Thursday, January 16, 2020

मुक्तक (संस्कृति, संस्कार, शिक्षा)

चरैवेति का मूल मन्त्र ले, आगे बढ़ते जाएंगे,
जीव मात्र से प्रेम करेंगे, सबको गले लगाएंगे,
ऐतरेय ब्राह्मण ने हमको, ये सन्देश दिया अनुपम,
परि-व्राजक बन सदा सत्य का, अन्वेषण कर लाएंगे।

(लावणी छंद आधारित)
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संस्कृति अरु संस्कार ये दोनों होते विकशित शिक्षा से,
आचार-विचार और रहन-सहन होते पोषित शिक्षा से,
अंधाधुंध पढ़ाते क्यों हम बच्चों को फिर भी अंग्रेजी,
सही दिशा क्या देश कभी पाएगा इस कलुषित शिक्षा से।

(16*2)
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मुक्तक (समर्पण)

मन में समर्पण जो नहीं जीने का फिर क्या अर्थ है,
उपकार को जो मानने में मन से ही असमर्थ है,
माता, पिता, गुरु, देश हित जिसमें समर्पण है नहीं,
ऐसे अधम पशु तुल्य का जीना जगत में व्यर्थ है।

(2212*4)
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जीवन-उपवन के माली हैं, गुरुवर वृन्द हमारे ये,
भवसागर में डगमग नौका, उसके दिव्य सहारे ये,
भावों का आगार बना कर, जीवन सफल बना देते,
बन्द नयन को ज्ञान ज्योति से, खोलें गुरुजन न्यारे ये।

(ताटन्क छंद आधारित)
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
21-11-16

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