Thursday, October 15, 2020

मौक्तिका (बालक)

2212*4 (हरिगीतिका छंद आधारित)

(पदांत 'को जाने नहीं', समांत 'आन')


प्रतिरूप बालक प्यार का भगवान का प्रतिबिम्ब है,

कितना मनोहर रूप पर अभिमान को जाने नहीं।।

पहना हुआ कुछ या नहीं लेटा किसी भी हाल में,

अवधूत सा निर्लिप्त जग के भान को जाने नहीं।।


चुप था अभी खोया हुआ दूजे ही पल रोने लगे,

मनमर्जियों का बादशाह किस भाव में खोने लगे।

कुछ भी कहो कुछ भी करो पड़ता नहीं इसको फ़रक,

ना मान को ये मानता सम्मान को जाने नहीं।।


सुन लोरियाँ मूँदे पलक फिर आँख को झट खोलता,

किलकारियों की गूँज से श्रवणों में मधु-रस घोलता।

खिलवाड़ करता था अभी सोने लगा क्यों लाल अब,

ये रात ओ दिन के किसी अनुमान को जाने नहीं।।

नन्हा खिलौना लाडला चिपका रहे माँ से अगर,

मुट्ठी में जकड़ा सब जगत ना दीन दुनिया की खबर।

ममतामयी खोयी हुई खोया हुआ ही लाल है,

माँ से अलग जग में किसी पहचान को जाने नहीं।।

अठखेलियाँ बिस्तर पे कर उलटे कभी सुलटे कभी,

मासूमियत इसकी हरे चिंता फ़िकर झट से सभी।

खोया हुआ धुन में रहे अपने में हरदम ये मगन,

जग की किसी भी चीज के अरमान को जाने नहीं।।

अपराध से ना वासता जग के छलों से दूर है,

मुसकान से घायल करे हर आँख का ये नूर है।

करता 'नमन' इस में छिपी भगवान की मूरत को मैं,

यह लोभ, स्वारथ, डाह या अपमान को जाने नहीं।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

तिनसुकिया

10-08-2016

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