतुकांत।

(10) देव घनाक्षरी
कुल वर्ण = 33
8, 8, 8, 9 पर यति अनिवार्य।
चरणान्त हमेशा 3 लघु (1 1 1) आवश्यक। यह चरणान्त भी पुनरावृत रूप में जैसे 'चलत चलत' रहे तो उत्तम।

(11) सूर घनाक्षरी
कुल वर्ण = 30
8, 8, 8, 6 पर यति अनिवार्य।
चरणान्त की कोई बाध्यता नहीं, कुछ भी रख सकते हैं।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

जलहरण घनाक्षरी (सिद्धु पर व्यंग)

शिल्प~8888,अंत में लघु-लघु

जब की क्रिकेट शुरु, बल्ले का था नामी गुरु,
जीभ से बै'टिंग करे, अब धुँवाधार यह।

न्योता दिया इमरान, गुरु गया पाकिस्तान,
फिर तो खिलाया गुल, वहाँ लगातार यह।

संग बैठ सेनाध्यक्ष, हुआ होगा चौड़ा वक्ष,
सब के भिगोये अक्ष, मन क्या विचार यह

बेगाने की ताजपोशी,अबदुल्ला मदहोशी,
देश को लजाय नाचे, किस अधिकार यह।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
27-08-18

रुबाई (1-3)

रुबाई-1

दिनकर सा धरा पर न रहा है कोई;
हूँकार भरे जो न बचा है कोई;
चमचों ने है अधिकार किया मंचों पे;
उद्धार करे झूठों से ना है कोई।

रुबाई-2

जीते हैं सभी मौन यहाँ रह कर के;
मर रूह गई जुल्मो जफ़ा सह कर के;
पत्थर पे न होता है असर चीखों का;
कुछ फ़र्क नहीं पड़ता इन्हें कह कर के।

रुबाई-3

झूठों की सदा अब होती जयकार यहाँ;
जो सत्य कहे सुनते हैं फटकार यहाँ;
कलमों के धनी हार कभी ना माने;
गूँजाएँगे नव क्रांति की गूँजार यहाँ।
*******
विधान:- 221  1221  122  22/112
1,2,4 चरण तुकांत।
=============

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
1-04-2017

मुक्तक (श्रृंगार)

छमक छम छम छमक छम छम बजी जब उठ तेरी पायल,
इधर कानों में धुन आई उधर कोमल हृदय घायल,
ठुमक के पाँव जब तेरे उठे दिल बैठता मेरा,
बसी मन में ये धुन जब से तेरा मैं हो गया कायल।

(1222×4)
*********

चाँदनी रात थी आपका साथ था, रुख से पर्दा हटाया मजा आ गया।
आसमाँ में खिला दूर वो चाँद था, पास में ये खिलाया मजा आ गया।
आतिश ए हुस्न उसमें कहाँ है भला, घटता बढ़ता रहे दाग भी साथ में।
इसको देखा तो शोले भड़कने लगे, चाँद यह क्या दिखाया मजा आ गया।।

(212×8)
*********

उनकी उल्फ़त दिल की ताक़त दोस्तो,
नक़्शे पा उनके ज़ियारत दोस्तो,
चूमते उनके ख़तों को रोज हम,
बस यही अपनी इबादत दोस्तो।

(2122  2122  212)
*********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
13-09-18

Thursday, September 12, 2019

पिरामिड "चाय"

(1)

पी
प्याली
चाय की
मतवाली,
कार्यप्रणाली
हृदय की हुई
होली जैसी धमाली।

(2)

ले
चुस्की
चाय की,
मिटी खुश्की,
भागी झपकी
स्फूर्ति दे थपकी
छायी खुमारी हल्की।

(3)

ये
चाय
है नशा,
बिगाड़ती
तन की दशा,
पर दे हताशा,
जब तक अप्राप्त।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
24-06-19

हाइकु (आँख में फूल)

5-7-5 वर्ण

आँख में फूल,
तलवे में कंटक,
प्रेम-डगर।
**

मुख पे हँसी,
हृदय में क्रंदन,
विरही मन।
**

बसो तो सही,
स्वप्न साबित हुये,
तो चले जाना।
**

आज का स्नेह
उफनता सागर
तृषित देह।
**

शब्द-बदली
काव्य-धरा बरसी
कविता खिली।
**

मानव-भीड़
उजड़ गये नीड़
खगों की पीड़।
**

तृण सजाते
खग नीड़ बनाते
नर ढहाते।
**

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
12-09-19

सेदोका (अपनों का दर्द)

5-7-7-5-7-7 वर्ण

हम स्वदेशी
अपनों का न साथ
घर में भी विदेशी;
गया बिखर,
बसा बसाया घर!
कोई न ले खबर।
**

बड़े लाचार,
गैरों का अत्याचार,
अपनों से दुत्कार;
सोची समझी
साजिश के शिकार,
कहाँ है सरकार?
**

हम ना-शाद,
उनका ये जिहाद
भीषण अवसाद;
न प्रतिवाद
खो जाये फरियाद,
हाय रे सत्तावाद।
**

(मेरठ में हिंदू परिवारों के पलायन पर)

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
30-06-19

सायली (मजदूर)

ईंट,
गारा, पत्थर।
सर पे ढोता
भारत का
मज़दूर।।
*****

मजदूर
हमें देने
सर पे छत
खुद रहता
बेछत।।
*****

मजदूर
उत्पादन- जनक,
बेटी के बाप
जैसा कोई
मजबूर।।
**

मजदूर
कारखानों में
मसीनों संग पिसता,
चूर चूर
होता।
**

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
15-09-17

माहिया (सावन आया है)

चूड़ी की खन खन में,
सावन आया है,
प्रियतम ही तन-मन में।

झूला झूलें सखियाँ,
याद दिलाएं ये,
गाँवों की वे बगियाँ।

गलियों से बचपन की,
सावन आ, खोया,
चाहत में साजन की।

आँख-मिचौली करता।
चंदा बादल से,
दृश्य हृदय ये हरता।

छत से उतरा सावन,
याद लिये पिय की,
मन-आंगन हरषावन।

मोर पपीहा की धुन,
सावन ले आयी,
मन में करती रुन-झुन।

झर झर झरतीं आँखें,
सावन लायीं हैं।
पिय-रट की दें पाँखें।

**************
प्रथम और तृतीय पंक्ति तुकांत (222222)
द्वितीय पंक्ति अतुकांत (22222)
**************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-06-19

Monday, September 9, 2019

सरसी छंद "विधान"

सरसी छंद चार चरणों का समपाद मात्रिक छंद है। प्रति चरण 27 मात्रा होती है। यति 16 और 11 मात्रा पर है। दो दो चरण तुकान्त। मात्रा बाँट-
16 मात्रिक ठीक चौपाई वाला चरण और  11 मात्रा वाला ठीक दोहा का सम पद।

एक स्वरचित पूर्ण सूर्य ग्रहण के वर्णन का उदाहरण देखें।

हीरक जड़ी अँगूठी सा ये, लगता सूर्य महान।
अंधकार में डूब गया है, देखो आज जहान।।
पूर्ण ग्रहण ये सूर्य देव का, दुर्लभ अति अभिराम।
दृश्य प्रकृति का अनुपम अद्भुत, देखो मन को थाम।।

बासुदेव अग्रवाल नमन
तिनसुकिया

श्रृंगार छंद "तड़प"

सजन मत प्यास अधूरी छोड़।
नहीं कोमल मन मेरा तोड़।।
बहुत ही तड़पी करके याद।
सुनो अब तो तुम अंतर्नाद।।

सदा तारे गिन काटी रात।
बादलों से करती थी बात।।
रही मैं रोज चाँद को ताक।
कलेजा होता रहता खाक।।

मिलन रुत आई बरसों बाद।
हृदय में छाया अति आह्लाद।।
बजा इस वीणा का हर तार।
बहा दो आज नेह की धार।।

गले से लगने की है चाह।
निकलती साँसों से अब आह।।
सभी अंगों में एक उमंग।
हुई जैसे उन्मुक्त मतंग।।

देख लो होंठ रहें है काँप।
मिलन की आतुरता को भाँप।।
बाँह में भर कर तन यह आज।
छेड़ दो रग रग के सब साज।।

समर्पण ही है मेरा प्यार।
सजन अब कर इसको स्वीकार।।
मिटा दो जन्मों की सब प्यास।
पूर्ण कर दो सब मेरी आस।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
01-08-2016

श्रृंगार छंद "विधान"

श्रृंगार छंद बहुत ही मधुर लय का 16 मात्रा का चार चरण का छंद है। तुक दो दो चरण में है। इसकी मात्रा बाँट 3 - 2 - 8 - 3 (ताल) है। प्रारंभ के त्रिकल के तीनों रूप मान्य है जबकि अंत का त्रिकल केवल दीर्घ और लघु (21) होना चाहिए। द्विकल 1 1 या 2 हो सकता है। अठकल के नियम जैसे प्रथम और पंचम मात्रा पर शब्द का समाप्त न होना, 1 से 4 तथा 5 से 8 मात्रा में पूरित जगण का न होना और अठकल का अंत द्विकल से होना अनुमान्य हैं।

श्रृंगार छंद का 32 मात्रा का द्विगुणित रूप महा श्रृंगार छंद कहलाता है। यह चार चरणों का छंद है जिसमें तुकांतता 32 मात्रा के दो दो चरणों में निभायी जाती है। यति 16 - 16 मात्रा पर पड़ती है।

बासुदेव अग्रवाल नमन
तिनसुकिया

लावणी छन्द "विधान"

लावणी छन्द अर्द्धमात्रिक छन्द है। इस छन्द में चार चरण होते हैं, जिनमें प्रति चरण 30 मात्राएँ होती हैं।

प्रत्येक चरण दो विभाग में बंटा हुआ रहता है जिनकी यति 16-14 निर्धारित होती है। अर्थात् विषम पद 16 मात्राओं का और सम पद 14 मात्राओं का होता है। दो-दो चरणों की तुकान्तता का नियम है। चरणान्त सदैव गुरु या 2 लघु से होना चाहिये।

16 मात्रिक वाले पद का विधान और मात्रा बाँट ठीक चौपाई छंद वाला है। 14 मात्रिक पद की बाँट 12+2 है। 12 मात्रिक 3 चौकल या एक अठकल और एक चौकल हो सकते हैं। चौकल और अठकल के सभी नियम लागू होंगे।

बासुदेव अग्रवाल नमन
तिनसुकिया

लावणी छन्द "गृह-प्रवेश"

सपनों का संसार हमारा, नव-गृह यह मंगलमय हो।
कीर्ति पताका इसकी फहरे, सुख वैभव सब अक्षय हो।।
यह विश्राम-स्थली सब की बन, शोक हृदय के हर लेवे।
इसमें वास करे उसको ये, जीवन का हर सुख देवे।।

तरुवर सी दे शीतल छाया, नींव रहे दृढ़ इस घर की।
कृपा दृष्टि बरसे इस पर नित, सवित, मरुतगण, दिनकर की।।
विघ्न हरे गणपति इस घर के, रिद्धि सिद्धि का वास रहे।
शुभ ऐश्वर्य लाभ की धारा, घर में आठों याम बहे।।

कुटिल दृष्टि इस नेह-गेह पर, नहीं किसी की कभी पड़े।
रिक्त कभी हो जरा न पाये, पय, दधि, घृत के भरे घड़े।।
परिजन रक्षित सदा यहाँ हो, अमिय-धार इसमें बरसे।
हो सत्कार अतिथि का इसमें, याचक नहीं यहाँ तरसे।।

दूर्वा, श्री फल, कुंकुम, अक्षत, दैविक भौतिक विपद हरे।
वरुण देव का पूर्ण कलश ये, घर के सब भंडार भरे।।
इस शुभ घर से जीवन-पथ में, आगे बढ़ते जायें हम।
सकल भाव ये उर में धर के, मंगल गृह में आयें हम।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
12-04-19

Friday, September 6, 2019

ग़ज़ल (जो मुसीबत में किसी के काम आता है)

बह्र:- 2122*3  2

जो मुसीबत में किसी के काम आता है,
सबसे पहले उसका दिल में नाम आता है।

टूट गर हर आस जाए याद हरदम रख,
अंत में तो काम केवल राम आता है।

मात के दरबार में नर सोच के ये जा,
माँ-कृपा जिस पे हो माँ के धाम आता है।

दुख का आना सुख का जाना ठीक वैसे ही,
ज्यों अँधेरा दिन ढ़ले हर शाम आता है।

जो ख़ुदा पे रख भरौसा ज़िंदगी जीता,
उसको ही अल्लाह का इलहाम आता है।

राह सच्चाई की चुन ली अब किसे परवाह,
सर पे किसका कौनसा इल्ज़ाम आता है।

गर समझते हो 'नमन' ये काम है अच्छा,
क्यों हो फिर ये फ़िक्र क्या परिणाम आता है

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
20-12-2018

(धुन- बस यही अपराध मैं हर बार)

ग़ज़ल (देश के गद्दार जो पहचान)

बह्र:- 2122*3

देश के गद्दार जो पहचान लो सब,
उनके मंसूबों की फ़ितरत जान लो सब।

जब भी छेड़े देश का इतिहास कोई,
चुप न बैठो बात का संज्ञान लो सब।

नाग कोई देश में गर फन उठाए,
उस को ठोकर से कुचल दें ठान लो सब।

देश से बढ़कर नहीं कोई जहाँ में, 
दिल की गहराई से इसको मान लो सब।

सिंह सी हुंकार भर जागो जवानों,
देख कर दुश्मन को सीना तान लो सब।

दुश्मनों को देश के करने उजागर,
देश का प्रत्येक कोना छान लो सब।

देश को हम नित 'नमन' कर मान देवें,
भारती माँ से यही वरदान लो सब।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
31-01-2017

ग़ज़ल (आज कहने जा रहा कुछ अनकही)

बह्र:- 2122  2122  212

आज कहने जा रहा कुछ अनकही,
बात अक्सर मन में जो आती रही।

आज की सच्चाई मित्रों है यही,
सबके मन भावे कहो हरदम वही।

खोखली अब हो रही रिश्तों की जड़,
मान्यताएँ जा रहीं हैं सब ढ़ही।

खो रहे माता पिता सम्मान अब,
भावनाएँ आधुनिकता में बही।

आज बे सिर पैर की सब हाँकते,
हो गया क्या अब दिमागों का दही।

हर तरफ आतंकियों का जोर है,
निरपराधों के लहू से तर मही।

बात कड़वी पर खरी कहता 'नमन',
तय जमाना ही करे क्या है सही।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन',
तिनसुकिया
12-11-2018

ग़ज़ल (बोलना बात का भी मना है)

बह्र:- 2122   122   122

बोलना बात का भी मना है,
साँस को छोड़ना भी मना है।

दहशतों में सभी जी रहे हैं,
दर्द का अब गिला भी मना है।

ख्वाब देखे कभी जो सभी ने,
आज तो सोचना भी मना है।

जख्म गहरे सभी सड़ गये हैं,
खोलना घाव का भी मना है।

सब्र रोके नहीं रुक रहा अब,
बाँध को तोड़ना भी मना है।

हो गई ख़त्म सहने की ताक़त,
करना उफ़ का ज़रा भी मना है।

अब नहीं है 'नमन' का ठिकाना,
आशियाँ ढूंढना भी मना है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
13-11-16

ग़ज़ल (चहरे पे ये निखार)

ग़ज़ल (चहरे पे ये निखार)

बह्र:- 2122  1212  22/112

चहरे पे ये निखार किसका है?
आँखों में भी ख़ुमार किसका है?

जख्म दे छिप रहा जो, छोड़ उसे,
दिल के तीर_आर पार किसका है?

खायी चोटें ही दिल की सुन सुन के,
फिर बता एतबार किसका है?

सोचता हूँ मगर न लब खुलते,
मुझ पे इतना ये भार किसका है?

चूर सत्ता के मद में जो हैं सुनें,
बे-रहम वक़्त यार किसका है?

मैं जमाने से क्यों चुराऊँ नज़र,
मेरे सर पर उधार किसका है?

कोई बतला तो दे ख़ुदा के सिवा,
ये 'नमन' ख़ाकसार किसका है?

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
06-05-18

Friday, August 16, 2019

पुछल्लेदार मुक्तक "नेताओं का खेल"

नेताओं ने आज देश में कैसा खेल रचाया है।
इनकी मनमानी के आगे सर सबका चकराया है।
लूट लूट जनता को इनने भारी माल बनाया है।
स्विस बैंकों में खाते रखकर काला धन खिसकाया है।।

सत्ताधीशों ने देश को है बाँटा,
करारा मारा चाँटा,
यही तो चुभे काँटा,
सुनोरे मेरे सब भाइयों,
बासुदेव कवि दर्द ये सुनाता।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
28-04-18

मुक्तक (साहित्य, भाषा)

भरा साहित्य सृजकों से हमारा ये सुखद परिवार,
बड़े गुरुजन का आशीर्वाद अरु गुणग्राहियों का प्यार,
यहाँ सम्यक समीक्षाओं से रचनाएँ परिष्कृत हों,
कहाँ संभव कि ऐसे में किसी की कुंद पड़ जा धार।

1222*4
*********

यहाँ काव्य की रोज बरसात होगी।
कहीं भी न ऐसी करामात होगी।
नहाओ सभी दोस्तो खुल के इसमें।
बड़ी इससे क्या और सौगात होगी।।

122×4
*********
हिन्दी

संस्कृत भाषा की ये पुत्री, सर्व रत्न की खान है,
आज अभागी सन्तानों से, वही रही खो शान है,
थाल पराये में मुँह मारो, पर ये हरदम याद हो,
हिन्दी ही भारत को जग में, सच्ची दे पहचान है।

(16+13 मात्रा)
*********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-10-16

मौक्तिका (जो सत्यता ना पहचानी)

2*9 (मात्रिक बहर)
(पदांत 'ना पहचानी', समांत 'आ' स्वर)

दूजों के गुण भारत तुम गाते,
अपनों की प्रतिभा ना पहचानी।
तुम मुख अन्यों का रहे ताकते,
पर स्वावलम्बिता ना पहचानी।।

सोने की चिड़िया देश हमारा,
था जग-गुरु का पद सबसे न्यारा।
किस हीन भावना में घिर कर अब,
वो स्वर्णिम गरिमा ना पहचानी।।

जिनको तूने उपदेश दिया था,
असभ्य से जिनको सभ्य किया था।
पर आज उन्हीं से भीख माँग के,
वह खोई लज्जा ना पहचानी।।

सम्मान के' जो सच्चे अधिकारी,
है जिनकी प्रतिभा जग में न्यारी।
उन अपनों की अनदेखी कर के,
उनकी अभिलाषा ना पहचानी।।

मूल्यांकन जो प्रतिभा का करते,
बुद्धि-हीन या पैसों पे मरते।
परदेशी वे अपनों पे थोप के',
देश की अस्मिता ना पहचानी।।

गुणी सुधी जन अब देश छोड़ कर,
विदेश जा रहे मुख को मोड़ कर।
लोहा उनने सब से मनवाया,
पर यहाँ रिक्तता ना पहचानी।।

सम्बल विदेश का अब तो छोड़ो,
अपनों से यूँ ना मुख को मोड़ो।
हे भारत 'नमन' करो उसको तुम,
अब तक जो सत्यता ना पहचानी।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
10-07-2016

कहमुकरी (विविध)

मीठा बोले भाव उभारे
तोड़े वादों में नभ तारे
सदा दिलासा झूठी देता
ए सखि साजन? नहिं सखि नेता!

सपने में नित इसको लपकूँ
मिल जाये तो इससे चिपकूँ
मेरे ये उर वसी उर्वसी
ए सखा सजनि? ना रे कुर्सी!

जिसके डर से तन मन काँपे
घात लगा कर वो सखि चाँपे
पूरा वह निष्ठुर उन्मादी
क्या साजन? न आतंकवादी!

गिरगिट जैसा रंग बदलता
रार करण वो सदा मचलता
उसकी समझुँ न कारिस्तानी
क्या साजन? नहिं पाकिस्तानी!

भेद न जो काहू से खोलूँ
इससे सब कुछ खुल के बोलूँ
उर में छवि जिसकी नित रखली
ए सखि साजन? नहिं तुम पगली!

बारिस में हो कर मतवाला,
नाचे जैसे पी कर हाला,
गीत सुनाये वह चितचोर,
क्या सखि साजन, ना सखि मोर।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-05-17

"कह मुकरी विधान"

कह मुकरी काव्य की एक पुरानी मगर बहुत खूबसूरत विधा है। यह चार पंक्तियों की संरचना है। यह विधा दो सखियों के परस्पर वार्तालाप पर आधारित है। जिसकी प्रथम 3 पंक्तियों में एक सखी अपनी दूसरी अंतरंग सखी से अपने साजन (पति अथवा प्रेमी) के बारे में अपने मन की कोई बात कहती है। परन्तु यह बात कुछ इस प्रकार कही जाती है कि अन्य किसी बिम्ब पर भी सटीक बैठ सकती है। जब दूसरी सखी उससे यह पूछती है कि क्या वह अपने साजन के बारे में बतला रही है, तब पहली सखी लजा कर चौथी पंक्ति में अपनी बात से मुकरते हुए कहती है कि नहीं वह तो किसी दूसरी वस्तु के बारे में कह रही थी ! यही "कह मुकरी" के सृजन का आधार है।

इस विधा में योगदान देने में अमीर खुसरो एवम् भारतेंदु हरिश्चन्द्र जैसे साहित्यकारों के नाम प्रमुख हैं ।

यह ठीक 16 मात्रिक चौपाई वाले विधान की रचना है। 16 मात्राओं की लय, तुकांतता और संरचना बिल्कुल चौपाई जैसी होती है। पहली एवम् दूसरी पंक्ति में सखी अपने साजन के लक्षणों से मिलती जुलती बात कहती है। तीसरी पंक्ति में स्थिति लगभग साफ़ पर फिर भी सन्देह जैसे कि कोई पहेली हो। चतुर्थ पंक्ति में पहला भाग 8 मात्रिक जिसमें सखी अपना सन्देह पूछती है यानि कि प्रश्नवाचक होता है और दुसरे भाग में (यह भी 8 मात्रिक) में स्थिति को स्पष्ट करते हुए पहली सखी द्वारा उत्तर दिया जाता है ।

हर पंक्ति 16 मात्रा, अंत में 1111 या 211 या 112 या 22 होना चाहिए। इसमें कहीं कहीं 15 या 17 मात्रा का प्रयोग भी देखने में आता है। न की जगह ना शब्द इस्तेमाल किया जाता है या नहिं भी लिख सकते हैं। सखी को सखि लिखा जाता है।

कुछ उदाहरण

1
बिन आये सबहीं सुख भूले।
आये ते अँग-अँग सब फूले।।
सीरी भई लगावत छाती।
ऐ सखि साजन ? ना सखि पाती।।
........अमीर खुसरो......

2
रात समय वह मेरे आवे।
भोर भये वह घर उठि जावे।।
यह अचरज है सबसे न्यारा।
ऐ सखि साजन ? ना सखि तारा।।
........अमीर खुसरो......

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

Tuesday, August 13, 2019

दोहा (प्रभु ही रखते ध्यान)

जीव जंतु जंगम जगत, सबको समझ समान।
योग क्षेम करके वहन, प्रभु ही रखते ध्यान।।

राम, कृष्ण, वामन कभी, कूर्म, मत्स्य अभिधान।
पाप बढ़े अवतार ले, प्रभु ही रखते ध्यान।।

ब्रह्म-रूप उद्गम करे, रुद्र-रूप अवसान।
विष्णु-रूप में सृष्टि का, प्रभु ही रखते ध्यान।।

अर्जुन के बन सारथी, गीता कीन्हि बखान।
भक्त दुखों में जब घिरे, प्रभु ही रखते ध्यान।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
11-06-19

कश्मीरी पत्थरबाजों पर दोहे

धरती का जो स्वर्ग था, बना नर्क वह आज।
गलियों में कश्मीर की, अब दहशत का राज।।

भटक गये सब नव युवक, फैलाते आतंक।
सड़कों पर तांडव करें, होकर के निःशंक।।

उग्रवाद की शह मिली, भटक गये कुछ छात्र।
ज्ञानार्जन की उम्र में, बने घृणा के पात्र।।

पत्थरबाजी खुल करें, अल्प नहीं डर व्याप्त।
सेना का भी भय नहीं, संरक्षण है प्राप्त।।

स्वारथ की लपटों घिरा, शासन दिखता पस्त।
छिन्न व्यवस्थाएँ सभी, जनता भय से त्रस्त।।

खुल के पत्थर बाज़ ये, बरसाते पाषाण।
देखें सब असहाय हो, कहीं नहीं है त्राण।।

हाथ सैनिकों के बँधे, करे न शस्त्र प्रयोग।
पत्थर बाज़ी झेलते, व्यर्थ अन्य उद्योग।।

सत्ता का आधार है, तुष्टिकरण का मंत्र।
बेबस जनता आज है, 'नमन' तुझे जनतंत्र।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-01-2019

रति छंद "प्यासा मन-भ्रमर"

मन मोहा, तन कुसुम सम तेरा।
हर लीन्हा, यह भ्रमर मन मेरा।।
अब तो ये, रह रह छटपटाये।
कब तृष्णा, परिमल चख बुझाये।।

मृदु हाँसी, जिमि कलियन खिली है।
घुँघराली, लट-छवि झिलमिली है।।
मधु श्वासें, मलय-महक लिये है।
कटि बांकी, अनल-दहक लिये है।।

मतवाली, शशि वदन यह गोरी।
मृगनैनी, चपल चकित चकोरी।।
चलती तो, लख हरिण शरमाये।
यह न्यारी, छवि न वरणत जाये।।

लगते हैं, अधर पुहुप लुभाये।
तब क्यों ना, सब मिल मन जलाये।।
मन भौंरा, निरखत डगर तेरी।
मिल ने को, बिलखत कर न देरी।।
===============
लक्षण छंद:-

'रति' छंदा', रख गण "सभनसागे"।
यति चारा, अरु नव वरण साजे।।

"सभनसागे" = सगण भगण नगण सगण गुरु

( 112  2,11  111  112  2)
13वर्ण, यति 4-9 वर्णों पर,
4 चरण,दो-दो चरण समतुकांत
*****************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
26-01-19

रक्ता छंद "शारदा वंदन"

ब्रह्म लोक वासिनी।
दिव्य आभ भासिनी।।
वेद वीण धारिणी।
हंस पे विहारिणी।।

शुभ्र वस्त्र आवृता।
पद्म पे विराजिता।।
दीप्त माँ सरस्वती।
नित्य तू प्रभावती।।

छंद ताल हीन मैं।
भ्रांति के अधीन मैं।।
मन्द बुद्धि को हरो।
काव्य की प्रभा भरो।।

छंद-बद्ध साधना।
काव्य की उपासना।
मैं सदैव ही करूँ।
भाव से इसे भरूँ।।

मात ये विचार हो।
देश का सुधार हो।।
ज्ञान का प्रसार हो।
नष्ट अंधकार हो।।

शारदे दया करो।
ज्ञान से मुझे भरो।।
काव्य-शक्ति दे मुझे।
दिव्य भक्ति दे मुझे।।

===========
विधान~ [रगण जगण गुरु]
( 212 121 2 ) = 7 वर्ण, 4 चरण
[दो-दो या चारों चरण समतुकांत]

**********
बासुदेव अग्रवाल नमन,
तिनसुकिया
10-02-19

यशोदा छंद "प्यारी माँ"

तु मात प्यारी।
महा दुलारी।।
ममत्व पाऊँ।
तुझे रिझाऊँ।।

गले लगाऊँ।
सदा मनाऊँ।।
करूँ तुझे माँ।
प्रणाम मैं माँ।।

तु ही सवेरा।
हरे अँधेरा।।
बिना तिहारे।
कहाँ सहारे।।

दुलार देती।
बला तु लेती।।
सनेह दाता।
नमामि माता।।
===========
लक्षण छंद:-

"जगाग" राचो।
'यशोदा' पाओ।।

121+ गुरु+ गुरु =5 वर्ण,4 चरण  दो-दो तुकांत
**************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
05-06-17

Friday, August 9, 2019

हाइकु (राजनेता)

पिता कोमल
संपूर्ण-स्वामी सुत
रोज दंगल।
**

बुआ की छाया
भतीजा भरमाया
अजब माया।
**

अहं सम्राज्य
हिंसा में घिरा राज्य
ममता लुप्त।
**

राहु-लगन
पीढ़ियों का सम्राज्य
हुआ समाप्त।
**

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
26-06-19

आरोही अवरोही पिरामिड (तेरी याद)

(1-7 और 7-1)

पी
कर
ये आँसू
जी  रहे  हैं
किसी तरह।
आँसू बह  रहे
आँखों से रह रह।

नहीं टिक रहा है
अब कहीं भी जी।
याद में तेरी
हर रोज
जी रहे
खून
पी।
******

जी
रहे
जिंदगी
अब हम
आसरे तेरे।
उजालों में छाए
घनघोर  अंधेरे।

गुजरते  हैं   दिन
अब आँसू पी पी।
तेरी याद में
है कितना
तड़पा
मेरा
जी।
*****

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
11-11-16

ताँका (प्रकृति)

जापानी विधा (5-7-5-7-7)

निशा ने पाया
मयंक सा साजन
हुई निहाल,
धारे तारक-माल
खूब करे धमाल।
**

तारक अस्त
हुई शर्म से लाल
भोर है मस्त,
रवि-रश्मि संघात
सरसे जलजात।
**

भ्रमर गूँज,
मधुपरी नर्तन,
हर्षित कूँज,
आया नव विहान
रजनी अवसान।
**

ग्राम्य-जीवन
संदल उपवन
सरसावन,
सुरभित पवन
वास बरसावन।
**

हवा में बहे
सेमली शुभ्र गोले,
आ कर सजे,
हरित दूब पर
जैसे झरे हों ओले।
**

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
20-06-19

चौका (उन्माद)

जापानी विधा चौका
5-7, 5-7, 5-7 -------- +7

अंधा विश्वास
अंधी आस्था करती
विवेक शून्य,
क्षणिक आवेश में
मानव भूले
क्या सही क्या गलत?
होकर पस्त,,,
यही तो है उन्माद।
मनुष्य नाचे
कठपुतली बन,
जिसकी डोर
बाज़ीगर के हाथ,
जैसे वो चाहे
नचाए पुतलों को
ये खिलौनों से
मस्तिष्क से रहित
मचा तांडव
करें नग्न नर्तन
लूट हिंसा का
मचा आतंकवाद
यही तो है उन्माद।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
08-09-17

क्षणिका (मानवीय क्षमता)

हे मानवीय क्षमता
क्या छोटी पड़ गई धरा?
जो चढ़ बैठी हो,
अंतरिक्ष में
जहाँ से अपने बनाये
उपग्रही खिलौनों की आँख से
तुम देख,,,,
अट्टहास कर सको
बेरोजगारी और गरीबी का दानव
अपने पंजों में जकड़ता
सिसकता, कराहता मानव।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-02-18

Wednesday, August 7, 2019

रोला छंद "दो राही"

जग-ज्वाला से दग्ध, पथिक इक था अति व्याकुल।
झूठे रिश्ते नातों के, प्रति भी शंकाकुल।।
मोह-बन्ध सब त्याग, शांति की चला खोज में।
जग झूठा जंजाल, भाव ये मन-सरोज में।1।

नश्वर यह मानव-तन, लख वैराग्य हुआ था।
क्षणभंगुरता पर जग की, नैराश्य हुआ था।।
उसका मन जग-ज्वाल, सदा रहती झुलसाती।
तृष्णा की ये बाढ़, हृदय रह रह बिलखाती।2।

स्वार्थ बुद्धि लख घोर, घृणा के उपजे अंकुर।
ज्ञान मार्ग की राह चले, मन था अति आतुर।।
अर्थी जग की धनसंचयता, से उद्वेलित।
जग की घोर स्वार्थपरता से, मन भी विचलित।3।

बन सन्यासी छोड़, चला वह जग की ज्वाला।
लगा ढूंढने मार्ग, शांति का हो मतवाला।।
परम शांति का एक मार्ग, वैराग्य विचारा।
आत्मज्ञान का अन्वेषण, ही एक सहारा।4।

एक और भी देह, धरा था जग में राही।
मोह और माया के, गुण का ही वह ग्राही।।
वृत्ति स्वार्थ से पूर्ण, सदा उसने अपनाई।
रहता इसमें मग्न, अधम वह कर कुटिलाई।5।

पाप लोभ मद के पथ पर, वह हुआ अग्रसर।
विचरण करता दम्भ क्षोभ, नद के नित तट पर।।
भेद-नीति से सब पर, अपनी धौंस जमाता।
पाशवता के निर्झर से, वह तृषा मिटाता।6।

एकमात्र था लक्ष्य, नित्य ही धन का संचय।
अन्यों का शोषण करना, उसका दृढ़ निश्चय।।
जुल्म अनेकों अपने से, अबलों पर ढ़ाहे।
अन्यों की आहों पर, निर्मित निज गृह चाहे।7।

अंतर इन दोनो पथिकों में, बहुत बड़ा है।
एक चाहता मुक्ति, दूसरा यहीं अड़ा है।।
मोक्ष-मार्ग पहले ने, बन्धन त्यज अपनाया।
पड़ा मोह माया में दूजा, रुदन मचाया।8।

नश्वर जग में धन्यवान, केवल पहले जन।
वृत्ति सुधा सम धार, अमिय मय करते जीवन।।
ज्ञान-रश्मि से वे प्रकाश, जग में फैलाते।
प्रेम-वारि जग उपवन में, वे नित बरसाते।9।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
27-05-2016

रोला छंद "विधान"

रोला चार चरणों का, प्रत्येक चरण में 24 मात्रा का छंद है। चरणान्त गुरु अथवा 2 लघु से होना आवश्यक है। तुक दो दो चरण में होती है।

कुंडलियाँ छंद के कारण रोला बहु प्रचलित छंद है। कुंडलियाँ में प्रथम दो पंक्ति दोहा की तथा अंतिम चार पंक्ति रोला की होती है। दोहा का चौथा चरण रोला की प्रथम पंक्ति के आरंभ में पुनरुक्त होता है, अतः रोला की प्रथम यति 11 मात्रा पर होना सर्वथा सिद्ध है। साथ ही इस यति का ताल (2 1) से अंत भी होना चाहिये।

परन्तु अति प्रतिष्ठित कवियों की रचनाओं से देखा गया है कि रोला छंद इस बन्धन में बंधा हुआ नहीं है। रोला बहुत व्यापक छंद है।  भिखारीदास ने छंदार्णव पिंगल में रोला को 'अनियम ह्वै है रोला' तक कह दिया है। रोला छंद 11, 13 की यति में भी बंधा हुआ नहीं है और न ही प्रथम यति का अंत गुरु लघु से होना चाहिये, इस बंधन में। अनेक प्रतिष्ठित कवियों की रचनाओं के आधार पर रोला की मात्रा बाँट  8-6-2-6-2 निश्चित होती है।
8 = अठकल या 2 चौकल।
6 = 3+3 या 4+2 या 2+4
2 = 1 + 1 या 2
यति भी 11, 12, 14, 16 मात्रा पर सुविधानुसार कहीं भी रखी जा सकती है। प्रसाद जी की कामायनी की कुछ पंक्तियाँ देखें।

मैं यह प्रजा बना कर कितना तुष्ट हुआ था,
किंतु कौन कह सकता इन पर रुष्ट हुआ था।
मैं नियमन के लिए बुद्धि-बल से प्रयत्न कर,
इनको कर एकत्र चलाता नियम बना कर।
रूप बदलते रहते वसुधा जलनिधि बनती,
उदधि बना मरुभूमि जलधि में ज्वाला जलती।
विश्व बँधा है एक नियम से यह पुकार-सी,
फैल गयी है इसके मन में दृढ़ प्रचार-सी।

पर कुंडलियाँ छंद में 11, 13 की यति रख कर ही रचना करनी चाहिए। इस छंद में रोला के मान्य रूप को ही रखना चाहिये जो रोला की चारों पंक्ति की प्रथम पंक्ति से अनुरूपता के लिए भी अति आवश्यक है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

रूपमाला छंद "राम-महिमा"

राम की महिमा निराली, राख मन में ठान।
अन्य रस का स्वाद फीका, भक्ति रस की खान।
जागती यदि भक्ति मन में, कृपा बरसी जान।
नाम साँचो राम को है, लो हृदय में मान।।

राम को भज मन निरन्तर, भक्ति मन में राख।
इष्ट पे रख पूर्ण आश्रय, मत बढ़ाओ शाख।
शांत करके मन-भ्रमर को, एक का कर जाप।
राम-रस को घोल मन में, दूर हो सब ताप।।

नाम प्रभु का दिव्य औषधि, नित करो उपभोग।
दाह तन मन की हरे ये, काटती भव-रोग।।
सेतु सम है राम का जप, जग समुद्र विशाल।
आसरा इसका मिले तो, पार हो तत्काल।।

रत्न सा जो है प्रकाशित, राम का वो नाम।
जीभ पे इसको धरो अरु, देख इसका काम।।
ज्योति इसकी जगमगा दे, हृदय का हर छोर।
रात जो बाहर भयानक, करे उसकी भोर।।

गीध, शबरी और बाली, तार दीन्हे आप।
आप सुनते टेर उनकी, जो करें नित जाप।।
राम का जप नाम हर क्षण, पवनसुत हनुमान।
सकल जग के पूज्य हो कर, बने महिमावान।।

राम को जो छोड़ थामे, दूसरों का हाथ।
अंत आयेगा निकट जब, कौन देगा साथ।
नाम पे मन रख भरोसा, सब बनेंगे काज।
राम से बढ़कर जगत में, कौन दूजो आज।।
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रूपमाला छंद *विधान*

यह एक अर्द्धसममात्रिक छन्द है, जिसके प्रत्येक चरण में 14 और 10 के विश्राम से 24 मात्राएँ और चरणान्त गुरु-लघु से होता है. इसको मदन छन्द भी कहते हैं. यह चार चरणों का छन्द है, जिसमें दो-दो पदों पर तुकान्तता बनती है।

इसकी मात्रा बाँट 3 सतकल और अंत ताल यानि
गुरु लघु से होता है। सतकल की मात्रा बाँट
3 2 2 है जिसमें द्विकल के दोनों रूप (2, 1 1) और त्रिकल के तीनों रूप (2 1, 1 2, 1 1 1) मान्य है।अतः निम्न बाँट तय होती है:
3 2 2  3 2 2 = 14 मात्रा और

3 2 2  2 1 = 10 मात्रा

इस छंद को 2122  2122, 2122  21 के बंधन में बाँधना उचित नहीं। प्रसाद जी का कामायनी के वासना सर्ग का उदाहरण देखें।

स्पर्श करने लगी लज्जा, ललित कर्ण कपोल,
खिला पुलक कदंब सा था, भरा गदगद बोल।
किन्तु बोली क्या समर्पण, आज का हे देव!
बनेगा-चिर बंध नारी, हृदय हेतु सदैव।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
29-08-2016

रास छंद "कृष्णावतार"

हाथों में थी, मात पिता के, सांकलियाँ।
घोर घटा में, कड़क रही थी, दामिनियाँ।
हाथ हाथ को, भी ना सूझे, तम गहरा।
दरवाजों पर, लटके ताले, था पहरा।।

यमुना मैया, भी ऐसे में, उफन पड़ी।
विपदाओं की, एक साथ में, घोर घड़ी।
मास भाद्रपद, कृष्ण पक्ष की, तिथि अठिया।
कारा-गृह में, जन्म लिया था, मझ रतिया।।

घोर परीक्षा, पहले लेते, साँवरिया।
जग को करते, एक बार तो, बावरिया।
सीख छिपी है, हर विपदा में, धीर रहो।
दर्शन चाहो, प्रभु के तो हँस, कष्ट सहो।।

अर्जुन से बन, जीवन रथ का, स्वाद चखो।
कृष्ण सारथी, रथ हाँकेंगे, ठान रखो।
श्याम बिहारी, जब आते हैं, सब सुख हैं।
कृष्ण नाम से, सारे मिटते, भव-दुख हैं।।
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रास छंद विधान:-

रास छंद 22 मात्राओं का छंद है जिसमें 8, 8, 6 मात्राओं पर यति होती है। चरणान्त 112 से होना आवश्यक है। चार चरणों का एक छंद होता है जिसमें 2-2 पंक्ति तुकांत होनी चाहिये। मात्रा बाँट प्रथम और द्वितीय यति में एक अठकल या 2 चौकल का है। अंतिम यति में 2 - 1 - 1 - 2 का है।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
24-08-2016

प्लवंगम छंद "सरिता"

भूधर बिखरें धरती पर हर ओर हैं।
लुप्त गगन में ही कुछ के तो छोर हैं।।
हैं तुषार मंडित जिनके न्यारे शिखर।
धवल पाग भू ने ज्यों धारी शीश पर।।

एक सरित इन शैल खंड से बह चली।
बर्फ विनिर्मित तन की थी वह चुलबली।।
ले अथाह जल अरु उमंग मन में बड़ी।
बलखाती इठलाती नदी निकल पड़ी।।

बाधाओं को पथ की सारी पार कर।
एक एक भू-खंडों को वह अंक भर।।
राहों के सब नाले, मिट्टी, तरु बहा।
हुई अग्रसर गर्जन करती वह महा।।

कभी मधुरतम कल कल ध्वनि से वह बहे।
श्रवणों में ज्यों रागों के सुर आ रहे।।
कभी भयंकर रूप धरे तांडव मचे।
धारा में जो भी पड़ जाये ना बचे।।

लदी हुई मानव-आशा के भार से।
सींचे धरती वरदानी सी धार से।
नगरों, मैदानों को करती पार वह।
हर्ष मोद का जग को दे भंडार वह।।

मधुर वारि से सींच अनेकों खेत को।
कृषकों के वह साधे हर अभिप्रेत को।।
हरियाली की खुशियों भरी खिला कली।
वह अथाह सागर के पट में छिप चली।।
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प्लवंगम छंद "विधान"

21 मात्रा। चार चरण, दो दो तुकांत।
मात्रा बाँट:-   8-8-2-1-2
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
16-04-2016

Sunday, August 4, 2019

ग़ज़ल (आप का साथ मिला)

बह्र: 2122 1122 1122  22

आप का साथ मिला, मुझ को सँवर जाना था,
पर लिखा मेरे मुक़द्दर में बिखर जाना था।

आ सका आपके नज़दीक न उल्फ़त में सनम,
तो मुझे इश्क़ में क्या हद से गुज़र जाना था।

पहले गर जानता ग़म इस में हैं दोनों के लिये,
इस मुहब्बत से मुझे तब ही मुकर जाना था।

जब भी वो आँख दिखाता है, ख़ता खाता है,
शर्म गर होती उसे कब का सुधर जाना था।

जो लड़े हक़ के लिये, सर पे कफ़न रखते थे,
अहले दुनिया से भला क्यों उन्हें डर जाना था।

सात दशकों से अधिक हो गये आज़ादी को,
देश का भाग्य तो इतने में निखर जाना था।

जो समझते हैं 'नमन' देश को जागीर_अपनी,
ये नशा उनका अभी तक तो उतर जाना था।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
21-02-19

Saturday, August 3, 2019

2122 1122 1122 22 बह्र के गीत

1 वो मेरी नींद मेरा चैन मुझे लौटा दो

2 ऐ सनम जिसने तुझे चाँद सी सूरत दी है

3 तेरी ज़ुल्फ़ों से जुदाई तो नहीं माँगी थी

4 जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते हैं लोग

5 कौन आया कि निगाहों में चमक जाग उठी

6 कोई फरियाद तेरे दिल में छुपी हो जैसे

ग़ज़ल (प्यार फिर झूठा जताने आये)

बह्र:- 2122  1122  22/112

प्यार फिर झूठा जताने आये,
साथ ले सौ वे बहाने आये।

बार बार_उन से मैं मिल रोई हूँ,
सोच क्या फिर से रुलाने आये।

दुनिया मतलब से ही चलती, वरना
कौन अब किसको मनाने आये।

राख ये जिस्म तो पहले से ही,
क्या बचा जो वे जलाने आये।

फिर नये वादों की झड़ लेकर वो,
आँसु घड़ियाली बहाने आये।

और अब कितना है ठगना बाकी,
जो वही मुँह ले रिझाने आये।

'बासु' नेताजी से पूछे जनता,
कौन सा भेष दिखाने आये।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-12-2018

ग़ज़ल (उनके हुस्न का गज़ब जलाल है)

बह्र:- 212  1212  1212

उनके हुस्न का गज़ब जलाल है,
ये बनाने वाले का कमाल है।

चहरा मरमरी गढ़ा ये क्या खुदा,
काम ये बहुत ही बेमिशाल है।

जब से रूठ के गये हैं जाने मन,
हम सके नहीं मना मलाल है।

नूर आँख का हुआ ये दूर क्या,
पूछिये न क्या हमारा हाल है।

रात रात बात चाँद से करें,
दिन गुज़रता जैसे कोई साल है।

इस अँधेरी शब की होगी क्या सहर,
दिल में अब तो एक ही सवाल है।

अब 'नमन' की हर ग़ज़ल के दर्द में,
उनका ही रहे छिपा खयाल है।

जलाल- तेज, चमक

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-06-19