Wednesday, May 12, 2021

मनहरण घनाक्षरी "राहुल पर व्यंग"

मनहरण घनाक्षरी

राजनायिकों के गले, मोदी का लगाना देख,
राहुल तिहारी नींद, उड़ने क्यों लगी है।

हाथ मिला हाथ झाड़, लेने की तिहारी रीत,
रीत गले लगाने की, यहाँ मन पगी है।

देश की परंपरा का, उपहास करो नित,
और आज तक किन्ही, बस महा ठगी है।

दुनिया से भाईचारा, कैसे है निभाया जाता,
तुझे क्या, तेरी तो बस, इटली ही सगी है।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
15-01-18

सार छंद "पुष्प"

सार छंद

अहो पुष्प तुम देख रहे हो, खिलकर किसकी राहें।
भावभंगिमा में भरते हो, किसकी रह रह आहें।।
पुष्पित हो तुम पूर्ण रूप से, ऐंठे कौन घटा पर।
सम्मोहित हो रहे चाव से, जग की कौन छटा पर।।

लुभा रहे भ्रमरों को अपने, मधुर परागों से तुम।
गूँजित रहते मधुपरियों के, सुंदर गीतों से तुम।।
कौन खुशी में वैभव का यह, जीवन बिता रहे हो।
आज विश्व प्राणी को इठला, क्या तुम दिखा रहे हो।।

अपनी इस आभा पर प्यारे, क्यों इतना इतराते।
अपने थोड़े वैभव पर क्यों, फूले नहीं समाते।।
झूम रहे हो आज खुशी से, तुम जिन के ही श्रम से।
बिसरा बैठे उनको अपने, यौवन के इस भ्रम से।।

मत भूलो तुम होती है, किंचित् ये हरियाली।
चार दिनों के यौवन में ये, थोड़ी सी खुशियाली।।
आज हँसी के जीवन पर कल, क्रंदन तो छाता है।
वृक्षों में भी इस बसन्त पर, कल पतझड़ आता है।।

क्षणभंगुर इस जीवन पर तुम, मत इठलाओ प्यारे।
दल, मकरंद चार दिन में ही, हो जायेंगे न्यारे।।
जितनी खुशबू फैला सकते, जल्दी ही फैला लो।
हँसते खिलते खुशियाँ बाँटो, जीवन अमर बना लो।।

नेकी कर कुंए में डालो, और न जोड़ो नाता।
सब अपनी ज्वाला में जलते, कोई किसे न भाता।।
स्वार्थ भाव से जग यह चलता, इतराओ तुम काहे।
दूजों के श्रम-कण पर आश्रित, जग तो रहना चाहे।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
13-05-16

Wednesday, May 5, 2021

ग़ज़ल (ढूँढूँ भला ख़ुदा की मैं रहमत)

बह्र:- 221  2121  1221  212

ढूँढूँ भला ख़ुदा की मैं रहमत कहाँ कहाँ,
अब क्या बताऊँ उसकी इनायत कहाँ कहाँ।

सहरा, नदी, पहाड़, समंदर ये दश्त सब,
दिखलाएँ सब ख़ुदा की ये वुसअत कहाँ कहाँ।

हर सिम्त हर तरह के दिखे उसके मोजिज़े,
जैसे ख़ुदा ने लिख दी इबारत कहाँ कहाँ।

अंदर जरा तो झाँकते अपने को भूल कर,
बाहर ख़ुदा की ढूँढते सूरत कहाँ कहाँ।

रुतबा-ओ-ज़िंदगी-ओ-नियामत ख़ुदा से तय,
इंसान फिर भी करता मशक्कत कहाँ कहाँ।

इंसानियत अता तो की इंसान को ख़ुदा,
फैला रहा वो देख तु दहशत कहाँ कहाँ।

कहता 'नमन' कि एक ख़ुदा है जहान में,
जैसे भी फिर हो उसकी इबादत कहाँ कहाँ।

सहरा = रेगिस्तान
दश्त = जंगल
वुअसत = फैलाव, विस्तार, सामर्थ्य
सिम्त = तरफ, ओर
मोजिज़े = चमत्कार (बहुवचन)

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
08-07-2017

ग़ज़ल (जब से देखा उन को मैं तो)

बह्र:- 2122  2122  2122  212

जब से देखा उन को मैं तो क़ैस जैसा बन गया,
अच्छा खासा जो था पहले क्या से अब क्या बन गया।

हाल कुछ ऐसा हुआ उनकी अदाएँ देख कर,
बन फ़साना सब की आँखों का मैं काँटा बन गया।

पेश क्या महफ़िल में कर दी इक लिखी ताज़ा ग़ज़ल,
घूरती सब की निगाहों का निशाना बन गया।

कामयाबी की बुलंदी पे गया गर चढ़ कोई,
हो सियासत में वो शामिल इक लुटेरा बन गया।

आये वो अच्छे दिनों का झुनझुना दे चल दिये,
देश के बहरों के कानों का वो बाजा बन गया।

लोगों की जो डाह में था इश्क़ का मेरा जुनूँ,
अब वो उन के जी को बहलाने का ज़रिया बन गया।

जो 'नमन' सब को समझता था महज कठपुतलियाँ,
आज वो जनता के हाथों खुद खिलौना बन गया।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
20-12-2018

ग़ज़ल (दीवाली पर जगमग जगमग)

बह्र:- 22 22 22 22 22 22 222

दीवाली पर जगमग जगमग जब सारे घर होते हैं,
आतिशबाज़ी धूम धड़ाके हर नुक्कड़ पर होते हैं।

पकवानों की खुशबू छायी, आरतियों के स्वर गूँजे,
त्योहारों के ये ही क्षण खुशियों के अवसर होते हैं।

अनदेखी परिणामों की कर जंगल नष्ट करें मानव,
इससे नदियों का जल सूखे बेघर वनचर होते हैं।

क्या कहिये ऐसों को जो रहतें तो शीशों के पीछे,
औरों की ख़ातिर उनके हाथों में पत्थर होते हैं।

कायर तो छुप वार करें या दूम दबा कर वे भागें,
रण में डट रिपु जो ललकारें वे ताकतवर होते हैं।

दुबके रहते घर के अंदर भारी सांसों को ले हम,
आपे से सरकार हमारे जब भी बाहर होते हैं।

कमज़ोरों पर ज़ोर दिखायें गेह उजाड़ें दीनों के,
बर्बर जो होते हैं वे अंदर से जर्जर होते हैं।

पर हित में विष पी कर के देवों के देव बनें शंकर,
त्यज कर स्वार्थ करें जो सेवा पूजित वे नर होते हैं।

दीन दुखी के दर्द 'नमन' जो कहते अपनी ग़ज़लों में,
वैसे ही कुछ खास सुख़नवर सच्चे शायर होते हैं।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
23-10-20