Saturday, March 16, 2019

चौपाई छंद "कलियुगी शतानन"

सिया राम चरणों में वंदन। मेटो अब कलयुग का क्रंदन।।
जब जब बढ़े पाप का भारा। तब तब प्रभु तुम ले अवतारा।।

त्रेता माहि भया रिपु भारी। सुर नर मुनि का कष्टनकारी।।
रावण नाम सकल जग जानी। दस शीशों का वह अभिमानी।।

कलयुग माहि जनम पुनि लीन्हा। घोर तपस्या विधि की कीन्हा।।
त्रेता से रावण को चीन्हा। सोच विचारि ब्रह्म वर दीन्हा।।

चार माथ का संकट भारी। विधि जाने कितना दुखकारी।।
ब्रह्मा चतुराई अति कीन्ही।वैसी विपदा वर में दीन्ही।।

जस जस अत्याचार बढ़ाये। त्यों त्यों वह नव मस्तक पाये।।
शत शीशों तक वर न रुकेगा। धर्म करेगा तब ही थमेगा।।

वर का मर्म न समझा पापी। आया मोद मना संतापी।।
पा अद्भुत वर विकट निशाचर। पातक घोर करे निशि वासर।।

रावण ने फैलाई माया। सूक्ष्म रूप में घर घर आया।।
भाँत भाँत के भेष बनाकर। पैठे मानव-मन में जा कर।।

जहँ जहँ देखे कमला वासा। सहज लक्ष्य लख फेंके पासा।।
साहूकार सेठ उद्योगी। हुये सभी रावण-वश रोगी।।

वशीभूत स्वारथ के कर के। बुद्धि विवेक ज्ञान को हर के।।
व्याभिचार शोषण फैलाया। ठगी लूट का तांडव छाया।।

ब्रह्मा का वर टरै न टारे। शीश लगे बढ़ने मतवारे।।
त्रेता का जो वीर दशानन। शत शीशों का भया शतानन।।

अधिकारी भक्षक बन बैठे। सत्ता भीतर गहरे पैठे।।
आराजक हो लूट मचाये। जहँ जहँ लिछमी तहँ तहँ छाये।।

शत आनन के चेले चाँटे। संशाधन अपने में बाँटे।।
त्राहि त्राहि सर्वत्र मची है। माया रावण खूब रची है।।

पीड़ित शोषित जन हैं सारे। आहें विकल भरे दुखियारे।।
सुनहु नाथ अब लो अवतारा। करहु देश का तुम उद्धारा।।

इस शत आनन का कर नाशा। मेटो भूमण्डल का त्रासा।।
तुम बिन नाथ कौन जग-त्राता। 'बासुदेव' तव यश नित गाता।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
12-07-2016

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