Saturday, March 16, 2019

चंचरीक छंद "बाल कृष्ण"

घुटरूवन चलत श्याम, कोटिकहूँ लजत काम,
सब निरखत नयन थाम, शोभा अति प्यारी।
आँगन फैला विशाल, मोहन करते धमाल,
झाँझन की देत ताल, दृश्य मनोहारी।।
लाल देख मगन मात, यशुमति बस हँसत जात,
रोमांचित पूर्ण गात, पुलकित महतारी।
नन्द भी रहे निहार, सुख की बहती बयार,
बरसै यह नित्य धार, जो रस की झारी।।

करधनिया खिसक जात, पग घूँघर बजत जात,
मोर-पखा सर सजात, लागत छवि न्यारी।
माखन मुख में लिपाय, मुरली कर में सजाय,
ठुमकत सबको रिझाय, नटखट सुखकारी।
यह नित का ही उछाव, सब का इस में झुकाव,
ब्रज के संताप दाव, हरते बनवारी।।
सुर नर मुनि नाग देव, सब को ही हर्ष देव,
बरनत कवि 'बासुदेव', महिमा ये सारी।।
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चंचरीक छंद *विधान*

इस छंद को हरिप्रिया के नाम से भी जाना जाता है। यह छंद चार चरणों का प्रति चरण 46 मात्राओं का सम मात्रिक दण्डक है। इसका यति विभाजन
(12+12+12+10) =46 है। मात्रा बाँट 12 मात्रिक यति में 2 छक्कल का तथा अंतिम यति में छक्कल+गुरु गुरु है। इस प्रकार मात्रा बाँट 7 छक्कल और अंत गुरु गुरु का है। सूर ने अपने पदों में इस छंद का पुष्कल प्रयोग किया है। तुकांतता दो दो चरण या चारों चरण समतुकांत रखने की है। आंतरिक यति में भी तुकांतता बरती जाय तो अति उत्तम अन्यथा यह नियम नहीं है।

यह छंद चंचरी या चर्चरी छंद से भिन्न है। भानु कवि ने छंद प्रभाकर में "र स ज ज भ र" गणों से युक्त वर्ण वृत्त को चंचरी छंद बताया है जो 26 मात्रिक गीतिका छंद ही है। जिसका प्रारूप निम्न है।
21211  21211  21211  212
केशव कवि ने रामचन्द्रिका में भी इसी विधान के अनुसार चंचरी नाम से अनेक छंद रचे हैं।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
21-08-17

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