Sunday, November 22, 2020

मुक्तक (इंसान-2)

ढ़ोते जो हम बोझ चार पे, तुम वो दो पर ढ़ोते हो,
तरह हमारी तुम भी खाते, पीते, जगते, सोते हो,
पर उसने वो समझ तुम्हें दी, जिससे तुम इंसान बने,
वरना हम तुम में क्या अंतर, जो गरूर में खोते हो।

(लावणी छंद आधारित)
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बल बुद्धि शौर्य के स्वामी तुम, मानव जग में कहलाते हो,
तुम बात अहिंसा की करते, तुम ढोंग रचा बहलाते हो,
तुम नदी खून की बहा बहा, नित प्राण हरो हम जीवों के,
हम एक ईश की सन्तानें, फिर क्यों तुम यूँ दहलातेहो।

(मत्त सवैया)
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जुता रहा जीवन-कोल्हू में, एक बैल सा भरमाया,
आँखों पर पट्टी को बाँधे, लगातार चक्कर खाया,
तेरी खातिर मालिक ने तो, रची सुहानी दुनिया थी,
किंतु प्रपंचों में ही उलझा, उसको भोग न तू पाया। 

(लावणी छंद आधारित)
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
5-11-19

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