Friday, July 26, 2024

लज्जा (कुण्डलिया छंद)

लज्जा मंगलसूत्र सी, सदा धार के राख।
लाज गई तो नहिँ बचे, यश, विवेक अरु साख।
यश, विवेक अरु साख, उचित, अनुचित नहिँ जाने।
मद में हो नर चूर, जरा संकोच न माने।
कहे 'बासु' कविराय, करो जितनी भी सज्जा।
सब कुछ है बेकार, नहीं जब मन में लज्जा।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया
21-10-2016

Friday, July 19, 2024

"हिमालय है आज भारत की कथा कह रहा"

प्रज्वलित दीप सा जो तिल तिल जल रहा
जग के निकेतन को आलोकित जो कर रहा
देश के वो भाल पर अपना मुकुट सजा
फहराये वो विश्व में भारत के यश की ध्वजा
शिवजी के पुण्य धाम में ये दीप जल रहा।
हिमालय है आज भारत की कथा कह रहा।1।

खड़ा है अटल बन देश का वो भाल बन
शीत ताप सहता हुवा जल रहा मशाल बन
आँधियाँ प्रचण्ड सह तूफान को वो अंक ले
तड़ित उपल वृष्टि थाम हृदय में उमंग ले
झंझावातों में भी आज अनवरत जल रहा।
हिमालय है आज भारत की कथा कह रहा।2।

जगद्गुरु के यश को जग में है गा रहा
सर्वोच्च बन के महिमा देश की दर्शा रहा
जग को आलोक दे सभ्यता का दीप यह
ज्ञान का प्रकाश दे अखिल संसार को यह
उन्नत शीखर का दीप जग तम हर रहा।
हिमालय है आज भारत की कथा कह रहा।3।

उत्तर की दीवाल यह जग से देश दूर रख
कोटि कोटि जनों को अपनी ही गोद में रख
स्वयं गल करके भी देश को यह प्राण दे
शत्रु सेना के भय से देश को यह त्राण दे
सर्वस्व लूटा करके भी देश को बचा रहा।
हिमालय है आज भारत की कथा कह रहा।4।

सर्व रत्न की खान देश का है यह प्राण
गंगा यमुना का जनक देश का महान मान
ऋषि मुनियों का समाधि स्थल भी है यह
देव संस्कृति और सभ्यता का कोष यह
अक्षय कोष देश का यह सर्वदा बचा रहा।
हिमालय है आज भारत की कथा कह रहा।5।

महान दीप की शिखा एक वस्तु मांग रही
देश के वीर पतंगों को पुकार के बुला रही
एक एक जल के जो निज प्राण आहुति दे
देश रक्षार्थ निज को दीप शिखा में झोंक दे
वीरों के बलिदान से ही यह आज बच रहा।
हिमालय है आज भारत की कथा कह रहा।6।

स्वयं जल करके जो देश को बचा रहा
अपने तन के वारि से देश को है सींच रहा
उसकी रक्षा में उठना क्या हमारा धर्म नहीं
उसके लिये प्राण देना क्या हमारा कर्म नहीं
हमरे तन के स्वेद से यह दीप जल रहा।
हिमालय है आज भारत की कथा कह रहा।7।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
24-05-1970

Wednesday, July 10, 2024

दोहा छंद (मानस विविध प्रसंग)

दोहा छंद 
(मानस विविध प्रसंग)


तार अहिल्या राम ने, किया बहुत उपकार।
शरणागतवत्सल हरी, जग में जय जय कार।।

मुनि वशिष्ठ सर नाय के, किये राम प्रस्थान।
संग लखन अरु जानकी, अद्भुत रघुकुल आन।।

भरत अनुज सह वन रहें, अवध चलें रघुराय।
राजतिलक हो राम का, कहि वशिष्ठ समुझाय।।

परखें जग इन चार सिय, आपद जब सिर आय। 
दार मित्र धीरज धरम, कह अनुसुइया माय।।

परखन महिमा राम की, सुरपति तनय जयंत।
मार चोंच सिय-पद मृदुल, बीन्धा अधम असंत।।

अभिमंत्रित कर सींक सर, छोड़े श्री रघुराय।
लक्ष्य अधम सुरपति तनय, काना दिया बनाय।।

पाय रजायसु राम की, लखन चले तत्काल।
इंद्रजीत का वध करन, बन कर काल कराल।।

केवट की ये कामना, हरि-पद करूं पखार।
बोला धुलवाएँ चरण, फिर उतरें प्रभु पार।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया
20-02-17

Tuesday, July 2, 2024

"ईश गरिमा"

ईश तुम्हारी सृष्टि की महिमा है बड़ी निराली;
कहीं शीत है कहीं ग्रीष्म है कहीं बसन्त की लाली ।
जग के जड़ चेतन जितने हैं सब तेरे ही कृत हैं;
जो तेरी छाया से वंचित अस्तित्व रहित वो मृत है ।।1।।

कलकल करती सरिता में तेरी निपुण सृष्टि है;
अटल खड़े शैल पर भी तेरी आभा की दृष्टि है ।
अथाह उदधि की उत्ताल तरंगों में तु नीहित है;
भ्रमणशील भू देवी भी तुझसे ही निर्मित है ।।2।।

अथाह अनंत अपार अम्बर की नील छटा में;
निशि की निरवता में काली घनघोर घटा में ।
तारा युक्त चीर से शोभित मयंक मयी रजनी में;
तु ही है शीतल शशि में अरु चंचल चपल चांदनी में ।।3।।

प्राची दिशि की रम्य अरुणिमा में उषा की छवि की;
रक्तवर्ण वृत्ताकृति सुंदरता में बाल रवि की ।
अस्ताचल जाते सन्ध्या में लालिम शांत दिवाकर की;
किरणों में तु ही नीहित है प्रखर तप्त भाष्कर की ।।4।।

हरे भरे मैदानों में अरु घाटी की गहराई में;
कोयल की कुहु से गूँजित बासन्ती अमराई में ।
अन्न भार से झुकी हुई खेतों की विकसित फसलों में; 
तेरा ही चातुर्य झलकता कामधेनु की नसलों में ।।5।।

विस्तृत एवम् स्वच्छ सलिल से भरे हुए ये सरोवर;
लदे हुए पुष्पों के गुच्छों से ये सुंदर तरुवर ।
घिरे हुए जो कुमुद समूह से ये मन्जुल शतदल;
तेरी ही आभा के द्योतक पुष्पित गुलाब अति कल ।।6।।

अथाह अनंत सागर की उफान मारती लहरों में;
खेतों में रस बरसाती नदियों की मस्त बहारों में ।
समधुर तोय से भरे पूरे इस धरा के सुंदर सोतों में;
दृष्टिगोचर होती है तेरी ही आभा खेतों में ।।7।।

मदमत्त मनोहर गजराज की मतवाली चालें:
बल विक्रम से शोभित वनराज की उच्च उछालें ।
चंचल हिरणी की आँखों में यह मा की ममता:
तुझसे ही तो शोभित है सब जीवों की क्षमता ।।8।।

हे ईश्वर हे परमपिता हे दीनबन्धु हितकारक;
तेरी कृतियों का बखान करना है कठिन ओ' पालक ।
तुझसे ही तो निर्मित है अखिल जगत सम्पूर्ण चराचर;
तुझसे जग का पालन होता तुझसे ही होता संहार ।।9।।

खिल जाए मेरी मन की वाटिका में भावों के प्रसून;
कर सकूँ काव्य रचना मैं जिनसे हो भावों में तल्लीन ।
ये मनोकामना पूर्ण करो हे ईश मेरी ये विनती;
तेरे उपकारों की मेरे पास नहीं कोई गिनती ।।10।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
07-05-1970

Wednesday, June 26, 2024

राखी (कुण्डलिया छंद)

राखी का त्योहार है, भ्रात बहन का प्यार।
बहना राखी बाँधती, भाई करे दुलार।
भाई करे दुलार, वचन रक्षा का देता।
जीवन भर का बोझ, बहन का काँधे लेता।
कहे 'बासु' कविराय, डोर रक्षा की साखी।
बंधन सदा अटूट, बँधी जो कर में राखी।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया
17-08-2016

Wednesday, June 19, 2024

"आँसू"

मानस के गहरे घावों को स्मर,
जो अनवरत है रोती।
उसी हृदय की टूटी माला के,
बिखरे हुये ये मोती।।1।।

मानस सागर की लहरों के,
ये आँसू फेन सदृश हैं।
लोक लोचन समक्ष ये आँसू पर,
इनके भाव अदृश हैं।।2।।

करुण हृदय के गम्भीर भाव के,
ये रूप हैं अति साकार।
उस भाग्यहीन माँ के अश्रु ये,
दुःख है जिसका निराकार।।3।।

वह भाग्यवती गृह रमणी सुंदर,
जिसकी दुनिया सम्पन्न थी।
थे जग के सब वैभव प्राप्य उसे,
गृह में उसकी कम्पन थी।।4।।

उस सम्पन्ना का था एक सहारा,
था अनुरूप उसके सब भाँति।
जीवन में थी उनके हरियाली,
छिटकी हुयी थी कीर्ति कांति।।5।।

उन दोनों के जीवन मध्य एक,
विकशित था जीवन बिंदु।
मोहित करता उनको क्रीडा से,
वह रजनी का कल इंदु।।6।।

बीता रही थी उनका यह जीवन,
सुंदर सुंदर कल क्रीडा।
उनसे हो क्रूर विधाता वाम,
ला दी जीवन मे भीषण पीड़ा।।7।।

हा छीन लिया उस रमणी से,
उसका जीवन धन समस्त।
धुल गया सुहाग का सिन्दूर,
हुवा कांति का सूर्य अस्त।।8।।

पर एक वर्ष भी बीत न पाया,
उस सुहाग को लुटे हुये।
दूजी बड़ विपदा ने आ घेरा,
दुःख की सेना लिये हुये।।9।।

जो उगा हुवा था नव मयंक,
बिखेर रहा था शुभ्र प्रकाश।
पर वाम विधाता भेज राहु को,
करवा डाला उसका ह्रास।।10।।

उसी समय से दुखिया के जीवन में,
छाया कष्टों का तूफान।
संगी साथी सब त्याग चले,
अब जीवन बना वीरान।।11।।

अब हर गली द्वार वह भटक भटक,
करती इस पीड़ा का स्मरण।
उस विकशित जीवन की यादों में,
ढुलका देती दो अश्रु कण।।12।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
1970 की लिखी कविता 

Monday, June 10, 2024

दोहे (धन तेरस)

धनतेरस का पुण्य दिन, जग में बड़ा अनूप।
रत्न चतुर्दश थे मिले, वैभव के प्रतिरूप।।

आज दिवस धनवंतरी, लाए अमरित साथ।
रोग विपद को टालते, सर पे जिसके हाथ।।

देव दनुज सागर मथे, बना वासुकी डोर।
मँदराचल थामे प्रभू, कच्छप बन अति घोर।।

प्रगटी माता लक्षमी, सागर मन्थन बाद।
धन दौलत की दायनी, करें भक्त नित याद।।

शीतल शशि उस में मिला, शंभु धरे वह माथ।
धन्वन्तरि थे अंत में, अमिय कुम्भ ले हाथ।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया
28-10-2016

Wednesday, June 5, 2024

"भारत यश गाथा"

ज्ञान राशि के महा सिन्धु को,
तमपूर्ण जगत के इंदु को,
पुरा सभ्यता के केंद्र बिंदु को,
नमस्कार इसको मेरे बारम्बार ।
रूप रहा इसका अति सुंदर,
है वैभव इसका जैसा पुरंदर,
स्थिति भी ना कम विस्मयकर,
है विधि का ये पावन पुरस्कार ।।1।।

प्रकाशमान किया विश्वाम्बर,
अनेकाब्दियों तक आकर,
इसका सभ्य रूप दिवाकर,
छाई इसकी पूरे भूमण्डल में छवि ।
इसका इतिहास अमर है,
इसका अति तेज प्रखर है,
इसकी प्रगति एक लहर है,
ज्ञान काव्य का है प्रकांड कवि ।।2।।

रहस्यों से है ना वंचित,
कथाओं से भी ना वंचित,
अद्भुत है न अति किंचित्,
सुंदर इसका भारत अभिधान ।
शकुंतला दुष्यंत का पुत्र रत्न,
धीर वीर सर्व गुण सम्पन्न,
गूंजा जिसका रण में कम्पन,
भरत भूप पर इसका शुभ नाम ।।3।।

ऋषभदेव का पुत्र विख्याता,
जड़ भरत नाम जिसका जग गाता,
उससे भी है इसका नाता,
केवल नाम मात्र इतना महान ।
इस धरा के रंग मंच पर,
प्रगटे अनेक वीर नर वर,
जिनकी पुन्य पताका रही फहर,
जग गाता आज उनका गुणगान ।।4।।

सम्राटों की दानशीलता,
उनकी शरणागतवत्सलता,
उनकी प्रजा हित चिन्तकता,
है सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में चमक रही ।
भगवन को भी यह भाया,
समस्त संसार को बिसराया,
अपना यहाँ धाम बसाया,
की मुक्त असुर भार से अखिल मही ।।5।।

प्राकृतिक दशा भी ना कम है,
इतिहास से अग्र दो कदम है,
जग से दूर इसका जन्म है,
विश्व में इसका एक अलग अस्तित्व ।
उत्तर में गिरिराज हिमांचल,
धवल रूप फैलाता आँचल,
रूप श्रेणियों का अति चँचल,
देश पर इसका गम्भीर महत्व ।।6।।

दक्षिण में इसका चाकर,
बना हुआ पावन रत्नाकर,
धन्य देश उसको पाकर,
सिंचित करती इसकी जलधारा ।
स्वर्ग द्वार की शुभ सोपान,
महेश जटा की शुभ शान,
सुरसरिता जैसी नदी महान,
बहती इसमें पाप पुञ्ज हारा ।।7।।

यमुना की वह पावन गूँज,
कावेरी के मनमोहक कुंज,
नदियों के बलखाते पुञ्ज,
छाए हुए इस धरती के ऊपर ।
झरनों की सुंदर झरझर,
झीलों की वह शोभा प्रखर,
नदियों की मतवाली लहर,
गूँजाती इसका नभ आठों पहर ।।8।।

मधुपरियों का मोहक स्वांग,
मधुकर का नित गुंजित राग,
पुष्पों के मधु पूरित पराग,
हर कोने में सुरभित फैलाते।
फल लदे पादप अनेक,
वृक्षावेष्टित लता प्रत्येक,
केशर क्यारी एक एक,
सब घाटी के धरातल को सजाते ।।9।।

मानसरोवर के हँस धवल,
कैलाश की शोभा नवल,
हिममंडित श्रेणियाँ प्रबल,
है पावन स्वर्ग के शाक्षात द्वार ।
प्रकृति का हम पर आभार,
करती यहाँ वह षट् श्रृंगार,
ऋतुएँ देती अलग संसार,
नवल रूप से आकर हर बार ।।10।।

अल्प नहीं राजबाला से,
गीत सुने सरिता वीणा से,
अभय है तुंग शैल रक्षा से,
भारत भूमि का धरातल पावन ।
प्रकृति जिसकी स्वयं सहचरी,
फलदायिनी वाँछाकारी,
सिंचन करता सागर वारि,
वस्त्र बनाती हरियाली मनभावन ।।11।।

जिसकी धरा इतनी विकशित,
वसुधा जिसकी वैभव से सित,
धरती जिसकी इतनी प्रफुल्लित,
कम क्यों होंगे उस माता के जन ।
पुत्रों में रहा स्वाभिमान,
मातृभूमि पर रहा अभिमान,
विजयी बनी इसकी सुसंतान,
वीर पुत्र रहे वैभव से सम्पन्न ।।12।।

मानवता के रहे पूजारी,
सत्यव्रत के पालनकारी,
शरणागत के कष्टनहारी,
रहे भूप यहाँ के प्रजापालक ।
नृप थे इतने औजवान्,
भूप थे इतने वीर्यवान्,
नरेश थे इतने शौर्यवान्,
जिनकी शरण चाहता सुर पालक ।।13।।

बने हरिश्चंद्र चाण्डाल भृत्य,
प्राण त्याग शिवि हुए कृत कृत्य,
अस्थिदान किए मुनि ये सत्य,
दान प्रियता शरणागत रक्षा कारण ।
भिक्षु बना अशोक सम्राट,
भर्तरी त्यागा राजपाट,
पांडव भटके घाट घाट,
भटके रघुनंदन पितु आज्ञा कारण ।।14।।

जग गाता इसका गुणगान,
यह है सर्वरतन की खान,
इसका गौरव अति महान,
रक्षा पाते यहाँ दीन दुखी अति आरत ।
करें देश सेवा हो निश्चल,
रिपु मन में मचा दें हलचल,
यह संकल्प हमारा हो अटल,
प्राणों से हो उच्च हमारा भारत ।।15।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
1970 की लिखी कविता 

Tuesday, May 21, 2024

चन्द्र शेखर आज़ाद (मुक्तक)

         

(चन्द्र शेखर आज़ादजी की पुण्य तिथि पर। जन्म 1906।)

तुम शुभ्र गगन में भारत के, चमके जैसे चन्दा उज्ज्वल।
ऐंठी मूंछे, चोड़ी छाती, आज़ाद खयालों के प्रतिपल।
अंग्रेजों को दहलाया था, दे अपना उत्साही यौवन।
हे शेखर! 'नमन' तुम्हें शत शत, जो खिले हृदय में बन शतदल।।

(मत्त सवैया आधारित)

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया 

Tuesday, May 14, 2024

योग-महिमा (कुण्डलिया)

योग साधना देन है, भारत की अनमोल।
मन को उत्साहित करे, काया करे सुडोल।
काया करे सुडोल, देन ऋषियों की भारी।
रखे देह से दूर, रोग की विपदा सारी।
निर्मल करती गात, शुद्ध यह करे भावना।
कहे 'बासु' कविराय, करो नित योग साधना।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया
21-06-2016

Tuesday, May 7, 2024

"ग्रीष्म वर्णन"

प्रसारती आज गर्मी पूर्ण बल को
तपा रही है आज पूरे अवनि तल को।
दर्शाते हुए उष्णता अपनी प्रखर
झुलसा रही वसुधा को लू की लहर।।1।।

तप्त तपन तप्त ताप राशि से अपने
साकार कर रहा है प्रलय सपने।
भाष्कर की कोटि किरणें भी आज
रोक रही भूतल के सब काम काज।।2।।

कर रहा अट्टहास ग्रीष्म आज जग में
बहा रहा पिघले लावे को रग रग में।
समेटे अपनी हंसी में जग रुदन
कर रहा तांडव नृत्य हो खुद में मगन।।3।।

व्यथा से व्याकुल हो रहा भू जन
ठौर नहीं छुपाने को कहीं भी तन।
त्याग आवश्यक कार्य कलाप वह सब
व्यथा सागर में डूबा हुआ है यह भव।।4।।

झुलसती भू सन्तान ग्रीष्म प्रभाव से
द्रुम लतादिक भी बचे न इसके दाव से।
झुलसाते असहाय विटप समूह को
बह रहा आतप ले लू समूह को।।5।।

हो विकल पक्षी भटक रहे पुनि पुनि
त्याग कल क्रीड़ा अरु समधुर धुनि।
अनेक पशु टिक अपने लघु आवास में
टपका रहे विकलता हर श्वास में।।6।।

शुष्क हुए सर्व नदी नद कूप सर
दर्शाता जलाभाव तपन ताप कर।
अति व्यथित हो इस सलिल अभाव से
बन रहे जन काल ग्रास इस दाव से।।7।।

खौला उदधि जल को भीषण ताप से
झुलसा जग जन को इस संताप से।
मुदित हो रहा ग्रीष्म अपने भाव में
न नाम ले थमने का अपने चाव में।।8।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
1970 की लिखी कविता

Thursday, May 2, 2024

अयोध्या मंदिर निर्माण (दोहे)

 दोहा छंद

अवधपुरी भगवा हुई, भू-पूजन की धूम।
भारतवासी के हृदय, आज रहे हैं झूम।।

दिव्य अयोध्या में बने, मंदिर प्रभु का भव्य।
सकल देश का स्वप्न ये, सबका ही कर्तव्य।।

पाँच सदी से झेलते, आये प्रभु वनवास।
असमंजस के मेघ छँट, पूर्ण हुई अब आस।।

मन में दृढ संकल्प हो, कछु न असंभव काम।
करने की ठानी तभी, खिला हुआ प्रभु-धाम।।

डर बिन सठ सुधरैं नहीं, बड़ी सार की बात।
काज न हो यदि बात से, आवश्यक तब लात।।

रामलला के नाम से, कटते सारे पाप।
रघुपति का संसार में , ऐसा प्रखर प्रताप।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया
05-08-20

Tuesday, April 23, 2024

सुलक्षण छंद "मन की बात"

कहनी आज मन की बात।
होंगे व्यक्त सब आघात।।
वाणी रुद्ध दृग में नीर।
आयी पीर अंतस चीर।।

आर्यावर्त भारत देश।
अति प्राचीन इसका वेश।।
वैभवपूर्ण क्षिति, जल, अन्न।
रहा सदैव यह संपन्न।।

धीर सुवीर यहाँ नरेश।
सदा सुशांति का परिवेश।।
आश्रय नित्य पाये सर्व।
त्यज कर भेद रख कर गर्व।।

लेकिन आज हम बल हीन।
सत्तारूढ़ फिर भी दीन।।
खो वह ओज पढे कुपाठ।
हुआ विलीन वह सब ठाठ।।

रीति रिवाज सारे भग्न।
त्याग स्वधर्म कायर मग्न।।
ओछे स्वार्थ का है जोर।
शासन व्यर्थ करता शोर।।

हैं अलगाव के सुर तेज।
सबको राष्ट्र से परहेज।।
मिलजुल देश करे विचार।
हों अब शीघ्र 'नमन' सुधार।।
***********

सुलक्षण छंद विधान -

सुलक्षण छंद 14 मात्रा प्रति पद का सम मात्रिक छंद है। यह मानव जाति का छंद है। एक छंद में कुल 4 पद होते हैं और छंद के दो दो या चारों पद सम तुकांत होने चाहिए। इन 14 मात्राओं की मात्रा बाँट चौकल + ताल (21) चौकल + ताल (21) है। चौकल में 22, 211, 112, 1111 आ सकते हैं। इसके अतिरिक्त चौकल में 3+1 भी रख सकते हैं।
******************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया
03-06-22

Sunday, April 14, 2024

 "जागो देश के जवानों"

जाग उठो हे वीर जवानों,
आज देश पूकार रहा है।
त्यज दो इस चिर निंद्रा को,
हिमालय पूकार रहा है।।1।।

छोड़ आलस्य का आँचल,
दुश्मन का कर दो मर्दन।
टूटो मृग झुंडों के ऊपर,
गर्जन करते केहरि बन।।2।।

मंडरा रहे हैं संकट के घन,
इस देश के गगन में।
शोषणता व्याप्त हुयी है,
जग के जन के मन में।।3।।

घिरा हुवा है आज देश,
चहुँ दिशि से अरि सेना से।
शोषण नीति टपक रही,
पर देशों के नैना से।।4।।

भूल गयी है उन्नति का पथ,
इधर इसी की सन्तानें।
भटक गयी है सच्चे पथ से,
स्वार्थ के पहने बाने।।5।।

दीवारों में है छेद कर रही,
वो अपने ही घर की।
धर्म कर्म अपना बिसरा,
ठोकर खाती दर दर की।।6।।

चला जा रहा आज देश,
गर्त में अवनति के गहरे।
आज इसी के विस्तृत नभ में,
पतन पताका है फहरे।।7।।

त्राहि त्राहि है मची हुयी,
देश के हर कोने में।
पड़ी हुयी सारी जनता है,
आज देश की रोने में।।8।।

अब तो जाग उठो जवानों,
जी में साहस ले कर।
काली बन अरि के सीने का,
दिखलाओ शोणित पी कर।।9।।

जग को अब तुम दिखलादो,
वीर भगत सिंघ बन कर।
वीरों की यह पावन भूमि,
वीर यहां के सहचर।।10।।

गांधी सुभाष बन कर के तुम,
भारत का मान बढ़ाओ।
जाति धर्म देश सेवा हित,
प्राणों की बलि चढ़ाओ।।11।।

मोहन बन कर के तुम जन को,
गीता का पाठ पढ़ाओ।
भूले भटके राही को तुम,
सच्ची राह दिखाओ।।12।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
1970 की लिखी कविता।

Wednesday, April 10, 2024

सरस छंद "ममतामयी माँ"

माँ तुम्हारा, छत्र सर पर।
छाँव देता, दिव्य तरुवर।।
नेह की तुम, खान निरुपम।
प्रेम की हो, रश्मि चमचम।।

जीव का कर, तुम अवतरण।
शिशु का करो, पोषण भरण।।
माँ सृष्टि को, कर प्रस्फुटित।
भाव में बह, होती मुदित।।

मातृ आँचल, शीतल सुखद।
दूर करता, ये हर विपद।।
माँ की कांति, रवि सम प्रखर।
प्रीत की यह, बहती लहर।।

वात्सल्य की, प्रतिमूर्ति तुम।
भाल पर ज्यों, दिव्य कुमकुम।।
भगवान हैं, माँ के चरण।
इन बिन कहाँ, फिर है शरण।।

माँ दुलारी, ज्यों विशद नभ।
जो बनाए, हर पथ सुलभ ।।
गोद में हैं, सब तीर्थ स्थल।
तार दें जो, जीवन सकल।।

माँ तुम्हारी, ममता परम।
कोई नहीं, इसका चरम।।
पीड़ मेरी, करती शमन।
प्रति दिन करूँ, तुमको 'नमन'।।
***********

सरस छंद -

सरस छंद 14 मात्रा प्रति पद का सम मात्रिक छंद है जिसका अंत नगण (111) से होना आवश्यक है। इसमें 7 - 7 मात्राओं पर यति अनिवार्य है। यह मानव जाति का छंद है। एक छंद में कुल 4 पद होते हैं और छंद के दो दो या चारों पद सम तुकांत होने चाहिए। इन 14 मात्राओं की मात्रा बाँट 2 5, 2 5 है। पंचकल की निम्न संभावनाएँ हैं :-

122
212
221
(2 को 11 में तोड़ सकते हैं, पर पद का अंत सदैव तीन लघु (111) से होना चाहिए।)
******************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया
01-06-22