Tuesday, December 24, 2019

विविध मुक्तक -1

जिंदा जब तक थे अपनों के हित तो याद बहुत
आये,
लिख वसीयतें हर अपने के कुछ कुछ तो ख्वाब सजाये,
पर याद न आयी उन अन्धो की जीवन की वीरानी,
जिन के लिए वसीयत हम इन आँखों की कर ना पाये।

(2*15)
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परछाँई देखो अतीत की, जब तू था बालक लाचार।
चलना तुझे सिखाया जिनने, लुटा लुटा कर अपना
प्यार।
रोनी रोनी सूरत क्यों है, आज उन्हीं की अंगुल थाम।
कद तेरा क्या आज बढ़ गया, रहा उन्हें जो तू दुत्कार।

(आल्हा छंद आधारित)
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चंद्र ! ग्रसित होना ही शायद, नियति तुम्हारी लगती है।
रूप बदल लो चाहे जितने, दीप्ति भला कब छुपती है।
भरे पड़े हैं राहु जगत में, पथ-पथ में, हर मोड़ों पे।
जो चमकेगा उसको ही तो, समय नागिनी डँसती है।

(लावणी छंद आधारित)
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
15-10-17

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