Sunday, November 10, 2019

रसाल छंद "यौवन"

यौवन जब तक द्वार, रूप रस गंध सुहावत।
बीतत दिन जब चार, नाँहि  मन को कछु भावत।।
वैभव यह अनमोल, व्यर्थ मत खर्च इसे कर।
वापस कबहु न आय, खो अगर दे इसको नर।।

यौवन सरित समान, वेगमय चंचल है अति।
धीर हृदय मँह धार, साध नर ले इसकी गति।।
हो कर इस पर चूर, जो बढ़त कार्य बिगारत।
जो पर चलत सधैर्य, वो सकल काज सँवारत।।

यौवन सब सुख सार, स्वाद तन का यह पावन।
ये नित रस परिपूर्ण, ज्यों बरसता मधु सावन।।
दे जब तक यह साथ, सृष्टि लगती मनभावन।
जर्जर जब तन होय, घोर तब दे झुलसावन।।

कांति चमक अरु वीर्य, पूर्ण जब देह रहे यह।
मानव कर तु उपाय, पार भव हो जिनसे यह।।
रे नर जनम सुधार,  यत्न करके जग से तर।
जीवन यह उपहार, व्यर्थ इसको मत तू कर।। 
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लक्षण छंद:-

"भानजभजुजल" वर्ण, और यति नौ दश पे रख।
पावन मधुर 'रसाल', छंद-रस रे नर तू चख।।

"भानजभजुजल" = भगण नगण जगण भगण जगण जगण लघु।
211 111 121 // 211 121 121 1
19 वर्ण, यति 9,10 वर्ण पर, दो दो या चारों चरण समतुकांत।

(इसका मात्राविन्यास रोला छंद से मिलता है। रसाल गणाश्रित छंद है अतः हर वर्ण की मात्रा नियत है जबकि रोला मात्रिक छंद है और ऐसा बन्धन नहीं है।)
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
16-10-17

जय गोविंदजी की टिप्पणी 5-4-19 काव्य सम्मेलन
लेखन चलत अमंद, भाव भर खूब लुभावत
पावन मधुर रसाल, छंद नित गान जु गावत
धन्य नमन कविराय, नेह भर छंद रचावत
ज्ञान जु अनुपम तोर, भान नित नव्य करावत।

रसना छंद "पथिक आह्वाहन"

डगर कहे चीख, जरा ठहर पथिक सुनो।
कठिन सभी मार्ग, सदैव कर मनन चुनो।
जगत भरा कंट, परन्तु तुम सँभल चलो।
तमस भरी रात, प्रदीप बन स्वयम जलो।।

दुखमय संसार, अभाव अधिकतर सहे।
सुखमय तो मात्र, कुछेक सबल जन रहे।।
रह उनके साथ, विनष्ट यह जग जिनका।
कुछ करके काज, बसा घर नवल उनका।।

तुम कर के पान, समस्त दुख विपद बढ़ो।
गिरि सम ये राह, बना सरल सुगम चढ़ो।।
तुम रख सौहार्द्र, सुकार्य अबल-हित करो।
इस जग में धीर, सुवीर बन कर उभरो।।

विकृत हुआ देश, हवा बहत अब पछुआ।
सब चकनाचूर, यहाँ ऋषि-अभिमत हुआ।।
तुम बन आदर्श, कदाचरण सकल हरो।
यह फिर से देश, समृद्ध पथिक तुम करो।।
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लक्षण छंद:-

"नयसननालाग", रखें सत अरु दश यतिं।
मधु 'रसना' छंद, रचें  ललित मृदुल गतिं।

"नयसननालाग" = नगण यगण सगण नगण नगण लघु गुरु।

( 111  122  1,12  111  111  12 )
17वर्ण, यति{7-10} वर्णों पर,4 चरण
दो-दो चरण समतुकांत।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-01-19

रमेश छंद "नन्ही गौरैया"

फुदक रही हो तरुवर डाल।
सुन चिड़िया दे कह निज हाल।।
उड़ उड़ छानो हर घर रोज।
तुम करती क्या नित नव खोज।।

चितकबरी रंगत लघु काय।
गगन परी सी हृदय लुभाय।।
दरखत पे तो कबहु मुँडेर।
फुर फुर जाती करत न देर।।

मधुर सुना के तुम सब गीत।
वश कर लेती हर घर जीत।।
छत पर दाना जल रख लोग।
कर इसका ले रस उपभोग।।

चहक बजाती मधुरिम साज।
इस चिड़िया का सब पर राज।।
नटखट नन्ही मन बहलाय।
अब इसको ले जगत बचाय।।
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लक्षण छंद:-

"नयनज" का दे गण परिवेश।
रचहु सुछंदा मृदुल 'रमेश'।।

"नयनज" = [ नगण यगण नगण जगण]
( 111  122  111  121 )
12 वर्ण, 4 चरण, दो-दो चरण समतुकांत।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
27-01-19

सोरठा "कृष्ण महिमा"

नयन भरा है नीर, चखन श्याम के रूप को।
मन में नहिं है धीर, नयन विकल प्रभु दरस को।।

शरण तुम्हारी आज, आया हूँ घनश्याम मैं।
सभी बनाओ काज, तुम दीनन के नाथ हो।।

मन में नित ये आस, वृन्दावन में जा बसूँ।
रहूँ सदा मैं पास, फागुन में घनश्याम के।।

फूलों का श्रृंगार, माथे सजा गुलाल है।
तन मन जाऊँ वार, वृन्दावन के नाथ पर।।

पड़त नहीं है चैन, टपक रहे दृग बिंदु ये।
दिन कटते नहिं रैन, श्याम तुम्हारे दरस बिन।।

हे यसुमति के लाल, मन मोहन उर में बसो।
नित्य नवाऊँ भाल, भव बन्धन सारे हरो।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
30-04-19

सोरठा "विधान"

दोहा की तरह सोरठा भी अर्ध सम मात्रिक छंद है। इसमें भी चार चरण होते हैं। प्रथम व तृतीय चरण विषम तथा द्वितीय व चतुर्थ चरण सम कहे जाते हैं। सोरठा में दोहा की तरह दो पंक्तियाँ होती हैं और प्रत्येक पंक्ति में २४ मात्राएँ होती हैं। सोरठा और दोहा के विधान में कोई अंतर नहीं है केवल चरण पलट जाते हैं। दोहा के सम चरण सोरठा में विषम बन जाते हैं और दोहा के विषम चरण सोरठा के सम। तुकांतता भी वही रहती है। यानि सोरठा में विषम चरण में तुकांतता निभाई जाती है जबकि पंक्ति के अंत के सम चरण अतुकांत रहते हैं।

दोहा और सोरठा में मुख्य अंतर गति तथा यति में है। दोहा में 13-11 पर यति होती है जबकि सोरठा में 11 - 13 पर यति होती है। यति में अंतर के कारण गति में भी भिन्नता रहती है।

मात्रा बाँट प्रति पंक्ति
8+2+1, 8+2+1+2

परहित कर विषपान, महादेव जग के बने।
सुर नर मुनि गा गान, चरण वंदना नित करें।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

Tuesday, November 5, 2019

ग़ज़ल (दुनिया है अलबेली)

बहरे मीर:- 2*6

दुनिया है अलबेली,
ये अनबूझ पहेली।

कड़वा जगत-करेला,
रस लो तो गुड़-भेली।

गले लगा या ठुकरा,
पर मत कर अठखेली।

किस्मत भोज बनाये,
या फिर गंगू तेली।

नेता आज छछूंदर,
सर पे मले चमेली।

आराजक बन छाये,
सत्ता जिनकी चेली।

'नमन' उठा सर जीओ,
दुनिया बना सहेली।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
31-08-19

ग़ज़ल (छेड़ाछाड़ी कर जब कोई)

बहरे मीर :- 2*15

छेड़ाछाड़ी कर जब कोई सोया शेर जगाए तो,
वह कैसे खामोश रहे जब दुश्मन आँख दिखाए तो।

चोट सदा उल्फ़त में खायी अब तो ये अंदेशा है,
उसने दिल में कभी न भरने वाले जख्म लगाए तो।

हाथ दोस्ती का आगे कर देते पर क्यों ठहरे हैं,
पहले ये बतला दो उसने छुपकर तीर चलाए तो।

ये अवाम आखिर कब तक चुप बैठेगी मज़बूरी में,
रोज हुक़ूमत झूठे वादों से इसको बहलाए तो।

अच्छे और बुरे दिन के बारे में सोचें, वक़्त कहाँ,
दिन भर की मिहनत भी जब दो रोटी तक न जुटाए तो।

उसके हुस्न की आग में जलते दिल को चैन की साँस मिले,
होश को खो के जोश में जब भी वह आगोश में आए तो।

हाय मुहब्बत की मजबूरी जोर नहीं इसके आगे,
रूठ रूठ कोई जब हमसे बातें सब मनवाए तो।

दुनिया के नक्शे पर लाये जिसको जिस्म तोड़ अपना,
टीस 'नमन' दिल में उठती जब खंजर वही चुभाए तो।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
15-10-17

ग़ज़ल (इंसान के खूँ की नहीं)

बह्र:- 2212*4

इंसान के खूँ की नहीं प्यासी कभी इंसानियत,
पर भूल जाते चूर मद में नर यही इंसानियत।

सकते न जो दे ज़िंदगी क्या हक़ उन्हें लेने का फिर,
पर खून बहता ही रहा, रोती रही इंसानियत।

बौछार करते गोलियों की भीड़ पर आतंकी जब,
उस भीड़ की दहशत में तब सिसकारती इंसानियत।

हे जालिमों जब जुल्म अबलों पर करो खूँखार बन,
मजलूम की आहों में दम को तोड़ती इंसानियत।

थक जाओगे आतंकियों तुम जुल्म से कहता 'नमन',
आतंक के आगे न झुकना जानती इंसानियत।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
22-08-16

ग़ज़ल (हिन्दी हमारी जान है)

बह्र:- 2212   2212

हिन्दी  हमारी जान है,
ये देश की पहचान है।

है मात जिसकी संस्कृत,
माँ  शारदा का दान है।

साखी  कबीरा की यही,
केशव की न्यारी शान है।

तुलसी की रग रग में बसी,
रसखान की ये तान है।

ये सूर  के  वात्सल्य में,
मीरा का इसमें गान है।

सब छंद, रस, उपमा की ये
हिन्दी हमारी खान है।

उपयोग  में  लायें इसे,
अमृत का ये तो पान है।

ये  मातृभाषा विश्व में,
सच्चा हमारा मान है।

इसको करें हम नित 'नमन',
भारत की हिन्दी आन है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
14-09-2016

Friday, October 25, 2019

रमणीयक छंद "कृष्ण महिमा"

मोर पंख सर पे, कर में मधु बाँसुरी।
पीत वस्त्र, कटि में कछनी अति माधुरी।।
ग्वाल बाल सँग धेनु चरावत मोहना।
कौन नित्य नहिं चाहत ये छवि जोहना।।

दिव्य रूप मनमोहन का नर चाख ले।
नाम-जाप रस को मन में तुम राख ले।।
कृष्ण श्याम मुरलीधर मोहन साँवरा।
एक नाम कछु भी जपले मन बावरा।।

मैं गँवार मति पाप-लिप्त अति दीन हूँ।
भोग और धन-संचय में बस लीन हूँ।।
धर्म आचरण का प्रभु मैं नहिं विज्ञ हूँ।
भाव भक्ति अरु अर्चन से अनभिज्ञ हूँ।।

मैं दरिद्र शरणागत हो प्रभु आ गया।
हाथ थाम कर हे ब्रजनाथ करो दया।।
भीर कोउ पड़ती तुम्हरा तब आसरा।
कष्टपूर्ण भव-ताप हरो इस दास रा।।
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लक्षण छंद:-

वर्ण राख कर पंच दशं "रनभाभरा"।
छंद राच 'रमणीयक' हो मन बावरा।।

"रनभाभरा" = रगण नगण भगण भगण रगण
212 111 211 211 212 =15 वर्ण
चार चरण, दो दो या चारों समतुकांत।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

13-07-17

रथपद छंद "मधुर स्मृति"

जब तुम प्रियतम में खोती।
हलचल तब मन में होती।।
तुम अतिसय दुख की मारी।
विरह अगन सहती सारी।।

बरसत अँसुवन की धारा।
तन दहकत बन अंगारा।।
मरम रहित जग से हारी ।
गुजर करत सह लाचारी।।

निश-दिन तब कितने प्यारे।
जब पिय प्रणय-सुधा डारे।।
तन मन हरषित था भारी।
सरस प्रकृति नित थी न्यारी।।

मधुरिम स्मृति गठरी ढ़ोती।
स्मर स्मर कर उनको रोती।।
लहु कटु अनुभव का पीती।
बस दुख सह कर ही जीती।।
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लक्षण छंद:-

"ननुसगग" वरण की छंदा।
'रथपद' रचत सभी बंदा।।

"ननुसगग" =  नगण नगण सगण गुरु गुरु

( 111  111  112   2   2 )
11वर्ण,4 चरण, दो-दो चरण समतुकांत
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-01-19

गीता महिमा (कुंडलियाँ)

गीता अद्भुत ग्रन्थ है, काटे भव की दाह।
ज्ञान अकूत भरा यहाँ, जिसकी कोइ न थाह।
जिसकी कोइ न थाह, लगाओ जितना गोता।
कटे पाप की पाश, गात मन निर्मल होता।
कहे 'बासु' समझाय, ग्रन्थ यह परम पुनीता।
सब ग्रन्थों का सार, पढें सारे नित गीता।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
17-12-18

Wednesday, October 23, 2019

गीत (छठ मैया)

चरणन में छठ माँ के,
कोसिया भरावण के,
दऊरा उठाई चले,
सब नर नार हो।

गंगा के घाट लगी,
भीड़ भगतन की,
देखो छठ मइया की,
महिमा अपार हो।

माथे पे सब चले दऊरा उठाई,
बबुआ, देवर, कहीं भतीजा, भाई,
सुहानी नार सजी,
बिहाने बिहाने चली,
पग में महावर लगी,
सँग भरतार हो।

जल में खड़े हो अर्घ देवन को,
उगते सूरज की पूजा करन को,
सब दिवले जलाये,
फल, पुष्पन चढाये,
माला अर्पण करे,
करो स्वीकार हो।

छठ माई पूर्ण करो इच्छाएँ सारी,
तेरी तो महिमा जग में है भारी,
अन-धन भंडार भरो,
सब को निरोग रखो,
चाही सन्तान देवो,
सुखी संसार हो।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
10-11-2018

नवगीत (मन-भ्रमर)


मन-भ्रमर काव्य-उपवन में
पगले डोल।

जिन कलियों को नित चूमे,
जिन पर तुम गुंजार करे,
क्यों मग्न होय इतना झूमे,
इक दिन उनका पराग झरे,
लो ठीक से तोल।
  मन-भ्रमर काव्य-उपवन में
  पगले डोल।

क्षणिक मधु के पीछे भागे,
नश्वर सुख में है तु रमा,
कैसे तेरे भाग हैं जागे,
जो इनमें तु रहा समा,
मन की गांठे खोल।
  मन-भ्रमर काव्य-उपवन में
  पगले डोल।

नव रस के जहाँ पुष्प खिले,
शांत, करुण तो और श्रृंगार,
वात्सल्य कभी तो भक्ति मिले,
तो वीर, हास्य की है फुहार,
जीवन में इनको घोल।
  मन-भ्रमर काव्य-उपवन में
  पगले डोल।

छंदों के रंग बिरंगे हैं दल,
रस अनेक भाव के यहाँ भरे,
जीवन यहाँ का निश्छल,
अलंकार सब सन्ताप हरे,
ना इनका कोई मोल।
  मन-भ्रमर काव्य-उपवन में
  पगले डोल।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-08-2016

Sunday, October 20, 2019

कुण्डला मौक्तिका (बेटी)

(पदांत 'बेटी', समांत 'अर')

बेटी शोभा गेह की, मात पिता की शान,
घर की है ये आन, जोड़ती दो घर बेटी।।
संतानों को लाड दे, देत सजन को प्यार,
रस की करे फुहार, नेह दे जी भर बेटी।।

रिश्ते नाते जोड़ती, मधुर सभी से बोले,
रखती घर की एकता, घर के भेद न खोले।
ममता की मूरत बड़ी, करुणा की है धार,
घर का सामे भार, काँध पर लेकर बेटी।।

परिचर्या की बात हो, नारी मारे बाजी,
सेवा करती धैर्य से, रोगी राखे राजी।
आलस सारा त्याग के, करती सारे काम,
रखती अपना नाम, सभी से ऊपर बेटी।।

लगे अस्मिता दाव पे, प्रश्न शील का आए,
बड़ी जागरुक नार है, खल कामी न सुहाए।
लाख प्रलोभन सामने, इज्जत की हो बात,
नहीं छून दे गात, मारती ठोकर बेटी।।

चले नहीं नारी बिना, घर गृहस्थ की गाडी,
पूर्ण काज सम्भालती, नारी सब की लाडी।
हक देवें, सम्मान दें, उसकी लेवें राय,
दिल को लो समझाय, नहीं है नौकर बेटी।।

जिस हक की अधिकारिणी, कभी नहीं वह पाई,
नर नारी के भेद की, पाट सकी नहिं खाई।
पीछा नहीं छुड़ाइए, देकर चुल्हा मात्र,
सदा 'नमन' की पात्र, रही जग की हर बेटी।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
14-10-2016

Friday, October 18, 2019

दुर्मिल सवैया (सरस्वती वंदना)

(8सगण)

शुभ पुस्तक हस्त सदा सजती, पदमासन श्वेत बिराजत है।
मुख मण्डल तेज सुशोभित है, वर वीण सदा कर साजत है।
नर-नार बसन्तिय पंचम को, सब शारद पूजत ध्यावत है।
तुम हंस सुशोभित हो कर माँ, प्रगटो वर सेवक माँगत है।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
01-02-2017

विजया घनाक्षरी (कामिनी)

(8, 8, 8, 8 पर यति अनिवार्य।
प्रत्येक यति के अंत में हमेशा लघु गुरु (1 2) अथवा 3 लघु (1 1 1) आवश्यक।
आंतरिक तुकान्तता के दो रूप प्रचलित हैं। प्रथम हर चरण की तीनों आंतरिक यति समतुकांत। दूसरा समस्त 16 की 16 यति समतुकांत। आंतरिक यतियाँ भी चरणान्त यति (1 2) या (1 1 1) के अनुरूप रखें तो उत्तम।)


तम में घिरी यामिनी, चमक रही दामिनी,
पिया में रमी कामिनी, कौन यह सुहासिनी।

आयी मिलने की घड़ी, व्याकुलता लिये बड़ी,
घर से निकल पड़ी, काम-विह्वल मानिनी।

सुनसान डगरिया, तन की न खबरिया,
लचकाय कमरिया, ठुमक चले भाविनी।

मन हरषाय रही, तन को लुभाय रही,
मद छलकाय रही, नार यह उमंगिनी।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
22-06-19

कृपाण घनाक्षरी (विनती)

8,8,8,8 अंत गुरु लघु हर यति समतुकांत।

जगत ये पारावार, फंस गया मझधार,
दिखे नहीं आर-पार, थाम प्रभु पतवार।

नहीं मैं समझदार, जानूँ नहीं व्यवहार,
कैसे करूँ मनुहार, करले तु अंगीकार।

चारों ओर भ्रष्टाचार, बढ़ गया दुराचार,
मच गया हाहाकार, धारो अब अवतार।

छाया घोर अंधकार, प्रभु कर उपकार,
करके तु एकाकार, करो मेरा बेड़ा पार।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
13-05-17

Monday, October 14, 2019

मुक्तक (आँसू)

मानस सागर की लहरों के हैं उफान मेरे आँसू,
वर्षों से जो दबी हृदय में वो पीड़ा कहते आँसू,
करो उपेक्षा मत इनकी तुम सुनलो ओ दुनियाँ वालों,
शब्दों से जो व्यक्त न हो उसको कह जाते ये आँसू।

(2×15)
*********

देख कर के आपकी ये जिद भरी नादानियाँ,
हो गईं लाचार सारी ही मेरी दानाइयाँ,
झेल जिनको कब से मैं बस खूँ के आँसू पी रहा,
लोग सरहाते बता कर आपकी ये खूबियाँ।

(2122*3 + 212)
**********

हम न वो राह से जो भटक जाएंगे,
इसकी दुश्वारियाँ देख थक जाएंगे,
हम तो खारों में भी हँसते गुल की तरह,
ये वो आँसू नहीं जो छलक जाएंगे

(212*3)
**********

बासुदेव अग्रवाल ,'नमन'
तिनसुकिया
24-08-17

मुक्तक (मुहब्बत)

अगर तुम मिल गई होती मुहब्बत और हो जाती,
मिले होते अगर दिल तो इनायत और हो जाती,
लिखा जब ठोकरें खाना गिला करने से अब क्या हो,
दिलों में जो मुहब्बत हो हक़ीक़त और हो जाती।

(1222*4)
*********

अगर ये दिल नहीं होता मुहब्बत फिर कहाँ होती,
मुहब्बत गर न होती तो इबादत फिर कहाँ होती,
इबादत के उसूलों पे टिके जग के सभी मजहब,
अगर मजहब न होता तो इनायत फिर कहाँ होती।

(1222*4)
*********

हर गीत मुहब्बत का चाहत से सँवारा है,
दी दिल ने सदा जब भी तुझको ही पुकारा है,
यादों में तेरी जानम दिन रो के गुजारें हैं,
तू फिर भी रहे रूठी कब दिल को गवारा है।

(221  1222)*2
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इश्क़ के चक्कर में ये कैसी जहालत हो गयी,
देखते ही देखते रुस्वा मुहब्बत हो गयी,
सोच ये आगे बढ़े थे, दिल पे उनका है करम,
पर किया जाहिर तो बोले ये हिमाकत हो गयी।

(2122*3 +  212)
*********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
20-08-17

पुछल्लेदार मुक्तक "चारा घोटाला"

बन्द तबेलों में सिसके हैं पड़ी पड़ी भैंसें सारी।
स्वारथ के अन्धों ने उनके पेटों पर लातें मारी।
बेच खा गये चारा उनका घोटाला करके भारी।
ऐसे चोर उचक्कों का क्या करलें भैसें बेचारी।।

चोरों ने किया चारा सारा मीसिंग,
की नोटों पे खूब कीसिंग,
अब जेलों में चक्की पीसिंग,
सुनो रे मेरे सब भाइयों
बासुदेव कवि पोल आज खोलिंग।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
22-04-18

मुक्तक (देश भक्ति)

सभी देशों में अच्छा देश भारतवर्ष प्यारा है,
खिले हम पुष्प इसके हैं बगीचा ये हमारा है,
हजारों आँधियाँ झकझोरती इसको सदा आईं,
मगर ये बाँटता सौरभ रहा उनसे न हारा है।

(1222*4)
*********

यह देश हमारी माँ, हम आन रखें इसकी।
चरणों में झुका माथा, सब शान रखें इसकी।
इस जन्म-धरा का हम, अब शीश न झुकने दें।
सब प्राण लुटा कर के, पहचान रखें इसकी।

(221 1222)*2
*********

देश के गद्दार जो हैं जान लो सब,
उनके' मंसूबों को' तुम पहचान लो सब,
नाग कोई देश में ना फन उठाए,
नौजवानों आज मन में ठान लो सब।

देश का ऊँचा करेंगे नाम हम सब,
मिल सदा अद्भुत करेंगे काम हम सब,
एकता के बन के हम आदर्श जग में,
देश को पावन बनाएं धाम हम सब।

(2122*3)
*********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
11-04-18

Thursday, October 10, 2019

सुजान छंद (पर्यावरण)

पर्यावरण खराब हुआ, यह नहिं संयोग।
मानव का खुद का ही है, निर्मित ये रोग।।

अंधाधुंध विकास नहीं, आया है रास।
शुद्ध हवा, जल का इससे, होय रहा ह्रास।।

यंत्र-धूम्र विकराल हुआ, छाया चहुँ ओर।
बढ़ते जाते वाहन का, फैल रहा शोर।।

जनसंख्या विस्फोटक अब, धर ली है रूप।
मानव खुद गिरने खातिर, खोद रहा कूप।।

नदियाँ मैली हुई सकल, वन का नित नाश।
घोर प्रदूषण जकड़ रहा, धरती, आकाश।।

वन्य-जंतु को मिले नहीं, कहीं जरा ठौर।
चिड़ियों की चहक न गूँजे, कैसा यह दौर।।

चेतें जल्दी मानव अब, ले कर संज्ञान।
पर्यावरण सुधारें वे, हर सब व्यवधान।।

पर्यावरण अगर दूषित, जगत व्याधि-ग्रस्त।
यह कलंक मानवता पर, हो जीवन त्रस्त।।
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(सुजान २३ मात्राओं का मात्रिक छंद है. इस छंद में हर पंक्ति में १४ तथा ९ मात्राओं पर यति तथा गुरु लघु पदांत का विधान है। अंत ताल 21 से होना आवश्यक है।)

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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
13-06-19

सार छंद (वाल्मीकि ऋषि)

दस्यु राज रत्नाकर जग में, वाल्मीकि कहलाये।
उल्टा नाम राम का इनको, नारद जी जपवाये।।
मरा मरा से राम राम की, सुंदर धुन जब आई।
वाल्मीकि जी ने ब्रह्मा सी, प्रभुताई तब पाई।।

घोर तपस्या में ये भूले, तन की सुध ही सारी।
चींटे इनके तन से चिपटे, त्वचा पूर्ण खा डारी।।
प्रणय समाहित क्रोंच युगल को, तीर व्याध जब मारा।
प्रथम अनुष्टुप् छंद इन्होंने, करुणा में रच डारा।।

'नमन' आदि कवि को मेरा है, चरणों में है वन्दन।
शरद पूर्णिमा के दिन इनका, जग करता अभिनंदन।।
रामायण से महाकाव्य की, इनने सरित बहाई।
करे निमज्जन उसमें ये जग, होते राम सहाई।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
05-10-17

सार छंद "विधान"

सार छंद चार चरणों का समपाद मात्रिक छंद है। प्रति चरण 28 मात्रा होती है। यति 16 और 12 मात्रा पर है। दो दो चरण तुकान्त। मात्रा बाँट-
16 मात्रिक ठीक चौपाई वाला चरण और 12 मात्रा वाला में तीन चौकल अथवा एक अठकल और एक चौकल हो सकते हैं। 12 मात्रिक पद का   अंत गुरु या 2 लघु से होना आवश्यक है।

बासुदेव अग्रवाल नमन
तिनसुकिया

सरसी छंद "राजनाथजी"

भंभौरा में जन्म लिया है, यू पी का यक गाँव।
रामबदन खेतीहर के घर, अपने रक्खे पाँव।।
सन इक्यावन की शुभ बेला, गुजरातीजी मात।
राजनाथजी जन्म लिये जब, सबके पुलके गात।।

पाँव पालने में दिखलाये, होनहार ये पूत।
थे किशोर तेरह के जब ये, बने शांति के दूत।।
जुड़ा संघ से कर्मवीर ये, आगे बढ़ता जाय।
पीछे मुड़ के कभी न देखा, सब के मन को भाय।।

राजनाथ जी सदा रहे हैं, सभी गुणों की खान।
किया दलित पिछड़ों की खातिर, सदा गरल का पान।।
सदा देश का मान बढ़ाया, स्पष्ट बात को बोल।
हिन्दी को इनने दिलवाया, पूरे जग में मोल।।

गृह मंत्रालय थाम रखा है, होकर के निर्भीक।
सिद्धांतों पर कभी न पीटे, तुष्टिकरण की लीक।।
अभिनन्दन 'संसार करत है, 'नमन' आपको 'नाथ'।
बरसे सौम्य हँसी इनकी नित, बना रहे यूँ साथ।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया (असम)
28-09-17

तोमर छंद (अव्यवस्था)

हर नगर है बदहाल।
अब जरा देख न भाल।।
है व्यवस्था लाचार।
दिख रही चुप सरकार।।

वाहन खड़े यक ओर।
पशु सड़क बीच विभोर।।
कुछ बची शर्म न लाज।
हर तरफ जंगल राज।।

मन मौज में कुछ लोग।
हर चीज का उपयोग।।
वे करे निज अनुसार।
बन कर सभी पर भार।।

ये दौड़ अंधी आज।
जा रही दब आवाज।।
आराजकों का शोर।
बस अब दिखाये जोर।।
******
12 मात्रा। अंत ताल से आवश्यक। चार चरण। दो दो तुकांत।
बाँट 2-3-2-2-3(ताल)
*****

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
21-09-19

Sunday, October 6, 2019

ग़ज़ल (आँखों के तीर दिल)

बह्र:- 221  2121  1221  212

आँखों के तीर दिल में चुभा कर चले गये,
घायल को छोड़ मुँह को छुपा कर चले गये।

चुग्गा वे शोखियों का चुगा कर चले गये,
सय्याद बनके पंछी फँसा कर चले गये।

आना भी और जाना भी उनका था हादसा,
अनजान से ही मन में समा कर चले गये।

जब दर्द ये दिया है तो क्यों दी न बेरुखी,
(अपना सा क्यूँ न मुझको बना कर चले गये।)

सहरा में है सराब सा उनका ये इश्क़ कुछ,
पूरे न हो वो ख्वाब दिखा कर चले गये।

ताउम्र क़ैद चाहता था अब्रे जुल्फ़ में,
दिखला घटा को प्यास बढ़ा कर चले गये।

अब तो 'नमन' है चश्मे वफ़ा का ही मुंतज़िर,
ख्वाहिश हुजूर क्यों ये जगा कर चले गये।

सहरा=रेगिस्तान
सराब=मृगतृष्णा
अब्रे ज़ुल्फ़=जुल्फ का बादल
चश्मे वफ़ा=वफ़ा भरी नज़र
मुंतज़िर=प्रतीक्षारत

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-06-17

(जिगर मुरादाबादी साहिब के मिसरे पर तरही ग़ज़ल।)

ग़ज़ल "ईद मुबारक़"

बह्र:- 221 1221 1221 122

रमजान गया आई नज़र ईद मुबारक,
खुशियों का ये दे सबको असर ईद मुबारक।

घुल आज फ़ज़ा में हैं गये रंग नये से,
कहती है ये खुशियों की सहर ईद मुबारक।

पाँवों से ले सर तक है धवल आज नज़ारा,
दे कर के दुआ कहता है हर ईद मुबारक।

सब भेद भुला ईद गले लग के मनायें,
ये पर्व रहे जग में अमर ईद मुबारक।

ये ईद है त्योहार मिलापों का अनोखा,
दूँ सब को 'नमन' आज मैं कर ईद मुबारक।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-06-17

ग़ज़ल (आजकल उनसे मुलाकातें)

बह्र:- 2122*3 212

आजकल उनसे मुलाकातें कहानी हो गईं,
शोखियाँ उनकी अदाएँ अब पुरानी हो गईं।

हम नहीं उनको मना पाये गए जब रूठ वों,
जिंदगी में गलतियाँ कुछ ना-गहानी हो गईं।

प्यार उनका पाने की मन में कई थी हसरतें,
चाहतें लेकिन वो सारी आज पानी हो गईं।

फाग बीता आ गई मधुमास की रंगीं फ़िजा,
टेसुओं की टहनियाँ सब जाफ़रानी हो गईं।

हुक्मरानों की बढ़ी है ऐसी कुछ चमचागिरी,
हरकतें बचकानी उनकी बुद्धिमानी हो गईं।

थे मवाली जो कभी वे आज नेता हैं बड़े,
देखिए सारी तवायफ़ खानदानी हो गईं।

बोलबाला आज अंग्रेजी का ऐसा देश में,
मातृ भाषाएँ हमारी नौकरानी हो गईं।

थाम के बैठे कलम चलता नहीं क्या माजरा,
जिनको लिखना था वो सब बातें जबानी हो गईं।

हाथ रख सर पे सदा आगे बढ़ाते आये जो,
अब 'नमन' रूहें वो सारी आसमानी हो गईं।


ना-गहानी= अकस्मात्

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
16-03-2017

Saturday, October 5, 2019

ग़ज़ल (करे क्या हूर)

बह्र:- 122  21

करे क्या हूर
मिला लंगूर।

नहीं अब आस
जमाना क्रूर।

नहीं तहज़ीब,
जरा भी लूर।

दिखा मत आँख
यहाँ सब शूर।

दबे जो घाव
बने नासूर।

बड़े निरुपाय
व्यथा भरपूर।

'नमन' की नज़्म
बड़ी मगरूर।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-09-19

ग़ज़ल (कुछ अजीब धाराएं)

बह्र:- (212 1222)*2

कुछ अजीब धाराएं, थी घिरीं सवालों में,
अब फँसीं नहीं वे हैं, उन सियासी चालों में।

होता है कोई ऐसा, शख़्स पैदा सालों में,
छा जो जाये दुनिया के, सारे न्यूज वालों में।

बदगुमानी अब तक जो, करते देश से आये,
राज़ उनके अब सारे, आ गये रिसालों में।

खुद की हाँकनी छोड़ें, अब तो आप नेताजी,
सुनिये दर्द पिंहाँ जो, मुफ़लिसों के नालों में।

खिलखिलाना यूँ छोड़ो, ये डुबो न दें हम को।
पड़ते गहरे जो गड्ढे, इन तुम्हारे गालों में।

बेजुबाँ तेरी मय में, बात वो कहाँ साकी,
बात जो दहकते से, लब के उन पियालों में।

ज़ाफ़रान की खुशबू, छा 'नमन' गयी फिर से,
छँट गये अँधेरे सब, सांस लें उजालों में।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
19-08-19

Friday, September 20, 2019

रत्नकरा छंद "अतृप्त प्रीत"

चंदा चित्त चुरावत है।
नैना नीर बहावत है।।
प्यासी प्रीत अतृप्त दहे।
प्यारा प्रीतम दूर रहे।।

ये भृंगी मन गूँजत है।
रो रो पीड़ सुनावत है।।
माला नित्य जपूँ पिय की।
भूली मैं सुध ही जिय की।।

रातें काट न मैं सकती।
तारों को नभ में तकती।।
बारंबार फटे छतिया।
है ये व्याकुल बावरिया।।

आँसू धार लिखी पतिया।
भेजूँ साजन लो सुधिया।।
चीखों की कुछ तो धुन ले।
निर्मोही सजना सुन ले।।
===========
लक्षण छंद:-

"मासासा" नव अक्षर लें।
प्यारी 'रत्नकरा' रस लें।।

"मासासा" = मगण सगण सगण
( 222  112  112 )
9वर्ण, 4 चरण,
दो-दो चरण समतुकांत।
****************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-01-19

रतिलेखा छंद "विरह विदग्धा"

मन तो ठहर ठहर अब, सकपकाये।
पिय की डगर निरख दृग, झकपकाये।।
तुम क्यों अगन सजन यह, तन लगाई।
यह चाह हृदय मँह प्रिय, तुम जगाई।।

तुम आ कर नित किस विध, गुदगुदाते।
सब याद सजन फिर हम, बुदबुदाते।।
अब चाहत पुनि चित-चक, चहचहाना।
नित दूर न रह प्रियवर, कर बहाना।।

दहके विरह अगन सह, हृदय भारी।
मन ही मन बिलखत यह, दुखित नारी।।
सजना किन गलियन मँह, रह रहे हो।
सरिता नद किन किन सह, बह रहे हो।।

तुम तो नव कलियन रस, नित चखो रे।
इस और कबहु मधुकर, नहिं लखो रे।।
किस कारण विरहण सब, दुख सहेगी।
दुखिया यह पिय सँग अब, कब रहेगी।।
==============
लक्षण छंद:-

"सननानसग" षट दशम, वरण छंदा।
यति एक दश अरु पँचम, सु'रतिलेखा'।।

"सननानसग"=  सगण नगण नगण नगण सगण गुरु

( 112  111  111 11,1  112   2 )
16वर्ण, यति{11-5} वर्णों पर,4 चरण
दो-दो चरण समतुकांत
***************
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-01-19

Sunday, September 15, 2019

दोहा (मकर सक्रान्ति)

हुआ सूर्य का संक्रमण, मकर राशि में आज।
मने पर्व सक्रांति का, ले कर पूरे साज।।

शुचिता तन मन की रखें, धरें सूर्य का ध्यान।
यथा शक्ति सब ही करें, तिल-लड्डू का दान।।

सुख वैभव सम्पत्ति का, यह पावन है पर्व।
भारत के हर प्रांत में, इसका न्यारा गर्व।।

पोंगल, खिचड़ी, लोहड़ी, कहीं बिहू का रंग।
कहीं पतंगों का दिवस, इसके अपने ढंग।।

संस्कृति, रीत, परम्परा, अपनी सभी अनूप।
सबके अपने अर्थ हैं, सबके अपने रूप।।

भेद भाव त्यज हम सभी, मानें ये त्योहार।
प्रीत नेह के रस भरे, पावन ये आगार।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
15-01-19

किरीट सवैया

(8 भगण 211)

भीतर मत्सर लोभ भरे पर, बाहर तू तन खूब
सजावत।
अंतर में जग-मोह बसा कर, क्यों भगवा फिर धार दिखावत।
दीन दुखी पर भाव दया नहिं, आरत हो भगवान
मनावत।
पाप घड़ा उर माँहि भरा रख, पागल अंतरयामि
रिझावत।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
20-11-18

वागीश्वरी सवैया

(122×7  +  12)

दया का महामन्त्र धारो मनों में, दया से सभी को लुभाते चलो।
न हो भेद दुर्भाव कैसा किसी से, सभी को गले से लगाते चलो।
दयाभूषणों से सभी प्राणियों के, उरों को सदा ही सजाते चलो।
दुखाओ दिलों को न थोड़ा किसी के,  दया की सुधा को बहाते चलो।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-10-16

घनाक्षरी विभेद

घनाक्षरी पाठक या श्रोता के मन पर पूर्व के मनोभावों को हटाकर अपना प्रभाव स्थापित कर अपने अनुकूल बना लेनेवाला छंद है। घनाक्षरी में शब्द प्रवाह इस तरह होता है मानो मेघ की गर्जन हो रही हो। साथ ही इसमें शब्दों की बुनावट सघन होती है जैसे एक को ठेलकर दूसरा शब्द आने की जल्दी में हो। शायद इसके नाम के पीछे यही सभी कारण रहे होंगे। घनाक्षरी छंद के कई भेदों के उदाहरण मिलते हैं।

(1) मनहरण घनाक्षरी
इस को घनाक्षरी का सिरमौर कहें तो अनुचित नहीं होगा।
कुल वर्ण संख्या = 31
16, 15 पर यति अनिवार्य। 8,8,8,7 के क्रम में लिखें तो और अच्छा।
चरणान्त हमेशा गुरु ही रहता है।

(2) जनहरण घनाक्षरी
कुल वर्ण संख्या = 31 । इसमें चरण के प्रथम 30 वर्ण लघु रहते हैं तथा केवल चरणान्त दीर्घ रहता है।
16, 15 पर यति अनिवार्य। 8,8,8,7 के क्रम में लिखें तो और अच्छा।

(3) रूप घनाक्षरी
कुल वर्ण संख्या = 32
16, 16 पर यति अनिवार्य। 8,8,8,8 के क्रम में लिखें तो और अच्छा।
चरणान्त हमेशा गुरु लघु (2 1)।

(4) जलहरण घनाक्षरी
कुल वर्ण संख्या = 32
16, 16 पर यति अनिवार्य। 8,8,8,8 के क्रम में लिखें तो और अच्छा।
चरणान्त हमेशा लघु लघु (1 1)।

(5) मदन घनाक्षरी
कुल वर्ण संख्या = 32
16, 16 पर यति अनिवार्य। 8,8,8,8 के क्रम में लिखें तो और अच्छा।
चरणान्त हमेशा गुरु गुरु (2 2)।

(6) डमरू घनाक्षरी
कुल वर्ण संख्या = 32 सभी मात्रा रहित वर्ण आवश्यक।
16, 16 पर यति अनिवार्य। 8,8,8,8 के क्रम में लिखें तो और अच्छा।

(7) कृपाण घनाक्षरी
कुल वर्ण संख्या 32
8, 8, 8, 8 पर यति अनिवार्य।
चरणान्त हमेशा गुरु लघु (2 1)।
हर यति समतुकांत होनी आवश्यक। एक चरण में चार यति होती है। इस प्रकार 16 यति समतुकांत होगी।

(8) विजया घनाक्षरी
कुल वर्ण संख्या 32
8, 8, 8, 8 पर यति अनिवार्य।
चरणान्त हमेशा लघु गुरु (1 2) अथवा 3 लघु (1 1 1) आवश्यक।
आंतरिक तूकान्तता के दो रूप प्रचलित हैं। प्रथम हर चरण की तीनों आंतरिक यति समतुकांत। दूसरा समस्त 16 की 16 यति समतुकांत। आंतरिक यतियाँ भी चरणान्त यति (1 2) या (1 1 1) के अनुरूप रखें तो उत्तम।

(9) हरिहरण घनाक्षरी
कुल वर्ण संख्या 32
8, 8, 8, 8 पर यति अनिवार्य।
चरणान्त हमेशा लघु लघु (1 1) आवश्यक।
आंतरिक तुकान्तता के दो रूप प्रचलित हैं। प्रथम हर चरण की तीनों आंतरिक यति समतुकांत। दूसरा समस्त 16 की 16 यति समतुकांत।

(10) देव घनाक्षरी
कुल वर्ण = 33
8, 8, 8, 9 पर यति अनिवार्य।
चरणान्त हमेशा 3 लघु (1 1 1) आवश्यक। यह चरणान्त भी पुनरावृत रूप में जैसे 'चलत चलत' रहे तो उत्तम।

(11) सूर घनाक्षरी
कुल वर्ण = 30
8, 8, 8, 6 पर यति अनिवार्य।
चरणान्त की कोई बाध्यता नहीं, कुछ भी रख सकते हैं।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

जलहरण घनाक्षरी (सिद्धु पर व्यंग)

शिल्प~8888,अंत में लघु-लघु

जब की क्रिकेट शुरु, बल्ले का था नामी गुरु,
जीभ से बै'टिंग करे, अब धुँवाधार यह।

न्योता दिया इमरान, गुरु गया पाकिस्तान,
फिर तो खिलाया गुल, वहाँ लगातार यह।

संग बैठ सेनाध्यक्ष, हुआ होगा चौड़ा वक्ष,
सब के भिगोये अक्ष, मन क्या विचार यह

बेगाने की ताजपोशी,अबदुल्ला मदहोशी,
देश को लजाय नाचे, किस अधिकार यह।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
27-08-18

रुबाई (1-3)

रुबाई-1

दिनकर सा धरा पर न रहा है कोई;
हूँकार भरे जो न बचा है कोई;
चमचों ने है अधिकार किया मंचों पे;
उद्धार करे झूठों से ना है कोई।

रुबाई-2

जीते हैं सभी मौन यहाँ रह कर के;
मर रूह गई जुल्मो जफ़ा सह कर के;
पत्थर पे न होता है असर चीखों का;
कुछ फ़र्क नहीं पड़ता इन्हें कह कर के।

रुबाई-3

झूठों की सदा अब होती जयकार यहाँ;
जो सत्य कहे सुनते हैं फटकार यहाँ;
कलमों के धनी हार कभी ना माने;
गूँजाएँगे नव क्रांति की गूँजार यहाँ।
*******
विधान:- 221  1221  122  22/112
1,2,4 चरण तुकांत।
=============

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
1-04-2017

मुक्तक (श्रृंगार)

छमक छम छम छमक छम छम बजी जब उठ तेरी पायल,
इधर कानों में धुन आई उधर कोमल हृदय घायल,
ठुमक के पाँव जब तेरे उठे दिल बैठता मेरा,
बसी मन में ये धुन जब से तेरा मैं हो गया कायल।

(1222×4)
*********

चाँदनी रात थी आपका साथ था, रुख से पर्दा हटाया मजा आ गया।
आसमाँ में खिला दूर वो चाँद था, पास में ये खिलाया मजा आ गया।
आतिश ए हुस्न उसमें कहाँ है भला, घटता बढ़ता रहे दाग भी साथ में।
इसको देखा तो शोले भड़कने लगे, चाँद यह क्या दिखाया मजा आ गया।।

(212×8)
*********

उनकी उल्फ़त दिल की ताक़त दोस्तो,
नक़्शे पा उनके ज़ियारत दोस्तो,
चूमते उनके ख़तों को रोज हम,
बस यही अपनी इबादत दोस्तो।

(2122  2122  212)
*********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
13-09-18

Thursday, September 12, 2019

पिरामिड "चाय"

(1)

पी
प्याली
चाय की
मतवाली,
कार्यप्रणाली
हृदय की हुई
होली जैसी धमाली।

(2)

ले
चुस्की
चाय की,
मिटी खुश्की,
भागी झपकी
स्फूर्ति दे थपकी
छायी खुमारी हल्की।

(3)

ये
चाय
है नशा,
बिगाड़ती
तन की दशा,
पर दे हताशा,
जब तक अप्राप्त।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
24-06-19

हाइकु (नवीन)

5-7-5 वर्ण

आँख में फूल,
तलवे में कंटक,
प्रेम-डगर।
**

मुख पे हँसी,
हृदय में क्रंदन,
विरही मन।
**

बसो तो सही,
यदि तुम हो स्वप्न,
तो चले जाना।
**
आज का स्नेह
उफनता सागर
तृषित देह।
**
शब्द-बदली
काव्य-धरा बरसी
कविता खिली।
**
आया चढ़ावा
बंदरों का कलेवा
ईश्वर भूखा।
**

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
12-09-19

सेदोका (अपनों का दर्द)

5-7-7-5-7-7 वर्ण

हम स्वदेशी
अपनों का न साथ
घर में भी विदेशी;
गया बिखर,
बसा बसाया घर!
कोई न ले खबर।
**

बड़े लाचार,
गैरों का अत्याचार,
अपनों से दुत्कार;
सोची समझी
साजिश के शिकार,
कहाँ है सरकार?
**

हम ना-शाद,
उनका ये जिहाद
भीषण अवसाद;
न प्रतिवाद
खो जाये फरियाद,
हाय रे सत्तावाद।
**

(मेरठ में हिंदू परिवारों के पलायन पर)

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
30-06-19

सायली (मजदूर)

ईंट,
गारा, पत्थर।
सर पे ढोता
भारत का
मज़दूर।।
*****

मजदूर
हमें देने
सर पे छत
खुद रहता
बेछत।।
*****

मजदूर
उत्पादन- जनक,
बेटी के बाप
जैसा वह
मजबूर।।
**

मजदूर
कारखानों में
मसीनों संग पिसता,
चूर चूर
होता।
**

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
15-09-17

माहिया (सावन आया है)

चूड़ी की खन खन में,
सावन आया है,
प्रियतम ही तन-मन में।

झूला झूलें सखियाँ,
याद दिलाएं ये,
गाँवों की वे बगियाँ।

गलियों से बचपन की,
सावन आ, खोया,
चाहत में साजन की।

आँख-मिचौली करता।
चंदा बादल से,
दृश्य हृदय ये हरता।

छत से उतरा सावन,
याद लिये पिय की,
मन-आंगन हरषावन।

मोर पपीहा की धुन,
सावन ले आयी,
मन में करती रुन-झुन।

झर झर झरतीं आँखें,
सावन लायीं हैं।
पिय-रट की दें पाँखें।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-06-19

Monday, September 9, 2019

सरसी छंद "विधान"

सरसी छंद चार चरणों का समपाद मात्रिक छंद है। प्रति चरण 27 मात्रा होती है। यति 16 और 11 मात्रा पर है। दो दो चरण तुकान्त। मात्रा बाँट-
16 मात्रिक ठीक चौपाई वाला चरण और  11 मात्रा वाला ठीक दोहा का सम पद।

एक स्वरचित पूर्ण सूर्य ग्रहण के वर्णन का उदाहरण देखें।

हीरक जड़ी अँगूठी सा ये, लगता सूर्य महान।
अंधकार में डूब गया है, देखो आज जहान।।
पूर्ण ग्रहण ये सूर्य देव का, दुर्लभ अति अभिराम।
दृश्य प्रकृति का अनुपम अद्भुत, देखो मन को थाम।।

बासुदेव अग्रवाल नमन
तिनसुकिया

श्रृंगार छंद "तड़प"

सजन मत प्यास अधूरी छोड़।
नहीं कोमल मन मेरा तोड़।।
बहुत ही तड़पी करके याद।
सुनो अब तो तुम अंतर्नाद।।

सदा तारे गिन काटी रात।
बादलों से करती थी बात।।
रही मैं रोज चाँद को ताक।
कलेजा होता रहता खाक।।

मिलन रुत आई बरसों बाद।
हृदय में छाया अति आह्लाद।।
बजा इस वीणा का हर तार।
बहा दो आज नेह की धार।।

गले से लगने की है चाह।
निकलती साँसों से अब आह।।
सभी अंगों में एक उमंग।
हुई जैसे उन्मुक्त मतंग।।

देख लो होंठ रहें है काँप।
मिलन की आतुरता को भाँप।।
बाँह में भर कर तन यह आज।
छेड़ दो रग रग के सब साज।।

समर्पण ही है मेरा प्यार।
सजन अब कर इसको स्वीकार।।
मिटा दो जन्मों की सब प्यास।
पूर्ण कर दो सब मेरी आस।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
01-08-2016

श्रृंगार छंद "विधान"

श्रृंगार छंद बहुत ही मधुर लय का 16 मात्रा का चार चरण का छंद है। तुक दो दो चरण में है। इसकी मात्रा बाँट 3 - 2 - 8 - 3 (ताल) है। प्रारंभ के त्रिकल के तीनों रूप मान्य है जबकि अंत का त्रिकल केवल दीर्घ और लघु (21) होना चाहिए। द्विकल 1 1 या 2 हो सकता है। अठकल के नियम जैसे प्रथम और पंचम मात्रा पर शब्द का समाप्त न होना, 1 से 4 तथा 5 से 8 मात्रा में पूरित जगण का न होना और अठकल का अंत द्विकल से होना अनुमान्य हैं।

श्रृंगार छंद का 32 मात्रा का द्विगुणित रूप महा श्रृंगार छंद कहलाता है। यह चार चरणों का छंद है जिसमें तुकांतता 32 मात्रा के दो दो चरणों में निभायी जाती है। यति 16 - 16 मात्रा पर पड़ती है।

बासुदेव अग्रवाल नमन
तिनसुकिया

लावणी छन्द "विधान"

लावणी छन्द अर्द्धमात्रिक छन्द है। इस छन्द में चार चरण होते हैं, जिनमें प्रति चरण 30 मात्राएँ होती हैं।

प्रत्येक चरण दो विभाग में बंटा हुआ रहता है जिनकी यति 16-14 निर्धारित होती है। अर्थात् विषम पद 16 मात्राओं का और सम पद 14 मात्राओं का होता है। दो-दो चरणों की तुकान्तता का नियम है। चरणान्त सदैव गुरु या 2 लघु से होना चाहिये।

16 मात्रिक वाले पद का विधान और मात्रा बाँट ठीक चौपाई छंद वाला है। 14 मात्रिक पद की बाँट 12+2 है। 12 मात्रिक 3 चौकल या एक अठकल और एक चौकल हो सकते हैं। चौकल और अठकल के सभी नियम लागू होंगे।

बासुदेव अग्रवाल नमन
तिनसुकिया

लावणी छन्द "गृह-प्रवेश"

सपनों का संसार हमारा, नव-गृह यह मंगलमय हो।
कीर्ति पताका इसकी फहरे, सुख वैभव सब अक्षय हो।।
यह विश्राम-स्थली सब की बन, शोक हृदय के हर लेवे।
इसमें वास करे उसको ये, जीवन का हर सुख देवे।।

तरुवर सी दे शीतल छाया, नींव रहे दृढ़ इस घर की।
कृपा दृष्टि बरसे इस पर नित, सवित, मरुतगण, दिनकर की।।
विघ्न हरे गणपति इस घर के, रिद्धि सिद्धि का वास रहे।
शुभ ऐश्वर्य लाभ की धारा, घर में आठों याम बहे।।

कुटिल दृष्टि इस नेह-गेह पर, नहीं किसी की कभी पड़े।
रिक्त कभी हो जरा न पाये, पय, दधि, घृत के भरे घड़े।।
परिजन रक्षित सदा यहाँ हो, अमिय-धार इसमें बरसे।
हो सत्कार अतिथि का इसमें, याचक नहीं यहाँ तरसे।।

दूर्वा, श्री फल, कुंकुम, अक्षत, दैविक भौतिक विपद हरे।
वरुण देव का पूर्ण कलश ये, घर के सब भंडार भरे।।
इस शुभ घर से जीवन-पथ में, आगे बढ़ते जायें हम।
सकल भाव ये उर में धर के, मंगल गृह में आयें हम।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
12-04-19

Friday, September 6, 2019

ग़ज़ल (जो मुसीबत में किसी के काम आता है)

बह्र:- 2122*3  2

धुन- बस यही अपराध मैं हर बार

जो मुसीबत में किसी के काम आता है,
सबसे पहले उसका दिल में नाम आता है।

टूट गर हर आस जाए याद हरदम रख,
अंत में तो काम केवल राम आता है।

मन में सच्ची भक्ति रख दरबार माँ के जा,
माँ-कृपा जिस पे हो माँ के धाम आता है।

दुख का आना सुख का जाना ठीक वैसे ही,
ज्यों अँधेरा दिन ढ़ले हर शाम आता है।

जो खुदा पे रख भरौसा जिंदगी जीता,
उसको ही अल्लाह का इलहाम आता है।

राह सच्चाई की चुन ली अब किसे परवाह,
सर पे किसका कौनसा इल्ज़ाम आता है।

वो ही मैदाँ वे ही घोड़े वे ही हैं दर्शक,
क्या 'नमन' फिर से वही परिणाम आता है?

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
20-12-2018

ग़ज़ल (देश के गद्दार जो पहचान)

बह्र:- 2122*3

देश के गद्दार जो पहचान लो सब,
उनके मंसूबों की फ़ितरत जान लो सब।

जब भी छेड़े देश का इतिहास कोई,
चुप न बैठो बात का संज्ञान लो सब।

नाग कोई देश में गर फन उठाए,
उस को ठोकर से कुचल दें ठान लो सब।

देश से बढ़कर नहीं कोई जहाँ में,
दिल की गहराई से इसको मान लो सब।

सिंह सी हुंकार भर जागो जवानों,
देख कर दुश्मन को सीना तान लो सब।

देश को हम नित 'नमन' कर मान देवें,
भारती माँ से यही वरदान लो सब।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
31-01-2017

ग़ज़ल (आज कहने जा रहा कुछ अनकही)

बह्र:- 2122  2122  212

आज कहने जा रहा कुछ अनकही,
बात अक्सर मन में जो आती रही।

आज की सच्चाई मित्रों है यही,
सबके मन भावे कहो हरदम वही।

खोखली अब हो रही रिश्तों की जड़,
मान्यताएँ जा रहीं हैं सब ढ़ही।

खो रहे माता पिता सम्मान अब,
भावनाएँ आधुनिकता में बही।

आज बे सिर पैर की सब हाँकते,
हो गया क्या अब दिमागों का दही।

हर तरफ आतंकियों का जोर है,
निरपराधों के लहू से तर मही।

बात कड़वी पर खरी कहता 'नमन',
आप निर्णय खुद करें क्या है सही।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन',
तिनसुकिया
12-11-2018

ग़ज़ल (बोलना बात का भी मना है)

बह्र:- 2122   122   122

बोलना बात का भी मना है,
साँस को छोड़ना भी मना है।

दहशतों में सभी जी रहे हैं,
दर्द का अब गिला भी मना है।

ख्वाब देखे कभी जो सभी ने,
आज तो सोचना भी मना है।

जख्म गहरे सभी सड़ गये हैं,
खोलना घाव का भी मना है।

सब्र रोके नहीं रुक रहा अब,
बाँध को तोड़ना भी मना है।

हो गई खत्म सहने की ताक़त,
करना उफ़ का जरा भी मना है।

अब नहीं है 'नमन' का ठिकाना,
आशियाँ ढूंढना भी मना है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
13-11-16

ग़ज़ल (आज फिर इश्तिहार किसका)

बह्र:- 2122  1212  22/112

आज फिर इश्तिहार किसका है?
शौक़ ये बार बार किसका है?

उनके शायद मचल रहे अरमाँ,
दिल में उनके बुखार किसका है?

करके घायल छिपा कहाँ क़ातिल,
दिल के तीर_आर पार किसका है?

आँख जो आज तक दिखाता रहा,
उसके बिन और वार किसका है?

दिल की सुन सुन ख़ता बहुत खाई,
फिर बता ऐतबार किसका है?

सोचता हूँ मगर न लब खुलते,
मुझ पे इतना ये भार किसका है?

गुल को छूते ही ये चुभन कैसी,
'बासु' मत पूछ खार किसका है?

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
06-05-18

Friday, August 16, 2019

पुछल्लेदार मुक्तक "नेताओं का खेल"

नेताओं ने आज देश में कैसा खेल रचाया है।
इनकी मनमानी के आगे सर सबका चकराया है।
लूट लूट जनता को इनने भारी माल बनाया है।
स्विस बैंकों में खाते रखकर काला धन खिसकाया है।।

सत्ताधीशों ने देश को है बाँटा,
करारा मारा चाँटा,
यही तो चुभे काँटा,
सुनोरे मेरे सब भाइयों,
बासुदेव कवि दर्द ये सुनाता।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
28-04-18

मुक्तक (साहित्य, भाषा)

भरा साहित्य सृजकों से हमारा ये सुखद परिवार,
बड़े गुरुजन का आशीर्वाद अरु गुणग्राहियों का प्यार,
यहाँ सम्यक समीक्षाओं से रचनाएँ परिष्कृत हों,
कहाँ संभव कि ऐसे में किसी की कुंद पड़ जा धार।

1222*4
*********

यहाँ काव्य की रोज बरसात होगी।
कहीं भी न ऐसी करामात होगी।
नहाओ सभी दोस्तो खुल के इसमें।
बड़ी इससे क्या और सौगात होगी।।

122×4
*********
हिन्दी

संस्कृत भाषा की ये पुत्री, सर्व रत्न की खान है,
आज अभागी सन्तानों से, वही रही खो शान है,
थाल पराये में मुँह मारो, पर ये हरदम याद हो,
हिन्दी ही भारत को जग में, सच्ची दे पहचान है।

(16+13 मात्रा)
*********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-10-16

मौक्तिका (जो सत्यता ना पहचानी)

2*9 (मात्रिक बहर)
(पदांत 'ना पहचानी', समांत 'आ' स्वर)

दूजों के गुण भारत तुम गाते,
अपनों की प्रतिभा ना पहचानी।
तुम मुख अन्यों का रहे ताकते,
पर स्वावलम्बिता ना पहचानी।।

सोने की चिड़िया देश हमारा,
था जग-गुरु का पद सबसे न्यारा।
किस हीन भावना में घिर कर अब,
वो स्वर्णिम गरिमा ना पहचानी।।

जिनको तूने उपदेश दिया था,
असभ्य से जिनको सभ्य किया था।
पर आज उन्हीं से भीख माँग के,
वह खोई लज्जा ना पहचानी।।

सम्मान के' जो सच्चे अधिकारी,
है जिनकी प्रतिभा जग में न्यारी।
उन अपनों की अनदेखी कर के,
उनकी अभिलाषा ना पहचानी।।

मूल्यांकन जो प्रतिभा का करते,
बुद्धि-हीन या पैसों पे मरते।
परदेशी वे अपनों पे थोप के',
देश की अस्मिता ना पहचानी।।

गुणी सुधी जन अब देश छोड़ कर,
विदेश जा रहे मुख को मोड़ कर।
लोहा उनने सब से मनवाया,
पर यहाँ रिक्तता ना पहचानी।।

सम्बल विदेश का अब तो छोड़ो,
अपनों से यूँ ना मुख को मोड़ो।
हे भारत 'नमन' करो उसको तुम,
अब तक जो सत्यता ना पहचानी।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
10-07-2016

कहमुकरी (विविध)

मीठा बोले भाव उभारे
तोड़े वादों में नभ तारे
सदा दिलासा झूठी देता
ए सखि साजन? नहिं सखि नेता!

सपने में नित इसको लपकूँ
मिल जाये तो इससे चिपकूँ
मेरे ये उर वसी उर्वसी
ए सखा सजनि? ना रे कुर्सी!

जिसके डर से तन मन काँपे
घात लगा कर वो सखि चाँपे
पूरा वह निष्ठुर उन्मादी
क्या साजन? न आतंकवादी!

गिरगिट जैसा रंग बदलता
रार करण वो सदा मचलता
उसकी समझुँ न कारिस्तानी
क्या साजन? नहिं पाकिस्तानी!

भेद न जो काहू से खोलूँ
इससे सब कुछ खुल के बोलूँ
उर में छवि जिसकी नित रखली
ए सखि साजन? नहिं तुम पगली!

बारिस में हो कर मतवाला,
नाचे जैसे पी कर हाला,
गीत सुनाये वह चितचोर,
क्या सखि साजन, ना सखि मोर।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-05-17

"कह मुकरी विधान"

कह मुकरी काव्य की एक पुरानी मगर बहुत खूबसूरत विधा है। यह चार पंक्तियों की संरचना है। यह विधा दो सखियों के परस्पर वार्तालाप पर आधारित है। जिसकी प्रथम 3 पंक्तियों में एक सखी अपनी दूसरी अंतरंग सखी से अपने साजन (पति अथवा प्रेमी) के बारे में अपने मन की कोई बात कहती है। परन्तु यह बात कुछ इस प्रकार कही जाती है कि अन्य किसी बिम्ब पर भी सटीक बैठ सकती है। जब दूसरी सखी उससे यह पूछती है कि क्या वह अपने साजन के बारे में बतला रही है, तब पहली सखी लजा कर चौथी पंक्ति में अपनी बात से मुकरते हुए कहती है कि नहीं वह तो किसी दूसरी वस्तु के बारे में कह रही थी ! यही "कह मुकरी" के सृजन का आधार है।

इस विधा में योगदान देने में अमीर खुसरो एवम् भारतेंदु हरिश्चन्द्र जैसे साहित्यकारों के नाम प्रमुख हैं ।

यह ठीक 16 मात्रिक चौपाई वाले विधान की रचना है। 16 मात्राओं की लय, तुकांतता और संरचना बिल्कुल चौपाई जैसी होती है। पहली एवम् दूसरी पंक्ति में सखी अपने साजन के लक्षणों से मिलती जुलती बात कहती है। तीसरी पंक्ति में स्थिति लगभग साफ़ पर फिर भी सन्देह जैसे कि कोई पहेली हो। चतुर्थ पंक्ति में पहला भाग 8 मात्रिक जिसमें सखी अपना सन्देह पूछती है यानि कि प्रश्नवाचक होता है और दुसरे भाग में (यह भी 8 मात्रिक) में स्थिति को स्पष्ट करते हुए पहली सखी द्वारा उत्तर दिया जाता है ।

हर पंक्ति 16 मात्रा, अंत में 1111 या 211 या 112 या 22 होना चाहिए। इसमें कहीं कहीं 15 या 17 मात्रा का प्रयोग भी देखने में आता है। न की जगह ना शब्द इस्तेमाल किया जाता है या नहिं भी लिख सकते हैं। सखी को सखि लिखा जाता है।

कुछ उदाहरण

1
बिन आये सबहीं सुख भूले।
आये ते अँग-अँग सब फूले।।
सीरी भई लगावत छाती।
ऐ सखि साजन ? ना सखि पाती।।
........अमीर खुसरो......

2
रात समय वह मेरे आवे।
भोर भये वह घर उठि जावे।।
यह अचरज है सबसे न्यारा।
ऐ सखि साजन ? ना सखि तारा।।
........अमीर खुसरो......

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

Tuesday, August 13, 2019

दोहा (प्रभु ही रखते ध्यान)

जीव जंतु जंगम जगत, सबको समझ समान।
योग क्षेम करके वहन, प्रभु ही रखते ध्यान।।

राम, कृष्ण, वामन कभी, कूर्म, मत्स्य अभिधान।
पाप बढ़े अवतार ले, प्रभु ही रखते ध्यान।।

ब्रह्म-रूप उद्गम करे, रुद्र-रूप अवसान।
विष्णु-रूप में सृष्टि का, प्रभु ही रखते ध्यान।।

अर्जुन के बन सारथी, गीता कीन्हि बखान।
भक्त दुखों में जब घिरे, प्रभु ही रखते ध्यान।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
11-06-19

कश्मीरी पत्थरबाजों पर दोहे

धरती का जो स्वर्ग था, बना नर्क वह आज।
गलियों में कश्मीर की, अब दहशत का राज।।

भटक गये सब नव युवक, फैलाते आतंक।
सड़कों पर तांडव करें, होकर के निःशंक।।

उग्रवाद की शह मिली, भटक गये कुछ छात्र।
ज्ञानार्जन की उम्र में, बने घृणा के पात्र।।

पत्थरबाजी खुल करें, अल्प नहीं डर व्याप्त।
सेना का भी भय नहीं, संरक्षण है प्राप्त।।

स्वारथ की लपटों घिरा, शासन दिखता पस्त।
छिन्न व्यवस्थाएँ सभी, जनता भय से त्रस्त।।

खुल के पत्थर बाज़ ये, बरसाते पाषाण।
देखें सब असहाय हो, कहीं नहीं है त्राण।।

हाथ सैनिकों के बँधे, करे न शस्त्र प्रयोग।
पत्थर बाज़ी झेलते, व्यर्थ अन्य उद्योग।।

सत्ता का आधार है, तुष्टिकरण का मंत्र।
बेबस जनता आज है, 'नमन' तुझे जनतंत्र।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-01-2019

रति छंद "प्यासा मन-भ्रमर"

मन मोहा, तन कुसुम सम तेरा।
हर लीन्हा, यह भ्रमर मन मेरा।।
अब तो ये, रह रह छटपटाये।
कब तृष्णा, परिमल चख बुझाये।।

मृदु हाँसी, जिमि कलियन खिली है।
घुँघराली, लट-छवि झिलमिली है।।
मधु श्वासें, मलय-महक लिये है।
कटि बांकी, अनल-दहक लिये है।।

मतवाली, शशि वदन यह गोरी।
मृगनैनी, चपल चकित चकोरी।।
चलती तो, लख हरिण शरमाये।
यह न्यारी, छवि न वरणत जाये।।

लगते हैं, अधर पुहुप लुभाये।
तब क्यों ना, सब मिल मन जलाये।।
मन भौंरा, निरखत डगर तेरी।
मिल ने को, बिलखत कर न देरी।।
===============
लक्षण छंद:-

'रति' छंदा', रख गण "सभनसागे"।
यति चारा, अरु नव वरण साजे।।

"सभनसागे" = सगण भगण नगण सगण गुरु

( 112  2,11  111  112  2)
13वर्ण, यति 4-9 वर्णों पर,
4 चरण,दो-दो चरण समतुकांत
*****************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
26-01-19

रक्ता छंद "शारदा वंदन"

ब्रह्म लोक वासिनी।
दिव्य आभ भासिनी।।
वेद वीण धारिणी।
हंस पे विहारिणी।।

शुभ्र वस्त्र आवृता।
पद्म पे विराजिता।।
दीप्त माँ सरस्वती।
नित्य तू प्रभावती।।

छंद ताल हीन मैं।
भ्रांति के अधीन मैं।।
मन्द बुद्धि को हरो।
काव्य की प्रभा भरो।।

छंद-बद्ध साधना।
काव्य की उपासना।
मैं सदैव ही करूँ।
भाव से इसे भरूँ।।

मात ये विचार हो।
देश का सुधार हो।।
ज्ञान का प्रसार हो।
नष्ट अंधकार हो।।

शारदे दया करो।
ज्ञान से मुझे भरो।।
काव्य-शक्ति दे मुझे।
दिव्य भक्ति दे मुझे।।

===========
विधान~ [रगण जगण गुरु]
( 212 121 2 ) = 7 वर्ण, 4 चरण
[दो-दो या चारों चरण समतुकांत]

**********
बासुदेव अग्रवाल नमन,
तिनसुकिया
10-02-19

यशोदा छंद "प्यारी माँ"

तु मात प्यारी।
महा दुलारी।।
ममत्व पाऊँ।
तुझे रिझाऊँ।।

गले लगाऊँ।
सदा मनाऊँ।।
करूँ तुझे माँ।
प्रणाम मैं माँ।।

तु ही सवेरा।
हरे अँधेरा।।
बिना तिहारे।
कहाँ सहारे।।

दुलार देती।
बला तु लेती।।
सनेह दाता।
नमामि माता।।
===========
लक्षण छंद:-

"जगाग" राचो।
'यशोदा' पाओ।।

121+ गुरु+ गुरु =5 वर्ण,4 चरण  दो-दो तुकांत
**************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
05-06-17

Friday, August 9, 2019

हाइकु (राजनेता)

पिता कोमल
संपूर्ण-स्वामी सुत
रोज दंगल।
**
बुआ की छाया
भतीजा भरमाया
अजब माया।
**
अहं सम्राज्य
हिंसा में घिरा राज्य
ममता लुप्त।
**
राहु-लगन
पीढ़ियों का सम्राज्य
हुआ समाप्त।
**

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
26-06-19

पिरामिड (तेरी याद)

(1-7 और 7-1) आरोही अवरोही

पी
कर
ये आँसू
जी  रहे  हैं
किसी तरह।
आँसू बह  रहे
आँखों से रह रह।

नहीं टिक रहा है
अब कहीं भी जी।
याद में तेरी
हर रोज
जी रहे
खून
पी।
******

जी
रहे
जिंदगी
अब हम
आसरे तेरे।
उजालों में छाए
घनघोर  अंधेरे।

गुजरते  हैं   दिन
अब आँसू पी पी।
तेरी याद में
है कितना
तड़पा
मेरा
जी।
*****

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
11-11-16

ताँका (प्रकृति)

जापानी विधा (5-7-5-7-7)

निशा ने पाया
मयंक सा साजन
हुई निहाल,
धारे तारक-माल
खूब करे धमाल।
**
तारक अस्त
हुई शर्म से लाल
भोर है मस्त,
रवि-रश्मि संघात
सरसे जलजात।
**
भ्रमर गूँज,
मधुपरी नर्तन,
हर्षित कूँज,
आया नव विहान
रजनी अवसान।
**
ग्राम्य-जीवन
संदल उपवन
सरसावन,
सुरभित पवन
वास बरसावन।
**
हवा में बहे
सेमली शुभ्र गोले,
आ कर सजे,
हरित दूब पर
जैसे झरे हों ओले।
**

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
20-06-19

चौका (उन्माद)

जापानी विधा चौका
5-7, 5-7, 5-7 -------- +7

अंधा विश्वास
अंधी आस्था करती
विवेक शून्य,
क्षणिक आवेश में
मानव भूले
क्या सही क्या गलत?
होकर पस्त,,,
यही तो है उन्माद।
मनुष्य नाचे
कठपुतली बन,
जिसकी डोर
बाज़ीगर के हाथ,
जैसे वो चाहे
नचाए पुतलों को
ये खिलौनों से
मस्तिष्क से रहित
मचा तांडव
करें नग्न नर्तन
लूट हिंसा का
मचा आतंकवाद
यही तो है उन्माद।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
08-09-17

क्षणिका (मानवीय क्षमता)

हे मानवीय क्षमता
क्या छोटी पड़ गई धरा?
जो चढ़ बैठी हो,
अंतरिक्ष में
जहाँ से अपने बनाये
उपग्रही खिलौनों की आँख से
तुम देख,,,,
अट्टहास कर सको
बेरोजगारी और गरीबी का दानव
अपने पंजों में जकड़ता
सिसकता, कराहता मानव।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-02-18

Wednesday, August 7, 2019

रोला छंद "दो राही"

जग-ज्वाला से दग्ध, पथिक इक था अति व्याकुल।
झूठे रिश्ते नातों के, प्रति भी शंकाकुल।।
मोह-बन्ध सब त्याग, शांति की चला खोज में।
जग झूठा जंजाल, भाव ये मन-सरोज में।1।

नश्वर यह मानव-तन, लख वैराग्य हुआ था।
क्षणभंगुरता पर जग की, नैराश्य हुआ था।।
उसका मन जग-ज्वाल, सदा रहती झुलसाती।
तृष्णा की ये बाढ़, हृदय रह रह बिलखाती।2।

स्वार्थ बुद्धि लख घोर, घृणा के उपजे अंकुर।
ज्ञान मार्ग की राह चले, मन था अति आतुर।।
अर्थी जग की धनसंचयता, से उद्वेलित।
जग की घोर स्वार्थपरता से, मन भी विचलित।3।

बन सन्यासी छोड़, चला वह जग की ज्वाला।
लगा ढूंढने मार्ग, शांति का हो मतवाला।।
परम शांति का एक मार्ग, वैराग्य विचारा।
आत्मज्ञान का अन्वेषण, ही एक सहारा।4।

एक और भी देह, धरा था जग में राही।
मोह और माया के, गुण का ही वह ग्राही।।
वृत्ति स्वार्थ से पूर्ण, सदा उसने अपनाई।
रहता इसमें मग्न, अधम वह कर कुटिलाई।5।

पाप लोभ मद के पथ पर, वह हुआ अग्रसर।
विचरण करता दम्भ क्षोभ, नद के नित तट पर।।
भेद-नीति से सब पर, अपनी धौंस जमाता।
पाशवता के निर्झर से, वह तृषा मिटाता।6।

एकमात्र था लक्ष्य, नित्य ही धन का संचय।
अन्यों का शोषण करना, उसका दृढ़ निश्चय।।
जुल्म अनेकों अपने से, अबलों पर ढ़ाहे।
अन्यों की आहों पर, निर्मित निज गृह चाहे।7।

अंतर इन दोनो पथिकों में, बहुत बड़ा है।
एक चाहता मुक्ति, दूसरा यहीं अड़ा है।।
मोक्ष-मार्ग पहले ने, बन्धन त्यज अपनाया।
पड़ा मोह माया में दूजा, रुदन मचाया।8।

नश्वर जग में धन्यवान, केवल पहले जन।
वृत्ति सुधा सम धार, अमिय मय करते जीवन।।
ज्ञान-रश्मि से वे प्रकाश, जग में फैलाते।
प्रेम-वारि जग उपवन में, वे नित बरसाते।9।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
27-05-2016

रोला छंद "विधान"

रोला चार चरणों का, प्रत्येक चरण में 24 मात्रा का छंद है। चरणान्त गुरु अथवा 2 लघु से होना आवश्यक है। तुक दो दो चरण में होती है।

कुंडलियाँ छंद के कारण रोला बहु प्रचलित छंद है। कुंडलियाँ में प्रथम दो पंक्ति दोहा की तथा अंतिम चार पंक्ति रोला की होती है। दोहा का चौथा चरण रोला की प्रथम पंक्ति के आरंभ में पुनरुक्त होता है, अतः रोला की प्रथम यति 11 मात्रा पर होना सर्वथा सिद्ध है। साथ ही इस यति का ताल (2 1) से अंत भी होना चाहिये।

परन्तु अति प्रतिष्ठित कवियों की रचनाओं से देखा गया है कि रोला छंद इस बन्धन में बंधा हुआ नहीं है। रोल बहुत व्यापक छंद है।  भिखारीदास ने छंदार्णव पिंगल में रोला को 'अनियम ह्वै है रोला' तक कह दिया है। रोला छंद 11, 13 की यति में भी बंधा हुआ नहीं है और न ही प्रथम यति का अंत गुरु लघु से होना चाहिये, इस बंधन में। अनेक प्रतिष्ठित कवियों की रचनाओं के आधार पर रोला की मात्रा बाँट  8-6-2-6-2 निश्चित होती है।
8 = अठकल या 2 चौकल।
6 = 3+3 या 4+2 या 2+4
2 = 1 + 1 या 2
यति भी 11, 12, 14, 16 मात्रा पर सुविधानुसार कहीं भी रखी जा सकती है। प्रसाद जी की कामायनी की कुछ पंक्तियाँ देखें।

मैं यह प्रजा बना कर कितना तुष्ट हुआ था,
किंतु कौन कह सकता इन पर रुष्ट हुआ था।
मैं नियमन के लिए बुद्धि-बल से प्रयत्न कर,
इनको कर एकत्र चलाता नियम बना कर।
रूप बदलते रहते वसुधा जलनिधि बनती,
उदधि बना मरुभूमि जलधि में ज्वाला जलती।
विश्व बँधा है एक नियम से यह पुकार-सी,
फैल गयी है इसके मन में दृढ़ प्रचार-सी।

पर कुंडलियाँ छंद में 11, 13 की यति रख कर ही रचना करनी चाहिए। इस छंद में रोला के मान्य रूप को ही रखना चाहिये जो रोला की चारों पंक्ति की प्रथम पंक्ति से अनुरूपता के लिए भी अति आवश्यक है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

रूपमाला छंद "राम-महिमा"

राम की महिमा निराली, राख मन में ठान।
अन्य रस का स्वाद फीका, भक्ति रस की खान।
जागती यदि भक्ति मन में, कृपा बरसी जान।
नाम साँचो राम को है, लो हृदय में मान।।

राम को भज मन निरन्तर, भक्ति मन में राख।
इष्ट पे रख पूर्ण आश्रय, मत बढ़ाओ शाख।
शांत करके मन-भ्रमर को, एक का कर जाप।
राम-रस को घोल मन में, दूर हो सब ताप।।

नाम प्रभु का दिव्य औषधि, नित करो उपभोग।
दाह तन मन की हरे ये, काटती भव-रोग।।
सेतु सम है राम का जप, जग समुद्र विशाल।
आसरा इसका मिले तो, पार हो तत्काल।।

रत्न सा जो है प्रकाशित, राम का वो नाम।
जीभ पे इसको धरो अरु, देख इसका काम।।
ज्योति इसकी जगमगा दे, हृदय का हर छोर।
रात जो बाहर भयानक, करे उसकी भोर।।

गीध, शबरी और बाली, तार दीन्हे आप।
आप सुनते टेर उनकी, जो करें नित जाप।।
राम का जप नाम हर क्षण, पवनसुत हनुमान।
सकल जग के पूज्य हो कर, बने महिमावान।।

राम को जो छोड़ थामे, दूसरों का हाथ।
अंत आयेगा निकट जब, कौन देगा साथ।
नाम पे मन रख भरोसा, सब बनेंगे काज।
राम से बढ़कर जगत में, कौन दूजो आज।।
************
रूपमाला छंद *विधान*

यह एक अर्द्धसममात्रिक छन्द है, जिसके प्रत्येक चरण में 14 और 10 के विश्राम से 24 मात्राएँ और चरणान्त गुरु-लघु से होता है. इसको मदन छन्द भी कहते हैं. यह चार चरणों का छन्द है, जिसमें दो-दो पदों पर तुकान्तता बनती है।

इसकी मात्रा बाँट 3 सतकल और अंत ताल यानि
गुरु लघु से होता है। सतकल की मात्रा बाँट
3 2 2 है जिसमें द्विकल के दोनों रूप (2, 1 1) और त्रिकल के तीनों रूप (2 1, 1 2, 1 1 1) मान्य है।अतः निम्न बाँट तय होती है:
3 2 2  3 2 2 = 14 मात्रा और

3 2 2  2 1 = 10 मात्रा

इस छंद को 2122  2122, 2122  21 के बंधन में बाँधना उचित नहीं। प्रसाद जी का कामायनी के वासना सर्ग का उदाहरण देखें।

स्पर्श करने लगी लज्जा, ललित कर्ण कपोल,
खिला पुलक कदंब सा था, भरा गदगद बोल।
किन्तु बोली क्या समर्पण, आज का हे देव!
बनेगा-चिर बंध नारी, हृदय हेतु सदैव।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
29-08-2016

रास छंद "कृष्णावतार"

हाथों में थी, मात पिता के, सांकलियाँ।
घोर घटा में, कड़क रही थी, दामिनियाँ।
हाथ हाथ को, भी ना सूझे, तम गहरा।
दरवाजों पर, लटके ताले, था पहरा।।

यमुना मैया, भी ऐसे में, उफन पड़ी।
विपदाओं की, एक साथ में, घोर घड़ी।
मास भाद्रपद, कृष्ण पक्ष की, तिथि अठिया।
कारा-गृह में, जन्म लिया था, मझ रतिया।।

घोर परीक्षा, पहले लेते, साँवरिया।
जग को करते, एक बार तो, बावरिया।
सीख छिपी है, हर विपदा में, धीर रहो।
दर्शन चाहो, प्रभु के तो हँस, कष्ट सहो।।

अर्जुन से बन, जीवन रथ का, स्वाद चखो।
कृष्ण सारथी, रथ हाँकेंगे, ठान रखो।
श्याम बिहारी, जब आते हैं, सब सुख हैं।
कृष्ण नाम से, सारे मिटते, भव-दुख हैं।।
====================
रास छंद विधान:-

रास छंद 22 मात्राओं का छंद है जिसमें 8, 8, 6 मात्राओं पर यति होती है। चरणान्त 112 से होना आवश्यक है। चार चरणों का एक छंद होता है जिसमें 2-2 पंक्ति तुकांत होनी चाहिये। मात्रा बाँट प्रथम और द्वितीय यति में एक अठकल या 2 चौकल का है। अंतिम यति में 2 - 1 - 1 - 2 का है।
********************
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
24-08-2016

प्लवंगम छंद "सरिता"

भूधर बिखरें धरती पर हर ओर हैं।
लुप्त गगन में ही कुछ के तो छोर हैं।।
हैं तुषार मंडित जिनके न्यारे शिखर।
धवल पाग भू ने ज्यों धारी शीश पर।।

एक सरित इन शैल खंड से बह चली।
बर्फ विनिर्मित तन की थी वह चुलबली।।
ले अथाह जल अरु उमंग मन में बड़ी।
बलखाती इठलाती नदी निकल पड़ी।।

बाधाओं को पथ की सारी पार कर।
एक एक भू-खंडों को वह अंक भर।।
राहों के सब नाले, मिट्टी, तरु बहा।
हुई अग्रसर गर्जन करती वह महा।।

कभी मधुरतम कल कल ध्वनि से वह बहे।
श्रवणों में ज्यों रागों के सुर आ रहे।।
कभी भयंकर रूप धरे तांडव मचे।
धारा में जो भी पड़ जाये ना बचे।।

लदी हुई मानव-आशा के भार से।
सींचे धरती वरदानी सी धार से।
नगरों, मैदानों को करती पार वह।
हर्ष मोद का जग को दे भंडार वह।।

मधुर वारि से सींच अनेकों खेत को।
कृषकों के वह साधे हर अभिप्रेत को।।
हरियाली की खुशियों भरी खिला कली।
वह अथाह सागर के पट में छिप चली।।
********************
प्लवंगम छंद "विधान"

21 मात्रा। चार चरण, दो दो तुकांत।
मात्रा बाँट:-   8-8-2-1-2
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
16-04-2016

Sunday, August 4, 2019

ग़ज़ल (आप का साथ मिला)

बह्र: 2122 1122 1122  22

आप का साथ मिला, मुझ को सँवर जाना था,
पर लिखा मेरे मुक़द्दर में बिखर जाना था।

आ सका आपके नज़दीक न उल्फ़त में सनम,
तो मुझे इश्क़ में क्या हद से गुज़र जाना था।

पहले गर जानता ग़म इस में हैं दोनों के लिये,
इस मुहब्बत से मुझे तब ही मुकर जाना था।

जब भी वो आँख दिखाता है, ख़ता खाता है,
शर्म गर होती उसे कब का सुधर जाना था।

जो लड़े हक़ के लिये, सर पे कफ़न रखते थे,
अहले दुनिया से भला क्यों उन्हें डर जाना था।

सात दशकों से अधिक हो गये आज़ादी को,
देश का भाग्य तो इतने में निखर जाना था।

सैंकड़ों बार 'नमन' ऐसे जवानों को दूँ,
देश-हित लड़ के जिन्हें फख्र से मर जाना था।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
21-02-19

Saturday, August 3, 2019

2122 1122 1122 22 बह्र के गीत

1 वो मेरी नींद मेरा चैन मुझे लौटा दो

2 ऐ सनम जिसने तुझे चाँद सी सूरत दी है

3 तेरी ज़ुल्फ़ों से जुदाई तो नहीं माँगी थी

4 जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते हैं लोग

5 कौन आया कि निगाहों में चमक जाग उठी

6 कोई फरियाद तेरे दिल में छुपी हो जैसे

ग़ज़ल (प्यार फिर झूठा जताने आये)

बह्र:- 2122  1122  22/112

प्यार फिर झूठा जताने आये,
साथ ले सौ वे बहाने आये।

बार बार_उन से मैं मिल रोई हूँ,
सोच क्या फिर से रुलाने आये।

दुनिया मतलब से ही चलती, वरना
कौन अब किसको मनाने आये।

राख ये जिस्म तो पहले से ही,
क्या बचा जो वे जलाने आये।

फिर नये वादों की झड़ लेकर वो,
आँसु घड़ियाली बहाने आये।

और अब कितना है ठगना बाकी,
जो वही मुँह ले रिझाने आये।

'बासु' नेताजी से पूछे जनता,
कौन सा भेष दिखाने आये।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-12-2018

ग़ज़ल (उनके हुस्न का गज़ब जलाल है)

बह्र:- 212  1212  1212

उनके हुस्न का गज़ब जलाल है,
ये बनाने वाले का कमाल है।

चहरा मरमरी गढ़ा ये क्या खुदा,
काम ये बहुत ही बेमिशाल है।

जब से रूठ के गये हैं जाने मन,
हम सके नहीं मना मलाल है।

नूर आँख का हुआ ये दूर क्या,
पूछिये न क्या हमारा हाल है।

रात रात बात चाँद से करें,
दिन गुज़रता बीतता ज्यों साल है।

इस अँधेरी शब की होगी क्या सहर,
दिल में अब तो एक ही सवाल है।

अब 'नमन' की हर ग़ज़ल के दर्द में,
उनका ही रहे पिंहाँ खयाल है।

जलाल- तेज, चमक; पिंहाँ- छुपा हुआ

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-06-19

ग़ज़ल (वो जब भी मिली)

बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम (12112*2)

वो जब भी मिली, महकती मिली,
गुलाब सी वो, खिली सी मिली।

हो गगरी कोई, शराब की ज्यों,
वो वैसी मुझे, छलकती मिली।

दिखाई पड़ीं, वे जब भी मुझे,
उन_आँखों में बस, खुमारी मिली।

लगाने की दिल, ये कैसी सज़ा,
वफ़ा की जगह, जफ़ा ही मिली।

कभी वो मुझे, बताए ज़रा,
जो मुझ में उसे, ख़राबी मिली।

गिला भी किया, ज़रा भी अगर,
पुरानी मगर, सफाई मिली।

'नमन' तो चला, भलाई की राह,
उसे तो सदा, बुराई मिली।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
06-07-19

Saturday, July 20, 2019

मौक्तिका (नव वर्ष स्वागत)

1222*4 (विधाता छंद पर आधारित)
(पदांत का लोप, समांत 'आएगा')

नया जो वर्ष आएगा, करें मिल उसका हम स्वागत;
नये सपने नये अवसर, नया ये वर्ष लाएगा।
करें सम्मान इसका हम, नई आशा बसा मन में;
नई उम्मीद ले कर के, नया ये साल आएगा।

मिला के हाथ सब से ही, सभी को दें बधाई हम;
जहाँ हम बाँटते खुशियाँ, वहीं बाँटें सभी के ग़म।
करें संकल्प सब मिल के, उठाएँगे गिरें हैं जो;
तभी कुछ कर गुजरने का, नया इक जोश छाएगा।

दिलों में मैल है बाकी, पुराने साल का कुछ गर;
मिटाएँ उसको पहले हम, नये रिश्तों से सब जुड़ कर।
कसक मन की मिटा करके, दिखावे को परे रख के;
दिलों की गाँठ को खोलें, तभी नव वर्ष भाएगा।

गरीबी ओ अमीरी के, मिटाएँ भेद भावों को;
अशिक्षित ना रहे कोई, करें खुशहाल गाँवों को।
'नमन' नव वर्ष में जागें, ये' सपने सब सजा दिल में;
तभी ये देश खुशियों के, सुहाने गीत गाएगा।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
26-12-16

सावन विरह-गीत

सावन मनभावन तन हरषावन आया।
घायल कर पागल करता बादल छाया।।

क्यों मोर पपीहा मन में आग लगाये।
सोयी अभिलाषा तन की क्यों ये जगाये।
पी की यादों ने क्यों इतना मचलाया।
सावन -----

ये झूले भी मन को ना आज रिझाये।
ना बाग बगीचों की हरियाली भाये।
बेदर्द पिया ने कैसा प्यार जगाया।
सावन------

जब उमड़ घुमड़ के बैरी बादल कड़के।
तड़के जब बिजली आतुर जियरा धड़के।
याद करूँ ऐसे में पिय ने जब चिपटाया।
सावन-----

झूम झूम के सावन बीते क्या कहती।
यादों में उनकी ही मैं खोई रहती।
क्यों सखि ऐसे में निष्ठुर ने बिसराया।
सावन-----

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-07-16

मुक्तक (सामयिक समस्या)

सिमटा ही जाये देश का देहात शह्र में।
लोगों के खोते जा रहे जज़्बात शह्र में।
सरपंच गाँव का था जो आ शह्र में बसा।
खो बैठा पर वो सारी ही औक़ात शह्र में।।

221  2121  1221  212
*********

खड़ी समस्या कर के कुछ तो, पैदा हुए रुलाने को,
इनको रो रो बाकी सारे, हैं कुहराम मचाने को,   
यदि मिलजुल हम एक एक कर, इनको निपटाये होते,
सुरसा जैसे मुँह फैला ये, आज न आतीं खाने को।

(ताटंक छंद आधारित)
***********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
19-06-19

मुक्तक (उद्देश्य,स्वार्थ)

बेवज़ह सी जिंदगी में कुछ वज़ह तो ढूंढ राही,
पृष्ठ जो कोरे हैं उन पर लक्ष्य की फैला तु स्याही,
सामने उद्देश्य जब हों जीने की मिलती वज़ह तब,
चाहतें मक़सद बनें गर हो मुरादें पूर्ण चाही।

(2122*4)
**********

वैशाखियों पे जिंदगी को ढ़ो रहे माँ बाप अब,
वे एक दूजे का सहारा बन सहे संताप सब,
सन्तान इतनी है कृतघ्नी घोर स्वारथ में पगी,
माँ बाप चाहे मौत निश दिन अरु मिटे भव-ताप कब।

(हरिगीतिका  (2212*4)
*********

ऐसा है कौन आज फरिश्ता कहें जिसे,
कोई बता दे एक मसीहा कहें जिसे,
देखें जिधर भी आज है मतलब का दौर बस,
इससे बचा न एक भी अच्छा कहें जिसे।

(221 2121 1221 212)
***********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-03-18

मुक्तक (राजनीति)

हम जैसों के अच्छे दिन तो, आ न सकें कुछ ने ठाना,
पास हमारे फटक न सकते, बुरे दिवस कुछ ने माना,
ये झुनझुना मगर अच्छा है, अच्छे दिन के ख्वाबों का,
मात्र खिलौना कुछ ने इसको, जी बहलाने का जाना

(ताटंक छंद आधारित)
*********

प्रथम विरोधी को शह दे कर, दिल के घाव दुखाते हैं,
फिर उन रिसते घावों पर वे, मलहम खूब लगाते हैं,
'फूट डालके राज करो' का, ये सिद्धांत पुराना है,
बचके रहना ऐसों से जो, अपना बन दिखलाते हैं।

(ताटंक छंद आधारित)
**********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
11-11-18

मुक्तक (ढोंगी बाबाओं पर व्यंग)

काम क्रोध के भरे पिटारे, कलियुग के ये बाबा,
गये बेच खा मन्दिर मस्ज़िद, काशी हो या काबा,
चकाचौंध इनकी झूठी है, बचके रहना इनसे,
भोले भक्तों को ठगने का, सारा शोर शराबा।

सार छंद आधारित
*********

लिप्त रहो जग के कर्मों में, ये कैसा सन्यास बता,
भगवा धारण करने से नहिं, आत्म-शुद्धि का चले पता,
राजनीति आश्रम से करते, चंदे का व्यापार चले,
मन की तृप्त न हुई कामना, त्यागी से क्यों रहे जता।

लावणी छंद आधारित
**********
(राम रहीम पर व्यंग)

'अड्डा झूठा कोठा' खोला, ढोंगी काम-कमीन,
'शैतानों का दूत' भूत सा, कुत्सित कीट मलीन,
जग आगे बेटी जो कन्या, राखै बना रखैल,
कारागृह में भेजें इसको, संपद सारी छीन।

सरसी छंद आधारित
*********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-05-19

मुक्तक (यमक युक्त)

सितम यूँ खूब ढ़ा लो।
या फिर तुम मार डालो।
मगर मुझ से जरा तुम।
मुहब्बत तो बढ़ालो।।
***

दुआ रब की तो पा लो।
बसर अजमेर चालो।
तमन्ना औलिया की।
जरा मन में तो पालो।।
***

अरी ओ सुन जमालो,
मुझे तुम आजमा लो,
ठिकाना अब तेरा तू,
मेरे दिल पे जमा लो।
***

ये ऊँचे ख्वाब ना लो।
जमीं पे पाँ टिका लो।
अरे छोड़ो भी ये जिद।
मुझे अपना बना लो।।
***

खरा सौदा पटा लो।
दया मन में बसा लो।
गरीबों की दुआ से।
सभी संताप टालो।।
***

तराने आज गा लो।
सभी को तुम रिझा लो।
जो सोयें हैं उन्हें भी।
खुशी से तुम जगा लो।।
***

1222 122
(काफ़िया=आ; रदीफ़=लो)
**********

सड़न से नाक फटती, हुई सब जाम नाली;
यहाँ रहना है दूभर, सजन अब चल मनाली;
किसी दूजी जगह का, कभी भी नाम ना ली;
खफ़ा होना वहाँ ना, यहाँ तो मैं मना ली।

(1222  122)*2
**********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
10-10-17

Friday, July 19, 2019

दोहा गीतिका (भूख)

काफ़िया = ई; रदीफ़ = भूख

दुनिया में सबसे बड़ी, है रोटी की भूख।
पाप कराये घोरतम, जब बिलखाती भूख।।

आँतड़ियाँ जब ऐंठती, जलने लगता पेट।
नहीं चैन मन को पड़े, समझो जकड़ी भूख।।

मान, प्रतिष्ठा, ओहदा, कभी न दें सन्तोष।
ज्यों ज्यों इनकी वृद्धि हो, त्यों त्यों बढ़ती भूख।।

कमला तो चंचल बड़ी, कहीं न ये टिक पाय।
प्राणी चाहे थाम रख, धन की ऐसी भूख।।

भला बूरा दिखता नहीं, चढ़े काम का जोर।
पशुवत् मानव को करे, ये जिस्मानी भूख।।

राजनीति के पैंतरे, नेताओं की चाल।
कुर्सी की इस देश में, सबसे भारी भूख।।

'नमन' भूख पर ही टिका, लोगों का व्यवहार।
जग की है फ़ितरत यही, सब पर हाबी भूख।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
08-12-2017

कुर्सी की महिमा (कुंडलियाँ)

महिमा कुर्सी की बड़ी, इससे बचा न कोय।
राजा चाहे रंक हो, कोउ न चाहे खोय।
कोउ न चाहे खोय, वृद्ध या फिर हो बालक।
समझे इस पर बैठ, सभी का खुद को पालक।
कहे 'बासु' कविराय, बड़ी इसकी है गरिमा।
उन्नति की सौपान, करे मण्डित ये महिमा।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
22-12-2018

सूर घनाक्षरी

8,8,8,6

मिलते विषम दोय, सम-कल तब होय,
सम ही कवित्त को तो, देत बहाव है।

आदि न जगन रखें, लय लगातार लखें,
अंत्य अनुप्रास से ही, या का लुभाव है।

शब्द रखें भाव भरे, लय ऐसी मन हरे,
भरें अलंकार जा का, खूब प्रभाव है।

गाके देखें बार बार, अटकें न मझधार,
रचिए कवित्त जा से, भाव रिसाव है।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
8-4-17

'छकलियाँ' (दर्द)

विपद
है विकट
हाथ पर हाथ
रख, देखें बाट;
कोई बचाएगा,
या फिर भाग जाएंगे।
**

न शांति
बुरी है,
न सहन शक्ति,
हो अत्याचार,,
शांति रख रख सहना?
अथवा पलायन स्वीकार!
**

जुल्म,,,
है खौफ,
सब चुपचाप,
अपनों का न साथ,
शासन को क्या पड़ी?
वोटों की पके खिचड़ी।
**
(मेरठ में हिंदू पलायन पर)

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
29-06-19

"छकलियाँ विधान"

मेरे द्वारा प्रतिपादित यह "छकलियाँ" हिंदी साहित्य में काव्य की एक नवीन विधा है। यह हाइकु, वर्ण पिरामिड जैसी लघु संरचना है। जापानी में हाइकु, ताँका, सेदोका इत्यादि और अंग्रेजी में हाइकु, ईथरी आदि लघु कविताएं सिलेबल की गिनती पर आधरित हैं और बहुत प्रचलित हैं। ये कविताएं अपने लघु विन्यास में भी गहनतम भावों का समावेश कर सकती हैं। हिंदी साहित्य में भी हाइकु, ताँका, सेदोका, चौका, पिरामिड आदि विधाएँ बहुत प्रचलित हो गई हैं। पर हिंदी में ये विधाएँ जापानी, अंग्रेजी की तरह सिलेबल की गणना पर आधारित न होकर अक्षरों की गणना पर आधारित हैं। इसलिए इन का कलेवर उतना विस्तृत नहीं है। उन भाषाओं में तो एक एक सिलेबल में 4, 5 अक्षरों तक का होना सामान्य बात है।

मेरे द्वारा निष्पादित यह 'छकलियाँ' कुल 6 पंक्तियों की संरचना है जिसमें 6 पंक्तियों में क्रमशः एक से लेकर छह दीर्घ वर्ण होते हैं। यानि प्रथम पंक्ति में एक दीर्घ वर्ण, दूसरी में दो और अंत की छठी पंक्ति में छह दीर्घ वर्ण होते हैं। इस तरह की संरचना वर्ण पिरामिड, हाइकु इत्यदि के रूप में हिंदी में पहले से प्रचलित है पर मेरी यह नवीन विधा उन सब से इस अर्थ में भिन्न है कि प्रचलित विधाओं में अक्षरों की गिनती होती है जबकि इस नवीन विधा में दीर्घ वर्ण की गिनती होती है। मैंने इसका बहुत ही सहज सा स्मृति पटल पर बस जाने वाला नामकरण 'छकलियाँ' के रूप में किया है। इसमें छह पंक्तियाँ एक लड़ी सी पिरोई हुई है और यही इसके नामकरण की सार्थकता है।

हिंदी छंद शास्त्र में मात्राओं की गणना लघु और गुरु वर्ण के आधार पर होती है। लघु वर्ण के उच्चारण में जितना समय लगता है, गुरु वर्ण के उच्चारण में उसका दुगुना लगता है। लघु का मात्रा भार 1 है तथा गुरु का 2।

लघु वर्ण:- स्वतंत्र अक्षर जैसे क,म,ह आदि या संयुक्त वर्ण जैसे स्व, क्य, प्र आदि जब अ, इ, उ, ऋ और अँ से युक्त हों। उदाहरण- क, चि, तु, कृ, हँ, क्ति आदि।

गुरु वर्ण:- स्वतंत्र या संयुक्त अक्षर जब आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः से युक्त हों। उदाहरण- का,  टी, फू, ये, जै, मो, रौ, दं, पः, प्रा आदि। इसके अतिरिक्त लघु वर्ण के पश्चात यदि संयुक्त वर्ण हो तो उसका भार उस लघु वर्ण पर आ जाता है और वह लघु वर्ण गुरु गिना जाता है। जैसे- अश्व, शुभ्र, प्रयुक्त, पवित्र में अ, शु, यु, वि गुरु वर्ण हैं। परन्तु यदि यह संयुक्त वर्ण ह के साथ है तो उच्चारण के अनुसार कुछ अपवाद भी हैं, जैसे- कन्हैया, तुम्हारा, मल्हार आदि में क, तु, म लघु ही रहते हैं।

दीर्घ वर्ण:- साधारणतया गुरु वर्ण को ही दीर्घ वर्ण कहा जाता है परंतु यहाँ इस दीर्घ वर्ण की परिभाषा थोड़ी भिन्न है। मैंने अपनी नव सृजित
'छकलियाँ' में इसी दीर्घ वर्ण की चर्चा की है। अतः इसे ध्यान से समझने की आवश्यकता है।

1- समस्त ऊपर बताये गये गुरु वर्ण दीर्घ गिने जाते हैं और लघु वर्ण आधा दीर्घ गिना जाता है।
2- शब्द में यदि दो लघु एक साथ रहते हों तो वे दो लघु एक दीर्घ गिने जाते हैं। जैसे- दो अक्षरों के शब्द- तुम, हम, गिरि आदि में दीर्घ भार एक गिना जाता है। दो से अधिक अक्षरों के शब्द में एक साथ आये दो लघु वर्ण। जैसे- मानव, भीषण, समता में नव,षण और सम एक दीर्घ वर्ण गिने जायेंगे। तीन अक्षरों के शब्द जिसमें तीनों अक्षर लघु हों तो अंतिम दो लघु मिल कर दीर्घ गिने जाते हैं और शब्द का प्रथम लघु आधा दीर्घ गिना जाता है। जैसे- कमल, अडिग, मधुर आदि 1.5 दीर्घ वर्ण गिने जाते हैं। हलचल, मधुकर आदि 2 दीर्घ हो गये। घबराहट में 3 दीर्घ गिने जाते हैं- घब, रा और हट। समन्वय में स= आधा, म= दीर्घ (न्व संयुक्त वर्ण), न्वय= दीर्घ कुल 2.5 दीर्घ।  हिंदी में दो लघु को दीर्घ मानने की परंपरा नहीं है पर उर्दू में यह शाश्वत दीर्घ माना जाता है।
इस नई विधा 'छकलियाँ' में कुछ विशेष छूट हैं जिन्हें ध्यान से समझने की आवश्यकता है।
दीर्घ गणना में विशेष छूट:-
(1) किसी शब्द के अंत में यदि गुरु और लघु वर्ण हों तो लघु वर्ण गणना से मुक्त है। उसे आधा भी नहीं गिना जाता। इसे ध्यान पूर्वक देखें। जैसे- राम, कृष्ण, भक्ति, भव्य आदि में केवल एक दीर्घ वर्ण गिना जायेगा। घनश्याम में घन का एक तथा श्याम का एक मिल कुल दो दीर्घ हुये। इस विशेष छूट के अंतर्गत महान, विचार, भविष्य जैसे शब्द 1.5 दीर्घ गिने जाते हैं।
(2) शब्द के मध्य में यदि दो गुरु वर्ण के मध्य में एक लघु हो तो उसे नहीं गिना जाता। जैसे- मेमना, ढोकला, देखना, छोकरी का दीर्घ भार केवल दो गिना जाता है। इन शब्दों में क्रमशः म, क, ख, क वर्ण नहीं गिने जाते। 'मसोसना' का दीर्घ भार 2.5 गिना जाता है क्योंकि दो गुरु के मध्य का स गणना से मुक्त है।
(3) शब्दान्त गुरु लघु में लघु वर्ण को न गिनने की छूट सामासिक शब्दों में भी प्रभावी है। विग्रह के पश्चात बचे मूल शब्द में यह छूट लागू है। जैसे- मध्यप्रदेश का दीर्घ भार 2.5 गिना जाएगा न कि 3। मध्य=1 और प्रदेश=1.5 जबकि शब्द के मध्य में ध्य प्र दो लघु एक साथ है। ऐसे ही रामकृपा= 2.5, सोचविचार= 2.5 जैसे शब्दों को समझा जा सकता है।

'छकलियाँ' की पंक्ति में आधे दीर्घ की छूट:- किसी पंक्ति का यदि दीर्घ वर्ण भार 1.5, 2.5 आदि हैं तो  आधा दीर्घ नहीं गिना जाता। इस छूट के अंतर्गत प्रथम पंक्ति में विचार, महान जैसे शब्द आ सकते हैं जिनका भार 1.5 है।

पंक्तियों की स्वतंत्रता:- इस विधा में भी हाइकु, ताँका, वर्ण पिरामिड की तरह पंक्तियों की स्वतंत्रता रखना अत्यन्त आवश्यक है। हर पंक्ति अपने आप में स्वतंत्र होनी चाहिये। एक ही वाक्य को तोड़कर पंक्तियाँ न बना दें। यह केवल 21 दीर्घ वर्णों की संरचना है और उसी में गागर में सागर भरना होता है अतः चमत्कारिक बात कहें।
पंक्तियों में यथासंभव तुकांतता रखें जिससे रचना में कविता दिखाई पड़े न कि गद्यात्मक कोई बात।

मैं 'छकलियाँ' की अपनी प्रथम रचना 'शारदा वंदना' के माध्यम से इसे और स्पष्ट करता हूँ।

मात (1 दीर्घ, त गणना मुक्त)
शारदा (2 दीर्घ, र गणना मुक्त)
हंसवाहिनी, (3 दीर्घ, स, हि गणना मुक्त)
वीणा वादिनी, (4 दीर्घ, दि गणना मुक्त)
अज्ञान घिरा हूँ मैं (5.5 दीर्घ, घिरा - 1.5 दीर्घ)
ज्ञान दो विद्या दायिनी। (6 दीर्घ, यि गणना मुक्त)

(5 वीं पंक्ति में अज्ञान का दीर्घ भार 2 है क्योंकि न 
गणना मुक्त है। कुल योग 2+1.5+1+1 = 5.5 जो 5 के लिए मान्य है। रचना में कुल 30 वर्ण।)

एक और रचना देखें:-

प्रीत (1 दीर्घ)
यही रीत, (2.5 दीर्घ)
जीत ले मीत, (3 दीर्घ)
प्रियतम के गीत, (4 दीर्घ, प्रियतम=2)
प्रणय सूत्र से प्रणीत (5 दीर्घ)
गगन धरा लेते जीत। (6 दीर्घ)

(रचना में तुकांतता देखें। प्रीत, मीत, गीत आदि शब्द का दीर्घ भार 1 है क्योंकि त गणना मुक्त है।
5 वीं पंक्ति में प्रणय=1.5, सूत्र=1, प्रणीत=1.5।
6 ठी पंक्ति में गगन=1.5, धरा=1.5। रचना में कुल 36 वर्ण। )

आप स्वयं देखें कि दीर्घ वर्ण की अवधारणा, शब्दान्त छूट तथा पंक्ति छूट आपके समक्ष सृजन के नव आयाम खोल रही है। ये सारे विचार जापानी और इंगलिश में प्रचलित सिलेबल गणना जितना विस्तृत कलेवर तो नहीं दे रहे पर हिंदी इतनी अधिक सक्षम है कि इतनी छूट भी सृजकों की कल्पना को नवीन ऊँचाइयाँ अवश्य प्रदान करेंगी।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-06-19

Tuesday, July 16, 2019

मौक्तिक दाम छंद "विनायक वंदन"

गजानन विघ्न करो सब दूर।
करो तुम आस सदा मम पूर।।
नवा कर माथ करूँ नित जाप।
कृपा कर के हर लो भव-ताप।।

प्रियंकर रूप सजे गज-भाल।
छटा अति मोहक तुण्ड विशाल।।
गले उपवीत रखो नित धार।
भुजा अति पावन सोहत चार।।

धरें कर में शुभ अंकुश, पाश।
करें उनसे रिपु, दैत्य विनाश।।
बिराजत हैं कमलासन नाथ।
रखें सर पे शुभदायक हाथ।।

दयामय विघ्न विनाशक आप।
हरो प्रभु जन्मन के सब पाप।।
बसो हिय पूर्ण करो सब काज।
रखो प्रभु भक्तन की पत आज।।
=============
विधान छंद:-

पयोधर चार मिलें क्रमवार।
भुजा तुक में कुल पाद ह चार।।
रचें सब छंद महा अभिराम।
कहावत है यह मौक्तिक दाम।।

पयोधर = जगन ।ऽ। के लिए प्रयुक्त होता है।
भुजा= दो का संख्यावाचक शब्द
121  121  121 121 = 12वर्ण

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
21-01-18

मोटनक छन्द "भारत की सेना"

सेना अरि की हमला करती।
हो व्याकुल माँ सिसकी भरती।।
छाते जब बादल संकट के।
आगे सब आवत जीवट के।।

माँ को निज शीश नवा कर के।
माथे रज भारत की धर के।।
टीका तब मस्तक पे सजता।
डंका रिपु मारण का बजता।।

सेना करती जब कूच यहाँ।
छाती अरि की धड़कात वहाँ।।
डोले तब दिग्गज और धरा।
काँपे नभ ज्यों घट नीर भरा।।

ये देख छटा रस वीर जगे।
सारी यह भू रणक्षेत्र लगे।।
गावें महिमा सब ही जिनकी।
माथे पद-धूलि धरूँ उनकी।।
=================
लक्षण छंद:-

"ताजाजलगा" सब वर्ण शुभं।
राचें मधु छंदस 'मोटनकं'।।

"ताजाजलगा"= तगण जगण जगण लघु गुरु।
221 121 121 12 = 11 वर्ण
चार चरण, दो दो समतुकांत।
******************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
16-03-2017

मलयज छंद "प्रभु-गुण"

सुन मन-मधुकर।
मत हिय मद भर।।
करत कलुष डर।
हरि गुण उर धर।।

सरस अमिय सम।
प्रभु गुण हरदम।।
मन हरि मँह रम।
हर सब भव तम।।

मन बहुत विकल।
हलचल प्रतिपल।।
पड़त न कछु कल।
हरि-दरशन हल।।

प्रभु-शरण लखत।
यह सर अब नत।।
तव चरण पड़त।
रख नटवर पत।।
=============
लक्षण छंद:-

"ननलल" लघु सब।
'मलयज' रच तब।

 "ननलल" = नगण नगण लघु लघु।
8 लघु, 4चरण समतुकांत
******************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
19-01-17

मनोज्ञा छंद "होली"

भर सनेह रोली।
बहुत आँख रो ली।।
सजन आज होली।
व्यथित खूब हो ली।।

मधुर फाग आया।
पर न अल्प भाया।।
कछु न रंग खेलूँ।
विरह पीड़ झेलूँ।।

यह बसंत न्यारी।
हरित आभ प्यारी।।
प्रकृति भी सुहायी।
नव उमंग छायी।।

पर मुझे न चैना।
कटत ये न रैना।।
सजन याद आये।
न कुछ और भाये।।

विकट ये बिमारी।
मन अधीर भारी।।
सुख समस्त छीना।
अति कठोर जीना।।

अब तुरंत आ के।
हृदय से लगा के।।
सुध पिया तु लेवो।
न दुख और देवो।।
=============
लक्षण छंद:-

"नरगु" वर्ण सप्ता।
रचत है 'मनोज्ञा'।।

"नरगु" = नगण रगण गुरु
111 212 + गुरु = 7-वर्ण
चार चरण, दो दो समतुकांत।
*****************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
11-03-17

Thursday, July 11, 2019

मत्त सवैया मुक्तकमाला (2019 चुनाव)

हर दल जो टुकड़ा टुकड़ा था, इस बार चुनावों ने छाँटा;
बाहर निकाल उसको फेंका, ज्यों चुभा हुआ हो वो काँटा;
जो अपनी अपनी डफली पर, बस राग स्वार्थ का गाते थे;
उस भ्रष्ट तंत्र के गालों पर, जनता ने मारा कस चाँटा।

इस बार विरोधी हर दल ने, ऐसा भारी झेला घाटा;
चित चारों खाने सभी हुए, हर ओर गया छा सन्नाटा।
जन-तंत्र-यज्ञ की वेदी में, उन सबकी आहुति आज लगी;
वे राजनीति को हाथ हिला, जल्दी करने वाले टा टा।

भारत में नव-उत्साह जगा, रिपु के घर में क्रंदन होगा;
बन विश्व-शक्ति उभरेंगे हम, जग भर में अब वंदन होगा;
हे मोदी! तुम कर्मठ नरवर, गांधी की पुण्य धरा के हो;
अब ओजपूर्ण नेतृत्व तले, भारत का अभिनंदन होगा।

तुम राष्ट्र-प्रेरणा के नायक, तुम एक सूत्र के दायक हो;
जो सकल विश्व को बेध सके, वैसे अमोघ तुम सायक हो;
भारत भू पर अवतरित हुये, ये भाग्य हमारा आज प्रबल;
तुम धीर वीर तुम शक्ति-पुंज, तुम जन जन के अधिनायक हो।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-05-19

राधेश्यामी छंद "विधान"

यह छंद मत्त सवैया के नाम से भी प्रसिद्ध है। पंडित राधेश्याम ने राधेश्यामी रामायण 32 मात्रिक चरण में रची। छंद में कुल चार चरण होते हैं तथा क्रमागत दो-दो चरण तुकान्त होते हैं। प्रति चरण पदपादाकुलक का दो गुना होता है l तब से यह छंद राधेश्यामी छंद के नाम से प्रसिद्धि पा गया।
पदपादाकुलक छंद के एक चरण में 16 मात्रा होती हैं , आदि में द्विकल (2 या 11) अनिवार्य होता है किन्तु त्रिकल (21 या 12 या 111) वर्जित होता है।
राधेश्यामी छंद का मात्रा बाँट इस प्रकार तय होता है:
2 + 12 + 2 = 16 मात्रा (चरण का प्रथम पद)
2 + 12 + 2 = 16 मात्रा (चरण का द्वितीय पद)
द्विकल के दोनों रूप (2 या 1 1) मान्य है। तथा 12 मात्रा में तीन चौकल, अठकल और चौकल या चौकल और अठकल हो सकते हैं। चौकल और अठकल के नियम निम्न प्रकार हैं जिनका पालन अत्यंत आवश्यक है।
चौकल:- (1) प्रथम मात्रा पर शब्द का समाप्त होना वर्जित है। 'करो न' सही है जबकि 'न करो' गलत है।
(2) चौकल में पूरित जगण जैसे सरोज, महीप, विचार जैसे शब्द वर्जित हैं।

अठकल:- (1) प्रथम और पंचम मात्रा पर शब्द समाप्त होना वर्जित है। 'राम कृपा हो' सही है जबकि 'हो राम कृपा' गलत है क्योंकि राम शब्द पंचम मात्रा पर समाप्त हो रहा है। यह ज्ञातव्य हो कि 'हो राम कृपा' में विषम के बाद विषम शब्द पड़ रहा है फिर भी लय बाधित है।
(2) 1-4 और 5-8 मात्रा पर पूरित जगण शब्द नहीं आ सकता।
(3) अठकल का अंत गुरु या दो लघु से होना आवश्यक है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

राधिका छंद "संकीर्ण मानसिकता"

अपने में ही बस मग्न, लोग क्यों सब हैं।
जीवन के सारे मूल्य, क्षीण क्यों अब हैं।।
हो दिशाहीन सब लोग, भटकते क्यों हैं।
दूजों का हर अधिकार, झटकते क्यों हैं।।

आडंबर का सब ओर, जोर है भारी।
दिखते तो स्थिर-मन किंतु, बहुत दुखियारी।।
ऊपर से चमके खूब, हृदय है काला।
ये कैसा भीषण रोग, सभी ने पाला।।

तन पर कपड़े रख स्वच्छ, शान झूठी में।
करना चाहें अब लोग, जगत मुट्ठी में।।
अब सिमट गये सब स्नेह, स्वार्थ अति छाया।
जीवन का बस उद्देश्य, लोभ, मद, माया।।

मानव खोया पहचान, यंत्रवत बन कर।
रिश्तों का भूला सार, स्वार्थ में सन कर।।
खो रहे योग्य-जन सकल, अपाहिज में मिल।
छिपती जाये लाचार, काग में कोकिल।।

नेता अभिनय में दक्ष, लोभ के मारे।
झूठे भाषण से देश, लूटते सारे।।
जनता भी केवल उन्हें, बिठाये सर पे।
जो ले लुभावने कौल, धमकता दर पे।।

झूठे वादों की बाढ़, चुनावों में अब।
बहुमत कैसे भी मिले, लखे नेता सब।।
हित आज देश के गौण, स्वार्थ सर्वोपर।
बिक पत्रकारिता गयी, लोभ में खो कर।।

है राजनीति सर्वत्र, खोखले नारे।
निज जाति, संगठन, धर्म, लगे बस प्यारे।।
ओछे विचार की बाढ़, भयंकर आयी।
कैसे जग-गुरु को आज, सोच ये भायी।।

मन से सारी संकीर्ण, सोच हम त्यागें।
रख कर नूतन उल्लास, सभी हम जागें।।
हम तुच्छ स्वार्थ से आज, तोड़ लें नाता।
धर उच्च भाव हम बनें, हृदय से दाता।।
***************
राधिका छंद *विधान*

इसके प्रत्येक चरण में 22 मात्रा होती हैं, 13,9 पर यति होती है, यति से पहले और बाद में त्रिकल आता है, कुल चार चरण होते हैं , क्रमागत दो-दो चरण तुकांत होते हैं l इसका मात्रा बाँट निम्न प्रकार से है।

2 6 2 3 = 13 मात्रा, प्रथम यति। द्विकल के दोनों रूप (2, 1 1) और त्रिकल के तीनों रूप (2 1, 1 2, 1 1 1) मान्य हैं। छक्कल के नियम लगेंगे जैसे प्रथम और पंचम मात्रा पर शब्द का समाप्त नहीं होना तथा प्रथम चार मात्रा में पूरित जगण (विचार आदि) नहीं हो सकते।

3 2 2 2 = 9 मात्रा, द्वितीय यति। द्विकल त्रिकल के सभी रूप मान्य।
===============
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
27-12-2018


जब मन में हो हनुमान, राम तो अपने।
सब बन जाते हैं काम, पूर्ण हो सपने।।
मन में रख के विश्वास, करो सब पूजा।
जो हर ले सारे कष्ट, नहीं है दूजा।।
*******

बेजान साज पर थिरक, रहीं क्यों अंगुल।
ये रात मिलन की रही, बीत हो व्याकुल।
अब साज हृदय का मचल, रहा बजने को।
सब तरस रहें हैं अंग, सजन सजने को।।

मुक्तामणि छंद "गणेश वंदना"

मात पिता शिव पार्वती, कार्तिकेय गुरु भ्राता।
पुत्र रत्न शुभ लाभ हैं, वैभव सकल प्रदाता।।
रिद्धि सिद्धि के नाथ ये, गज-कर से मुख सोहे।
काया बड़ी विशाल जो, भक्त जनों को मोहे।।

भाद्र शुक्ल की चौथ को, गणपति पूजे जाते।
आशु बुद्धि संपन्न ये, मोदक प्रिय कहलाते।।
अधिपति हैं जल-तत्त्व के, पीत वस्त्र के धारी।
रक्त-पुष्प से सोहते, भव-भय सकल विदारी।।

सतयुग वाहन सिंह का, अरु मयूर है त्रेता।
द्वापर मूषक अश्व कलि, हो सवार गण-नेता।।
रुचिकर मोदक लड्डुअन, शमी-पत्र अरु दूर्वा।
हस्त पाश अंकुश धरे, शोभा बड़ी अपूर्वा।।

विद्यारंभ विवाह हो, गृह-प्रवेश उद्घाटन।
नवल कार्य आरंभ हो, या फिर हो तीर्थाटन।।
पूजा प्रथम गणेश की, संकट सारे टारे।
काज सुमिर इनको करो, विघ्न न आए द्वारे।।

भालचन्द्र लम्बोदरा, धूम्रकेतु गजकर्णक।
एकदंत गज-मुख कपिल, गणपति विकट विनायक।।
विघ्न-नाश अरु सुमुख ये, जपे नाम जो द्वादश।
रिद्धि सिद्धि शुभ लाभ से, पाये नर मंगल यश।।

ग्रन्थ महाभारत लिखे, व्यास सहायक बन कर।
वरद हस्त ही नित रहे, अपने प्रिय भक्तन पर।।
मात पिता की भक्ति में, सर्वश्रेष्ठ गण-राजा।
'बासुदेव' विनती करे, सफल करो सब काजा।।
===========
विधान:-

दोहे का लघु अंत जब, सजता गुरु हो कर के।
'मुक्तामणि' प्रगटे तभी, भावों माँहि उभर के।।

मुक्तामणि चार चरणों का अर्ध सम मात्रिक छंद है जिसके विषम पद 13 मात्रा के ठीक दोहे वाले विधान के होते हैं तथा सम पद 12 मात्रा के होते हैं। इस प्रकार प्रत्येक चरण कुल 25 मात्रा का 13 और 12  मात्रा के दो पदों से बना होता है। दो दो चरण समतुकांत होते हैं। मात्रा बाँट:
विषम पद- 8+3 (ताल)+2 कुल 13 मात्रा
सम पद- 8+2+2 कुल 12 मात्रा।
अठकल की जगह दो चौकल हो सकते हैं। द्विकल के दोनों रूप (1 1 या 2) मान्य है।
*******************
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
05-09-2016

मरहठा छंद "कृष्ण लीलामृत"

धरती जब व्याकुल, हरि भी आकुल, लेते प्रभु अवतार।
कर कृपा भक्त पर, दुख जग के हर, दूर करे भू भार।।
द्वापर युग में जब, घोर असुर सब, देन लगे संताप।
हरि भक्त सेवकी, मात देवकी, सुत बन प्रगटे आप।।

यमुना जल तारन, कालिय कारन, जो विष से भरपूर।
कालिय शत फन पर, नाचे जम कर, किया नाग-मद चूर।।
दावानल भारी, गौ मझधारी, फँस कर व्याकुल घोर।
कर पान हुताशन, विपदा नाशन, कीन्हा माखनचोर।।

विधि माया कीन्हे, सब हर लीन्हे, गौ अरु ग्वालन-बाल।
बन गौ अरु बालक, खुद जग-पालक, मेटा ब्रज-जंजाल।।
ब्रह्मा इत देखे, उत भी पेखे, दोनों एक समान।
तुम प्रभु अवतारी, भव भय हारी, ब्रह्म गये सब जान।।

ब्रज विपदा हारण, सुरपति कारण, आये जब यदुराज।
गोवर्धन धारा, सुरपति हारा, ब्रज का साधा काज।
मथुरा जब आये, कुब्जा भाये, मुष्टिक चाणुर मार।
नृप कंस दुष्ट अति, मामा दुर्मति, वध कर, दी भू तार।।

पाण्डव के रक्षक, कौरव भक्षक, राजनीति मर्मज्ञ।
शिशुपाल हने जब, अग्र-पूज्य तब, राजसूय था यज्ञ।।
था युद्ध भयंकर, पार्थ शोक हर, दे गीता उपदेश।
कृष्णा-विपदा हर, चीर बढ़ा कर, बने भक्त-हृदयेश।।

ब्रज के तुम नायक, अति सुख दायक, सबका देकर साथ।
जब भीड़ पड़ी है, विपद हरी है, आगे आ तुम नाथ।।
हे कृष्ण मुरारी! जनता सारी, विपदा में है आज।
कर जोड़ सुमरते, विनती करते, रखियो हमरी लाज।
*************
मरहठा छंद विधान:-

यह प्रति चरण कुल 29 मात्रा का छंद है। इसमें यति विभाजन 10, 8,11 मात्रा का है।
मात्रा बाँट:-
प्रथम यति 2+8 =10 मात्रा
द्वितीय यति 8,
तृतीय यति 8+3 (ताल यानि 21) = 11 मात्रा
अठकल की जगह दो चौकल लिये जा सकते हैं। अठकल चौकल के सब नियम लगेंगे।
4 चरण सम तुकांत या दो दो चरण समतुकांत। अंत्यानुप्रास हो तो और अच्छा।
===========

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
31-10-2016

बरवै छंद "शिव स्तुति"

सदा सजे शीतल शशि, इनके माथ।
सुरसरिता सर सोहे, ऐसो नाथ।।

सुचिता से सेवत सब, है संसार।
हे शिव शंकर संकट, सब संहार।

आक धतूरा चढ़ते, घुटती भंग।
भूत गणों को हरदम, रखते संग।।

गले रखे लिपटा के, सदा भुजंग।
डमरू धारी बाबा, रहे मलंग।।

औघड़ दानी तुम हो, हर लो कष्ट।
दुख जीवन के सारे, कर दो नष्ट।।

करूँ समर्पित तुमको, सारे भाव।
दूर करो हे भोले, भव का दाव।।
==============
बरवै छंद विधान:-

यह बरवै दोहा भी कहलाता है। बरवै अर्द्धसम मात्रिक छन्द है। इसके प्रथम एवं तृतीय चरण में 12-12 मात्राएँ तथा द्वितीय एवं चतुर्थ चरण में 7-7 मात्राएँ हाती हैं। विषम चरण के अंत में गुरु या दो लघु होने चाहिए। सम चरणों के अन्त में ताल यानि 2 1 होना आवश्यक है। मात्रा बाँट विषम चरण का 8+4 और सम चरण का 4+3 है। अठकल की जगह दो चौकल हो सकते हैं। अठकल और चौकल के सभी नियम लगेंगे।
********************
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
21-08-2016

Saturday, July 6, 2019

212*4 बह्र के गीत

1) छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए
    ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए
2) कर चले हम फ़िदा जानो तन साथियों
3) बेखुदी में सनम उठ गए जो कदम
4) जिस गली में तेरा घर न हो बालमा
5) मेरे महबूब में क्या नहीं क्या नहीं   
6) दिल ने मज़बूर इतना ज़ियादा किया
7) ऐ वतन ऐ वतन तेरे सर की कसम
8) खुश रहे तू सदा ये दुआ है मेरी
9) हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी

गज़ल (याद आती हैं जब)

बह्र:- 212  212  212  212

याद आती हैं जब आपकी शोखियाँ,
और भी तब हसीं होती तन्हाइयाँ।

आपसे बढ़ गईं इतनी नज़दीकियाँ,
दिल के लगने लगीं पास अब दूरियाँ।

डालते गर न दरिया में कर नेकियाँ,
हारते हम न यूँ आपसे बाज़ियाँ।

गर न हासिल वफ़ा का सिला कुछ हुआ,
उनकी शायद रहीं कुछ हों मज़बूरियाँ।

मिलता हमको चराग-ए-मुहब्बत अगर,
शब सी काली ये आतीं न दुश्वारियाँ।

हुस्नवालों से दामन बचाना ए दिल,
मात दानिश को दें उनकी नादानियाँ।

आग मज़हब की जो भी लगाते 'नमन',
इसमें अपनी ही वे सेंकते रोटियाँ।

दानिश=अक्ल, बुद्धि

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
3-4-18

ग़ज़ल (गीत खुशियों के गाते)

बह्र:- 212*3 + 2

गीत खुशियों के गाते चलेंगे,
जख्म दिल के मिटाते चलेंगे।

रंग अपना जमाते चलेंगे,
रोतों को हम हँसाते चलेंगे।

जो मुहब्बत से महरूम तन्हा,
दिल में उनको बसाते चलेंगे।

झेले जेर-ओ-जबर अब तलक सब,
जग में सर अब उठाते चलेंगे।

सुनले अहल-ए-जहाँ कम नहीं हम,
सबसे आगे ही आते चलेंगे।

काम ऐसे करेंगे सभी मिल,
सबको दुनिया में भाते चलेंगे।

दोस्ती को 'नमन' करते हरदम,
नफ़रतों को भुलाते चलेंगे।

जेर-ओ-जबर=जबरदस्ती नीचे लाना, अस्त व्यस्तता
अहल-ए-जहाँ=दुनियाँ वालों

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
19-06-17

ग़ज़ल (राम सुमिरन बिना गत नहीं)

बह्र:- 212  212  212

राम सुमिरन बिना गत नहीं,
और चंचल ये मन रत नहीं।

व्यर्थ सब कुछ है संसार में,
नाम-जप की अगर लत नहीं।

है दिखावे का जप-तप वृथा,
भाव हैं यदि समुन्नत नहीं।

मन को थिर कर के भज राम को,
भक्ति उसकी जो अक्षत नहीं।

लाभ उसकी न चर्चा से कुछ,
बात जो शास्त्र-सम्मत नहीं।

नर वे पशुवत हैं, पर-पीड़ लख
भाव जिनके हों आहत नहीं।

नैन प्यासे 'नमन' मन विकल,
प्रभु-शरण बिन कहीं पत नहीं।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
8-04-18

ग़ज़ल (दरिया है बहुत गहरा)

बह्र:- (221  1222)*2

दरिया है बहुत गहरा, कश्ती भी पुरानी है,
हिम्मत की मगर दिल में, कम भी न रवानी है।

ज़ज़्बा हो जो बढ़ने का, कुछ भी न लगे मुश्किल,
कुछ करने की जीवन में, ये ही तो निशानी है।

दिल उनसे मिला जब से, बदली है फ़ज़ा तब से,
मदहोश नज़ारे हैं, हर शय ही सुहानी है।

बचपन के सुहाने दिन, रह रह के वे याद-आएं,
आँखों में हैं मंज़र सब, हर बात ज़ुबानी है।

औक़ात नहीं कुछ भी, पर आँख दिखाए वो
टकरायेगा हम से तो, मुँह की उसे खानी है।

सिरमौर बने जग का, भारत ये वतन प्यारा,
ये आस हमें पूरी, अब कर के दिखानी है।

जिस ओर 'नमन' देखे, मुफ़लिस ही भरें आहें,
अब सब को गरीबी ये, जड़ से ही मिटानी है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-06-19

Saturday, June 22, 2019

हाइकु (राजनीति)

सत्ता का यज्ञ
यजमान हैं विज्ञ
पुरोधा अज्ञ।
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सत्ता-मिलिंद
पी स्वार्थी मकरंद
हुआ स्वच्छंद।
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नेता हैं चोर
जनता करे शोर
तंत्र का जोर।
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जनता ताके
बैठी बगलें झाँके
कुर्सी दे फाके
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लोक सेवक
जनता का शोषक
स्वयं पोषक।
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अंगुल पांच
सियासत का हाथ
सब समान।
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गायों की रोटी
बन्दरों हाथ पड़ी
कुत्तों में बँटी।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
19-06-19

सेदोका (किशान)

जापानी विधा (5-7-7-5-7-7)

किशान भाई
मौसम हरजाई
सरकार पराई।
अन्न उगाया
फसल की जगह
हाय रे! मौत उगी।
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मिट्टी से लड़े
कृषक के फावड़े
तब फ़सल झड़े,
पर हाय रे
तभी मौसम अड़ा
भारी संकट पड़ा।
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उगानेवाले
ग़म खा के जी रहे
खुद को मिटा रहे।
बेचनेवाले
बादाम पिस्ता खाते
हर  खुशी  मनाते।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
3-09-16

सायली (चमकी बुखार)

चमकी
ऐसी भड़की
काल बन धमकी
मासूमों की
सिसकी।
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बिहार
बच्चे बीमार
सोयी पड़ी सरकार
करे हुँकार
बुखार।
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मुजफ्फरपुर
बुखार  निष्ठुर
आया बन महिषासुर
केवल चिंतातुर!
हस्तिनापुर।
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महाकाल
बुखार विकराल
बच्चों  पर  भूचाल
सरकारी अस्पताल
बदहाल।

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1-2-3-2-1 शब्द
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-06-19