Saturday, July 6, 2019

गीतिका (राम सुमिरन बिना गत नहीं)

(मापनी:- 212  212  212)

राम सुमिरन बिना गत नहीं,
और चंचल ये मन रत नहीं।

व्यर्थ सब कुछ है संसार में,
नाम-जप की अगर लत नहीं।

हैं दिखावे ही जप-तप सभी,
भाव यदि हैं समुन्नत नहीं।

प्राप्त नर-तन का होना वृथा,
भक्ति प्रभु की जो अक्षत नहीं।

लाभ उसकी न चर्चा से कुछ,
बात जो शास्त्र-सम्मत नहीं।

नर वे पशुवत हैं, पर-पीड़ लख
भाव जिनके हों आहत नहीं।

नैन प्यासे 'नमन' मन विकल,
प्रभु-शरण बिन कहीं पत नहीं।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
8-04-18

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