Saturday, October 10, 2020

मानव छंद "नारी की व्यथा"

आडंबर में नित्य घिरा।

नारी का सम्मान गिरा।।

सत्ता के बुलडोजर से।

उन्मादी के लश्कर से।।


रही सदा निज में घुटती।

युग युग से आयी लुटती।।

सत्ता के हाथों नारी।

झूल रही बन बेचारी।।


मौन भीष्म भी रखै जहाँ।

अंधा है धृतराष्ट्र वहाँ।।

उच्छृंखल हो राज-पुरुष।

करते सारे पाप कलुष।।


अधिकारी सारे शोषक।

अपराधों के वे पोषक।।

लूट खसोट मची भारी।

दिखै व्यवस्था ही हारी।।


रोग नशे का फैल गया।

लुप्त हुई है हया दया।।

अपराधों की बाढ जहाँ।

ऐसे में फिर चैन कहाँ।।


बने हुये हैं जो रक्षक।

वे ही आज बड़े भक्षक।।

हर नारी की घोर व्यथा।

पंचाली की करुण कथा।।

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मानव छंद विधान:-


मानव छंद 14 मात्रिक चार पदों का छंद है। तुक दो दो पद की मिलाई जाती है। 14 मात्रा की बाँट 12 2 है। 12 मात्रा में तीन चौकल हो सकते हैं, एक अठकल एक चौकल हो सकता है या एक चौकल एक अठकल हो सकता है।


मानव छंद में ही किंचित परिवर्तन से मानव जाति के दो और छंद हैं। 


4*2 211S = (हाकलि) यह छंद दो चौकल भगण और दीर्घांत से बनता है।


4*2 2SS = (सखी) यह छंद दो चौकल द्विकल और अंत में दो दीर्घ वर्ण से बनता है।

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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

तिनसुकिया

26-09-20

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