Monday, January 6, 2020

ग़ज़ल (इश्क़ की मेरी इब्तिदा है वो)

बह्र:- 2122  1212   22

इश्क़ की मेरी इब्तिदा है वो,
हमनवा और दिलरुबा है वो।

मेरा दिल तो है एक दरवाज़ा,
हर किसी के लिए खुला है वो।

खुद में खुद को ही ढूंढ़ता जो बशर,
पारसा वो नहीं तो क्या है वो।

जब से खुद को ख़ुदा समझने लगा,
अपनी धुन में रमा हुआ है वो।

बाँध पट्टी जो जीता आँखों पे,
बैल जैसा ही जी रहा है वो।

दोष क्या दूसरों का है इस में,
अपनी नज़रों से खुद गिरा है वो।

दिल उसे बा-वफ़ा भले ही कहे,
जानता हूँ कि बेवफ़ा है वो।

ज़िंदगी दूसरों को दे जो 'नमन',
ज़िंदगी अपनी जी चुका है वो।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
8-10-19

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