Tuesday, March 12, 2019

ग़ज़ल (ये हुस्न मौत का तो)

बह्र:- (221  2122)*2

ये हुस्न मौत का तो सामान हो न जाए,
मेरी ये जिंदगी अब तूफान हो न जाए।

बातें जुदाई की तू मुझसे न यूँ किया कर,
सुनके जिन्हें मेरा जी हलकान हो न जाए।

तूने दिया जफ़ा से हरदम वफ़ा का बदला,
इस सिलसिले में उल्फ़त कुर्बान हो न जाए।

वापस वो जब से आई मन्नत ये तब से मेरी,
तकरार फिर से अब इस दौरान हो न जाए।

तब तक दिखे न हमको सब में हमारी सूरत,
जब तक जगत ये पूरा भगवान हो न जाए।

मतलब परस्त इंसां को रब न दे तु इतना,
पा के जिसे कहीं वो हैवान हो न जाए।

ये इल्तिज़ा 'नमन' की उससे कभी किसी का,
नुक्सान हो न जाए, अपमान हो न जाए।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
15-1-18

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