Friday, July 19, 2019

"गुर्वा विधान"

"गुर्वा" विधान:-

मेरे द्वारा प्रतिपादित यह "गुर्वा" हिन्दी साहित्य में काव्य की एक नवीन विधा है। यह हाइकु जैसी लघु संरचना है। जापानी में हाइकु, ताँका, सेदोका इत्यादि और अंग्रेजी में हाइकु, ईथरी आदि लघु कविताएं सिलेबल की गिनती पर आधरित हैं और बहुत प्रचलित हैं। ये कविताएं अपने लघु विन्यास में भी गहनतम भावों का समावेश कर सकती हैं। हिन्दी साहित्य में भी हाइकु, ताँका, सेदोका, चौका, पिरामिड आदि विधाएँ बहुत प्रचलित हो गई हैं। पर हिन्दी में ये विधाएँ जापानी, अंग्रेजी की तरह सिलेबल की गणना पर आधारित न होकर अक्षरों की गणना पर आधारित हैं। इसलिए इन का कलेवर उतना विस्तृत नहीं है। सिलेबल में ध्वनि के अनुसार एक से अधिक अक्षरों का प्रयोग होना सामान्य बात है।

मेरे द्वारा निष्पादित यह 'गुर्वा' कुल 3 पंक्तियों की संरचना है जिसमें 3 पंक्तियों में क्रमशः छह, पांच और छह गुरु वर्ण होते हैं। इस तरह की संरचना हाइकु, ताँका इत्यदि के रूप में हिन्दी में पहले से प्रचलित है पर मेरी यह नवीन विधा उन सब से इस अर्थ में भिन्न है कि प्रचलित विधाओं में अक्षरों की गिनती होती है जबकि इस नवीन विधा में केवल गुरु की गिनती होती है। इसमें पंक्ति का मान निर्धारित गुरु की संख्या से आँका जाता है, इसीलिए इसके लक्षण को सार्थक करता हुआ इसका छोटा सा नाम 'गुर्वा' दिया गया है। इसके तीन पद में क्रमशः 6 - 5 - 6 गुरू होने आवश्यक हैं। इसके उपरांत भी यह गुर्वा मात्रा या वर्णों की संख्या में बंधा हुआ नहीं है। इसे आगे और स्पष्ट किया जायेगा।

हिन्दी छंद शास्त्र में मात्राओं की गणना लघु और गुरु वर्ण के आधार पर होती है। लघु वर्ण के उच्चारण में जितना समय लगता है, गुरु वर्ण के उच्चारण में उसका दुगुना लगता है। लघु का मात्रा भार 1 तथा गुरु का 2 की संख्या से दिगदर्शित किया जाता है।

गुर्वा में हमारा प्रयोजन केवल गुरु से है। लघु वर्ण इस में गणना से मुक्त रहते हैं। गुर्वा की पंक्ति में आये प्रत्येक शब्द के गुरु वर्ण गिने जाते हैं। शब्द में आये एकल लघु नहीं गिने जाते, वे गणनामुक्त होते हैं। आगे लघु वर्ण और गुरु वर्ण पर प्रकाश डालते हुये इसे सोदाहरण और स्पष्ट किया जायेगा।

लघु वर्ण:- स्वतंत्र अक्षर जैसे क, म, ह आदि या संयुक्त वर्ण जैसे स्व, क्य, प्र आदि जब अ, इ, उ, ऋ और अँ से युक्त हों तो ऐसे अक्षर लघु कहलाते हैं। उदाहरण- क, चि, तु, कृ, हँ, क्ति आदि।

गुरु वर्ण:- स्वतंत्र या संयुक्त अक्षर जब आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः से युक्त हों तो ऐसे अक्षर गुरु कहलाते हैं। उदाहरण- का,  टी, फू, ये, जै, मो, रौ, दं, पः, प्रा, स्वी आदि।

इसके अतिरिक्त लघु वर्ण के पश्चात यदि संयुक्त वर्ण हो तो उस में जुड़े आर्ध वर्ण का भार उस लघु वर्ण पर आ जाता है और वह लघु वर्ण गुरु गिना जाता है। जैसे- अश्व, शुभ्र, प्रयुक्त, पवित्र में अ, शु, यु, वि गुरु वर्ण के रूप में गिने जाते हैं। अश्व शब्द में अ वर्ण अपने आप में लघु है परंतु उच्चारण में आधे श का इस पर भार लेकर उच्चरित किया जाता है इसलिये छंद शास्त्र के अनुसार इस अ को गुरु गिना जायेगा। श्व में कोई मात्रा नहीं लगी हुई है अतः वह लघु है। इस प्रकार अश्व शब्द में एक गुरु और एक लघु है। गुर्वा के लिये इस शब्द से एक गुरु प्राप्त होगा और श्व लघु गणनामुक्त है। संयुक्त वर्ण के पहले यदि गुरु है तो वह गुरु ही रहता है। जैसे - साध्य शब्द में सा पहले ही गुरु है, ध्य के आधे ध का भार पड़ने से भी यह गुरु ही रहेगा। साध्य शब्द से गुर्वा के लिये एक गुरु प्राप्त होगा और ध्य लघु गणनामुक्त रहेगा।

ह के साथ यदि आधा न, म , ल जुड़ा हुआ है तो ऐसे संयुक्त वर्ण के पहले आये लघु को कुछ शब्दों में गुरुत्व प्राप्त नहीं होता। जैसे- कन्हैया, तुम्हारा, मल्हार आदि में क, तु, म लघु ही रहते हैं। जिन्हें, इन्हे में जि, इ लघु ही रहते हैं। मल्हार से हमें केवल एक गुरु प्राप्त होगा। म और र दोनों लघु गणनामुक्त हैं। तुम्हारा शब्द में म्हा और रा के दो गुरु गिने जायेंगे। यह अपवाद की श्रेणी का शब्द है जिस में तु को गुरुत्व प्राप्त नहीं होता और यह लघु ही रहता है जो गुर्वा में गणनामुक्त है।

शाश्वत दीर्घ:- किसी भी शब्द में एक साथ आये दो लघु से शाश्वत दीर्घ बनता है जिसे एक गुरु के रूप में गिना जाता है। जैसे- दो अक्षरों के शब्द- तुम, हम, गिरि, ऋतु, रिपु आदि एक गुरु गिने जायेंगे। दो से अधिक अक्षरों के शब्द में एक साथ आये दो लघु वर्ण। जैसे- मानव, भीषण, कटुता में नव, षण और कटु एक गुरु गिना जायेगा। इन तीनों शब्दों में दो दो गुरु हैं। तक्षक में भी दो गुरु गिने जायेंगे। संयुक्त क्ष का त पर भार आने से त को गुरुत्व प्राप्त हो गया तथा क्षक शाश्वत दीर्घ के रूप में गुरु है। तीन अक्षरों के शब्द जिसमें तीनों अक्षर लघु हों तो अंतिम दो लघु मिल कर एक गुरु गिने जाते हैं और शब्द का प्रथम लघु गणनामुक्त रहता है। जैसे- कमल, अडिग, मधुर आदि में एक गुरु गिना जायेगा। हलचल, मधुकर, सविनय आदि में 2 गुरु गिने जायेंगे। घबराहट में 3 गुरु गिने जाते हैं- घब, रा और हट। समन्वय में स लघु, म= गुरु (न्व संयुक्त वर्ण), न्वय= गुरु। कुल 2 गुरु स गणनामुक्त। 'विचारणीय' में चा और णी केवल दो गुरु हैं। वि, र, य तीन लघु होने पर भी लघु का जोड़ा नहीं है। इसलिये ये गणनामुक्त हैं और गुर्वा के लिये इस शब्द में केवल दो गुरु हैं। 'विरचा' में भी दो गुरु हैं, विर और चा।

गुर्वा में गुरु का निर्धारण पंक्ति में आये एक एक शब्द के आधार पर करने से यह बहुत ही सरल है।

(1) एक अक्षर के बिना मात्रा के न, व गणनामुक्त हैं। था, है, क्यों, भी आदि एक गुरु के शब्द हैं।

(2) दो अक्षर के शब्द में दो गुरु होने के लिये या तो दोनों अक्षर दीर्घ मात्रिक हों या दुसरा अक्षर दीर्घ मात्रा के साथ संयुक्ताक्षर हो जिससे कि प्रथम अक्षर को गुरुत्व प्राप्त हो जाये। ऊपर बताये गये अपवादों पर ध्यान रहे। अन्य स्थिति में एक गुरु गिना जायेगा।

(3) तीन अक्षर के शब्द में एक गुरु तभी हो सकता है जब तीनों अक्षर लघु रहे, जैसे - प्रबल, पतित आदि। या जगणात्मक शब्द हो, जैसे -  उपाय, विचार, स्वतंत्र आदि। दोगुरु के मध्य का लघु गणनामुक्त है। जैसे - मेमना, ढोकला, देखना, छोकरी, नाशिनी। इन सब में दो गुरु गिने जायेंगे। त्रिअक्षरी में तीन गुरु होने के लिये तीनों अक्षर दीर्घमात्रिक हों या विश्वासी जैसे शब्दों में एक लघु को गुरुत्व प्राप्त हो।

तीन से अधिक अक्षरों के शब्दों में साथ साथ आये दो लघु पर विशेष ध्यान रखें। क्योंकि इनका मान एक गुरु का हैं। आचमन में आ और मन के मध्य का च गणनामुक्त तथा इस शब्द में दो गुरु हैं।

(4) सामासिक शब्द में गुरु गणना विग्रह के पश्चात मूल शब्दों में की जाती है। जैसे- मध्यप्रदेश में  2 गुरु गिने जायेंगे न कि 3। मध्य =1 और प्रदेश = 1 जबकि शब्द के मध्य में ध्य, प्र दो लघु एक साथ हैं। ऐसे ही रामकृपा में भी राम =1 और कृपा = 1, अलग अलग गुरु विचार होगा।  कुल दो गुरु। सोचविचार में सोच = 1 और विचार = 1, कुल दो गुरु। ऐसे शब्दों में दोनों शब्द अपना स्वतंत्र अर्थ रखते हैं।

जिन रचनाकारों को मात्रा गणना का सम्यक ज्ञान है और जो छंदबद्ध सृजन करने में सिद्धहस्त हैं उनके लिये इस विधा में लघु वर्ण का गणनामुक्त रहने के अतिरिक्त कुछ भी नया नहीं है।सर्वशक्तिमान में र्व, क्ति और न तीनों गणनामुक्त हैं। इस शब्द में तीन लघु हैं पर लघु की जोड़ी एक भी नहीं है। र्व, क्ति संयुक्त हैं जिनका भार स और श पर आ रहा है इसलिये स और श को गुरुत्व प्राप्त हो गया। इस प्रकार इस शब्द में तीन गुरु हुये।

पंक्तियों की स्वतंत्रता:- इस विधा में भी हाइकु, ताँका, चौका की तरह पंक्तियों की स्वतंत्रता रखना अत्यन्त आवश्यक है। हर पंक्ति अपने आप में स्वतंत्र होनी चाहिये। यह केवल 17 गुरु की संरचना है और उसी में गागर में सागर भरना होता है अतः चमत्कारिक बात कहें। रचनाकार शब्द चित्र खींच सकता है, अपने चारों ओर के परिवेश का वर्णन कर सकता है या कुछ भी अनुभव जनित भावों को अभिव्यक्त कर सकता है।

समतुकांतता:- रचना की तीन पंक्तियों में से कोई भी दो पंक्तियों में समतुकांतता आवश्यक है। तीनों पंक्तियाँ भी समतुकांत हो सकती हैं। यह तुकांतता शब्दांत में केवल स्वर साम्य की भी रखी जा सकती है। जैसे आ के साथ आ की, ई के साथ ई की, आअ के साथ आअ, एअ के साथ एअ, अअ के साथ अअ आदि।

मैं 'गुर्वा' की अपनी प्रथम रचना माँ शारदा के चरणों में अर्पित करते हुये इस विधान को और स्पष्ट करता हूँ।

शारद वंदन "गुर्वा" :-

वंदन वीणा वादिनी, (2, 2, 2 तीन शब्दों में = 6 गुरु।)
मात ज्ञान की दायिनी, (1, 1, 1, 2 चार शब्दों में 5 गुरु।)
काव्य बोध का मैं कांक्षी। (1, 1, 1, 1, 2 पांच शब्दों में = 6 गुरु।)

(रचना में 8, 8, 8 कुल 24 वर्ण। 13, 13, 14 कुल 40 मात्रा।)

लक्षण "गुर्वा" :-

रस शर ऋतु क्रम से रखें, (1, 1, 1, 1, 1, 1 छह शब्दों में = 6 गुरु।)
मात्र दीर्घ का कर गणन, (1, 1, 1, 1, 1 पांच शब्दों में 5 = गुरु।)
'गुर्वा' मुखरित कर चखें। (2, 2, 1, 1 चार शब्दों में =  6 गुरु।)

(प्रथम पंक्ति में षट रस, पंच शर, षट ऋतु संख्यावाचक हैं। रचना में 11, 10, 10 कुल 31 वर्ण। 13, 13, 13 कुल 39 मात्रा।)

आप स्वयं देखें कि केवल गुरु वर्ण की गणना की अवधारणा, शब्द में एकल रूप से आये लघु वर्णों की गणना से छूट आपके समक्ष सृजन के नव आयाम खोल रही है। इन छूट से हिन्दी में भी यह विधा जापानी और इंगलिश में प्रचलित सिलेबल गणना जितना विस्तृत कलेवर ग्रहण कर रही है। सिलेबल का निर्धारण उच्चारण पर आधारित रहता है जबकि गुरु गणना, इसमें छूट आदि स्वरूप पर आधारित है जिस में संदेह का स्थान नहीं। इतनी छूट सृजकों की कल्पना को नवीन ऊँचाइयाँ प्रदान कर रही है। साथ ही पंक्तियों को अनेक छंदों की लय के अनुसार ढाला जा सकता है। तुकांतता रचना को कविता का स्वरूप देती है। पंक्तियाँ निश्चित की हुई गुरु की संख्या से आबद्ध हैं फिर भी गुर्वा वर्णों की संख्या और मात्रा की संख्या या उनके क्रम के बंधन में बंधा हुआ नहीं है। इसकी यह स्वतंत्रता सृजक को अनंत आकाश उपलब्ध कराती है जिसमें वह कल्पना की उन्मुक्त उड़ान भर सके।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-06-19

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