Saturday, February 2, 2019

आल्हा/वीर छंद "विधान"

आल्हा छंद या वीर छंद दो पदों के चार चरणों में रचा जाता है। इसे मात्रिक सवैया भी कहते हैं। इसमें यति १६-१५ मात्रा पर नियत होती है। दो दो या चारों चरण समतुकांत होने चाहिए। 

16 मात्रिक वाले पद का विधान और मात्रा बाँट ठीक चौपाई छंद वाला है। 15 मात्रिक पद का अंत ताल यानि गुरु लघु से होना आवश्यक है। तथा बची हुई 12 मात्राएँ तीनों चौकल हो सकती हैं या फिर एक अठकल और एक चौकल हो सकती है। चौकल और अठकल के सभी नियम लागू होंगे। 

ध्यातव्य है कि इस छंद का ’यथा नाम तथा गुण’ की तरह इसके कथ्य अकसर ओज भरे होते हैं और सुनने वाले के मन में उत्साह और उत्तेजना पैदा करते हैं। जनश्रुति इस छंद की विधा को यों रेखांकित करती है - 

आल्हा मात्रिक छन्द, सवैया, सोलह-पन्द्रह यति अनिवार्य। 
गुरु-लघु चरण अन्त में रखिये, सिर्फ वीरता हो स्वीकार्य।
अलंकार अतिशयताकारक, करे राइ को तुरत पहाड़। 
ज्यों मिमयाती बकरी सोचे, गुँजा रही वन लगा दहाड़। 

परन्तु इसका यह अर्थ भी नहीं कि इस छंद में वीर रस के अलावा अन्य रस की रचना नहीं रची जा सकती।
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भारत के जवानों पर चार पंक्तियाँ।

सम्भाला है झट से मोर्चा, हुआ शत्रु का ज्योंही भान।

उछल उछल के कूद पड़े हैं, भरी हुई बन्दूकें तान।
नस नस इनकी फड़क उठी है, करने रिपु का शोणित पान।
झपट पड़े हैं क्रुद्ध सिंह से, भारत के ये वीर जवान।।


(बासुदेव अग्रवाल 'नमन' रचित)

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