Saturday, April 10, 2021

राधेश्यामी छंद "शशिकला"

रात्री देवी के आँगन में, जब गगन मार्ग से शशि जाता।
शीतल किरणों को फैला कर, यह शुभ्र ज्योत्स्ना है छाता।।
कर व्योम मार्ग को आलोकित, बढ़ता मयंक नभ-मंडल पे।
आनन से छिटका मुस्काहट, दिन जैसा करे धरा तल पे।।

खेले जब आंखमिचौली यह, प्यारे तारों से मिलजुल के।
बादल समूह के पट में छिप, रह जाये कभी कभी घुल के।।
लुकछिप कर कभी देखता है, रख ओट मेघ के अंबर की।
घूंघट-पट से नव वधु जैसे, निरखे छवि अपने मन-हर की ।।

चञ्चलता लिये नवल-शिशु सी, दिन प्रति दिन रूप बदलता है।
ले पूर्ण रूप को निखर कभी, हर दिन घट घट कर चलता है।।
रजनी जब सुंदर थाल सजा, इसका आ राजतिलक करती।
आरूढ़ गगन-सिंहासन हो, कर दे यह रजतमयी धरती।।

बुध तारागण के बैठ संग, यह राजसभा में अंबर की।
संचालन करे राज्य का जब, छवि देखे बनती नृप वर की।।
यह रजत-रश्मि को बिखरा कर, भूतल को आलोकित करता।
शीतल सुरम्य किरणों से फिर, दाहकता हृदयों की हरता।।

जो शष्य कनक सम खेतों का, पा रजत रश्मियों की शोभा।
वह हेम रजतमय हो कर के, छवि देता है मन की लोभा।।
धरती का आँचल धवल हुआ, सरिता-धारा झिलमिल करती।
ग्रामीण गेह की शुभ्रमयी, प्रांजल शोभा मन को हरती।।

दे मधुर कल्पना कवियों को, मृगछौना सा भोलाभाला।
मनमोहन सा प्यारा चंदा, सब के मन को हरने वाला।।
रजनी के शासन में करके, यह 'नमन' धरा अरु अम्बर को।
यह भोर-पटल में छिप जाता, दे कर पथ प्यारे दिनकर को।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
21-05-2016

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