Friday, February 8, 2019

कनक मंजरी छंद "गोपी विरह"

तन-मन छीन किये अति पागल,
हे मधुसूदन तू सुध ले।
श्रवणन गूँज रही मुरली वह,
जो हम लीं सुन कूँज तले।।
अब तक खो उस ही धुन में हम,
ढूंढ रहीं ब्रज की गलियाँ।
सब कुछ जानत हो तब दर्शन,
देय खिला मुरझी कलियाँ।।

द्रुम अरु कूँज लता सह बातिन,
में हर गोपिण पूछ रही।
नटखट श्याम सखा बिन जीवित,
क्यों अब लौं, निगलै न मही।।
विहग रहे उड़ छू कर अम्बर,
गाय रँभाय रहीं सब हैं।
हरित सभी ब्रज के तुम पादप,
बंजर तो हम ही अब हैं।।

मधुकर एक लखी तब गोपिन,
बोल पड़ीं फिर वे उससे।
भ्रमर कहो किस कारण गूँजन,
से बतियावत हो किससे।।
इन परमार्थ भरी कटु बातन,
से कछु काम नहीं अब रे।
रख अपने तक ज्ञान सभी यह,
भूल गईं सुध ही जब रे।।

मधुकर श्यामल मोहन श्यामल,
तू न कहीं छलिया वह ही।
कलियन रूप चखे नित नूतन,
है गुण श्याम समान वही।।
परखन प्रीत हमार यहाँ यदि,
रूप मनोहर वो धर लें।
यदि न कहो उनसे झट जा कर,
दर्श दिखा दुख वे हर लें।।
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लक्षण छंद:-

प्रथम रखें लघु चार तबै षट "भा" गण  संग व 'गा' रख लें।
सु'कनकमंजरि' छंद रचें यति तेरह वर्ण तथा दश पे।।

लघु चार तबै षट "भा" गण  संग व 'गा' = 4लघु+6भगण(211)+1गुरु]=23 वर्ण

{1111+211+211+211+211+211+211+2}

(भागवत का प्रसिद्ध गोपी गीत इसी छंद में है।)
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
27-01-19

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