Friday, March 8, 2019

उल्लाला छंद 'विधान'

उल्लाला छंद विधान -

उल्लाला छंद द्वि पदी मात्रिक छंद है। स्वतंत्र रूप से यह छंद कम प्रचलन में है, परन्तु छप्पय छंद के 6 पदों में प्रथम 4 पद रोला छंद के तथा अंतिम 2 पद उल्लाला छंद  के होते हैं। इसके दो रूप प्रचलित हैं।

(1) 26 मात्रिक पद जिसके चरण 13-13 मात्राओं के यति खण्डों में विभाजित रहते हैं। इसका मात्रा विभाजन: अठकल + द्विकल + लघु + द्विकल है। अंत में एक गुरु या 2 लघु का विधान है। इस प्रकार दोहा छंद के चार विषम चरणों से उल्लाला छंद बनता है। इस छंद में 11वीं मात्रा लघु ही होती है।

(2) 28 मात्रिक पद जिसके चरण 15 -13 मात्राओं के यति खण्डों में विभाजित रहते हैं। इस में शुरू में द्विकल (2 या 11) जोड़ा जाता है, बाकी सब कुछ प्रथम रूप की तरह ही है। तथापि 13-13 मात्राओं वाला छंद ही विशेष प्रचलन में है। 15 मात्रिक चरण में 13 वीं मात्रा लघु होती है।

तुकांतता के दो रूप प्रचलित हैं। 
(1) सम+सम चरणों की तुकांतता जो प्रायः द्वि पदी रूप में रचा जाता है। जैसे -
"जीवन अपने मार्ग को, ढूँढे हर हालात में।
जीने की ही लालसा, स्फूर्ति नई दे गात में।।"

(2) दूसरे रूप में दो विषम और दो सम चरण
मिलाकर कुल चार चरण रखे जाते हैं और क्रमशः दो दो चरण में तुकांतता निभाई जाती है। इस रूप में यह छंद 'चंद्रमणि छंद' के नाम से भी जाना जाता है।
चंद्रमणि छंद उदाहरण -

"नहीं प्रदूषण आग है।
यहाँ न भागमभाग है।।
गाँवों का वातावरण।
'नमन' प्रकृति का आभरण।।"

बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया
12-12-2016



No comments:

Post a Comment