Thursday, April 11, 2019

कामरूप छंद "गरीबों की दुनिया"

कैसी गरीबी, बदनसीबी, दिन सके नहिं काट।
हालात माली, पेट खाली, वस्त्र बस हैं टाट।।
अति छिन्न कुटिया, भग्न खटिया, सार इसमें काम।
है भूमि बिस्तर, छत्त अंबर, जी रहे अविराम।।

बच्चे अशिक्षित, घोर शोषित, सकल सुविधा हीन।
जन्मे अभागे, भीख माँगे, जुर्म में या लीन।।
इक दूसरे से, नित लड़ें ये, गालियाँ बक घोर।
झट थामते फिर, भूल किर किर, प्रीत की मृदु डोर।।

घर में न आटा, वस्तु घाटा, सह रहे किस भांति।
अति सख्त जीवन, क्षीण यौवन, कुछ न इनको शांति।।
पर ये सुखी हैं, नहिं दुखी हैं, मग्न अपने माँहि।
मिलजुल बिताये, दिन सुहाये, पर शिकायत नाँहि।।

इनकी जरूरत, खूब सीमित, कम बहुत सामान।
पर काम चलता, कुछ न रुकता, सब करे आसान।।
हँस के बितानी, जिंदगानी, मन्त्र मन यह धार।
जीवन बिताते, काट देते, दीनता दुश्वार।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
12-11-17

No comments:

Post a Comment