Friday, October 23, 2020

हाइकु (कोरोना)

कोरोनासुर
विपदा बन कर
टूटा भू पर।
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यह कोरोना
सकल जगत का
अक्ष भिगोना।
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कोरोना पर
मुख को ढक कर
आओ बाहर।
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कोरोना यह
जगत रहा सह
कैदी सा रह।
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कोरोना अब
निगल रहा सब
जायेगा कब?
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बासुदेव अग्रवाल नमन
तिनसुकिया
14-08-20

3 comments:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (२४-१०-२०२०) को 'स्नेह-रूपी जल' (चर्चा अंक- ३८६४) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    --
    अनीता सैनी

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  2. बहुत सुंदर सार्थक हाइकु।

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