Friday, May 20, 2022

अनुष्टुप छंद

"गुरु पंचश्लोकी"


सद्गुरु-महिमा न्यारी, जग का भेद खोल दे।
वाणी है इतनी प्यारी, कानों में रस घोल दे।।

गुरु से प्राप्त की शिक्षा, संशय दूर भागते।
पाये जो गुरु से दीक्षा, उसके भाग्य जागते।।

गुरु-चरण को धोके, करो रोज उपासना।
ध्यान में उनके खोकेेे, त्यागो समस्त वासना।।

गुरु-द्रोही नहीं होना, गुरु आज्ञा न टालना।
गुरु-विश्वास का खोना, जग-सन्ताप पालना।।

गुरु के गुण जो गाएं, मधुर वंदना करें।
आशीर्वाद सदा पाएं, भवसागर से तरें।।
******************

अनुष्टुप छंद विधान -

यह छंद अर्द्ध समवृत्त है । यह द्विपदी छंद है जिसके पद में दो चरण होते हैं। इस के प्रत्येक चरण में आठ वर्ण होते हैं । पहले चार वर्ण किसी भी मात्रा के हो सकते हैं । पाँचवाँ लघु और छठा वर्ण सदैव गुरु होता है । सम चरणों में सातवाँ वर्ण लघु और विषम चरणों में गुरु होता है। आठवाँ वर्ण संस्कृत में तो लघु या गुरु कुछ भी हो सकता है। संस्कृत में छंद के चरण का अंतिम वर्ण लघु होते हुये भी दीर्घ उच्चरित होता है जबकि हिन्दी में यह सुविधा नहीं है। अतः हिन्दी में आठवाँ वर्ण सदैव दीर्घ ही होता है।

(1) × × × × । ऽ ऽ ऽ, (2) × × × × । ऽ । ऽ
(3) × × × × । ऽ ऽ ऽ, (4) × × × × । ऽ । ऽ

उपरोक्त वर्ण विन्यास के अनुसार चार चरणों का एक छंद होता है। सम चरण (2, 4) समतुकांत होने चाहिए। रोचकता बढाने के लिए चाहें तो विषम चरण (1, 3) भी समतुकांत कर सकते हैं पर आवश्यक नहीं।

गुरु की गरिमा भारी, उसे नहीं बिगाड़ना।
हरती विपदा सारी, हितकारी प्रताड़ना।।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया
22-07-2016

Tuesday, May 17, 2022

छंदा सागर (मङ्गलाचरण)

 "छंदा सागर" ग्रन्थ

(मङ्गलाचरण)

वीणा की माँ वादिनी, वाहन हंस विहार।
विद्या दे वागीश्वरी, वारण करो विकार।।

ब्रह्म लोक वासिनी।
दिव्य आभ भासिनी।।
वेद वीण धारिणी।
हंस पे विहारिणी।।

शुभ्र वस्त्र आवृता।
पद्म पे विराजिता।।
दीप्त माँ सरस्वती।
नित्य तू प्रभावती।।

छंद ताल हीन मैं।
भ्रांति के अधीन मैं।।
मन्द बुद्धि को हरो।
काव्य की प्रभा भरो।।

छंद-बद्ध साधना।
काव्य की उपासना।
मैं सदैव ही करूँ।
भाव से इसे भरूँ।।

मात ये विचार हो।
देश का सुधार हो।।
ज्ञान का प्रसार हो।
नष्ट अंधकार हो।।

शारदे दया करो।
ज्ञान से मुझे भरो।।
काव्य-शक्ति दे मुझे।
दिव्य भक्ति दे मुझे।।

यह रक्ता छंद की स्तुति प्रस्तुत करते हुए हिंदी के छंद शास्त्र का दिग्दर्शन कराने वाले "छंदा सागर" ग्रन्थ को विद्या बुद्धि प्रदायनी माँ सरस्वती के श्री चरणों में  आशीर्वाद की प्रार्थना के साथ अर्पित कर रहा हूँ।
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भालचन्द्र लम्बोदरा, धूम्रकेतु गजकर्णक।
एकदंत गज-मुख कपिल, गणपति विकट विनायक।।
विघ्न-नाश अरु सुमुख ये, जपे नाम जो द्वादश।
रिद्धि सिद्धि शुभ लाभ से, पाये नर मंगल यश।।

मुक्तामणि में विघ्ननाशक गणपति के द्वादश नामों को स्तुति रूप में प्रस्तुत करते हुए "छंदा सागर" ग्रन्थ के निर्विघ्न पूर्ण होने की तथा ग्रन्थ से प्रबुद्ध पाठकों का चित्त रंजन करने की मंगलकामना करता हूँ।
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सद्गुरु-महिमा न्यारी, जग का भेद खोल दे।
वाणी है इतनी प्यारी, कानों में रस घोल दे।।

गुरु से प्राप्त की शिक्षा, संशय दूर भागते।
पाये जो गुरु से दीक्षा, उसके भाग्य जागते।।

गुरु-चरण को धोके, करो रोज उपासना।
ध्यान में उनके खोकेेे, त्यागो समस्त वासना।।

गुरु-द्रोही नहीं होना, गुरु आज्ञा न टालना।
गुरु-विश्वास का खोना, जग-सन्ताप पालना।।

गुरु के गुण जो गाएँ, मधुर वंदना करें।
आशीर्वाद सदा पाएँ, भवसागर से तरें।।

अनुष्टुप छंद में यह गुरु पंच श्लोकी उन समस्त गुरुजनों को अर्पित है जिनसे मुझे आजतक किसी भी रूप में ज्ञान प्राप्त हुआ।
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बना शारदे वास, मन मन्दिर में पैठ कर। 
विनती करता दास, 'बासुदेव' कर जोड़ कर।।

कृष्ण भाव की रास, थामें मन-रथ बैठ कर।
'बासुदेव' की आस, पूर्ण करें बसुदेव-सुत।। 

व्यास देव दें दृष्टि, कार्य करूँ कल्याणकर। 
करें भाव की वृष्टि, ग्रन्थ बने ये शोक हर।।

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बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया

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Wednesday, May 11, 2022

सुगम गीता "अवतरणिका"

 सुगम गीता 
"अवतरणिका"

कृष्ण भाव की रास, थामें मन-रथ बैठ कर।
'बासुदेव' की आस, पूर्ण करें बसुदेव-सुत।।

व्यास देव दें दृष्टि, काव्य रचूँ कल्याणकर।
करें भाव की वृष्टि, ग्रन्थ बने ये शोक हर।।

बना शारदे वास, मन मन्दिर में पैठ कर।
विनती करता दास, 'बासुदेव' कर जोड़ कर।।

 "शारदा वंदना"

कलुष हृदय में वास बना माँ,
श्वेत पद्म सा निर्मल कर दो ।
शुभ्र ज्योत्स्ना छिटका उसमें,
अपने जैसा उज्ज्वल कर दो ।।

शुभ्र रूपिणी शुभ्र भाव से,
मेरा हृदय पटल माँ भर दो ।
वीण-वादिनी स्वर लहरी से,
मेरा कण्ठ स्वरिल माँ कर दो ।।

मन उपवन में हे माँ मेरे,
कविता पुष्प प्रस्फुटित होंवे ।
मन में मेरे नव भावों के,
अंकुर सदा अंकुरित होंवे ।।

माँ जनहित की पावन सौरभ,
मेरे काव्य कुसुम में भर दो ।
करूँ काव्य रचना से जग-हित,
'नमन' शारदे ऐसा वर दो ।।

रचयिता:-
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया


Tuesday, May 10, 2022

मंदाक्रान्ता छंद

     मंदाक्रान्ता छंद "लक्ष्मी स्तुति"


लक्ष्मी माता, जगत जननी, शुभ्र रूपा शुभांगी।
विष्णो भार्या, कमल नयनी, आप हो कोमलांगी।।
देवी दिव्या, जलधि प्रगटी, द्रव्य ऐश्वर्य दाता।
देवों को भी, कनक धन की, दायिनी आप माता।।

नीलाभा से, युत कमल को, हस्त में धारती हैं।
हाथों में ले, कनक घट को, सृष्टि संवारती हैं।।
चारों हाथी, दिग पति महा, आपको सींचते हैं।
सारे देवा, विनय करते, मात को सेवते हैं।।

दीपों की ये, जगमग जली, ज्योत से पूजता हूँ।
भावों से ये, स्तवन करता, मात मैं धूजता हूँ।।
रंगोली से, घर दर सजा, बाट जोहूँ तिहारी।
आओ माते, शुभ फल प्रदा, नित्य आह्लादकारी।।

आया हूँ मैं, तव शरण में, भक्ति का भाव दे दो।
मेरे सारे, दुख दरिद की, मात प्राचीर भेदो।।
मैं आकांक्षी, चरण-रज का, 'बासु' तेरा पुजारी।
खाली झोली, बस कुछ भरो, चाहता ये भिखारी।।
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मंदाक्रान्ता छंद विधान -

"माभानाता,तगग" रच के, चार छै सात तोड़ें।
'मंदाक्रान्ता', चतुष पद की, छंद यूँ आप जोड़ें।।

"माभानाता, तगग" = मगण, भगण, नगण, तगण, तगण, गुरु गुरु (कुल 17 वर्ण की वर्णिक छंद।)
222   2,11   111  2,21   221   22  
चार छै सात तोड़ें = चार वर्ण,छ वर्ण और सात वर्ण पर यति।

(संस्कृत का प्रसिद्ध छंद जिसमें मेघदूतम् लिखा गया है।)
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया
30-10-2016

Saturday, May 7, 2022

शब्द शिल्पी साझा अंक

"ओपेन बुक्स आनलाइन" के साझा अंक 'शब्द शिल्पी' में प्रकाशित मेरी दो रचनाएँ।


डाउन लोड लिंक:-

https://drive.google.com/file/d/1D1nRQWmbstx2PfgwqtWGpEdhn1C39Qgs/view?usp=drivesdk

बासुदेव अग्रवाल नमन
तिनसुकिया

Wednesday, May 4, 2022

दोहा छंद

 दोहा छंद "मजदूर"


श्रम सीकर की वृष्टि से, सरसाते निर्माण।
इन मजदूरों का सभी, गुण का करें बखाण।।

हर उत्पादन का जनक, बेचारा मजदूर।
पर बेटी के बाप सा, खुद कितना मजबूर।।

छत देने हर शीश पर, जूझ रहा मजदूर।
बेछत पर वो खुद रहे, हो कर के मजबूर।।

चैन नहीं मजदूर को, मौसम का जो रूप।
आँधी हो तूफान हो, चाहे पड़ती धूप।।

बहा स्वेद को रात दिन, श्रमिक करे श्रम घोर।
तमस भरी उसकी निशा, लख न सके पर भोर।।

मजदूरों से ही बने, उन्नति का परिवेश।
नवनिर्माणों से खिले, नभ को छूता देश।।

नये कारखानें खुलें, प्रगति करें मजदूर।
मातृभूमि जगमग करें, भारत के ये नूर।।
***   ***   ***

बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया
04-05-22

Friday, April 29, 2022

सिंहनाद छंद

 सिंहनाद छंद "विनती"


हरि विष्णु केशव मुरारी।
तुम शंख चक्र कर धारी।।
मणि वक्ष कौस्तुभ सुहाये।
कमला तुम्हें नित लुभाये।।

प्रभु ग्राह से गज उबारा।
दस शीश कंस तुम मारा।।
गुण से अतीत अविकारी।
करुणा-निधान भयहारी।।

पृथु मत्स्य कूर्म अवतारी।
तुम रामचन्द्र बनवारी।।
प्रभु कल्कि बुद्ध गुणवाना।
नरसिंह वामन महाना।।

अवतार नाथ अब धारो।
तुम भूमि-भार सब हारो।।
हम दीन हीन दुखियारे।
प्रभु कष्ट दूर कर सारे।।
================

सिंहनाद छंद विधान -

"सजसाग" वर्ण दश राखो।
तब 'सिंहनाद' मधु चाखो।।

"सजसाग" = सगण जगण सगण गुरु
(112  121 112  2) 
10 वर्ण प्रति चरण का वर्णिक छंद, 4 चरण दो दो सम तुकान्त।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया
18-02-2017

Saturday, April 23, 2022

गुर्वा (ऋतु वर्णन)

ग्रीष्म गूजरी मतवाली,
स्वेद घड़ा छलकाती,
विकल सभी को कर डाली।
***

पावस पायल पहनी,
छम छम धुन बाजे,
हरियाली मन में खिली।
***

मिला शरद का आमंत्रण,
खिले हृदय में उत्सव,
शुभ्र ज्योत्सना का नर्तन।
***

बसंत बाग में बगराया,
बौर आम पर छाया,
कोकिल मधुर गान गाये।
*** ***
गुर्वा विधान जानने के लिए यहाँ क्लिक करें --->   गुर्वा विधान लिंक

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
11-04-21

Sunday, April 17, 2022

कुण्डलिया छंद

 कुण्डलिया छंद "विधान"


कुण्डलिया छंद दोहा छंद और रोला छंद के संयोग से बना विषम छंद है। इस छंद में ६ पद होते हैं तथा प्रत्येक पद में २४ मात्राएँ होती हैं। यह छंद दो छंदों के मेल से बना है जिसके पहले दो पद दोहा छंद के तथा शेष चार पद रोला छंद से बने होते हैं।

दोहा छंद एक अर्द्ध समपद छंद है। इसका हर पद यति चिन्ह द्वारा दो चरणों में बँटा होता है और दोनों चरणों का विधान एक दूसरे से अलग रहता है इसीलिए इसकी संज्ञा अर्द्ध समपद छंद है। इस प्रकार दोहा छंद के दोनों दल में चार चरण होते हैं। इसके प्रथम एवं तृतीय चरण यानी विषम चरण १३-१३ मात्राओं के तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण यानी सम चरण ११-११ मात्राओं के होते हैं। 

कुण्डलिया छंद में दोहे का चौथा चरण रोला छंद के प्रथम चरण में सिंहावलोकन की तरह यथावत दोहरा दिया जाता है। रोला छंद के प्रत्येक पद में २४ मात्राएँ होती हैं। चूँकि दोहे का चौथा चरण कुण्डलिया छंद में रोला के प्रथम चरण में यथावत रख दिया जाता है इसलिए इस छंद में रोला छंद के चारों पदों की सम रूपता बनाये रखने के लिए रोला के चारों विषम चरणों की यति ११वीं मात्रा पर रखनी आवश्यक है, साथ ही इस चरण का अंत भी ताल यानी गुरु लघु से होना आवश्यक है। 

वैसे तो रोला छंद की मात्रा बाँट तीन अठकल की है पर कुण्डलिया छंद में रोला की प्रथम यति ताल अंत (21) के साथ ११ मात्रा पर सुनिश्चित है जिसकी मात्रा बाँट ८-३(गुरु लघु) है। अतः बाकी बची १३ मात्राएँ केवल ३-२-८ की मात्रा बाँट में ही हो सकती हैं क्योंकि रोला छंद का दूसरा अठकल केवल ३-३-२ में ही विभक्त होगा। शायद इसी कारण से इसी मात्रा बाँट में रोला छंद आजकल रूढ हो गया है।

कुण्डलिया छंद का प्रारंभ जिस शब्द या शब्द-समूह से होता है, छंद का अंत भी उसी शब्द या शब्द-समूह से होता है। सोने में सुहागा तब है जब कुण्डलिया के प्रारंभ का और अंत का शब्द एक होते हुए भी दोनों जगह अलग अलग अर्थ रखता हो। साँप की कुण्डली की तरह रूप होने के कारण ही इसका नाम कुण्डलिया पड़ा है। मेरी एक स्वरचित कुण्डलिया:-

 *कुण्डलिया छंद* (चौपाल)

धोती कुर्ता पागड़ी, धवल धवल सब धार।
सुड़क रहे हैं चाय को, करते गहन विचार।।
करते गहन विचार, किसी की शामत आई।
बैठे सारे साथ, गाँव के बूढ़े भाई।।
झगड़े सब निपटाय, समस्या सब हल होती।
अद्भुत यह चौपाल, भेद जो सब ही धोती।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया

Thursday, April 14, 2022

बहाग बिहू 'मुक्तक'



कपौ कुसुम का पहने गजरा, पेंपा के स्वर गुंजायें।
नाच रही हैं झूम रही हैं, असम धरा की बालायें।
महक उठी है प्रकृति मनोहर, सतरंगी आभा बिखरी।
पर्व बहाग बिहू का आया, गीत सुहाने सब गायें।।

(लावणी छंद)

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
14.4.22

Saturday, April 9, 2022

ग़ज़ल (आज तक बस छला गया है मुझे)

बह्र:- 2122  1212  22

आज तक बस छला गया है मुझे,
दूर सच से रखा गया है मुझे।

गाम दर गाम ख्वाब झूठे दिखा,
रोज अब तक ठगा गया है मुझे।

अब इनायत सी लगती उनकी जफ़ा,
क्यों तु ग़म इतना भा गया है मुझे।

इंतज़ार उनका करते करते अब,
सब्र करना तो आ गया है मुझे।

उसने बस चार दिन पिलाई संग,
रोज का लग नशा गया है मुझे।

मेहमाँ बन कभी जो घर में बसा,
वो भिखारी बना गया है मुझे।

बेवफ़ाओं को जल्द भूल 'नमन',
सीख कोई सिखा गया है मुझे।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-10-18

Wednesday, April 6, 2022

वंशस्थ छंद

 वंशस्थ छंद "शीत-वर्णन"


तुषार आच्छादित शैल खण्ड है।
समस्त शोभा रजताभ मण्ड है।
प्रचण्डता भीषण शीत से पगी।
अलाव तापें यह चाह है जगी।।

समीर भी है सित शीत से महा।
प्रसार ऐसा कि न जाय ही सहा।
प्रवाह भी है अति तीव्र वात का।
प्रकम्पमाना हर रोम गात का।।

व्यतीत ज्यों ही युग सी विभावरी।
हरी भरी दूब तुषार से भरी।।
लगे की आयी नभ को विदारके।
उषा गले मौक्तिक हार धार के।।

लगा कुहासा अब व्योम घेरने।
प्रभाव हेमंत लगा बिखेरने।।
खिली हुई धूप लगे सुहावनी।
सुरम्य आभा लगती लुभावनी।।
===============

वंशस्थ छंद विधान -

"जताजरौ" द्वादश वर्ण साजिये।
 प्रसिद्ध 'वंशस्थ' सुछंद राचिये।।

"जताजरौ" = जगण, तगण, जगण, रगण
121  221  121  212

(वंशस्थ छंद के प्रत्येक चरण में 12 वर्ण की वर्णिक छंद है। दो दो या चारों चरण समतुकांत।) 
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया
12-01-19

Sunday, April 3, 2022

काव्य कौमुदी "होली विशेषांक"

 काव्य कुञ्ज पटल के साझा काव्य संग्रह "काव्य कौमुदी (होली विशेषांक)" के आभासी संस्करण में प्रकाशित मेरी रचना।

काव्य कौमुदी डाउनलोड लिंक:-


दोहे "होली"

होली के सब पे चढ़े, मधुर सुहाने रंग।
पिचकारी चलती कहीं, बाजे कहीं मृदंग।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
03.04.22

Monday, March 28, 2022

मुक्तक "बेवफाई"

शुरू बेवफ़ाई की जब भी, चर्चाएँ हो जाती हैं,
असफल प्रेम कथाओं की सब, यादें मन में छाती हैं,
इश्क़ मुहब्बत छोड़ और भी, ग़म दुनिया में हैं यारो,
आज बेवफ़ा नेताओं की, चालें कम न रुलाती हैं।

(ताटंक छंद)
*********

वार पीठ में करते देखा, लोगों को नज़दीकी से,
हुआ सामना तभी हमारा, दुनिया की तारीकी से,
देख बेवफ़ाई अपनों की, अश्क़ लहू के पीते हैं,
रंग बदलती इस दुनिया का, चखा स्वाद बारीकी से।

(ताटंक छंद)
*********

जो खाया जख्म अपनों से बताया भी नहीं जाता।
लगा है दिल के भीतर ये दिखाया भी नहीं जाता।
बड़ा बेचैन हूँ यारो करूँ भी तो करूँ क्या मैं।
कहीं अब और दुनिया छोड़ जाया भी नहीं जाता।।

(विधाता छंद वाचिक)
*********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
29-08-17

Thursday, March 24, 2022

त्रिभंगी छंद

 त्रिभंगी छंद "भारत की धरती"


भारत की धरती, दुख सब हरती, 
हर्षित करती, प्यारी है।
ये सब की थाती, हमें सुहाती, 
हृदय लुभाती, न्यारी है।।
ऊँचा रख कर सर, हृदय न डर धर, 
बसा सुखी घर, बसते हैं।
सब भेद मिटा कर, मेल बढ़ा कर, 
प्रीत जगा कर, हँसते हैं।।

उत्तर कशमीरा, दक्षिण तीरा, 
सागर नीरा, दे भेरी।।
अरुणाचल बाँयी, गूजर दाँयी, 
बाँह सुहायी, है तेरी।
हिमगिरि उत्तंगा, गर्जे गंगा, 
घुटती भंगा, मदमाती।।
रामेश्वर पावन, बृज वृंदावन, 
ताज लुभावन, है थाती।

संस्कृत मृदु भाषा, योग मिमाँसा, 
सारी त्रासा, हर लेते।
अज्ञान निपातन, वेद सनातन, 
रीत पुरातन, हैं देते।।
तुलसी रामायन, गीता गायन, 
दिव्य रसायन, हैं सारे।
पादप हरियाले, खेत निराले, 
नद अरु नाले, दुख हारे।।

नित शीश झुकाकर, वन्दन गाकर, 
जीवन पाकर, रहते हैं।
इस पर इठलाते, मोद मनाते, 
यश यह गाते, कहते हैं।।
नव युवकों आओ, आस जगाओ, 
देश बढ़ाओ, तुम आगे।
भारत की महिमा, पाये गरिमा, 
बढ़े मधुरिमा, सब जागे।।
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त्रिभंगी छंद विधान -

त्रिभंगी छंद प्रति पद 32 मात्राओं का सम पद मात्रिक छंद है। प्रत्येक पद में 10, 8, 8, 6 मात्राओं पर यति होती है। यह 4 पद का छंद है। प्रथम व द्वितीय यति समतुकांत होनी आवश्यक है। परन्तु अभ्यांतर समतुकांतता यदि तीनों यति में निभाई जाय तो सर्वश्रेष्ठ है। पदान्त तुकांतता दो दो पद की आवश्यक है।

प्राचीन आचार्य केशवदास, भानु कवि, भिखारी दास के जितने उदाहरण मिलते हैं उनमें अभ्यान्तर तुकांतता तीनों यति में है, परंतु रामचरित मानस में तुकांतता प्रथम दो यति में ही निभाई गई है। कई विद्वान मानस के इन छंदों को दंडकला छंद का नाम देते हैं जिसमें यति 10, 8, 14 मात्रा की होती है।

मात्रा बाँट निम्न प्रकार से है:-
प्रथम यति- 2+4+4
द्वितीय यति- 4+4
तृतीय यति- 4+4
पदान्त यति- 4+S (2)
चौकल में पूरित जगण वर्जित रहता है तथा चौकल की प्रथम मात्रा पर शब्द समाप्त नहीं हो सकता।

पदान्त में एक दीर्घ (S) आवश्यक है लेकिन दो दीर्घ हों तो सौन्दर्य और बढ़ जाता है।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया
18-02-18

Saturday, March 19, 2022

हाइकु विधा

हाइकु विधा "विविध"

है रूखापन
तृषित तभी तन
रोता है मन।
**

सीने जगत
भाई भतीजावाद
खूब पलता
**

बजायी बीन
हैं जुगाली में लीन
हृदय-हीन।
**

तृण बिखरे
कूड़ा पसरे, जुड़े
घर निखरे।
**

हाइकु विधा - हाइकु सत्रह (१७) अक्षर में लिखी जाने वाली सबसे छोटी कविता है। इसमें तीन पंक्तियाँ रहती हैं। प्रथम पंक्ति में ५ अक्षर, दूसरी में ७ और तीसरी में ५ अक्षर रहते हैं। संयुक्त अक्षर को एक अक्षर गिना जाता है, जैसे 'सुगन्ध' में तीन अक्षर हैं - सु-१, ग-१, न्ध-१) तीनों वाक्य अलग-अलग होने चाहिए। अर्थात एक ही वाक्य को ५,७,५ के क्रम में तोड़कर नहीं लिखना है। बल्कि तीन पूर्ण पंक्तियाँ हों।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
13-11-2020

Tuesday, March 15, 2022

शिखरिणी छंद

 शिखरिणी छंद "भारत वंदन"


बड़ा ही प्यारा है, जगत भर में भारत मुझे।
सदा शोभा गाऊँ, पर हृदय की प्यास न बुझे।।
तुम्हारे गीतों को, मधुर सुर में गा मन भरूँ।
नवा माथा मेरा, चरण-रज माथे पर धरूँ।।

यहाँ गंगा गर्जे, हिमगिरि उठा मस्तक रखे।
अयोध्या काशी सी, वरद धरणी का रस चखे।।
यहाँ के जैसे हैं, सरित झरने कानन कहाँ।
बिताएँ सारे ही, सुखमय सदा जीवन यहाँ।।

दया की वीणा के, मुखरित हुये हैं स्वर जहाँ।
सभी विद्याओं में, अति पटु रहे हैं नर जहाँ।।
उसी की रक्षा में, तन मन लगा तत्पर रहूँ।
जरा भी बाधा हो, अगर इसमें तो हँस सहूँ।।

खुशी के दीपों की, जगमग यहाँ लौ नित जगे।
हमें प्राणों से भी, अधिक प्रिय ये भारत लगे।।
प्रतिज्ञा ये धारूँ, दुखित जन के मैं दुख हरूँ।
इन्हीं भावों को ले, 'नमन' तुम को अर्पित करूँ।।
=================

शिखरिणी छंद विधान -

रखें छै वर्णों पे, यति "यमनसाभालग" रचें।
चतुष् पादा छंदा, सब 'शिखरिणी' का रस चखें।।

"यमनसाभालग" = यगण, मगण, नगण, सगण, भगण लघु गुरु ( कुल 17 वर्ण की वर्णिक छंद।)

122  222,  111  112  211 12

(शिव महिम्न श्लोक इसी छंद में है।)
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया
08-01-2019

Saturday, March 12, 2022

ग़ज़ल (बदगुमानी की अब इंतिहा चाहिए)

बह्र:- 212*4

बदगुमानी की अब इंतिहा चाहिए,
ज़िंदगी की नयी इब्तिदा चाहिए।

लू सी नफ़रत की झेलीं बहुत आँधियाँ,
ठंड दे अब वो बाद-ए-सबा चाहिए।

मेरी नाकामियों से भरी कश्ती को,
पार कर दे वो अब नाखुदा चाहिए।

राह-ए-उल्फ़त में अब तक मिलीं ठोकरें,
इश्क़ का आखिरी मरहला चाहिए।

देश का और खुद का उठा सर चलूँ,
दिल में वैसी ही मुझको अना चाहिए।

नेस्तनाबूद दुश्मन को करते समय,
जान दे मैं सकूँ वो कज़ा चाहिए।

पेश सबसे मुहब्बत से आया 'नमन',
कुछ तो उसको भी इसका सिला चाहिए।

बदगुमानी- सन्देह परक दृष्टि, असंतुष्टि
बाद-ए-सबा- पुरवाई
नाखुदा- मल्लाह, नाविक
मरहला- मंजिल, पड़ाव
अना- आत्म गौरव

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
11-06-19

Tuesday, March 8, 2022

तोमर छंद

तोमर छंद "अव्यवस्था"


हर नगर है बदहाल।
अब जरा देख न भाल।।
है व्यवस्था लाचार।
दिख रही चुप सरकार।।

वाहन खड़े हर ओर।
चरते सड़क पर ढोर।।
कुछ बची शर्म न लाज।
हर तरफ जंगल राज।।

मन मौज में कुछ लोग।
हर चीज का उपयोग।।
वे करें निज अनुसार।
बन कर सभी पर भार।।

ये दौड़ अंधी आज।
जा रही दब आवाज।।
आराजकों का शोर।
बस अब दिखाये जोर।।
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तोमर छंद विधान -

यह 12 मात्रा का सम-पद मात्रिक छंद है। अंत ताल (21) से आवश्यक। इसकी मात्रा बाँट:- द्विकल-सप्तकल-3 (केवल 21)
(द्विकल में 2 या 11 मान्य तथा सप्तकल का 1222, 2122, 2212,2221 में से कोई भी रूप हो सकता है।)

चार चरण। दो दो समतुकांत।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया
21-09-19

Wednesday, February 23, 2022

सेदोका-विधान

 सेदोका विधान -

सेदोका कविता कुल छह पंक्तियों की जापानी विधा की रचना है। इसमें प्रति पंक्ति निश्चित संख्या में वर्ण रहते हैं। सेदोका कविता दो 'कतौता' के मेल से बनती है। कतौता 5,7,7 वर्ण प्रति पंक्ति के क्रम में तीन पंक्ति की रचना है। एक पूर्ण सेदोका में निम्न क्रम में वर्ण रहते हैं।

प्रथम पंक्ति - 5 वर्ण
द्वितीय पंक्ति - 7 वर्ण
तृतीय पंक्ति - 7 वर्ण

चतुर्थ पंक्ति - 5 वर्ण
पंचम पंक्ति - 7 वर्ण
षष्ठ पंक्ति - 7 वर्ण

(वर्ण गणना में लघु, दीर्घ और संयुक्ताक्षर सब मान्य हैं। अन्य जापानी विधाओं की तरह ही सेदोका छंद में भी पंक्तियों की स्वतंत्रता निभाना अत्यंत आवश्यक है। हर पंक्ति अपने आप में स्वतंत्र हो परंतु कविता को एक ही भाव में समेटे अग्रसर भी करती रहे।)
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

Friday, February 18, 2022

चौपाई छंद

 चौपाई छंद विधान

चौपाई छंद 16 मात्रा का बहुत ही व्यापक छंद है। यह चार चरणों का सम मात्रिक छंद है। चौपाई के दो चरण अर्द्धाली या पद कहलाते हैं। जैसे-

"जय हनुमान ज्ञान गुण सागर। जय कपीश तिहुँ लोक उजागर।।"

ऐसी चालीस अर्द्धाली की रचना चालीसा के नाम से प्रसिद्ध है। इसके एक चरण में आठ से सोलह वर्ण तक हो सकते हैं, पर मात्राएँ 16 से न्यूनाधिक नहीं हो सकती। दो दो चरण समतुकांत होते हैं। चरणान्त गुरु या दो लघु से होना आवश्यक है।

चौपाई छंद चौकल और अठकल के मेल से बनती  है। चार चौकल, दो अठकल या एक अठकल और  दो चौकल किसी भी क्रम में हो सकते हैं। समस्त संभावनाएँ निम्न हैं।
4-4-4-4, 8-8, 4-4-8, 4-8-4, 8-4-4

चौपाई में कल निर्वहन केवल चतुष्कल और अठकल से होता है। अतः एकल या त्रिकल का प्रयोग करें तो उसके तुरन्त बाद विषम कल शब्द रख समकल बना लें। जैसे 3+3 या 3+1 इत्यादि। चौकल और अठकल के नियम निम्न प्रकार हैं जिनका पालन अत्यंत आवश्यक है।

चौकल = 4 - चौकल में चारों रूप (11 11, 11 2, 2 11, 22) मान्य रहते हैं।

(1) चौकल में पूरित जगण (121) शब्द, जैसे विचार महान उपाय आदि नहीं आ सकते। 
(2) चौकल की प्रथम मात्रा पर कभी भी शब्द समाप्त नहीं हो सकता। 
चौकल में 3+1 मान्य है परन्तु 1+3 मान्य नहीं है। जैसे 'व्यर्थ न' 'डरो न' आदि मान्य हैं। 'डरो न' पर ध्यान चाहूँगा 121 होते हुए भी मान्य है क्योंकि यह पूरित जगण नहीं है। डरो और न दो अलग अलग शब्द हैं। वहीं चौकल में 'न डरो' मान्य नहीं है क्योंकि न शब्द चौकल की  प्रथम मात्रा पर समाप्त हो रहा है।

3+1 रूप खंडित-चौकल कहलाता है जो चरण के आदि या मध्य में तो मान्य है पर अंत में मान्य नहीं है। 'डरे न कोई' से चरण का अंत हो सकता है 'कोई डरे न' से नहीं।

अठकल = 8 - अठकल के दो रूप हैं। प्रथम 4+4 अर्थात दो चौकल। दूसरा 3+3+2 है जिसमें त्रिकल के तीनों (111, 12 और 21) तथा द्विकल के दोनों रूप (11 और 2) मान्य हैं।

(1) अठकल की 1 से 4 मात्रा पर और 5 से 8 मात्रा पर पूरित जगण - 'उपाय' 'सदैव 'प्रकार' जैसा शब्द नहीं आ सकता।
(2) अठकल की प्रथम और पंचम मात्रा पर शब्द कभी भी समाप्त नहीं हो सकता। 'राम नाम जप' सही है जबकि 'जप राम नाम' गलत है क्योंकि राम शब्द पंचम मात्रा पर समाप्त हो रहा है।   

पूरित जगण अठकल की तीसरी या चौथी मात्रा से ही प्रारंभ हो सकता है क्योंकि 1 और 5 से वर्जित है तथा दूसरी मात्रा से प्रारंभ होने का प्रश्न ही नहीं है, कारण कि प्रथम मात्रा पर शब्द समाप्त नहीं हो सकता।  'तुम सदैव बढ़' में जगण तीसरी मात्रा से प्रारंभ हो कर 'तुम स' और 'दैव' ये दो त्रिकल तथा 'बढ़' द्विकल बना रहा है।
'राम सहाय न' में जगण चौथी मात्रा से प्रारंभ हो कर 'राम स' और 'हाय न' के रूप में दो खंडित चौकल बना रहा है।

एक उदाहरणार्थ रची चौपाई में ये नियम देखें-
"तुम गरीब से रखे न नाता।
बने उदार न हुये न दाता।।"

"तुम गरीब से" अठकल तथा तीसरी मात्रा से जगण प्रारंभ।
"रखे न" खंडित चौकल "नाता" चौकल। "नाता रखे न" लिखना गलत है क्योंकि खंडित चौकल चरण के अंत में नहीं आ सकता।
"बने उदार न" अठकल तथा चौथी मात्रा से जगण प्रारंभ।

किसी भी गंभीर सृजक का चौपाई छंद पर अधिकार होना अत्यंत आवश्यक है। आल्हा छंद, ताटंक छंद, लावणी छंद, सार छंद, सरसी छंद इत्यादि प्रमुख छंदों का आधार चौपाई ही है क्योंकि इन छंदों के पद का प्रथम 16 मात्रिक चरण चौपाई छंद का ही चरण है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया
16-03-19

Saturday, February 12, 2022

काव्य कौमुदी "साझा काव्य संग्रह"

काव्य कुञ्ज पटल के साझा काव्य संग्रह काव्य कौमुदी के आभासी संस्करण में प्रकाशित मेरी रचनाएँ।

काव्य कौमुदी डाउनलोड लिंक:-


बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया



Friday, February 11, 2022

ग़ज़ल (मुस्कुराता ही रहे बाग़ में)

बह्र:- 2122  1122  1122  22

मुस्कुराता ही रहे बाग़ में गुल खिल तन्हा,
फ़िक्र क्या ज़िंदगी में तू है अगर दिल तन्हा।

मुश्किलें सामने आयीं तो गये छोड़ सभी,
रह गया मैं ही ज़माने के मुक़ाबिल तन्हा।

बज़्म-ए-दुनिया की तो रौनक़ ही मेरे यारों से,
गर नहीं साथ वे लगती भरी महफ़िल तन्हा।

खुद की हिम्मत ही नहीं साथ तो क्या दुनिया करे,
हौसला गर है तो सब हो सके हासिल तन्हा।

पास में नाव न, पतवार न, तूफाँ है ज़बर,
तैर कर ढूंढ़ना हम को ही है साहिल तन्हा।

अपनी नफ़रत को जो अंज़ाम दे बंदूकों से,
खुद भी दहशत में वे रह मरते हैं तिल तिल तन्हा।

खून खुद का ही मैं कर बैठा हूँ फँस दुनिया में,
मर गया कब का 'नमन' रह गया क़ातिल तन्हा।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
01-10-19

Wednesday, February 9, 2022

निधि छंद

 निधि छंद "सुख-सार"

उनका दे साथ।
जो लोग अनाथ।।
ले विपदा माथ।
थामो तुम हाथ।।

दुखियों के कष्ट।
कर दो तुम नष्ट।।
नित बोलो स्पष्ट।
मत होना भ्रष्ट।।

मन में लो धार।
अच्छा व्यवहार।।
मत मानो हार।
दुख कर स्वीकार।।

जग की ये रीत।
सुख में सब मीत।।
दुख से कर प्रीत।
लो जग को जीत।।

जीवन का भार।
चलना दिन चार।।
अटके मझधार।
कैसे हो पार।।

कलुष घटा घोर।
तम चारों ओर।।
दिखता नहिं छोर।
कब होगी भोर।।

आशा नहिं छोड़।
भाग न मुख मोड़।।
साधन सब जोड़।
निकलेगा तोड़।।

सच्ची पहचान।
बन जा इंसान।।
जग से पा मान।
ये सुख की खान।।
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निधि छंद विधान -

यह नौ मात्रा का सम मात्रिक चार चरणों का छंद है। इसका चरणान्त ताल यानी गुरु लघु से होना आवश्यक है। बची हुई 6 मात्राएँ छक्कल होती हैं।  तुकांतता दो दो चरण या चारों चरणों में समान रखी जाती है।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया
19-07-16 

Thursday, February 3, 2022

स्रग्धरा छंद

    स्रग्धरा छंद "शिव स्तुति"

शम्भो कैलाशवासी, सकल दुखित की, पूर्ण आशा करें वे।
भूतों के नाथ न्यारे, भव-भय-दुख को, शीघ्र सारा हरें वे।।
बाघों की चर्म धारें, कर महँ डमरू, कंठ में नाग साजें।
शाक्षात् हैं रुद्र रूपी, मदन-मद मथे, ध्यान में वे बिराजें।।

गौरा वामे बिठाये, वृषभ चढ़ चलें, आप ऐसे दुलारे।
माथे पे चंद्र सोहे, रजत किरण से, जो धरा को सँवारे।।
भोले के भाल साजे, शुचि सुर-सरिता, पाप की सर्व हारी।
ऐसे न्यारे त्रिनेत्री, विकल हृदय की, पीड़ हारें हमारी।।

काशी के आप वासी, शुभ यह नगरी, मोक्ष की है प्रदायी।
दैत्यों के नाशकारी, त्रिपुर वध किये, घोर जो आततायी।।
देवों की पीड़ हारी, भयद गरल को, कंठ में आप धारे।
देवों के देव हो के, परम पद गहा, सृष्टि में नाथ न्यारे।।

भक्तों के प्राण प्यारे, घट घट बसते, दिव्य आशीष देते।
भोलेबाबा हमारे, सब अनुचर की, क्षेम की नाव खेते।।
कापाली शूलपाणी, असुर लख डरें, भक्त का भीत टारे।
हे शम्भो 'बासु' माथे, वरद कर धरें, आप ही हो सहारे।।

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स्त्रग्धरा छंद विधान -

"माराभाना ययाया", त्रय-सत यति दें, वर्ण इक्कीस या में।
बैठा ये सूत्र न्यारा, मधुर रसवती, 'स्त्रग्धरा' छंद राचें।।

"माराभाना ययाया"= मगण, रगण, भगण, नगण, तथा लगातार तीन यगण।
222  212  2,11  111  12,2  122  122 =  कुल 21 वर्ण की वर्णिक छंद।
त्रय-सत यति दें= सात सात वर्ण पर यति।
चार पद, दो दो पद समतुकांत।

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बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया