Friday, August 16, 2019

पुछल्लेदार मुक्तक "नेताओं का खेल"

नेताओं ने आज देश में कैसा खेल रचाया है।
इनकी मनमानी के आगे सर सबका चकराया है।
लूट लूट जनता को इनने भारी माल बनाया है।
स्विस बैंकों में खाते रखकर काला धन खिसकाया है।।

सत्ताधीशों ने देश को है बाँटा,
करारा मारा चाँटा,
यही तो चुभे काँटा,
सुनोरे मेरे सब भाइयों,
बासुदेव कवि दर्द ये सुनाता।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
28-04-18

मुक्तक (साहित्य, भाषा)

भरा साहित्य सृजकों से हमारा ये सुखद परिवार,
बड़े गुरुजन का आशीर्वाद अरु गुणग्राहियों का प्यार,
यहाँ सम्यक समीक्षाओं से रचनाएँ परिष्कृत हों,
कहाँ संभव कि ऐसे में किसी की कुंद पड़ जा धार।

1222*4
*********

यहाँ काव्य की रोज बरसात होगी।
कहीं भी न ऐसी करामात होगी।
नहाओ सभी दोस्तो खुल के इसमें।
बड़ी इससे क्या और सौगात होगी।।

122×4
*********
हिन्दी

संस्कृत भाषा की ये पुत्री, सर्व रत्न की खान है,
आज अभागी सन्तानों से, वही रही खो शान है,
थाल पराये में मुँह मारो, पर ये हरदम याद हो,
हिन्दी ही भारत को जग में, सच्ची दे पहचान है।

(16+13 मात्रा)
*********

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-10-16

मौक्तिका (जो सत्यता ना पहचानी)

2*9 (मात्रिक बहर)
(पदांत 'ना पहचानी', समांत 'आ' स्वर)

दूजों के गुण भारत तुम गाते,
अपनों की प्रतिभा ना पहचानी।
तुम मुख अन्यों का रहे ताकते,
पर स्वावलम्बिता ना पहचानी।।

सोने की चिड़िया देश हमारा,
था जग-गुरु का पद सबसे न्यारा।
किस हीन भावना में घिर कर अब,
वो स्वर्णिम गरिमा ना पहचानी।।

जिनको तूने उपदेश दिया था,
असभ्य से जिनको सभ्य किया था।
पर आज उन्हीं से भीख माँग के,
वह खोई लज्जा ना पहचानी।।

सम्मान के' जो सच्चे अधिकारी,
है जिनकी प्रतिभा जग में न्यारी।
उन अपनों की अनदेखी कर के,
उनकी अभिलाषा ना पहचानी।।

मूल्यांकन जो प्रतिभा का करते,
बुद्धि-हीन या पैसों पे मरते।
परदेशी वे अपनों पे थोप के',
देश की अस्मिता ना पहचानी।।

गुणी सुधी जन अब देश छोड़ कर,
विदेश जा रहे मुख को मोड़ कर।
लोहा उनने सब से मनवाया,
पर यहाँ रिक्तता ना पहचानी।।

सम्बल विदेश का अब तो छोड़ो,
अपनों से यूँ ना मुख को मोड़ो।
हे भारत 'नमन' करो उसको तुम,
अब तक जो सत्यता ना पहचानी।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
10-07-2016

कहमुकरी (विविध)

मीठा बोले भाव उभारे
तोड़े वादों में नभ तारे
सदा दिलासा झूठी देता
ए सखि साजन? नहिं सखि नेता!

सपने में नित इसको लपकूँ
मिल जाये तो इससे चिपकूँ
मेरे ये उर वसी उर्वसी
ए सखा सजनि? ना रे कुर्सी!

जिसके डर से तन मन काँपे
घात लगा कर वो सखि चाँपे
पूरा वह निष्ठुर उन्मादी
क्या साजन? न आतंकवादी!

गिरगिट जैसा रंग बदलता
रार करण वो सदा मचलता
उसकी समझुँ न कारिस्तानी
क्या साजन? नहिं पाकिस्तानी!

भेद न जो काहू से खोलूँ
इससे सब कुछ खुल के बोलूँ
उर में छवि जिसकी नित रखली
ए सखि साजन? नहिं तुम पगली!

बारिस में हो कर मतवाला,
नाचे जैसे पी कर हाला,
गीत सुनाये वह चितचोर,
क्या सखि साजन, ना सखि मोर।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-05-17

"कह मुकरी विधान"

कह मुकरी काव्य की एक पुरानी मगर बहुत खूबसूरत विधा है। यह चार पंक्तियों की संरचना है। यह विधा दो सखियों के परस्पर वार्तालाप पर आधारित है। जिसकी प्रथम 3 पंक्तियों में एक सखी अपनी दूसरी अंतरंग सखी से अपने साजन (पति अथवा प्रेमी) के बारे में अपने मन की कोई बात कहती है। परन्तु यह बात कुछ इस प्रकार कही जाती है कि अन्य किसी बिम्ब पर भी सटीक बैठ सकती है। जब दूसरी सखी उससे यह पूछती है कि क्या वह अपने साजन के बारे में बतला रही है, तब पहली सखी लजा कर चौथी पंक्ति में अपनी बात से मुकरते हुए कहती है कि नहीं वह तो किसी दूसरी वस्तु के बारे में कह रही थी ! यही "कह मुकरी" के सृजन का आधार है।

इस विधा में योगदान देने में अमीर खुसरो एवम् भारतेंदु हरिश्चन्द्र जैसे साहित्यकारों के नाम प्रमुख हैं ।

यह ठीक 16 मात्रिक चौपाई वाले विधान की रचना है। 16 मात्राओं की लय, तुकांतता और संरचना बिल्कुल चौपाई जैसी होती है। पहली एवम् दूसरी पंक्ति में सखी अपने साजन के लक्षणों से मिलती जुलती बात कहती है। तीसरी पंक्ति में स्थिति लगभग साफ़ पर फिर भी सन्देह जैसे कि कोई पहेली हो। चतुर्थ पंक्ति में पहला भाग 8 मात्रिक जिसमें सखी अपना सन्देह पूछती है यानि कि प्रश्नवाचक होता है और दुसरे भाग में (यह भी 8 मात्रिक) में स्थिति को स्पष्ट करते हुए पहली सखी द्वारा उत्तर दिया जाता है ।

हर पंक्ति 16 मात्रा, अंत में 1111 या 211 या 112 या 22 होना चाहिए। इसमें कहीं कहीं 15 या 17 मात्रा का प्रयोग भी देखने में आता है। न की जगह ना शब्द इस्तेमाल किया जाता है या नहिं भी लिख सकते हैं। सखी को सखि लिखा जाता है।

कुछ उदाहरण

1
बिन आये सबहीं सुख भूले।
आये ते अँग-अँग सब फूले।।
सीरी भई लगावत छाती।
ऐ सखि साजन ? ना सखि पाती।।
........अमीर खुसरो......

2
रात समय वह मेरे आवे।
भोर भये वह घर उठि जावे।।
यह अचरज है सबसे न्यारा।
ऐ सखि साजन ? ना सखि तारा।।
........अमीर खुसरो......

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

Tuesday, August 13, 2019

दोहा (प्रभु ही रखते ध्यान)

जीव जंतु जंगम जगत, सबको समझ समान।
योग क्षेम करके वहन, प्रभु ही रखते ध्यान।।

राम, कृष्ण, वामन कभी, कूर्म, मत्स्य अभिधान।
पाप बढ़े अवतार ले, प्रभु ही रखते ध्यान।।

ब्रह्म-रूप उद्गम करे, रुद्र-रूप अवसान।
विष्णु-रूप में सृष्टि का, प्रभु ही रखते ध्यान।।

अर्जुन के बन सारथी, गीता कीन्हि बखान।
भक्त दुखों में जब घिरे, प्रभु ही रखते ध्यान।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
11-06-19

कश्मीरी पत्थरबाजों पर दोहे

धरती का जो स्वर्ग था, बना नर्क वह आज।
गलियों में कश्मीर की, अब दहशत का राज।।

भटक गये सब नव युवक, फैलाते आतंक।
सड़कों पर तांडव करें, होकर के निःशंक।।

उग्रवाद की शह मिली, भटक गये कुछ छात्र।
ज्ञानार्जन की उम्र में, बने घृणा के पात्र।।

पत्थरबाजी खुल करें, अल्प नहीं डर व्याप्त।
सेना का भी भय नहीं, संरक्षण है प्राप्त।।

स्वारथ की लपटों घिरा, शासन दिखता पस्त।
छिन्न व्यवस्थाएँ सभी, जनता भय से त्रस्त।।

खुल के पत्थर बाज़ ये, बरसाते पाषाण।
देखें सब असहाय हो, कहीं नहीं है त्राण।।

हाथ सैनिकों के बँधे, करे न शस्त्र प्रयोग।
पत्थर बाज़ी झेलते, व्यर्थ अन्य उद्योग।।

सत्ता का आधार है, तुष्टिकरण का मंत्र।
बेबस जनता आज है, 'नमन' तुझे जनतंत्र।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
18-01-2019

रति छंद "प्यासा मन-भ्रमर"

मन मोहा, तन कुसुम सम तेरा।
हर लीन्हा, यह भ्रमर मन मेरा।।
अब तो ये, रह रह छटपटाये।
कब तृष्णा, परिमल चख बुझाये।।

मृदु हाँसी, जिमि कलियन खिली है।
घुँघराली, लट-छवि झिलमिली है।।
मधु श्वासें, मलय-महक लिये है।
कटि बांकी, अनल-दहक लिये है।।

मतवाली, शशि वदन यह गोरी।
मृगनैनी, चपल चकित चकोरी।।
चलती तो, लख हरिण शरमाये।
यह न्यारी, छवि न वरणत जाये।।

लगते हैं, अधर पुहुप लुभाये।
तब क्यों ना, सब मिल मन जलाये।।
मन भौंरा, निरखत डगर तेरी।
मिल ने को, बिलखत कर न देरी।।
===============
लक्षण छंद:-

'रति' छंदा', रख गण "सभनसागे"।
यति चारा, अरु नव वरण साजे।।

"सभनसागे" = सगण भगण नगण सगण गुरु

( 112  2,11  111  112  2)
13वर्ण, यति 4-9 वर्णों पर,
4 चरण,दो-दो चरण समतुकांत
*****************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
26-01-19

रक्ता छंद "शारदा वंदन"

ब्रह्म लोक वासिनी।
दिव्य आभ भासिनी।।
वेद वीण धारिणी।
हंस पे विहारिणी।।

शुभ्र वस्त्र आवृता।
पद्म पे विराजिता।।
दीप्त माँ सरस्वती।
नित्य तू प्रभावती।।

छंद ताल हीन मैं।
भ्रांति के अधीन मैं।।
मन्द बुद्धि को हरो।
काव्य की प्रभा भरो।।

छंद-बद्ध साधना।
काव्य की उपासना।
मैं सदैव ही करूँ।
भाव से इसे भरूँ।।

मात ये विचार हो।
देश का सुधार हो।।
ज्ञान का प्रसार हो।
नष्ट अंधकार हो।।

शारदे दया करो।
ज्ञान से मुझे भरो।।
काव्य-शक्ति दे मुझे।
दिव्य भक्ति दे मुझे।।

===========
विधान~ [रगण जगण गुरु]
( 212 121 2 ) = 7 वर्ण, 4 चरण
[दो-दो या चारों चरण समतुकांत]

**********
बासुदेव अग्रवाल नमन,
तिनसुकिया
10-02-19

यशोदा छंद "प्यारी माँ"

तु मात प्यारी।
महा दुलारी।।
ममत्व पाऊँ।
तुझे रिझाऊँ।।

गले लगाऊँ।
सदा मनाऊँ।।
करूँ तुझे माँ।
प्रणाम मैं माँ।।

तु ही सवेरा।
हरे अँधेरा।।
बिना तिहारे।
कहाँ सहारे।।

दुलार देती।
बला तु लेती।।
सनेह दाता।
नमामि माता।।
===========
लक्षण छंद:-

"जगाग" राचो।
'यशोदा' पाओ।।

121+ गुरु+ गुरु =5 वर्ण,4 चरण  दो-दो तुकांत
**************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
05-06-17

Friday, August 9, 2019

हाइकु (राजनेता)

पिता कोमल
संपूर्ण-स्वामी सुत
रोज दंगल।
**
बुआ की छाया
भतीजा भरमाया
अजब माया।
**
अहं सम्राज्य
हिंसा में घिरा राज्य
ममता लुप्त।
**
राहु-लगन
पीढ़ियों का सम्राज्य
हुआ समाप्त।
**

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
26-06-19

पिरामिड (तेरी याद)

(1-7 और 7-1) आरोही अवरोही

पी
कर
ये आँसू
जी  रहे  हैं
किसी तरह।
आँसू बह  रहे
आँखों से रह रह।

नहीं टिक रहा है
अब कहीं भी जी।
याद में तेरी
हर रोज
जी रहे
खून
पी।
******

जी
रहे
जिंदगी
अब हम
आसरे तेरे।
उजालों में छाए
घनघोर  अंधेरे।

गुजरते  हैं   दिन
अब आँसू पी पी।
तेरी याद में
है कितना
तड़पा
मेरा
जी।
*****

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
11-11-16

ताँका (प्रकृति)

जापानी विधा (5-7-5-7-7)

निशा ने पाया
मयंक सा साजन
हुई निहाल,
धारे तारक-माल
खूब करे धमाल।
**
तारक अस्त
हुई शर्म से लाल
भोर है मस्त,
रवि-रश्मि संघात
सरसे जलजात।
**
भ्रमर गूँज,
मधुपरी नर्तन,
हर्षित कूँज,
आया नव विहान
रजनी अवसान।
**
ग्राम्य-जीवन
संदल उपवन
सरसावन,
सुरभित पवन
वास बरसावन।
**
हवा में बहे
सेमली शुभ्र गोले,
आ कर सजे,
हरित दूब पर
जैसे झरे हों ओले।
**

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
20-06-19

चौका (उन्माद)

जापानी विधा चौका
5-7, 5-7, 5-7 -------- +7

अंधा विश्वास
अंधी आस्था करती
विवेक शून्य,
क्षणिक आवेश में
मानव भूले
क्या सही क्या गलत?
होकर पस्त,,,
यही तो है उन्माद।
मनुष्य नाचे
कठपुतली बन,
जिसकी डोर
बाज़ीगर के हाथ,
जैसे वो चाहे
नचाए पुतलों को
ये खिलौनों से
मस्तिष्क से रहित
मचा तांडव
करें नग्न नर्तन
लूट हिंसा का
मचा आतंकवाद
यही तो है उन्माद।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
08-09-17

क्षणिका (मानवीय क्षमता)

हे मानवीय क्षमता
क्या छोटी पड़ गई धरा?
जो चढ़ बैठी हो,
अंतरिक्ष में
जहाँ से अपने बनाये
उपग्रही खिलौनों की आँख से
तुम देख,,,,
अट्टहास कर सको
बेरोजगारी और गरीबी का दानव
अपने पंजों में जकड़ता
सिसकता, कराहता मानव।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-02-18

Wednesday, August 7, 2019

रोला छंद "दो राही"

जग-ज्वाला से दग्ध, पथिक इक था अति व्याकुल।
झूठे रिश्ते नातों के, प्रति भी शंकाकुल।।
मोह-बन्ध सब त्याग, शांति की चला खोज में।
जग झूठा जंजाल, भाव ये मन-सरोज में।1।

नश्वर यह मानव-तन, लख वैराग्य हुआ था।
क्षणभंगुरता पर जग की, नैराश्य हुआ था।।
उसका मन जग-ज्वाल, सदा रहती झुलसाती।
तृष्णा की ये बाढ़, हृदय रह रह बिलखाती।2।

स्वार्थ बुद्धि लख घोर, घृणा के उपजे अंकुर।
ज्ञान मार्ग की राह चले, मन था अति आतुर।।
अर्थी जग की धनसंचयता, से उद्वेलित।
जग की घोर स्वार्थपरता से, मन भी विचलित।3।

बन सन्यासी छोड़, चला वह जग की ज्वाला।
लगा ढूंढने मार्ग, शांति का हो मतवाला।।
परम शांति का एक मार्ग, वैराग्य विचारा।
आत्मज्ञान का अन्वेषण, ही एक सहारा।4।

एक और भी देह, धरा था जग में राही।
मोह और माया के, गुण का ही वह ग्राही।।
वृत्ति स्वार्थ से पूर्ण, सदा उसने अपनाई।
रहता इसमें मग्न, अधम वह कर कुटिलाई।5।

पाप लोभ मद के पथ पर, वह हुआ अग्रसर।
विचरण करता दम्भ क्षोभ, नद के नित तट पर।।
भेद-नीति से सब पर, अपनी धौंस जमाता।
पाशवता के निर्झर से, वह तृषा मिटाता।6।

एकमात्र था लक्ष्य, नित्य ही धन का संचय।
अन्यों का शोषण करना, उसका दृढ़ निश्चय।।
जुल्म अनेकों अपने से, अबलों पर ढ़ाहे।
अन्यों की आहों पर, निर्मित निज गृह चाहे।7।

अंतर इन दोनो पथिकों में, बहुत बड़ा है।
एक चाहता मुक्ति, दूसरा यहीं अड़ा है।।
मोक्ष-मार्ग पहले ने, बन्धन त्यज अपनाया।
पड़ा मोह माया में दूजा, रुदन मचाया।8।

नश्वर जग में धन्यवान, केवल पहले जन।
वृत्ति सुधा सम धार, अमिय मय करते जीवन।।
ज्ञान-रश्मि से वे प्रकाश, जग में फैलाते।
प्रेम-वारि जग उपवन में, वे नित बरसाते।9।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
27-05-2016

रोला छंद "विधान"

रोला चार चरणों का, प्रत्येक चरण में 24 मात्रा का छंद है। चरणान्त गुरु अथवा 2 लघु से होना आवश्यक है। तुक दो दो चरण में होती है।

कुंडलियाँ छंद के कारण रोला बहु प्रचलित छंद है। कुंडलियाँ में प्रथम दो पंक्ति दोहा की तथा अंतिम चार पंक्ति रोला की होती है। दोहा का चौथा चरण रोला की प्रथम पंक्ति के आरंभ में पुनरुक्त होता है, अतः रोला की प्रथम यति 11 मात्रा पर होना सर्वथा सिद्ध है। साथ ही इस यति का ताल (2 1) से अंत भी होना चाहिये।

परन्तु अति प्रतिष्ठित कवियों की रचनाओं से देखा गया है कि रोला छंद इस बन्धन में बंधा हुआ नहीं है। रोल बहुत व्यापक छंद है।  भिखारीदास ने छंदार्णव पिंगल में रोला को 'अनियम ह्वै है रोला' तक कह दिया है। रोला छंद 11, 13 की यति में भी बंधा हुआ नहीं है और न ही प्रथम यति का अंत गुरु लघु से होना चाहिये, इस बंधन में। अनेक प्रतिष्ठित कवियों की रचनाओं के आधार पर रोला की मात्रा बाँट  8-6-2-6-2 निश्चित होती है।
8 = अठकल या 2 चौकल।
6 = 3+3 या 4+2 या 2+4
2 = 1 + 1 या 2
यति भी 11, 12, 14, 16 मात्रा पर सुविधानुसार कहीं भी रखी जा सकती है। प्रसाद जी की कामायनी की कुछ पंक्तियाँ देखें।

मैं यह प्रजा बना कर कितना तुष्ट हुआ था,
किंतु कौन कह सकता इन पर रुष्ट हुआ था।
मैं नियमन के लिए बुद्धि-बल से प्रयत्न कर,
इनको कर एकत्र चलाता नियम बना कर।
रूप बदलते रहते वसुधा जलनिधि बनती,
उदधि बना मरुभूमि जलधि में ज्वाला जलती।
विश्व बँधा है एक नियम से यह पुकार-सी,
फैल गयी है इसके मन में दृढ़ प्रचार-सी।

पर कुंडलियाँ छंद में 11, 13 की यति रख कर ही रचना करनी चाहिए। इस छंद में रोला के मान्य रूप को ही रखना चाहिये जो रोला की चारों पंक्ति की प्रथम पंक्ति से अनुरूपता के लिए भी अति आवश्यक है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

रूपमाला छंद "राम-महिमा"

राम की महिमा निराली, राख मन में ठान।
अन्य रस का स्वाद फीका, भक्ति रस की खान।
जागती यदि भक्ति मन में, कृपा बरसी जान।
नाम साँचो राम को है, लो हृदय में मान।।

राम को भज मन निरन्तर, भक्ति मन में राख।
इष्ट पे रख पूर्ण आश्रय, मत बढ़ाओ शाख।
शांत करके मन-भ्रमर को, एक का कर जाप।
राम-रस को घोल मन में, दूर हो सब ताप।।

नाम प्रभु का दिव्य औषधि, नित करो उपभोग।
दाह तन मन की हरे ये, काटती भव-रोग।।
सेतु सम है राम का जप, जग समुद्र विशाल।
आसरा इसका मिले तो, पार हो तत्काल।।

रत्न सा जो है प्रकाशित, राम का वो नाम।
जीभ पे इसको धरो अरु, देख इसका काम।।
ज्योति इसकी जगमगा दे, हृदय का हर छोर।
रात जो बाहर भयानक, करे उसकी भोर।।

गीध, शबरी और बाली, तार दीन्हे आप।
आप सुनते टेर उनकी, जो करें नित जाप।।
राम का जप नाम हर क्षण, पवनसुत हनुमान।
सकल जग के पूज्य हो कर, बने महिमावान।।

राम को जो छोड़ थामे, दूसरों का हाथ।
अंत आयेगा निकट जब, कौन देगा साथ।
नाम पे मन रख भरोसा, सब बनेंगे काज।
राम से बढ़कर जगत में, कौन दूजो आज।।
************
रूपमाला छंद *विधान*

यह एक अर्द्धसममात्रिक छन्द है, जिसके प्रत्येक चरण में 14 और 10 के विश्राम से 24 मात्राएँ और चरणान्त गुरु-लघु से होता है. इसको मदन छन्द भी कहते हैं. यह चार चरणों का छन्द है, जिसमें दो-दो पदों पर तुकान्तता बनती है।

इसकी मात्रा बाँट 3 सतकल और अंत ताल यानि
गुरु लघु से होता है। सतकल की मात्रा बाँट
3 2 2 है जिसमें द्विकल के दोनों रूप (2, 1 1) और त्रिकल के तीनों रूप (2 1, 1 2, 1 1 1) मान्य है।अतः निम्न बाँट तय होती है:
3 2 2  3 2 2 = 14 मात्रा और

3 2 2  2 1 = 10 मात्रा

इस छंद को 2122  2122, 2122  21 के बंधन में बाँधना उचित नहीं। प्रसाद जी का कामायनी के वासना सर्ग का उदाहरण देखें।

स्पर्श करने लगी लज्जा, ललित कर्ण कपोल,
खिला पुलक कदंब सा था, भरा गदगद बोल।
किन्तु बोली क्या समर्पण, आज का हे देव!
बनेगा-चिर बंध नारी, हृदय हेतु सदैव।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
29-08-2016

रास छंद "कृष्णावतार"

हाथों में थी, मात पिता के, सांकलियाँ।
घोर घटा में, कड़क रही थी, दामिनियाँ।
हाथ हाथ को, भी ना सूझे, तम गहरा।
दरवाजों पर, लटके ताले, था पहरा।।

यमुना मैया, भी ऐसे में, उफन पड़ी।
विपदाओं की, एक साथ में, घोर घड़ी।
मास भाद्रपद, कृष्ण पक्ष की, तिथि अठिया।
कारा-गृह में, जन्म लिया था, मझ रतिया।।

घोर परीक्षा, पहले लेते, साँवरिया।
जग को करते, एक बार तो, बावरिया।
सीख छिपी है, हर विपदा में, धीर रहो।
दर्शन चाहो, प्रभु के तो हँस, कष्ट सहो।।

अर्जुन से बन, जीवन रथ का, स्वाद चखो।
कृष्ण सारथी, रथ हाँकेंगे, ठान रखो।
श्याम बिहारी, जब आते हैं, सब सुख हैं।
कृष्ण नाम से, सारे मिटते, भव-दुख हैं।।
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रास छंद विधान:-

रास छंद 22 मात्राओं का छंद है जिसमें 8, 8, 6 मात्राओं पर यति होती है। चरणान्त 112 से होना आवश्यक है। चार चरणों का एक छंद होता है जिसमें 2-2 पंक्ति तुकांत होनी चाहिये। मात्रा बाँट प्रथम और द्वितीय यति में एक अठकल या 2 चौकल का है। अंतिम यति में 2 - 1 - 1 - 2 का है।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
24-08-2016

प्लवंगम छंद "सरिता"

भूधर बिखरें धरती पर हर ओर हैं।
लुप्त गगन में ही कुछ के तो छोर हैं।।
हैं तुषार मंडित जिनके न्यारे शिखर।
धवल पाग भू ने ज्यों धारी शीश पर।।

एक सरित इन शैल खंड से बह चली।
बर्फ विनिर्मित तन की थी वह चुलबली।।
ले अथाह जल अरु उमंग मन में बड़ी।
बलखाती इठलाती नदी निकल पड़ी।।

बाधाओं को पथ की सारी पार कर।
एक एक भू-खंडों को वह अंक भर।।
राहों के सब नाले, मिट्टी, तरु बहा।
हुई अग्रसर गर्जन करती वह महा।।

कभी मधुरतम कल कल ध्वनि से वह बहे।
श्रवणों में ज्यों रागों के सुर आ रहे।।
कभी भयंकर रूप धरे तांडव मचे।
धारा में जो भी पड़ जाये ना बचे।।

लदी हुई मानव-आशा के भार से।
सींचे धरती वरदानी सी धार से।
नगरों, मैदानों को करती पार वह।
हर्ष मोद का जग को दे भंडार वह।।

मधुर वारि से सींच अनेकों खेत को।
कृषकों के वह साधे हर अभिप्रेत को।।
हरियाली की खुशियों भरी खिला कली।
वह अथाह सागर के पट में छिप चली।।
********************
प्लवंगम छंद "विधान"

21 मात्रा। चार चरण, दो दो तुकांत।
मात्रा बाँट:-   8-8-2-1-2
================

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
16-04-2016